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Ambubachi Mela: क्यों 4 दिन बंद रहते हैं कामाख्या मंदिर के कपाट? जानिए रजस्वला देवी की अनोखी परंपरा
Ambubachi Mela Ke Bare Me Jankari: जानिए कामाख्या मंदिर में मनाए जाने वाले इस अद्भुत शक्ति पर्व का महत्व, तंत्र साधना, नारीत्व, मासिक धर्म की सांस्कृतिक परंपराएं और भारतीय समाज में स्त्री शक्ति की अवधारणा।
Ambubachi Mela Ke Bare Me Jankari
Ambubachi Mela: भारत विविध संस्कृतियों, रंगों, ऋतुओं, राग-रागिनियों और अनंत उत्सवों का देश है। जहां हर बदलते मौसम में रंग बदलते हैं, रस बदलते हैं और हर ऋतु अपनी एक नई सुगंध लेकर आती है। लेकिन महिलाओं के जीवन में इन ऋतुओं के साथ एक और ऋतु पूरे यौवन भर साथ चलती है, वह है मासिक ऋतु। भारत के कई राज्यों में महिलाओं में मासिक धर्म को प्राकृतिक, पवित्र और नारीत्व के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मुख्य रूप से ओडिशा में रज पर्व और असम में अंबुबाची मेला और तुलुनी बिया में इसके भव्य सांस्कृतिक उत्सव होते हैं।
भारत भूमि पर वैदिक काल से ही शक्ति पूजा का प्रचलन रहा है। यहां शिवलिंग और योनिपीठ पुरुष और प्रकृति का प्रतीक माने जाते हैं। दोनों के बगैर यह सृष्टि असंभव है।
ऋग्वेद के देवीसूक्त (मंडल 10, सूक्त 125, मंत्र 5) के प्रसिद्ध श्लोक में जगतजननी माँ जगदम्बा (देवी वाक्) अपनी सर्वशक्तिमत्ता और ऐश्वर्य का वर्णन कर रही हैं-
"अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः ।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥"
कामरूप में मां की योनी पीठ के आसपास अनेक स्थानों पर सृष्टि के आदि बीज के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं।
अब जबकि मां कामाख्या के वर्ष में एक बार रजस्वल्ला होने पर अंबुबासी या अंबुबाची मेला शुरू होने एवं 4 दिन मंदिर के कपाट बंद होने का समय नजदीक आ चुका है तो पूरा नीलाचल पहाड़ देश भर से आए साधु -संन्यासियों और तांत्रिकों से आच्छादित हो गया है, जो कि इस महायोग के चार दिन अपनी तंत्र साधना में लीन रहेंगे। मां के रजस्वला होने का यह समय तंत्र सिद्धि और साधना के लिए सबसे अधिक ऊर्जा वाला होता है क्योंकि इसका अर्थ है कि वह उर्वर है, सर्जन करने वाली है। भले ही चार दिन मंदिर के कपाट बंद रहते हैं पर इस समय नीलाचल पहाड़ की ऊर्जा अद्भुत, अद्वितीय और रहस्यमयी होती है।
हर वर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार अंबुबासी महायोग आषाढ़ महीने में मनाया जाता है, जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है, अर्द्रा नक्षत्र आता है, जबकि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह महायोग जून में एक निश्चित समय पर ही पड़ता है। हिंदू पंचांग में तिथि की घट-बढ़ और सौर मास व चंद्र मास के गणितीय अंतर (संक्रांति) के कारण महायोग की शुरुआत कभी-कभी ज्येष्ठ के आखिरी दिनों में हो जाती है। अतः तिथियां भले ही किसी भी महीने में पड़ें, लेकिन मूल परंपरा हमेशा वही रहती है—जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है, तब माता के रजस्वला होने का समय माना जाता है। अंबुबासी महायोग के समय असम में कामाख्या मंदिर समेत सभी मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं। इस बार यह मेला 22 जून से 26 जून तक आयोजित होगा। यह मेला कोई सामान्य उत्सव नहीं है। 22 जून की रात को प्रवृत्ति होगी यानी मां कामाख्या मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे। मां कामाख्या के वार्षिक रजस्वला काल में तीन दिन का एकांतवास रहता है। इसके बाद निवृत्ति होगी, 26 जून की सुबह विशेष स्नान और पूजा के उपरांत मंदिर को भक्तों के दर्शनों के लिए खोल दिया जायेगा।
जून महीने के मध्य में जब सूर्य ने मिथुन राशि में प्रवेश किया, ओडिशा ने 14 से 17 जून तक 'भूदेवी' यानी धरती माता के मासिक धर्म से गुजरने का उत्सव रज पर्व मनाया, जिसमें माना जाता है कि इन तीन दिनों के दौरान धरती मानसून के आगमन से पहले खुद को उपजाऊ बनाती है। उसे आराम देने के प्रतीक के रूप में, इन तीन दिनों तक खेतों की जुताई, बुवाई या मिट्टी खोदने जैसे कृषि कार्य पूरी तरह से बंद रहते हैं। यह त्योहार मुख्य रूप से महिलाओं एवं कुंवारी लड़कियों का त्योहार है जो उनके आराम और प्रकृति के सम्मान को समर्पित होता है। पूरे साल घर-परिवार का काम करने वाली महिलाओं को इन तीन दिनों रसोई और गृहकार्य से छुट्टी दी जाती है। घर के सारे काम पुरुष करते हैं। इस समय नए कपड़े व पारंपरिक आभूषण पहनना, हाथ-पैरों में आलता लगाना, मीठा पान खाने का विशेष चलन है। लड़कियां पेड़ों की शाखाओं पर सजे हुए झूलों 'रज डोल' का आनंद लेती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाती है। घरों में चावल के आटे, उड़द की दाल नारियल, गुड़, इलायची और घी से बना एक विशेष पारंपरिक मीठा 'पोडा पीठा' बनाया जाता है, जो नारीत्व और पृथ्वी की उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। चौथे दिन 'बसुमती स्नान' के दिन महिलाएं घर की चक्की के पत्थर को धरती माता का प्रतीक मानकर हल्दी के लेप से नहलाती हैं, सिंदूर-फूल और सभी मौसमी फल अर्पित करती हैं।
असम के पारंपरिक हिंदू समाज में लड़कियों के पहली बार मासिक धर्म होने पर 'तुलोनी बिया' नाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसे अलग-अलग स्थानों पर 'शांति बिया', 'सानु बिया' या 'फूल बिया' कहा जाता है। लड़की को 3 से 7 दिनों तक घर के बाहर एक अलग कमरे में आराम करने और पौष्टिक आहार करने दिया जाता है, पुरुष मुख दर्शन निषेध होता है। उसके बाद, गाँव की महिलाओं द्वारा लड़की को विशेष धार्मिक स्नान कराकर , पारंपरिक मेखला-चादर पहनाकर सजाया जाता है। 'बियानाम' यानी विवाह के गीत गाते हैं और एक-दूसरे के चेहरे पर हल्दी या चावल का आटा यानी पीठागुड़ी लगाते हैं। कुछ क्षेत्रों में, केले के पेड़ के साथ एक प्रतीकात्मक विवाह भी किया जाता है।
तमिलनाडु में लड़की को पहली बार मासिक धर्म होने को नौ दिनों के समारोह मंजल नीरट्टू विझा या हल्दी स्नान उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लड़की को सगे-संबंधियों द्वारा पारंपरिक साड़ी और गहने पहनाए जाते हैं। कर्नाटक में भी पहले मासिक धर्म के समय हाफ-साड़ी उत्सव मनाने की समृद्ध परंपरा है, इसे ऋतुशुद्धि या ऋतु कला संस्कार कहा जाता है। लड़की को पहली बार साड़ी पहनाई जाती है और पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पहली बार रजस्वला होने पर लड़की को उपहार, नए कपड़े और मिठाइयां दी जाती हैं, उसके बालों को फूलों से सजाया जाता है, जिसे पेद्दामनिशी पंडागा कहते हैं। इस प्रकार देश के विभिन्न राज्यों में लगभग एक ही प्रकार के रीति-रिवाजों के माध्यम से लड़की के बचपन से स्त्रीत्व में प्रवेश करने के संक्रमण काल को उत्सव के साथ मनाया जाता है।
भारत में मासिक धर्म का विस्तृत उल्लेख प्राचीन वैदिक साहित्य और आयुर्वेद ग्रंथों में मिलता है। समय के साथ इन ग्रंथों की मान्यताएँ और दृष्टिकोण बदलते रहे हैं। मिथकों के अनुसार, इंद्र द्वारा वृत्त नाम के एक ब्राह्मण की हत्या से उत्पन्न ब्रह्म-हत्या के पाप का एक अंश पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों ने ग्रहण किया था। इस श्राप के फलस्वरूप स्त्रियों को हर महीने मासिक धर्म होना माना गया। वेदों में मासिक धर्म के दौरान कठोर छुआछूत, अशुद्धि या मंदिर जाने पर प्रतिबंध का उल्लेख नहीं मिलता है। प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों सुश्रुत संहिता और चरक संहिता में मासिक धर्म को 'रज' या 'आर्तव' कहा गया। इसके अलावा अष्टांग हृदयम् में 'रजस्वला परिचर्या' के नियम का वर्णन है। इन ग्रंथों में इसे शरीर की एक प्राकृतिक और मासिक शुद्धि की वैज्ञानिक प्रक्रिया माना गया। बाद के काल में, ग्रंथों में मासिक धर्म के नियमों और सामाजिक वर्जनाओं का उल्लेख मिलता है। इनमें रजस्वला स्त्री के लिए तीन दिनों तक सामाजिक और धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने के नियम बनाए गए हैं। पूर्व वैदिक तांत्रिक संस्कारों में रजस्वल्ला महिलाएँ या उनका स्पर्श अशुभ नहीं माना जाता था।
इस संदर्भ में हम महाभारत काल को कैसे भूल सकते हैं,
जब युधिष्ठिर जुएं में अपने भाइयों और भार्या द्रौपदी समेत सब कुछ हार गए थे, तब दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी को हस्तिनापुर के भरे दरबार में खींच लाया था।
द्रौपदी ने तब दुशासन को कहा था कि वह इस समय रजस्वला है और बिना ऋतु स्नान किए दरबार में नहीं जा सकती तथा उन्होंने राजसी वस्त्रों और श्रंगार के स्थान पर केवल एक ही वस्त्र पहना हुआ है। रजस्वला अवस्था में स्त्री को सार्वजनिक रूप से सभा में लाना वर्जित है। द्रौपदी ने दरबार में मौजूद भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और धृतराष्ट्र से इस अत्याचार को रोकने की प्रार्थना की पर किसी ने ऐसा नहीं किया। बाद में इस घटना ने महाभारत के युद्ध में कुरुवंशियों के नाश में एक निर्णायक भूमिका निभाई।
हमने मासिक धर्म को जीव विज्ञान की एक प्रक्रिया नहीं माना बल्कि उसे कठोर छुआछूत से जोड़कर इसे महिलाओं की एक कमी या कमजोरी मान लिया है। जबकि हम भूल गए हैं कि मासिक धर्म की देवी अशुद्ध नहीं बल्कि पवित्र है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्यों कर मां कामाख्या के रजस्वल्ला होने के समय पूरे देश भर के साधु -सन्यासी तांत्रिक और भक्तगण आते। मां कामाख्या का इस वार्षिक रजस्वल्ला में मिलता लाल वस्त्र याद दिलाता है कि यही शक्ति है, इसी से सृजन है , यही उर्वरा का संकेत है , यही चेतना है और बगैर इस शक्ति के शिव भी शव हैं। इस मासिक चक्र के बाद ही तो प्रजनन आता है। अगर सावन न आए तो पृथ्वी में बीज कैसे उत्पन्न होगा। मासिक धर्म के कारण ही तो वे सृजन कर्ता होती हैं, नई पीढ़ी को जन्म दे पाती हैं। अगर यह मासिक धर्म ही खत्म हो जाए तो नई पीढ़ी का तो कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता है। पुरुष तो सृजनकर्ता नहीं होता। आज हमने इतने आदर्श बना लिए हैं कि हम प्रकृति और पुरुष के मौलिक संबंध को ही भूल गए हैं। भारतीय स्थापत्य कला और धर्म में खजुराहो और कोणार्क में नक्काशी हुए मिथुन जोड़े मात्र आलंकारिक सजावट नहीं, वे धर्मशास्त्र हैं सृजन का, सृष्टि का।
अंशु सारडा अन्वि


