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MIT Water Generator: जादुई वॉटर जनरेटर, रेगिस्तान में भी हवा से निकलेगा मीठा पानी
MIT का अनोखा वॉटर जनरेटर हवा से मीठा पानी निकालता है। मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क और सोलर एनर्जी से बना यह उपकरण रेगिस्तान जैसी जगहों पर भी 20% से कम नमी में काम करता है। जल संकट का सस्ता और टिकाऊ समाधान।
MIT Water Generator (Image Credit-Social Media)
MIT Water Generator: लगातार घटता जलस्तर का संकट पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी चुनौती बन चुका है। देश के कई ऐसे इलाके हैं जहां प्यास बुझाने के लिए लोग क्या-क्या जतन नहीं कर रहे। कभी कुओं में झांकते हैं, तो कभी नदियों और झीलों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन प्रकृति के असंतुलन से जब बारिश थम जाए और धरती के नीचे का पानी भी खत्म होने लगे, तब इंसान प्रकृति के इस कहर को झेलने के लिए बेबस हो जाता है। आज सिर्फ देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के करोड़ों लोग ऐसे ही हालात से गुजर रहे हैं। इसी बीच अमेरिका के मशहूर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक दुनिया को दिखाई है, जो किसी जादू से कम नहीं है। यह उपकरण हवा में तैरती नमी को पकड़कर उसे पीने योग्य साफ पानी में बदल देता है। वह भी बिना किसी बिजली के, सिर्फ सूरज की रोशनी की मदद से। आइए जानते हैं सूखे में पानी की आस बनने वाले इस अनोखे यंत्र के बारे में -
पानी के संकट पर क्या कहता है विश्व स्वास्थ्य संगठन
जल संकट की चुनौती को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े बताते हैं कि करीब 2.2 अरब लोग ऐसे हैं जिनके पास साफ पानी की सुविधा नहीं है। जहां हर तीसरा इंसान प्यास और गंदे पानी की बीमारी से जूझ रहा है। अफ्रीका के सूखे मैदानों से लेकर मध्य पूर्व की तपती रेत तक और भारत के कई गांवों तक, पानी अब सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और भूजल का अत्यधिक दोहन मिलकर इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। ऐसे माहौल में MIT का यह नया आविष्कार किसी जीवनदायी संजीवनी की तरह सामने आया है।
हवा से पानी खींचती है MIT की अनोखी खोज
वैज्ञानिकों ने जो वॉटर जनरेटर बनाया है, वह हवा से सीधे पीने योग्य पानी खींच लेता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें बिजली की कोई जरूरत नहीं होती। यह पूरी तरह से सोलर पॉवर से चलता है। इसे रेगिस्तानों और उन जगहों के लिए तैयार किया गया है जहां नमी बेहद कम होती है और पारंपरिक साधनों से पानी जुटाना नामुमकिन लगता है। एरिज़ोना के रेगिस्तान में इसका सफल परीक्षण किया गया और वहां भी इसने लगातार साफ पानी उपलब्ध करवा कर अपनी प्रमाणिकता को साबित किया है।
MIT की मशीन एक धातु-कार्बनिक ढांचा इस तरह करता है काम
इस उपकरण की तकनीक किसी विज्ञान-कथा जैसी लग सकती है। इसमें एक खास पदार्थ इस्तेमाल होता है जिसे मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क यानी MOF कहा जाता है। यह एक तरह की झरझरी संरचना होती है, जो स्पंज की तरह हवा से नमी को खींचकर अपने भीतर समेट लेती है। जब इस पर सूरज की गर्मी पड़ती है, तो यह नमी पानी की बूंदों में बदलकर बाहर निकल आती है। यही पानी इकठ्ठा होकर एक छोटे से टैंक में जमा हो जाता है। केवल एक किलो MOF की मदद से हर दिन लगभग 2.8 लीटर पानी तैयार किया जा सकता है। खास बात यह है कि यह तकनीक उन इलाकों में भी काम करती है जहां हवा की नमी 20 प्रतिशत से भी कम होती है।
सूरज की ऊर्जा से संचालित होता है ये उपकरण
पानी खींचने वाले सारे उपकरण बिजली पर निर्भर होते हैं। लेकिन MIT का यह उपकरण पूरी तरह सूरज की ऊर्जा पर निर्भर है। इसका मतलब है कि चाहे गांव में बिजली न हो, या रेगिस्तान में कोई तार न पहुंचे, फिर भी यह उपकरण आसानी से पानी बना सकता है। यह पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है क्योंकि इसमें किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता। बिजली का खर्चा न होने से यह गरीब से गरीब इंसान तक पहुंच सकता है और लंबे समय तक बिना ज्यादा देखरेख के चलता रहेगा।
प्रयोग के दौरान बेहद सूखी हवा के बीच भी लगातार पानी बनाने में रहा सफल
जब इस उपकरण को एरिज़ोना के रेगिस्तान में परखा गया, तो वैज्ञानिक खुद भी हैरान रह गए। दिन में तेज धूप और बेहद सूखी हवा के बीच भी यह लगातार पानी बनाने में सफल रहा। इस प्रयोग के सफल होने के बाद अब तब तकनीक उन इलाकों के लिए वरदान साबित होने जा रही है जहां लोग एक एक बूंद पानी के लिए भी तरसने को मजबूर हैं। यह तकनीक अब सिर्फ किताबों और लैब तक सीमित नहीं है, बल्कि असल जिंदगी में भी कारगर साबित होने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
आने वाले सालों की योजनाएं
वैज्ञानिकों की योजना है कि 2026 से इस तकनीक का उपयोग अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे इलाकों में किया जाए, जहां लोग सालों से पानी की कमी से जूझ रहे हैं। इसके कई और उपयोग भी हैं। आपातकालीन स्थितियों में राहत कार्यों के दौरान यह तुरंत पानी उपलब्ध करा सकता है, सेना के लिए रेगिस्तानी मोर्चों पर यह जीवनरक्षक साबित हो सकता है। भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों में भी इंसान की प्यास बुझाने का काम कर सकता है। जब मंगल या चांद पर बस्ती बसाने की बात होगी, तो ऐसी ही तकनीक वहां जीवन संभव बनाएगी। सबसे उत्साहजनक बात यह है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने के बाद इस उपकरण से पानी बनाने की लागत बेहद कम होगी। अनुमान लगाया गया है कि यह लगभग 0.02 पाउंड प्रति लीटर यानी सिर्फ दो रुपये के आसपास बैठेगी। यह कीमत बोतलबंद पानी से कई गुना सस्ती है। इसका मतलब है कि गरीब इलाकों में रहने वाले लोग भी इसे आसानी से इस्तेमाल कर पाएंगे और लंबे समय तक इससे लाभ उठा सकेंगे।
जब दुनिया भर के विशेषज्ञ यह चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले समय में युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पानी के लिए होंगे, तब MIT की यह खोज नई रोशनी लेकर आई है। यह उपकरण न सिर्फ विज्ञान की उपलब्धि है बल्कि मानवता के अस्तित्व की सुरक्षा का एक रास्ता भी है। यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो गांव-गांव और शहर-शहर साफ पानी उपलब्ध हो सकेगा और प्यास के कारण होने वाली त्रासदियां धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी।


