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Butter Festival 2026: 11 हजार फीट पर दूध-मक्खन की होली, जानें दयारा बुग्याल की अनोखी परंपरा
Butter Festival 2026: उत्तराखंड के दयारा बुग्याल में 11 हजार फीट की ऊंचाई पर बटर फेस्टिवल मनाया जाता है। जानें दूध-मक्खन की होली, अढूंड़ी उत्सव और इसकी सदियों पुरानी परंपरा।
Butter Festival 2026: Milk and Butter Holi at 11,000 Feet in Dayara Bugyal
Butter Festival 2026: उत्तराखंड की पहाड़ियों में जब बादलों की चादर के बीच मखमली घास पर रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, तब दयारा बुग्याल में होली का रंग कुछ अलग ही नजर आता है। यहां न गुलाल उड़ता है और न रंगों से चेहरे रंगे जाते हैं। 11 हजार फीट की ऊंचाई पर लोग एक-दूसरे के चेहरे पर मक्खन लगाते हैं, दूध और मट्ठे की बौछार करते हैं और इसी के बीच लोकगीतों व ढोल-दमाऊ की थाप पर झूम उठते हैं। उत्तरकाशी के रैथल गांव की यह सदियों पुरानी परंपरा अढूंड़ी उत्सव यानी बटर फेस्टिवल के रूप में दयारा बुग्याल में जीवंत हो रही है।
28 वर्ग किलोमीटर में फैले बुग्याल में जुटेंगे ग्रामीण और पर्यटक
भटवाड़ी ब्लॉक के रैथल गांव से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित दयारा बुग्याल समुद्रतल से लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई पर है और करीब 28 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। गर्मियों के मौसम में आसपास के ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ यहां की छानियों में पहुंचते हैं। हरी घास और प्राकृतिक वनस्पतियों से भरपूर यह इलाका पशुओं के लिए बेहतर चरागाह उपलब्ध कराता है।
सोमवार को शुरू हुए आयोजन में स्थानीय ग्रामीणों के साथ देश-विदेश और अलग-अलग राज्यों से पहुंचे पर्यटकों ने भी हिस्सा लिया। मखमली घास, फूलों की खुशबू और पहाड़ी लोकधुनों के बीच दूध और मक्खन की होली ने पूरे बुग्याल को उत्सव के रंग में रंग दिया। आयोजन के साथ ही रैथल गांव में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया।
भाद्रपद संक्रांति से जुड़ा है उत्सव
बटर फेस्टिवल को स्थानीय तौर पर अढूंड़ी या अंढूड़ी उत्सव कहा जाता है। यह आयोजन पारंपरिक रूप से भाद्रपद महीने की संक्रांति के आसपास किया जाता है। इसे केवल मनोरंजन का पर्व नहीं माना जाता, बल्कि ग्रामीण इसे प्रकृति, पशुधन और स्थानीय देव परंपरा के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर मानते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी अंडूरी उत्सव को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा पर्व बताया गया है।
दयारा बुग्याल स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका से लंबे समय से जुड़ा रहा है। गर्मियों में जब मवेशी यहां चरते हैं तो पर्याप्त घास और प्राकृतिक चारे के कारण उनकी सेहत और दूध उत्पादन में वृद्धि होती है। मानसून के बाद मौसम ठंडा होने लगता है और ग्रामीण धीरे-धीरे अपने पशुओं को लेकर गांवों की ओर लौटने लगते हैं। यही वापसी बटर फेस्टिवल की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। उत्तराखंड पर्यटन के अनुसार यह पर्व पशुओं के सुरक्षित और स्वस्थ लौटने तथा प्रकृति की कृपा के प्रति धन्यवाद का प्रतीक है।
दूध-मक्खन से क्यों खेली जाती है होली?
इस उत्सव की सबसे खास पहचान दूध, मक्खन और मट्ठे की होली है। ग्रामीण एक-दूसरे के चेहरे पर मक्खन लगाते हैं और मट्ठा डालकर उत्सव मनाते हैं। लोक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण और गोवंश के साथ मक्खन का संबंध भी इस परंपरा को धार्मिक जुड़ाव रखता है। कई स्थानीय मान्यताओं में बुग्याल और पशुधन की रक्षा करने वाली शक्तियों के प्रति आभार जताने की बात कही जाती है। इस परंपरा को लेकर एक रोचक तथ्य भी सामने आता है। पुराने समय में इस उत्सव में गोबर का इस्तेमाल कर होली खेलने की परंपरा होने का उल्लेख मिलता है। समय के साथ इसकी जगह दूध, मक्खन और मट्ठे ने ले ली। आज यही अनोखी परंपरा बटर फेस्टिवल की पहचान बन चुकी है।
पूजा के बाद शुरू होती है मक्खन वाली होली
उत्सव की शुरुआत केवल होली खेलने से नहीं होती। पारंपरिक रीति-रिवाजों और पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीण उत्सव में शामिल होते हैं। स्थानीय देव परंपरा के अनुसार पूजा के दौरान प्रकृति, पशुधन और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की जाती है। इसके बाद ढोल-दमाऊ और पहाड़ी लोकवाद्यों की थाप के बीच लोग एक-दूसरे पर मक्खन और मट्ठा लगाकर उत्सव मनाते हैं। लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य इस आयोजन को और खास बनाते हैं।
समय के साथ उत्सव का स्वरूप भी व्यापक हुआ है। अब यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य और अन्य पारंपरिक आयोजन भी होते हैं। कई वर्षों से पर्यटकों की बढ़ती दिलचस्पी ने इसे उत्तराखंड के प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षणों में शामिल कर दिया है। वहीं इसकी मूल भावना आज भी ग्रामीण जीवन, पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़ी हुई है।
गर्मियों में बुग्याल, ठंड में गांव लौटते हैं ग्रामीण
दयारा बुग्याल में ग्रामीणों का प्रवास भी इस पर्व की कहानी का अहम हिस्सा है। गर्मियों की शुरुआत में रैथल और आसपास के गांवों के लोग अपने मवेशियों के साथ ऊंचाई वाले चरागाहों की ओर जाते हैं। वहां वे कई सप्ताह तक पशुओं के साथ रहते हैं। बुग्याल की हरी घास मवेशियों के लिए प्राकृतिक चारे का काम करती है।
मानसून के बाद तापमान गिरने लगता है और मौसम बदलने के साथ ग्रामीणों की वापसी शुरू हो जाती है। इसी मौसमी चक्र ने अढूंड़ी उत्सव को एक ऐसी परंपरा का रूप दिया, जिसमें प्रकृति और इंसान के बीच का रिश्ता साफ दिखाई देता है। बुग्याल केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवनशैली का हिस्सा भी है।
हाईकोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार व्यवस्था
दयारा पर्यटन उत्सव समिति रैथल के अध्यक्ष मनोज राणा के अनुसार, इस बार हाईकोर्ट की गाइडलाइन का अनुपालन करते हुए बुग्याल से करीब 800 मीटर की दूरी पर चिड़ापड़ा और गोई में आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं। पूजा-अर्चना के बाद दूध और मक्खन की होली के साथ रैथल में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। इस आयोजन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां आधुनिक उत्सव की चमक के बीच भी पहाड़ की पुरानी परंपरा सांस लेती दिखाई देती है। यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से लोग इस अनूठे उत्सव को देखने और इसकी परंपरा का हिस्सा बनने दयारा बुग्याल पहुंचते हैं।


