Ancient Temple India: राम मंदिर केस में जिन ईंटों का हुआ जिक्र, उन्हीं से बना है ये प्राचीन मंदिर... जानें पूरी कहानी

Ancient Temple India: फतेहपुर के तेंदुली गांव का चतुर्भुजी बाबा मंदिर अपनी प्राचीन ‘ककई ईंटों’ के लिए चर्चित है। जानें इसका इतिहास, वास्तुकला और अयोध्या से जुड़ा संदर्भ।

Jyotsana Singh
Published on: 29 Aug 2026 5:38 PM IST (Updated on: 29 Aug 2026 5:39 PM IST)
Ancient Temple India: The Temple Built With Bricks Linked to the Ram Temple Case
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Ancient Temple India: The Temple Built With Bricks Linked to the Ram Temple Case


Ancient Temple India: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसकी दीवारों में सिर्फ ईंटें नहीं, बल्कि सदियों पुराना इतिहास सांस लेता है। गांव के लोग इसे चतुर्भुजी बाबा का मंदिर कहते हैं। मंदिर की खास ‘ककई ईंटों’ की चर्चा अयोध्या राम मंदिर मामले से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों के संदर्भ में भी हुई थी। गर्भगृह में कमल के आकार के चबूतरे पर विराजमान भगवान विष्णु की चार भुजाओं वाली प्रतिमा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। लेकिन संरक्षण के अभाव में इतिहास की यह अनमोल धरोहर धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है।

गांव की पहचान बना चतुर्भुजी बाबा का मंदिर

फतेहपुर की बिंदकी तहसील के तेंदुली गांव में स्थित यह मंदिर पहली नजर में भले ही किसी सामान्य ग्रामीण मंदिर जैसा लगे, लेकिन इसकी एक-एक ईंट अपने भीतर पुरानी स्थापत्य परंपरा की कहानी समेटे हुए है। गांव में इसे भगवान विष्णु के मंदिर के रूप में पूजा जाता है और स्थानीय लोग श्रद्धा से इसे चतुर्भुजी बाबा कहते हैं। मंदिर पूर्व दिशा की ओर बना है और इसके गर्भगृह में भगवान विष्णु की चार भुजाओं वाली खड़ी प्रतिमा स्थापित है।

भगवान विष्णु की इस प्रतिमा को कमल के आकार में बने चबूतरे पर स्थापित किया गया है। यही दृश्य मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। सामान्य दिनों में भी यहां लोगों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दौरान मंदिर में विशेष रौनक दिखाई देती है। इसकी वजह यह है कि भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।

एक रात में बना था मंदिर, आज भी सूरज की पहली किरण पहुंचती है गर्भगृह तक

तेंदुली के इस प्राचीन मंदिर को लेकर गांव में कई ऐसी मान्यताएं हैं, जो इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं रहने देतीं, बल्कि रहस्य और आस्था से जोड़ देती हैं। ग्रामीणों के बीच सदियों से यह बात कही जाती रही है कि मंदिर का निर्माण एक ही रात में भूतों द्वारा किया गया था। वहीं एक और मान्यता है कि सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती है और भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्पर्श करती है। इसी वजह से इसे सूर्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी कुछ आकृतियों को लेकर भी ग्रामीणों में अलग-अलग धारणाएं हैं और इन्हें भूतों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि ये बातें स्थानीय लोकविश्वास हैं, इनके ऐतिहासिक प्रमाण अलग से उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन इन मान्यताओं ने चतुर्भुजी बाबा मंदिर के प्रति लोगों की आस्था और जिज्ञासा को जरूर और गहरा कर दिया है।

इन ईंटों ने अयोध्या मामले में भी खींचा ध्यान

तेंदुली के इस मंदिर की सबसे खास पहचान इसकी प्राचीन ईंटें हैं। स्थानीय तौर पर इन्हें ‘ककई ईंट’ कहा जाता है। इन ईंटों का आकार, मजबूती और इनसे तैयार की गई सजावटी संरचना आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े विवाद के दौरान पुरातात्विक साक्ष्यों की चर्चा में तेंदुली मंदिर का भूतों द्वारा किया गया था।नाम भी सामने आया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अयोध्या में मिले ईंटों से जुड़े साक्ष्यों की प्राचीनता की तुलना तेंदुली की ईंटों से किए जाने का उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि इस मंदिर की ईंटों को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई।

कंगूरेदार छत बताती है कारीगरों की कहानी

मंदिर की वास्तुकला इसे और खास बनाती है। इसकी कंगूरेदार छत और ईंटों पर किया गया सजावटी काम उस समय के कारीगरों की बारीकी और तकनीक का उदाहरण माना जाता है। मंदिर का बाहरी हिस्सा पुरानी ईंटों से तैयार किया गया है, जबकि गर्भगृह की संरचना में भारतीय मंदिर वास्तु की झलक साफ दिखाई देती है।

मंदिर के साथ बना द्वार मंडप भी इसकी स्थापत्य विशेषताओं में शामिल है। इसकी बनावट में इस्लामी वास्तुकला का प्रभाव दिखाई देने की बात कही जाती है। यही कारण है कि मंदिर को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि स्थापत्य और इतिहास की नजर से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसके निर्माण काल को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं। स्थानीय लोग इसे मध्यकालीन मंदिर बताते हैं तो कुछ दावे इसे 18वीं शताब्दी से जोड़ते हैं। वहीं अन्य पुरातात्विक संदर्भों में तेंदुली के प्राचीन ईंट मंदिर को इससे कहीं पुराना माना गया है।

35 साल पहले चोरी हो गई थी भगवान विष्णु की प्रतिमा

इस मंदिर के इतिहास में एक झकझोर देने वाला अध्याय भगवान विष्णु की पुरानी प्रतिमा की चोरी से भी जुड़ा है। गांव के लोग बताते हैं कि करीब 35 साल पहले मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की विशाल चतुर्भुज प्रतिमा चोरी हो गई थी। उस घटना ने गांव के लोगों को भीतर तक आहत कर दिया था।

मंदिर को खाली छोड़ने के बजाय ग्रामीणों ने खुद जिम्मेदारी उठाई। लोगों ने चंदा इकट्ठा किया और चित्रकूट से भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा लाकर मंदिर में दोबारा स्थापित कराई। आज यही प्रतिमा चतुर्भुजी बाबा के रूप में लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है। मंदिर में किसी स्थायी पुजारी की नियुक्ति नहीं है, लेकिन गांव के राजू महाराज अपनी श्रद्धा के कारण यहां पूजा-अर्चना करते हैं।

1996 में पुरातत्व विभाग ने लिया संरक्षण म

तेंदुली मंदिर की प्राचीनता और इसकी वास्तुकला को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वर्ष 1996 में इसे अपने संरक्षण में लिया था। ग्रामीणों के प्रयास से मंदिर को संरक्षित स्मारक का दर्जा मिलने की उम्मीद जगी थी कि अब इसकी ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित रहेगी।

लेकिन समय बीतने के साथ ग्रामीणों की चिंता बढ़ती गई। उनका कहना है कि मंदिर के संरक्षण और मरम्मत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पुरानी दीवारें और स्थापत्य संरचना मौसम की मार झेल रही हैं और धीरे-धीरे मंदिर की चमक फीकी पड़ रही है।

ग्रामीणों के सामने है मरम्मत की मजबूरी

गांव के लोगों का कहना कहते है कि मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण ग्रामीण अपनी तरफ से इसमें नया निर्माण या बड़ी मरम्मत नहीं करा सकते। अगर वे अपनी श्रद्धा से मंदिर को ठीक कराना भी चाहें तो पुरातात्विक नियमों के कारण ऐसा करना आसान नहीं है।

ग्रामीणों की मांग है कि विभाग मंदिर की मौजूदा स्थिति का गंभीरता से आकलन कर वैज्ञानिक तरीके से इसका संरक्षण कराए। उनके लिए यह सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि गांव की पहचान और पूर्वजों से मिली विरासत है।

आस्था के साथ इतिहास भी समेटे है तेंदुली

तेंदुली का चतुर्भुजी बाबा मंदिर आज दो दुनियाओं के बीच खड़ा दिखाई देता है। एक ओर गर्भगृह में भगवान विष्णु के सामने सिर झुकाते श्रद्धालु हैं, तो दूसरी ओर मंदिर की पुरानी ईंटें इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञों को आकर्षित करती हैं। जन्माष्टमी पर जब मंदिर में दूर दराज से आए श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती है, तब यह प्राचीन धरोहर फिर से जीवंत हो उठती है।वहीं जन्माष्टमी करीब आते ही यह मंदिर भव्य सज सज्जा के साथ श्रद्धालुओं का आस्था का केंद्र बनने को तैयार है। स्थानीय जन इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन और पूजा अनुष्ठान की परम्परा को लम्बे समय में पूरी श्रद्धा के साथ निभाते चले आ रहे हैं।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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