Himalaya Mountain Explained: हिमालय हर साल ऊंचा क्यों हो रहा है? एवरेस्ट और धरती के नीचे का विज्ञान

Himalaya Mountain Explained: हिमालय आज भी क्यों ऊपर उठ रहा है और क्या एवरेस्ट भविष्य में बहुत ज्यादा ऊंचा हो सकता है?

Neel Mani Lal
Published on: 9 Sept 2026 2:26 AM IST
Himalaya Mountain Explained: हिमालय हर साल ऊंचा क्यों हो रहा है? एवरेस्ट और धरती के नीचे का विज्ञान
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Himalaya Mountain Explained: दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला हिमालय ऐसी लगती है जैसे करोड़ों साल पहले बनकर तैयार हो गई हो। लेकिन सच यह है कि हिमालय आज भी बदल रहा है। उसके नीचे धरती की विशाल चट्टानी परतें लगातार खिसक रही हैं, एक-दूसरे को धकेल रही हैं और इस दबाव का असर पहाड़ों पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि हिमालय के ऊंचे हिस्सों में जमीन आज भी हर साल कुछ मिलीमीटर ऊपर उठ रही है। 2025 के एक अध्ययन में हिमालय के कुछ ऊंचे हिस्सों में करीब 5 से 8 मिलीमीटर प्रति वर्ष की ऊपर उठने की रफ़्तार दर्ज की गई। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि एवरेस्ट हर साल 5 से 8 मिलीमीटर लंबा हो रहा है क्योंकि पहाड़ को ऊपर उठाने वाली ताकत के साथ-साथ बारिश, बर्फ, नदियां, हिमनद और भूस्खलन उसे लगातार काटकर नीचे भी ला रहे हैं।

आखिर हिमालय बना कैसे?

हिमालय की कहानी करीब 5 करोड़ साल पुरानी है। उस समय भारत आज की जगह पर नहीं था। जमीन का एक विशाल टुकड़ा, जिस पर आज भारत मौजूद है, लगातार उत्तर की ओर बढ़ रहा था और अंततः एशिया की जमीन से जा टकराया। आज हम जिस भारत और एशिया को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखते हैं, वह कभी अलग-अलग भूभाग थे और उनके बीच समुद्र था। जब भारत की जमीन एशिया की जमीन से टकराई तो दोनों को आसानी से एक-दूसरे के नीचे धंस जाना संभव नहीं था, क्योंकि दोनों ही मोटी और हल्की चट्टानी परतों से बनी थीं। इसलिए टक्कर का दबाव जमीन को सिकोड़ने और ऊपर की ओर धकेलने लगा। करोड़ों साल तक यह प्रक्रिया चलती रही और इसी से हिमालय तथा उसके उत्तर में तिब्बती पठार का निर्माण हुआ।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत और एशिया की टक्कर ने पिछले करीब 5 करोड़ साल में हिमालय को ऊपर उठाने में बड़ी भूमिका निभाई है और इसका बड़ा हिस्सा पिछले करीब 1 करोड़ साल में विकसित हुआ।

इसे एक कालीन के उदाहरण से समझिए। अगर आप किसी कालीन को दोनों तरफ से लगातार धकेलेंगे तो वह सिर्फ आगे नहीं खिसकेगी बल्कि बीच में सिलवटें पड़कर ऊपर भी उठने लगेंगी। हिमालय में भी कुछ ऐसा ही हुआ, बस यहां कालीन की जगह धरती की विशाल और बेहद मोटी चट्टानी परतें थीं और उन्हें धकेलने वाली ताकत इतनी बड़ी थी कि उसका असर आज भी दिखाई देता है। फर्क इतना है कि हिमालय की यह प्रक्रिया किसी एक दिन या एक घटना में नहीं हुई, बल्कि करोड़ों साल तक बहुत धीमी गति से चलती रही और आज भी जारी है।

भारत आज भी एशिया को धकेल रहा है

इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा यह है कि भारत और एशिया की टक्कर खत्म नहीं हुई है। भारत के नीचे की विशाल चट्टानी परत आज भी उत्तर की ओर बढ़ रही है और एशिया की परत से टकरा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत और एशिया के बीच आपसी खिसकने की गति करीब 40 से 50 मिलीमीटर यानी 4 से 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष है। सुनने में यह बहुत कम लगता है, लेकिन करोड़ों साल के हिसाब से यह बहुत बड़ी दूरी बन जाती है। यही लगातार दबाव हिमालय के नीचे चट्टानों में तनाव पैदा करता है और पहाड़ों को ऊपर उठाने वाली ताकत का एक बड़ा स्रोत है।

एक बात समझना बहुत जरूरी है। अगर भारत हर साल करीब 4 से 5 सेंटीमीटर उत्तर की ओर बढ़ रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि हिमालय भी हर साल 4 से 5 सेंटीमीटर ऊंचा हो रहा है। प्लेटों की इस गति का कुछ हिस्सा जमीन को आगे धकेलने, चट्टानों को मोड़ने और उनके भीतर दबाव जमा करने में जाता है। कुछ ऊर्जा भूकंप के दौरान अचानक निकलती है और बाकी का एक हिस्सा ही जमीन को ऊपर उठाने में योगदान देता है। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए भारत की गति और हिमालय की ऊंचाई बढ़ने की गति दो अलग-अलग चीजें हैं।

क्या एवरेस्ट भी हर साल ऊपर उठ रहा है?

हिमालय के हर हिस्से की स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं जमीन तेजी से ऊपर उठ रही है, कहीं धीमी गति से और कुछ जगहों पर जमीन नीचे भी जा सकती है। 2025 के अध्ययन में हिमालय के ऊंचे हिस्सों में करीब 5 से 8 मिलीमीटर प्रति वर्ष की ऊपर उठने की गति मिली, लेकिन यह पूरे हिमालय की औसत ऊंचाई बढ़ने की दर नहीं है। यह जमीन की गति का एक माप है, जिसे वैज्ञानिकों ने एक खास क्षेत्र में उपग्रह से दर्ज किया। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिमालय के कई हिस्सों में जमीन आज भी ऊपर उठ रही है, न कि यह कि पूरा हिमालय हर साल एक निश्चित संख्या में मिलीमीटर ऊंचा हो रहा है।

और यहां एक और दिलचस्प बात है। जमीन के ऊपर उठने की हर स्पीड सिर्फ पहाड़ बनाने वाली ताकत के कारण नहीं होती। 2025 के एक अन्य अध्ययन के अनुसार हिमालय के कुछ हिस्सों में बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से जमीन पर पड़ा भार कम हो रहा है। इससे जमीन कुछ हद तक ऊपर की ओर उठ सकती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भारी चीज को हटाने पर दबा हुआ गद्दा थोड़ा ऊपर आ जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कुछ जगहों पर ऐसी वजह से होने वाली ऊपर की गति मापी गई कुल गति का 10 से 40 प्रतिशत तक हिस्सा हो सकती है।

एवेरस्ट की ऊँचाई का क्या हाल है?

दुनिया की सबसे ऊंची छोटी माउंट एवरेस्ट की अपनी ऊंचाई भी बिल्कुल स्थिर संख्या नहीं है। नेपाल और चीन के संयुक्त सर्वेक्षण ने 2020 में इसकी ऊंचाई 8,848.86 मीटर बताई थी। लेकिन किसी पहाड़ की ऊंचाई मापना केवल जमीन की ऊपर-नीचे होने वाली गति पर निर्भर नहीं करता। बर्फ की मोटाई, मौसम, भूकंप और मापने की तकनीक भी दर्ज ऊंचाई में छोटे बदलाव ला सकती है। इसलिए अगर किसी साल एवरेस्ट की माप कुछ मिलीमीटर अलग आती है तो इसका मतलब यह नहीं कि पहाड़ ने उतनी ही ऊंचाई हासिल कर ली।

अगर पहाड़ ऊपर उठ रहा है तो वह बहुत ज्यादा ऊंचा क्यों नहीं हो जाता?

एक तरफ धरती के भीतर से पहाड़ को ऊपर धकेलने वाली ताकत काम कर रही है और दूसरी तरफ धरती की सतह पर ऐसी ताकतें हैं जो उसे लगातार काट रही हैं। बारिश चट्टानों को तोड़ती है, नदियां पहाड़ों के बीच गहरी घाटियां बनाती हैं, बर्फ चट्टानों में दरारें डालती है, ग्लेशियर चट्टानों को घिसते हैं और भूस्खलन पहाड़ का मलबा नीचे ले आते हैं। यानी हिमालय एक साथ दो दिशाओं में बदल रहा है। वह नीचे से ऊपर उठ रहा है और ऊपर से धीरे-धीरे घिस भी रहा है।

इसे ऐसे समझिए जैसे कोई व्यक्ति एक तरफ से मिट्टी का ढेर लगातार ऊंचा कर रहा हो और दूसरी तरफ बारिश उस ढेर को धीरे-धीरे बहा रही हो। अगर मिट्टी डालने की गति बारिश से ज्यादा है तो ढेर ऊंचा होगा, लेकिन अगर दोनों के बीच संतुलन बन जाए तो उसकी ऊंचाई एक सीमा के आसपास बनी रह सकती है। हिमालय के साथ भी कुछ ऐसा ही है। 2025 में प्रकाशित एक भूवैज्ञानिक अध्ययन ने पश्चिमी हिमालय और आसपास के क्षेत्र के बारे में बताया कि लंबे समय में जमीन की मोटाई बढ़ने, उसके अंदर चट्टानों के खिसकने और ऊपर उठने की प्रक्रिया का संतुलन घिसाव के साथ बन सकता है। यानी पहाड़ का ऊपर उठना और उसका घिसना एक-दूसरे के खिलाफ लगातार काम करते हैं।

हिमालय की चट्टानें इतनी आसानी से टूटती क्यों हैं?

ऊंचे पहाड़ों पर मौसम भी पहाड़ बनाने और बिगाड़ने का काम करता है। दिन में तापमान बढ़ता है, रात में बहुत नीचे चला जाता है। चट्टानों में मौजूद छोटी दरारों में पानी पहुंचता है। जब यह पानी जमता है तो फैलता है और चट्टान पर दबाव डालता है। बार-बार ऐसा होने पर चट्टान कमजोर होकर टूटने लगती है। ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और ग्लेशियर इस काम को और तेज कर सकते हैं। फिर बारिश और नदियां टूटे हुए पत्थरों और मिट्टी को अपने साथ नीचे ले जाती हैं। यही कारण है कि हिमालय से निकलने वाली नदियां केवल पानी ही नहीं लातीं। वे हर साल पहाड़ों से बड़ी मात्रा में मिट्टी और चट्टानों का मलबा भी नीचे लाती हैं। यही मलबा आगे जाकर मैदानों में जमा होता है और गंगा तथा ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के विशाल मैदानों को बनाने में योगदान देता है। यानी पहाड़ का एक हिस्सा धीरे-धीरे टूटकर मैदान में पहुंच रहा है।

भूकंप भी हिमालय को बदलते हैं

हिमालय में आने वाले भूकंप इस कहानी का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भारत की जमीन लगातार एशिया की ओर बढ़ रही है, लेकिन यह गति हर जगह चिकनी और लगातार नहीं होती। कई जगह चट्टानी परतें लंबे समय तक एक-दूसरे में फंसी रहती हैं। इस दौरान दबाव जमा होता रहता है। जब चट्टानें उस दबाव को और नहीं सह पातीं तो अचानक खिसकती हैं और भूकंप आता है। इसी वजह से हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप वाले इलाकों में गिना जाता है।

2015 का नेपाल भूकंप इसका बड़ा उदाहरण था। भूकंप के दौरान जमीन के कुछ हिस्से ऊपर उठे और कुछ हिस्से नीचे गए। इसका मतलब यह है कि हिमालय का निर्माण केवल लाखों साल तक धीरे-धीरे जमीन के ऊपर उठने से नहीं होता। कभी-कभी धरती के भीतर जमा दबाव एक बड़े भूकंप के रूप में अचानक बाहर आता है और जमीन की ऊंचाई में भी बदलाव कर देता है।

यानी जिस पहाड़ को हम बाहर से बिल्कुल स्थिर देखते हैं, उसके नीचे लगातार हलचल चल रही है। जमीन हर समय नाटकीय तरीके से नहीं बदलती, लेकिन वह पूरी तरह स्थिर भी नहीं है।

क्या एक दिन हिमालय एवरेस्ट से बहुत ऊंचा हो जाएगा?

हिमालय लगातार ऊपर उठते-उठते अनंत ऊंचाई तक नहीं पहुंच जाएगा। इसकी वजह यह है कि पहाड़ की ऊंचाई केवल इस बात से तय नहीं होती कि जमीन के नीचे से कितना दबाव मिल रहा है। बारिश, बर्फ, नदियां, ग्लेशियर, भूस्खलन और गुरुत्वाकर्षण लगातार दूसरी दिशा में काम करते हैं। जैसे-जैसे पहाड़ बहुत ऊंचा और ढलानदार होता है, उसकी चट्टानें भी ज्यादा अस्थिर होने लगती हैं और टूटने तथा नीचे खिसकने की प्रक्रिया बढ़ सकती है।

इसके अलावा धरती की ऊपरी चट्टानी परत कोई लोहे की प्लेट नहीं है जिसे जितना दबाएं उतना ही ऊपर उठती जाए। बहुत ज्यादा दबाव पड़ने पर चट्टानें मुड़ती हैं, टूटती हैं और जमीन के अलग-अलग हिस्से अलग तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। तिब्बती पठार और हिमालय के आसपास की जमीन में भी ऊपर उठने के साथ-साथ खिंचाव और नीचे बैठने जैसी प्रक्रियाएं चलती हैं। इसलिए प्रकृति में कोई ऐसा सीधा नियम नहीं है कि अगर भारत हर साल कुछ सेंटीमीटर आगे बढ़ रहा है तो हिमालय भी उसी अनुपात में हमेशा ऊंचा होता रहेगा।

लेकिन भारत और एशिया की आपसी गति हमेशा एक जैसी नहीं रहेगी, जमीन के नीचे दबाव हर जगह समान नहीं है और पहाड़ के घिसने की गति भी मौसम, बारिश, बर्फ और नदियों के हिसाब से बदलती रहती है। करोड़ों साल के पैमाने पर खुद महाद्वीपों की गति और धरती की सतह का नक्शा भी बदल सकता है। लेकिन इतना तय है कि हिमालय का बदलना अभी खत्म नहीं हुआ है। वैज्ञानिकों के पास इस बात के साफ प्रमाण हैं कि भारत और एशिया की टक्कर आज भी जारी है और हिमालय के कई हिस्सों में जमीन ऊपर उठ रही है। साथ ही पहाड़ लगातार टूट और घिस भी रहा है। इसलिए हिमालय को किसी तैयार हो चुके स्मारक की तरह देखना सही नहीं होगा। यह एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो आज भी चल रही है।

एक दिलचस्प बात: हिमालय जितना ऊंचा है, उतना ही बेचैन भी

हिमालय की सबसे दिलचस्प बात यही है कि उसकी ऊंचाई और उसका खतरा एक ही कहानी से जुड़े हैं। भारत की जमीन अगर एशिया की ओर बढ़ना बंद कर दे तो हिमालय को ऊपर उठाने वाली मुख्य ताकत कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन जब तक यह टक्कर जारी है, तब तक पहाड़ों के नीचे दबाव जमा होता रहेगा और बड़े भूकंप का खतरा भी बना रहेगा। 2025 के अध्ययन में हिमालय के एक बड़े हिस्से में जमीन के नीचे जमा हो रहे दबाव और भविष्य में बड़े भूकंप की संभावना को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसलिए हिमालय केवल दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला नहीं है। यह धरती के अंदर चल रहे एक बहुत बड़े खेल का दिखाई देने वाला हिस्सा है। ऊपर हमें बर्फ से ढकी चोटियां दिखाई देती हैं, लेकिन उनके नीचे भारत और एशिया की विशाल चट्टानी परतों की लगातार खींचतान चल रही है।

क्या एवरेस्ट कभी छोटा पड़ जाएगा?

बहुत लंबे समय के बाद हिमालय की ऊंचाई और उसका आकार जरूर बदल सकता है, लेकिन ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि एवरेस्ट लगातार हर साल कुछ मिलीमीटर बढ़ता जाएगा और करोड़ों साल बाद वह आज से कई गुना ऊंचा हो जाएगा। ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि हिमालय के निर्माण की कहानी केवल ऊपर उठने की कहानी नहीं है। इसमें ऊपर उठना और घिसना दोनों साथ-साथ चलते हैं।

आज वैज्ञानिकों को हिमालय के ऊंचे हिस्सों में कई मिलीमीटर प्रति वर्ष की ऊपर की गति दिखाई देती है, लेकिन इस आंकड़े को सीधे पहाड़ की ऊंचाई में जोड़ देना गलत होगा। इसका कुछ हिस्सा जमीन के नीचे चल रही भारत-एशिया की टक्कर से आता है और कुछ जगहों पर बर्फ तथा पानी का भार कम होने से जमीन के ऊपर उठने का असर भी दिखाई देता है। दूसरी तरफ बारिश, नदियां, बर्फ, ग्लेशियर और भूस्खलन लगातार पहाड़ को काट रहे हैं। इसलिए हिमालय की कहानी को एक लाइन में समझना हो तो बात इतनी है: भारत आज भी एशिया को धकेल रहा है, इसलिए हिमालय के कई हिस्से आज भी ऊपर उठ रहे हैं; लेकिन उसी समय प्रकृति पहाड़ को लगातार काट भी रही है।

यानी एवरेस्ट कोई ऐसी इमारत नहीं है जिसकी मंजिलें हर साल जुड़ रही हों। वह एक जीवित भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा है। उसकी ऊंचाई बदल सकती है, हिमालय का आकार बदल सकता है, नई चोटियां ऊपर उठ सकती हैं और पुरानी चोटियां घिस सकती हैं। लेकिन यह सब इंसानी समय में नहीं, बल्कि लाखों और करोड़ों साल की घड़ी पर होता है। इसलिए अगली बार जब एवरेस्ट की तस्वीर देखें तो उसे सिर्फ दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ न समझें। उसके नीचे आज भी एक पूरा महाद्वीप धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और उसी दबाव से धरती की एक पूरी पर्वत श्रृंखला लगातार बन भी रही है और टूट भी रही है।

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