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Char Dham Yatra Plastic Pollution 2026: पुण्य कमाने पहुंचे श्रद्धालु छोड़ गए 288 टन कचरा, चारधाम के ग्लेशियरों पर मंडराया खतरा
Char Dham Yatra Plastic Pollution: रिकॉर्ड श्रद्धालुओं के बीच चारधाम यात्रा से निकले 288 टन कचरे ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा खतरा प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़ा है।
Char Dham Yatra 2026 Plastic Pollution Garbage
देहरादून/रुद्रप्रयाग: सरकार द्वारा श्रद्धालुओं के लिए तमाम बंदोबस्त और उन्नत सुविधाओं के उद्घोष के साथ शुरू की गई चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड तोड़ उपस्थिति दर्ज होने के साथ ही अब इससे जुड़ी नकारात्मक खबरें भी सामने आने लगी हैं। जिसमें सबसे बड़ा मुद्दा है प्लास्टिक कचरा। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा इस साल एक नया रिकॉर्ड बना रही है। 19 अप्रैल से शुरू हुई यात्रा में अब तक 28 लाख से अधिक श्रद्धालु बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के दर्शन कर चुके हैं। लेकिन आस्था की इस विशाल यात्रा के बीच एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने आई है। बीते 51 दिनों में चारधाम मार्ग और धाम क्षेत्रों से 288 टन से अधिक कूड़ा-कचरा एकत्र किया गया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस कचरे का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक का है, जो हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियरों और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ बढ़ रहा कचरे का दबाव
चारधाम यात्रा हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करती है। इस बार भी रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। हालांकि, यात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ कचरा प्रबंधन की चुनौती भी तेजी से बढ़ी है।
31 मई तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चारों धामों से कुल 288 टन से अधिक कचरा एकत्र किया गया। इनमें सबसे ज्यादा कचरा केदारनाथ क्षेत्र से निकला है। केदारनाथ से करीब 122 टन, यमुनोत्री से लगभग 80 टन, गंगोत्री से 70 टन और बदरीनाथ क्षेत्र से करीब 10 टन कचरा एकत्र किया गया। यह कचरा ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों से नीचे लाकर निस्तारित किया जा रहा है।
हिमालय के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में फैला प्रदूषण
चारों धाम समुद्र तल सेटी लगभग 3,000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं। इनके आसपास देश के महत्वपूर्ण हिमालयी ग्लेशियर मौजूद हैं।
यमुनोत्री क्षेत्र चंपासर ग्लेशियर से जुड़ा है, जबकि गंगोत्री धाम के पास प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर स्थित है। केदारनाथ क्षेत्र में चोराबाड़ी और कंपेनिंग ग्लेशियर मौजूद हैं। वहीं बदरीनाथ क्षेत्र सतोपंथ और अलकापुरी ग्लेशियरों के प्रभाव क्षेत्र में आता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में फैलने वाला प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरा केवल दृश्य प्रदूषण नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पर्यावरण के लिए दीर्घकालिक खतरा पैदा करता है।
प्लास्टिक कचरा बना सबसे बड़ी समस्या
चारधाम यात्रा मार्ग पर सबसे ज्यादा प्लास्टिक बोतलें, पॉलिथीन, खाद्य पदार्थों के रैपर, डिस्पोजेबल सामग्री, जूते-चप्पल और पुराने कपड़े पाए जा रहे हैं।
प्लास्टिक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में सैकड़ों वर्ष लगा देता है। जब यह ग्लेशियर क्षेत्रों और बर्फीली सतहों पर जमा होता है तो सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करता है। इससे बर्फ के पिघलने की गति बढ़ सकती है।
वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, जो भविष्य में जल स्रोतों और जैव विविधता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
ग्लेशियरों के साथ जल स्रोत भी हो रहे प्रभावित
हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहा जाता है क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। एनवायरनमेंटलिस्ट के अनुसार, जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो उनके आसपास जमा प्लास्टिक और अन्य प्रदूषक भी पानी के साथ नीचे बहते हैं। इससे नदी तंत्र और पेयजल स्रोत प्रभावित हो सकते हैं। कई अध्ययनों में हिमालयी नदियों और बर्फ में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी भी दर्ज की जा चुकी है। जो भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
भूस्खलन और जल निकासी पर भी पड़ रहा असर
प्लास्टिक कचरा केवल प्रदूषण ही नहीं फैलाता, बल्कि प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को भी प्रभावित करता है। पॉलिथीन और अन्य अपशिष्ट नालियों तथा जल प्रवाह मार्गों को अवरुद्ध कर देते हैं। इससे बारिश और बर्फ का पानी जमीन में समाने के बजाय सतह पर तेजी से बहने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे भूस्खलन और मिट्टी कटाव जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है, जो पहले से ही संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों के लिए चिंता का विषय है।
वन्यजीव और बुग्याल भी खतरे में
चारधाम क्षेत्र के आसपास फैले बुग्याल (उच्च हिमालयी घास के मैदान) जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां और औषधीय पौधे पाए जाते हैं। कचरे के कारण इन बुग्यालों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इसके अलावा हिमालयी भालू, स्नो लेपर्ड, गिद्ध, भरल और हिमालयी आईबेक्स जैसे वन्यजीव भी खतरे में हैं। भोजन की तलाश में कई बार ये जानवर प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट निगल लेते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
कचरा प्रबंधन के लिए क्या कर रही है सरकार?
चारधाम यात्रा मार्ग पर बढ़ते कचरे को देखते हुए प्रशासन ने कई व्यवस्थाएं की हैं। कचरे के पृथक्करण और पुनर्चक्रण के लिए 37 मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) केंद्र स्थापित किए गए हैं।
इसके अलावा प्लास्टिक कचरे को संपीड़ित और सुरक्षित तरीके से नीचे लाने के लिए 38 प्लास्टिक कंपैक्टर और बेलिंग मशीनें लगाई गई हैं। प्रशासन का दावा है कि एकत्र किए गए कचरे को व्यवस्थित ढंग से रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जा रहा है।
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी
चारधाम यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि हिमालय के सबसे नाजुक पारिस्थितिक क्षेत्रों से जुड़ी यात्रा है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं, बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु की भी है। पर्यावरण विदों का मानना है कि सरकार द्वारा इन धार्मिक यात्राओं के दौरान प्लास्टिक इस्तेमाल पर सख्त नियम बनाए जाने चाहिए साथ ही यात्रियों द्वारा सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए, कचरा निर्धारित स्थानों पर डाला जाए और कैरी इन-कैरी आउट जैसे नियम अपनाए जाएं, तो हिमालय को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।


