Emu War History: ऑस्ट्रेलिया का 'एमू युद्ध', इतिहास, महामंदी और किसानों के संकट की पूरी कहानी

Emu War History in Hindi: जानिए 1932 में ऑस्ट्रेलिया की सेना ने हजारों एमू पक्षियों के खिलाफ मशीनगन अभियान क्यों चलाया, कितने पक्षी मारे गए और इसे Great Emu War क्यों कहा जाता है।

Yogesh Mishra
Published on: 13 Oct 2026 8:48 PM IST
Emu War History Great Emu War | Emu War 1932 Australia Emu War | Newstrack Hindi News
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Emu War History Great Emu War | Emu War 1932 Australia Emu War | Newstrack Hindi News

Emu War History: 1932 में ऑस्ट्रेलिया में एक ऐसा अभियान चला, जिसकी कहानी आज भी लोगों को हैरान करती है। एक तरफ ऑस्ट्रेलियाई सेना के प्रशिक्षित सैनिक थे, जिनके पास मशीनगनें और हज़ारों गोलियाँ थीं। दूसरी तरफ करीब बीस हज़ार एमू थे, जो उड़ नहीं सकते थे और जिनके पास न हथियार थे, न कोई सैन्य संगठन। फिर भी सैनिक उन्हें उम्मीद के मुताबिक नहीं मार पाए। नतीजे इतने निराशाजनक रहे कि लोकप्रिय इतिहास में इसे "ग्रेट एमू वॉर" यानी महान एमू युद्ध कहा जाने लगा।

यह कोई औपचारिक युद्ध नहीं था। यह महामंदी, खेती के संकट और जंगली जानवरों से किसानों को हो रहे नुकसान से निपटने के लिए चलाया गया एक सरकारी अभियान था।

1932 के पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में क्या हो रहा था?

उस समय दुनिया महामंदी की चपेट में थी। गेहूँ की कीमतें गिर रही थीं और किसान आर्थिक तंगी में थे। पहले विश्वयुद्ध से लौटे कई पूर्व सैनिक सरकारी योजनाओं के तहत खेती में अपना भविष्य तलाश रहे थे।

इसकी जड़ें युद्ध के बाद की नीतियों में हैं। 1914 से 1918 के युद्ध में ऑस्ट्रेलिया के बहुत से सैनिक शामिल हुए थे। लौटने के बाद उनके पुनर्वास के लिए सरकार ने ज़मीन देने की योजनाएँ चलाईं, और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के गेहूँ वाले इलाकों में खेती फैली। पर सारी ज़मीन उपजाऊ नहीं थी। कई खेत सूखे और अनिश्चित बारिश वाले इलाकों में बने थे। किसानों को ज़मीन साफ करने, मशीनें खरीदने और बाड़ लगाने में पैसा लगाना पड़ा था, और कई परिवार कर्ज़ में थे।

1929 में आई महामंदी ने हालत और बिगाड़ दी। इसी बीच 1932 में हज़ारों एमू अपने मौसमी सफर में खेतों तक आ पहुँचे। उस समय के अभियान से जुड़े ब्योरों में करीब बीस हज़ार एमू का अनुमान मिलता है। यह आज की तरह वैज्ञानिक गिनती नहीं, बल्कि उस दौर का अंदाज़ा था। एमू फसलें खा रहे थे और बाड़ें तोड़ रहे थे, जिससे खरगोश जैसे दूसरे नुकसानदेह जानवरों के घुसने का रास्ता भी खुल जाता था। यानी टकराव सिर्फ इंसान और पक्षी का नहीं था। यह खेती के फैलाव, जंगली जानवरों के कुदरती आने-जाने और आर्थिक संकट का टकराव था।

एमू इतने मुश्किल निशाने क्यों साबित हुए?

एमू ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी बड़े उड़ानहीन पक्षी हैं। शुतुरमुर्ग के बाद वे दुनिया के सबसे ऊँचे जीवित पक्षियों में आते हैं। वयस्क एमू करीब 1.5 से 1.9 मीटर ऊँचा होता है और उसका वज़न लगभग 30 से 55 किलो होता है। लंबी, मज़बूत टाँगों की वजह से वे अनुकूल हालात में करीब 50 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ सकते हैं।

वे खाने-पानी की उपलब्धता के हिसाब से घूमते रहते हैं। बारिश और वनस्पति बदलने पर उनका ठिकाना भी बदल जाता है। वे बीज, फल, पौधों के हिस्से और छोटे जीव खाते हैं, और खेतों में गेहूँ उनके लिए आसान भोजन बन जाता है।

कभी वे छोटे झुंडों में दिखते हैं, कभी बड़े समूहों में। खतरा भाँपते ही वे अलग-अलग दिशाओं में भाग जाते हैं, जिससे उन्हें एक साथ निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है। 1932 में यही बात सैनिकों पर भारी पड़ी। मशीनगन ताकतवर हथियार है, पर ताकत और असर एक बात नहीं हैं। हथियार कितना काम करेगा, यह लक्ष्य, दूरी, ज़मीन और लक्ष्य के व्यवहार पर भी निर्भर करता है।

किसानों ने सेना से मदद क्यों माँगी?

आज सुनकर अजीब लगता है कि फसल बचाने के लिए मशीनगन वाले सैनिक भेजे गए। पर उस समय के किसानों में कई पूर्व सैनिक थे, जिन्होंने विश्वयुद्ध में मशीनगन का असर देखा था। उन्हें लगा कि हज़ारों पक्षियों की समस्या सेना की मदद से जल्दी निपट सकती है।

किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन रक्षा मंत्री सर जॉर्ज पीयर्स से मशीनगनों की माँग की। मंत्री मान गए, पर शर्तों के साथ। ब्योरों के मुताबिक हथियार प्रशिक्षित सैनिक चलाते, जबकि आने-जाने, रहने, खाने और गोला-बारूद के खर्च में राज्य सरकार और किसानों की भूमिका तय की गई थी।

अभियान की कमान रॉयल ऑस्ट्रेलियन आर्टिलरी के मेजर ग्विनिड पर्स विन-ऑब्रे मेरेडिथ को मिली। उनके साथ सार्जेंट एस. मैकमरे और गनर जे. ओ'हैलोरन थे। लोकप्रिय कहानियों में अक्सर ऐसा दिखाया जाता है जैसे हज़ारों सैनिकों की पूरी फौज पक्षियों पर उतार दी गई। असल में सैन्य दल बहुत छोटा था: दो लुईस हल्की मशीनगनें और करीब दस हज़ार गोलियाँ। मकसद पूरे ऑस्ट्रेलिया के एमू खत्म करना नहीं, बल्कि प्रभावित खेतों में उनकी संख्या घटाकर फसल का नुकसान काबू करना था। फिर भी इसके लिए सैन्य हथियारों का इस्तेमाल इतना अनोखा था कि अखबारों और बाद के लोकप्रिय इतिहास ने इसे "युद्ध" का नाम दे दिया।

2 नवंबर: पहली गोलीबारी

अभियान अक्टूबर में शुरू होना था, पर बारिश से पक्षी इधर-उधर फैल गए और देरी हो गई। आखिरकार 2 नवंबर 1932 को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कैंपियन इलाके के पास कार्रवाई शुरू हुई।

पहली दिक्कत यह थी कि पक्षी एक जगह टिकते ही नहीं थे। शुरू में करीब पचास एमू दिखे, पर वे मशीनगन की असरदार दूरी से बाहर थे। किसानों ने उन्हें उस तरफ खदेड़ने की कोशिश की जहाँ सैनिक छिपे थे। योजना थी कि पक्षी एक साथ मशीनगन की रेंज में आएँगे और थोड़ी देर की गोलीबारी में बहुत से मारे जाएँगे। पर पक्षी एक दिशा में भागने के बजाय छोटे झुंडों में बिखर गए। गोली चली, कुछ पक्षी मरे भी, पर पहले ही दिन साफ हो गया कि सैनिकों की कल्पना और असली हालात में बड़ा फर्क है।

यहाँ पक्षियों के बर्ताव को किसी सैन्य रणनीति की तरह नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कोई योजना नहीं बनाई थी, न उनके पास कोई सेनापति था। खतरा महसूस होने पर वे स्वाभाविक रूप से भाग रहे थे।

4 नवंबर: हज़ार पक्षी सामने थे, पर मशीनगन जाम हो गई

अभियान का सबसे मशहूर किस्सा 4 नवंबर का है। सैनिकों ने एक जलस्रोत के पास घात लगाई, इस उम्मीद में कि पानी पीने आए पक्षी इकट्ठा होंगे। ब्योरों के मुताबिक करीब एक हज़ार एमू वहाँ आए। यही वह मौका था जिसका सैनिकों को पहले दिन से इंतज़ार था। उन्होंने पक्षियों के पास आने तक रुककर गोली चलाई। पर कुछ ही देर में मशीनगन जाम हो गई। तब तक करीब बारह पक्षी मारे जा चुके थे, और बाकी घबराकर अलग-अलग दिशाओं में भाग गए। यह किस्सा इसलिए मशहूर हुआ कि इसमें सैन्य तकनीक की ताकत और उसकी व्यावहारिक सीमाएँ एक साथ दिखीं। बाद में इसे कई मज़ाकिया कहानियों में बदल दिया गया, पर इसका मूल तथ्य ऐतिहासिक ब्योरों में दर्ज है।

ट्रक पर मशीनगन

सैनिकों ने सिर्फ एक जगह से गोली चलाने के बजाय रणनीति बदलने की भी कोशिश की। एक प्रयोग में मशीनगन ट्रक पर लगाई गई, ताकि वाहन तेज़ी से एमू के झुंड के पास पहुँचे और चलते-चलते गोली चलाई जा सके। पर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के ऊबड़-खाबड़ खेतों और कच्चे रास्तों पर ट्रक संभालना और सटीक निशाना लगाना दोनों मुश्किल निकले। एमू तेज़ दौड़ते थे और अचानक दिशा बदल लेते थे, जबकि उछलते ट्रक पर बैठे सैनिक के लिए मशीनगन स्थिर रखना कठिन था। जिस वाहन से रफ्तार का फायदा मिलने की उम्मीद थी, वही ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर निशानेबाज़ी में रुकावट बन गया।

8 नवंबर: सेना की वापसी

कुछ ही दिनों में अभियान के असर पर सवाल उठने लगे। हज़ारों गोलियाँ चलीं, पर मारे गए पक्षी उम्मीद से बहुत कम थे। अखबारों में मज़ाक उड़ने लगा और राजनीतिक स्तर पर भी सवाल उठे। 8 नवंबर 1932 को रक्षा मंत्री पीयर्स ने सैन्य दल को वापस बुला लिया।

शुरुआती दौर में करीब 2,500 गोलियाँ चलने का ज़िक्र मिलता है, पर इस दौरान कितने एमू मरे, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। कुछ ब्योरों में करीब पचास, तो कुछ रिपोर्टों में तीन सौ से पाँच सौ तक की संख्या है। इसलिए किसी एक संख्या को पक्का तथ्य कहना ठीक नहीं।

इसके पीछे राजनीतिक वजहें भी थीं। सरकार पर सवाल उठ रहे थे कि किसानों की समस्या के लिए सेना और मशीनगनों का इस्तेमाल कितना सही था। खर्च, असर और जंगली जानवरों पर ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग को लेकर आलोचना हो रही थी। उधर किसान भी खुश नहीं थे, क्योंकि फसलों का नुकसान जारी था। सेना बुलाने से सरकार की राजनीतिक परेशानी शायद कुछ कम होती, पर खेती का संकट खत्म नहीं हुआ था।

सेना दोबारा लौटी: अंतिम नतीजा

किसानों की शिकायतें जारी रहीं। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रीमियर जेम्स मिशेल ने भी सैन्य मदद दोबारा शुरू करने का समर्थन किया। नवंबर के मध्य में अभियान फिर शुरू हुआ। इस बार सैनिकों ने पिछले अनुभव से कुछ सीखा और मारे गए पक्षियों की संख्या बढ़ी। पर विशाल इलाके में फैले हज़ारों पक्षियों को काबू करना फिर भी कठिन था। अभियान दिसंबर की शुरुआत तक चला और 10 दिसंबर 1932 को मेजर मेरेडिथ को वापस बुला लिया गया।

मेरेडिथ की आखिरी रिपोर्ट में 9,860 गोलियाँ चलने और 986 एमू के पक्के तौर पर मरने का दावा दर्ज है। साथ ही करीब 2,500 घायल पक्षियों के बाद में मरने का अनुमान भी दिया गया, पर इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई और इतिहासकारों ने इसकी भरोसेमंदी पर सवाल उठाए हैं। कई पक्षी मरे, पर जितने बड़े पैमाने पर समस्या हल होने की उम्मीद थी, उतना नहीं हुआ।

करीब बीस हज़ार पक्षियों के अनुमान वाले इलाके में 986 पक्की मौतें भी समस्या खत्म होने का सबूत नहीं थीं। मारे गए पक्षियों की संख्या और फसल बचाने में मिली असली कामयाबी दो अलग बातें थीं। ज़्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि 1932 का एमू नियंत्रण अभियान अपने मुख्य मकसद को ठीक से पूरा नहीं कर पाया। इसी प्रशासनिक और व्यावहारिक नाकामी को बाद में मज़ाक में "पक्षियों की जीत" कहा जाने लगा।

क्या एमू पर गोलियों का असर नहीं होता था?

अभियान के दौरान एमू की रफ्तार और गोली लगने के बाद भी दौड़ते रहने की क्षमता ने सैनिकों को चौंकाया। मेजर मेरेडिथ ने पक्षियों की तुलना सैन्य टैंकों से की थी। उनके कथन बाद में बहुत मशहूर हुए और इससे यह धारणा बनी कि एमू इतने मज़बूत होते हैं कि गोलियाँ उनका कुछ नहीं बिगाड़तीं। पर यह वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। एमू आम जीवित पक्षी हैं और गोली लगने से गंभीर रूप से घायल या मृत हो सकते हैं। घायल होकर थोड़ी दूर दौड़ते रहना उनके अभेद्य होने का सबूत नहीं है। गोली का असर इस पर निर्भर करता है कि वह शरीर के किस हिस्से में लगी और चोट कितनी गंभीर थी।

किसी जानवर का बहुत तेज़ दौड़ना या गोली लगने के बाद कुछ देर सक्रिय रहना उसके सैन्य कौशल का नहीं, जीवविज्ञान और शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया का मामला है। एमू की लंबी टाँगें, रफ्तार और खुले इलाकों में रहने की क्षमता उन्हें पीछा करने वालों से बचाती हैं, और 1932 में इन्हीं गुणों ने सैनिकों के लिए चुनौती खड़ी की। इसलिए इस घटना को पक्षियों की बुद्धि या सामूहिक युद्धनीति की कहानी के बजाय उनके कुदरती व्यवहार और इंसानी योजना की सीमाओं का उदाहरण मानना ज़्यादा ठीक है।

इसके बाद किसानों की समस्या कैसे सुलझी?

मशीनगनों से उम्मीद के मुताबिक नतीजा न मिलने के बाद दूसरे उपायों का महत्व बढ़ा। इनमें एमू मारने पर इनाम, खेतों की बाड़बंदी और जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखने की कोशिशें शामिल थीं। ऑस्ट्रेलिया में खरगोशों और दूसरे जानवरों को रोकने के लिए लंबी बाड़ों की व्यवस्था पहले से थी, और बाद के दशकों में कुछ इलाकों में एमू को रोकने के लिए खास बाड़ें भी बढ़ाई गईं। पर यह कहना सही नहीं होगा कि 1932 के तुरंत बाद एक नई बाड़ से पूरी समस्या खत्म हो गई। जंगली जानवरों और खेती का टकराव समय के साथ बदलता रहा, और अलग-अलग इलाकों में हल भी अलग रहे।

इस घटना का बड़ा सबक यह है कि जंगली जानवरों से नुकसान हो तो समस्या की जड़ समझनी पड़ती है। अगर किसी इलाके में कुदरती ठिकाने बदल दिए जाएँ, पानी और भोजन के स्रोत बदल जाएँ या खेती उन रास्तों तक फैल जाए जिनसे जानवर नियमित गुज़रते हैं, तो टकराव बढ़ सकता है। ऐसे में सिर्फ जानवरों की संख्या घटाना हमेशा स्थायी हल नहीं होता। बाड़बंदी, खेती का बेहतर प्रबंधन, रहने की जगहों का अध्ययन और स्थानीय हालात के हिसाब से बने उपाय ज़्यादा कारगर हो सकते हैं। ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से जुड़े ऐतिहासिक शोध में भी 1932 के अभियान को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की खेती के विस्तार की नीतियों और पर्यावरण के बड़े संदर्भ में देखा गया है।

आज एमू का क्या महत्व है?

एमू आज भी ऑस्ट्रेलिया के सबसे पहचाने जाने वाले जानवरों में हैं। वे सिर्फ बड़े और तेज़ दौड़ने वाले पक्षी नहीं, स्थानीय पारिस्थितिकी का हिस्सा भी हैं। तरह-तरह के फल और बीज खाने की वजह से वे बीजों के फैलाव में भूमिका निभा सकते हैं।

उनका सांस्कृतिक महत्व भी है। ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय प्रतीकों में कंगारू के साथ एमू की आकृति भी दिखती है। यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जिस पक्षी को राष्ट्रीय पहचान में जगह मिली, उसी के खिलाफ 1932 में सरकारी मदद से मशीनगन अभियान चला। पर राष्ट्रीय प्रतीक होने का महत्व और किसी इलाके में किसानों को होने वाला नुकसान, ये दो अलग सच्चाइयाँ हैं, और दोनों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है।

यह कहानी आज भी इतनी मशहूर क्यों है?

इस घटना को लगभग सौ साल होने को हैं, पर इंटरनेट, लोकप्रिय इतिहास और वृत्तचित्रों में इसकी चर्चा चलती रहती है। वजह इसका विरोधाभास है: इंसान ने आधुनिक हथियार लिए, प्रशिक्षित सैनिक भेजे, साफ लक्ष्य तय किया, फिर भी तेज़ भागते पक्षियों ने अभियान बेअसर कर दिया। इसमें ऐसा लगता है कि निहत्थे पक्षियों ने ताकतवर सेना को चुनौती दे दी, इसीलिए इसे अक्सर "कुदरत की इंसान पर जीत" की तरह पेश किया जाता है।

पर लोकप्रियता के साथ कहानी में बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें भी जुड़ गई हैं। कई जगह कहा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया ने पूरा युद्ध छेड़ा और एक भी पक्षी मारे बिना हार गया, या एमू को संगठित सैनिकों की तरह दिखाया जाता है। असली ब्योरे इन दावों का समर्थन नहीं करते। ABC ने 2022 में इस घटना की नब्बेवीं बरसी पर छपे लेख में भी ऐतिहासिक तथ्यों और मज़ाकिया लोकप्रिय छवि के फर्क को साफ किया था।

इस कहानी का एक गंभीर पहलू भी है, जो हँसी के पीछे छिप जाता है। किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे थे और अपनी रोज़ी बचाने के लिए मदद माँग रहे थे। सैनिकों को ऐसे काम पर भेजा गया था जिसके लिए सैन्य हथियार ज़्यादा काम के नहीं थे। और हज़ारों पक्षी बस उसी कुदरती ढंग से खाना-पानी खोज रहे थे जिसके लिए उनकी प्रजाति बनी है। इसलिए किसी एक पक्ष को पूरा मूर्ख या दूसरे को जानबूझकर विजेता बताने से इतिहास की जटिलता खो जाती है।

ग्रेट एमू वॉर का असली सवाल यह नहीं कि दो मशीनगनें हज़ारों पक्षियों को क्यों नहीं मार सकीं। असली सवाल यह है कि ऐसी रणनीति क्यों चुनी गई जो समस्या की प्रकृति से मेल ही नहीं खाती थी। किसानों को फसल बचानी थी, और सरकार ने सीमित सैन्य कार्रवाई से हज़ारों पक्षियों की संख्या घटाने की कोशिश की। सैनिकों के पास हथियार थे, पर सामने ऐसे जीव थे जो बहुत बड़े इलाके में फैले थे, तेज़ दौड़ते थे और खतरा भाँपते ही बिखर जाते थे। नतीजा: गोलीबारी हुई, पक्षी मरे, सरकार की आलोचना हुई और अभियान खत्म करना पड़ा, पर खेती और जंगली जानवरों के टकराव का बड़ा सवाल बना रहा।

इसमें एक और सीख है। आधुनिक तकनीक तभी काम आती है जब उसे समस्या के असली हालात समझकर इस्तेमाल किया जाए। मशीनगन युद्धक्षेत्र में ताकतवर हथियार हो सकती है, पर इससे यह साबित नहीं होता कि खुले मैदान में हज़ारों तेज़ पक्षियों से होने वाले फसल-नुकसान को रोकने का वह सबसे अच्छा साधन भी है। हथियार की ताकत और नीति की समझदारी दो अलग बातें हैं।

1932 में ऑस्ट्रेलियाई सैनिक एमू से कोई औपचारिक युद्ध नहीं हारे, पर उनका अभियान अपने घोषित मकसद में पर्याप्त सफल भी नहीं हुआ। इसी नाकामी से वह कहानी बनी जो आज भी दुनिया भर में सुनाई जाती है। इसमें हँसी ज़रूर है, पर उसके पीछे महामंदी से परेशान किसानों का संघर्ष, जंगली जानवरों के कुदरती आने-जाने की सच्चाई और प्रशासनिक फैसलों की सीमाएँ भी हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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