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Hariyali Teej Shiva Temples: हरियाली तीज पर इन शिव मंदिरों में करें दर्शन
Hariyali Teej Shiva Temples: हरियाली तीज पर मनचाहे जीवनसाथी की कामना से युवतियां इन प्राचीन शिव मंदिरों में पूजा करती हैं। जानें काशी विश्वनाथ से मनकामेश्वर तक प्रमुख मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं।
Hariyali Teej Shiva Temples: Visit These Shiva Temples for Blessings of a Desired Life Partner
Hariyali Teej Shiva Temples: रिमझिम बारिश की तरावट के साथ चादर सी ओढ़े हरियाली, आम के पेड़ों पर पड़े झूलों की पेंग, किशोरियों और महिलाओं के हाथों में रची मेहंदी और साथ ही शिव-पार्वती की भक्ति... यह दिव्य नजारा 12 मास में बस एक बार सिर्फ सावन के दौरान देखने को मिलता है। इस महीने में ही महिलाओं और किशोरियों से जुड़ा बेहद खास त्यौहार हरियाली तीज आते ही उत्तर प्रदेश के प्राचीन शिव मंदिरों में आस्था का रंग और गहरा हो जाता है। खासकर वे युवतियां जो भगवान शिव जैसे गुणों वाले जीवनसाथी की कामना करती हैं, इस दिन शिव मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना करती हैं। वहीं सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं।
हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इस पर्व की सबसे प्रमुख धार्मिक मान्यता माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा से जुड़ी है। इसी वजह से अविवाहित कन्याओं के बीच यह विश्वास प्रचलित है कि श्रद्धा और विधि-विधान से शिव-पार्वती की पूजा करने पर उन्हें मनचाहा या सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त हो सकता है। उत्तर प्रदेश में शिव आराधना की परंपरा बेहद पुरानी है। काशी विश्वनाथ से लेकर लोधेश्वर महादेव और गोला गोकर्णनाथ तक ऐसे कई मंदिर हैं, जिनसे अलग-अलग पौराणिक कथाएं, स्थानीय परंपराएं और सदियों पुरानी आस्थाएं जुड़ी हुई हैं। हरियाली तीज पर इन मंदिरों में दर्शन करना धार्मिक अनुभव के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को करीब से महसूस करने का मौका भी देता है।
काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी
जब उत्तर प्रदेश के प्राचीन शिव मंदिरों की बात होती है तो सबसे पहले नाम काशी विश्वनाथ का आता है। वाराणसी में गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। मंदिर में विराजमान शिव को विश्वनाथ या विश्वेश्वर के नाम से जाना जाता है। जिसका अर्थ है- पूरे संसार के स्वामी।
काशी की धार्मिक परंपरा में यह विश्वास बेहद मजबूत है कि भगवान शिव स्वयं इस नगरी के अधिष्ठाता हैं। यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। हरियाली तीज के अवसर पर शिव-पार्वती की पूजा करने वाली महिलाओं और युवतियों के लिए काशी विश्वनाथ का दर्शन विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप भी इतिहास के कई महत्वपूर्ण दौरों से जुड़ा है। आधिकारिक मंदिर से जुड़ी जानकारी के अनुसार, मंदिर का निर्माण और पुनर्निर्माण कई बार हुआ और वर्तमान मंदिर का निर्माण मराठा शासक अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में कराया था।
हरियाली तीज पर यहां पूजा का भाव केवल मनोकामना तक सीमित नहीं रहता। श्रद्धालु शिव-पार्वती के दांपत्य को आदर्श मानकर अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सुख की कामना करते हैं।
गोला गोकर्णनाथ मंदिर, लखीमपुर खीरी
लखीमपुर खीरी का गोला गोकर्णनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है। इसे कई बार 'छोटी काशी' भी कहा जाता है। सावन के दौरान यहां शिवभक्तों की विशेष भीड़ दिखाई देती है और हरियाली तीज जैसे पर्व पर भी मंदिर परिसर में धार्मिक उत्साह बढ़ जाता है। इस मंदिर से जुड़ी स्थानीय पौराणिक मान्यताएं इसे रामायण काल से जोड़ती हैं। यही वजह है कि यहां भगवान शिव की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा मानी जाती है।
हरियाली तीज पर अविवाहित युवतियां शिव-पार्वती के सामने अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं। सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और पति की दीर्घायु के लिए पूजा करती हैं। सावन में मंदिर का पूरा वातावरण बेलपत्र, फूल, जलाभिषेक और 'हर हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठता है।
लोधेश्वर महादेव, महादेवा बाराबंकी
बाराबंकी के महादेवा गांव में स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर भी आस्था का बड़ा केंद्र है। यह मंदिर रामनगर तहसील क्षेत्र में घाघरा नदी के तट के निकट स्थित है। जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, यहां स्थित शिवलिंग को 52 विशिष्ट और दुर्लभ शिवलिंगों में शामिल माना जाता है। हर वर्ष महाशिवरात्रि पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
लोधेश्वर से जुड़ी मान्यताओं का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। बाराबंकी जिला प्रशासन भी इस क्षेत्र को महाभारत कालीन परंपराओं से जोड़ता है और जिले के प्राचीन शिव स्थलों का उल्लेख करता है। यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। यही कारण है कि हरियाली तीज जैसे पर्व पर भी शिव-पार्वती की पूजा करने वाली महिलाएं और युवतियां लोधेश्वर धाम का रुख करती हैं। खासकर सावन के मौसम में मंदिर और आसपास का वातावरण धार्मिक रंग में रंग जाता है।
मनकामेश्वर मंदिर, लखनऊ
राजधानी लखनऊ में गोमती नदी के आसपास स्थित मनकामेश्वर मंदिर शहर के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में शामिल है। मंदिर को लेकर स्थानीय परंपराओं में कई कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं मान्यताओं के कारण यहां मनोकामना पूर्ति के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा रही है। हरियाली तीज पर मंदिर में शिव-पार्वती की पूजा का विशेष माहौल दिखाई देता है। अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की कामना करती हैं तो विवाहित महिलाएं सुखी दांपत्य और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं। इस मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में रामायण से संबंधित प्रसंग भी सुनाए जाते हैं।
मान्यता है कि माता सीता को वनवास के लिए छोड़ने के बाद भगवान राम के भाई लक्ष्मण इसी क्षेत्र में रुके थे और उन्होंने यहां भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी। स्थानीय आस्था में यह कहानी मंदिर की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां विराजमान शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान शिव से जुड़ी मानी जाती है। इसी वजह से मंदिर को मनोकामना पूरी करने वाले शिवधाम के रूप में श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान प्राप्त है।
गढ़मुक्तेश्वर का प्राचीन शिव क्षेत्र
हापुड़ जिले का गढ़मुक्तेश्वर गंगा किनारे बसा प्राचीन धार्मिक क्षेत्र है। जिला प्रशासन के अनुसार इसका प्राचीन नाम शिववल्लभपुर बताया जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान शिव के गणों को मुक्ति मिली थी। जिसके कारण इस स्थान का नाम गढ़मुक्तेश्वर पड़ा। यहां गंगा मंदिर समेत कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं। गंगा और शिव की आस्था का यह संगम गढ़मुक्तेश्वर को विशेष बनाता है। यहां धार्मिक स्नान और पूजा की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। तीज, नाग पंचमी, शिवरात्रि और सावन के दौरान धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। हरियाली तीज पर यहां पहुंचने वाली महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा कर वैवाहिक सुख की कामना करती हैं। अविवाहित युवतियों के लिए भी शिव मंदिर में पूजा करना मनचाहे जीवनसाथी की धार्मिक कामना से जुड़ा माना जाता है।
क्यों खास है हरियाली तीज का शिव-पार्वती से रिश्ता?
हरियाली तीज की पूरी धार्मिक भावना को समझने के लिए माता पार्वती की तपस्या की कथा जानना बेहद जरूरी है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी तप और समर्पण के बाद शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इस कथा के कारण हरियाली तीज को पति-पत्नी के प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य के लिए व्रत रखती हैं। जबकि अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर की कामना करती हैं। कई जगह महिलाएं हरे रंग के कपड़े पहनती हैं। मेहंदी लगाती हैं, झूले झूलती हैं और तीज के लोकगीत गाती हैं। सावन की हरियाली के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन जाता है।


