Amarnath Cave: इतिहास के पन्नों में अमरनाथ गुफा, क्या सच में गड़रिये ने की थी 'बाबा बर्फानी' की खोज?

Amarnath Cave History: हर वर्ष जब 'बाबा बर्फानी' के दर्शन के लिए पवित्र अमरनाथ यात्रा शुरू होती है, तो उसके साथ ही...

Shailendra Singla
Published on: 11 July 2026 5:06 PM IST (Updated on: 11 July 2026 5:12 PM IST)
Amarnath Cave: इतिहास के पन्नों में अमरनाथ गुफा, क्या सच में गड़रिये ने की थी बाबा बर्फानी की खोज?
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Amarnath Cave History: हर वर्ष जब 'बाबा बर्फानी' के दर्शन के लिए पवित्र अमरनाथ यात्रा शुरू होती है, तो उसके साथ ही इतिहास की व्याख्याओं को लेकर एक पुराना विवाद फिर से सिर उठाने लगता है। कई समकालीन लेखों और विमर्शों में यह दावा किया जाता है कि इस पवित्र गुफा की खोज वर्ष 1850 में 'बूटा मलिक' नामक एक मुस्लिम गड़रिये (चरवाहे) ने की थी। परंतु, यदि हम भारत के प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को खंगालें, तो यह बात पूरी तरह से असत्य और अतार्किक सिद्ध होती है।

सच्चाई यह है कि जब इस धरती पर इस्लाम का उदय भी नहीं हुआ था, उससे कई शताब्दी पूर्व से ही सनातन संस्कृति के अनुयायी इस अलौकिक गुफा में बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं। आइए, अमरनाथ गुफा के वास्तविक और प्रामाणिक इतिहास पर एक नज़र डालते हैं:

1. कल्हण की 'राजतरंगिणी' और राजा सामदीमत का वर्णन

कश्मीर के प्रामाणिक इतिहास को समझने के लिए ११वीं-१२वीं शताब्दी में महाकवि कल्हण द्वारा रचित 'राजतरंगिणी' सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है।

राजतरंगिणी में स्पष्ट उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत (जिनका कालखंड ईसा पूर्व से लेकर प्रारंभिक शताब्दियों के बीच माना जाता है) परम शैव भक्त थे।

वे पहलगाम के वनों के आगे स्थित बर्फ के प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे।

पूरे हिमालय क्षेत्र में बर्फ का प्राकृतिक शिवलिंग केवल अमरनाथ गुफा में ही बनता है। इससे यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि जिस गुफा की खोज 1850 में होने का दावा किया जाता है, वहाँ राजा-महाराजा सदियों पहले से दर्शन कर रहे थे।

2. नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता के साक्ष्य

छठी शताब्दी में लिखे गए 'नीलमत पुराण' में कश्मीर के भूगोल, लोककथाओं और धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत जानकारी मिलती है। इसमें 'अमरेश्वरा' (अमरनाथ) तीर्थ यात्रा का स्पष्ट और सीधा उल्लेख है, जिससे पता चलता है कि छठी शताब्दी में भी लोग यहाँ नियमित यात्रा किया करते थे।

इसी प्रकार, प्राचीन 'बृंगेश संहिता' में अमरनाथ यात्रा के मार्ग का हूबहू वर्णन मिलता है। इस संहिता के अनुसार, गुफा की ओर जाते समय श्रद्धालु अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती नदी में धार्मिक अनुष्ठान करते थे। यह वही मार्ग है जो आज भी अमरनाथ यात्रा के लिए उपयोग किया जाता है।

3. मध्यकालीन इतिहास में अमरनाथ गुफा का ज़िक्र

इतिहासकारों का एक धड़ा यह तर्क देता है कि बीच के कालखंड में यह गुफा लुप्त हो गई थी, लेकिन मध्यकाल के कई मुस्लिम शासकों और इतिहासकारों के दस्तावेज़ इस दावे को खारिज करते हैं:

सुल्तान जैनुल आबिदीन (1420-1470 ई.): कश्मीर के इस प्रसिद्ध शासक ने स्वयं अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी, जिसका प्रामाणिक उल्लेख मध्यकालीन इतिहासकार जोनराज ने अपनी रचनाओं में किया है।

आईन-ए-अकबरी (16वीं शताब्दी): मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक, अबुल फजल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'आईन-ए-अकबरी' में अमरनाथ को हिंदुओं का एक अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल बताया है। उसने लिखा है: "गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है, जो १५ दिनों तक चंद्रमा के बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता है और दो गज से अधिक ऊँचा हो जाता है, और चंद्रमा के घटने के साथ ही वह भी विलुप्त हो जाता है।"

बर्नियर ट्रेवल्स: १७वीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी चिकित्सक और यात्री फ्रांसिस बर्नियर ने भी अपनी यात्रा वृत्तांत में इस चमत्कारी बर्फ के शिवलिंग का अद्भुत वर्णन किया है।

यात्रा में व्यवधान और 'खोज' का भ्रम

सवाल उठता है कि यदि इतिहास इतना स्पष्ट है, तो बूटा मलिक की कहानी कहाँ से आई? वास्तव में, १४वीं शताब्दी के बाद कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के हमलों और हिंदुओं के ज़बरन निष्कासन के कारण स्थिति अत्यंत अशांत हो गई थी। इसके परिणामस्वरूप यह दुर्गम यात्रा लगभग तीन शताब्दियों तक आम श्रद्धालुओं के लिए बाधित या अत्यंत सीमित रही।

कालांतर में, जब स्थिति सामान्य हुई और स्थानीय चरवाहों (जिनमें बूटा मलिक का परिवार शामिल था) ने कश्मीरी पंडितों और साधुओं को दोबारा उस मार्ग और गुफा तक पहुँचने में मदद की, तो उसे भूलवश "गुफा की खोज" का नाम दे दिया गया। कृतज्ञतावश, अमरनाथ में चढ़ने वाले चढ़ावे का एक निश्चित भाग आज भी उस गड़रिये के वंशजों को दिया जाता है।

यह व्यवस्था सामाजिक सौहार्द और सहयोग का प्रतीक तो हो सकती है, लेकिन इसके आधार पर हज़ारों वर्ष पुराने नीलमत पुराण, राजतरंगिणी और आईन-ए-अकबरी के लिखित इतिहास को नकार कर यह कहना कि गुफा की खोज मात्र १७० साल पहले हुई थी, पूरी तरह से ऐतिहासिक रूप से अनुचित है।

अमरनाथ गुफा एक अनादि, प्राकृतिक और पौराणिक धरोहर है। भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) भी इसकी प्राचीनता को हज़ारों वर्ष पुराना मानता है। इतिहास के इस सत्य को जानना और अपनी भावी पीढ़ी को बताना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है, ताकि परसेप्शन (धारणाओं) के खेल में वास्तविक इतिहास कहीं लुप्त न हो जाए।

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