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India Silent Village: यहां बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इशारों में करते हैं बात, वजह जानकर चौंक जाएंगे
India Silent Village: जम्मू-कश्मीर का डडकई गांव अपनी अनोखी पहचान और इशारों की भाषा के लिए दुनियाभर में चर्चा में है।
India Silent Village: लहलहाती फसलों से सजे खेत खालिहानों के साथ भारत के गांव अपनी पुरातन संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में बसा एक छोटा-सा गांव ऐसा भी है, जिसकी पहचान उसकी खामोशी है। इस गांव में कई लोग सुन और बोल नहीं पाते, इसलिए यहां बातचीत का सबसे बड़ा माध्यम आवाज नहीं बल्कि इशारे हैं। यही वजह है कि डडकई गांव को लंबे समय से 'साइलेंट विलेज' के नाम से जाना जाता है। इस अनोखे गांव की यह अनोखी पहचान सिर्फ लोगों को हैरान नहीं करती, बल्कि यह स्वास्थ्य, समाज और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक बड़ा प्रश्नचिन्ह भी है। कि आज जब चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तेजी से विकास हो रहा है ऐसे में आज भी ऐसी जगहें हैं जो स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम हैं।
जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों के बीच बसा है डडकई गांव
डडकई गांव जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की गंडोह तहसील के भासेला क्षेत्र में स्थित है। चारों ओर ऊंचे पहाड़, घने जंगल और हरियाली से घिरा यह गांव प्राकृतिक सुंदरता का बेहतरीन उदाहरण है। भद्रवाह से लगभग 105 किलोमीटर दूर स्थित यह इलाका लंबे समय तक सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से भी काफी दूर रहा। यही वजह है कि यह गांव अपनी अनोखी पहचान के बावजूद लंबे समय तक दुनिया की नजरों से ओझल रहा।
क्यों कहा जाता है 'साइलेंट विलेज'?
डडकई को 'साइलेंट विलेज' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो जन्म से ही सुन या बोल नहीं पाते। गांव के कई परिवारों में यह समस्या पीढ़ियों से देखने को मिलती रही है। खासकर बच्चों में जन्मजात बहरापन और गूंगापन अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। जब गांव के कई लोग आवाज के जरिए संवाद नहीं कर सकते, तो उन्होंने अपनी अलग संचार प्रणाली विकसित कर ली। यहां रोजमर्रा की बातचीत हाथों के इशारों, चेहरे के हाव-भाव और संकेतों के जरिए होती है। यही दृश्य इस गांव को बाकी गांवों से पूरी तरह अलग बनाता है।
इशारों की भाषा बनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा
डडकई में रहने वाले लोग वर्षों से संकेतों के जरिए अपने एक-दूसरे की बातें समझते और समझाते आए हैं। परिवार के सदस्य, पड़ोसी और बच्चे सभी इस तरीके से संवाद करने के आदी हैं। यही कारण है कि गांव में रहने वाले लोगों के लिए यह कोई असामान्य बात नहीं, बल्कि उनकी सामान्य जीवनशैली का हिस्सा है।
बाहर से आने वाले लोगों के लिए यह अनुभव बेहद अलग और भावुक करने वाला होता है।
100 साल पहले सामने आया था पहला मामला
स्थानीय जानकारियों के अनुसार, इस गांव में जन्मजात सुनने और बोलने में असमर्थता का पहला दर्ज मामला वर्ष 1901 के आसपास सामने आया था। इसके बाद समय के साथ ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती गई। धीरे-धीरे डडकई की पहचान इसी विशेषता के कारण बनने लगी और लोग इसे 'साइलेंट विलेज' कहने लगे। वर्षों से इस विषय पर अलग-अलग अध्ययन होते रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे आनुवंशिक कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
क्या है इसके पीछे वैज्ञानिक वजह?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि डडकई में बड़ी संख्या में जन्मजात बहरेपन के मामलों के पीछे आनुवंशिक कारण हो सकते हैं। कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि सीमित आबादी और एक ही समुदाय के भीतर पीढ़ियों तक विवाह होने से कुछ आनुवंशिक विकारों के फैलने की संभावना बढ़ जाती है। किसी एक कारण को अंतिम रूप से जिम्मेदार नहीं माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि विस्तृत मेडिकल रिसर्च और जेनेटिक जांच के बाद ही स्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग की भी रही नजर
समय-समय पर स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल विशेषज्ञों की टीमें गांव का दौरा कर चुकी हैं। कई लोगों की जांच भी की गई, ताकि इस स्थिति के वास्तविक कारणों को समझा जा सके। साथ ही प्रभावित बच्चों की पहचान कर उन्हें बेहतर चिकित्सा और विशेष शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रयास भी किए गए। समय पर स्क्रीनिंग, सुनने की जांच और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से भविष्य में ऐसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पर्यटकों के लिए भी बन चुका है आकर्षण का केंद्र
डडकई सिर्फ अपनी रहस्यमयी पहचान के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता की वजह से भी लोगों को आकर्षित करता है। ऊंचे पहाड़, शांत वातावरण, हरे-भरे जंगल और पारंपरिक पहाड़ी जीवन यहां आने वाले पर्यटकों को अलग अनुभव देते हैं।
स्थानीय लोग चाहते हैं कि गांव को केवल 'साइलेंट विलेज' के रूप में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, प्राकृतिक विरासत और मानवीय संघर्ष की कहानी के रूप में भी पहचाना जाए। साथ ही यह गांव समावेशी समाज, दिव्यांगजनों के सम्मान और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है।


