Jagannath Rath Yatra 2026: 15 दिन तक क्यों नहीं होते भगवान जगन्नाथ के दर्शन? जानिए रथ यात्रा 2026 की अनोखी परंपरा

Jagannath Rath Yatra 2026: स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा 15 दिनों तक अनसर काल में रहते हैं। जानिए रथ यात्रा 2026 से जुड़ी इस अनोखी परंपरा का रहस्य।

Jyotsana Singh
Published on: 11 Jun 2026 7:00 AM IST
Jagannath Rath Yatra 2026 and the 15-day Anasara ritual when Lord Jagannath remains out of public darshan
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Jagannath Rath Yatra 2026 Reason Behind 15 Days No Public Darshan

Jagannath Rath Yatra 2026: पुरी। ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में शामिल है। यहां हर साल निकलने वाली रथ यात्रा को दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। वर्ष 2026 में यह भव्य रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी। इससे पहले 29 जून को स्नान पूर्णिमा के अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से अभिषेक किया जाएगा। मान्यता है कि इस विशेष स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और 15 दिनों तक भक्तों को उनके दर्शन नहीं होते। इसके बाद जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तब रथ यात्रा का शुभारंभ होता है।

क्या है रथ यात्रा का रहस्य

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होने के लिए पुरी पहुंचते हैं। रथों की रस्सियां खींचना भगवान की सेवा का अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा से रथ खींचने वाले व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

108 घड़ों से स्नान के बाद 15 दिनों तक क्यों बंद हो जाते हैं दर्शन

रथ यात्रा से पहले आने वाली स्नान पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि अत्यधिक स्नान के कारण भगवान को ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे विश्राम के लिए चले जाते हैं। इस अवधि को ‘अनसर काल’ कहा जाता है। लगभग 15 दिनों तक मंदिर के पट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक औषधियां और विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। जब भगवान स्वस्थ हो जाते हैं, तब नवयौवन दर्शन कराया जाता है और फिर रथ यात्रा शुरू होती है।

भव्यता और दिव्यता का प्रतीक है भगवान जगन्नाथ का नंदी घोष रथ

भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदी घोष है। यह तीनों रथों में सबसे बड़ा और सबसे आकर्षक माना जाता है। इसकी ऊंचाई करीब 45 फीट होती है और इसमें 16 विशाल पहिए लगाए जाते हैं। इस रथ के निर्माण में सैकड़ों लकड़ी के हिस्सों का उपयोग किया जाता है। लाल और पीले रंग के कपड़ों से सजा यह रथ दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। रथ के शीर्ष पर भगवान नृसिंह और हनुमान जी के प्रतीक चिन्ह लगाए जाते हैं। यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे पीछे चलता है।

यात्रा में सबसे आगे क्यों रहता है बलभद्र का तालध्वज रथ

भगवान बलभद्र, जिन्हें बलराम भी कहा जाता है, उनके रथ का नाम तालध्वज है। यह रथ अपनी अलग पहचान और भव्यता के लिए जाना जाता है। लगभग 44 फीट ऊंचे इस रथ में 14 बड़े पहिए होते हैं। पारंपरिक रंगों से सजा यह रथ शक्ति और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान सबसे पहले तालध्वज रथ ही आगे बढ़ता है और इसके पीछे अन्य रथ चलते हैं।

क्या संदेश देता है देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ

भगवान जगन्नाथ की बहन देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन या देवदलन कहा जाता है। यह रथ आकार में अन्य दोनों रथों से थोड़ा छोटा होता है, लेकिन इसकी धार्मिक महत्ता उतनी ही अधिक है। लगभग 43 फीट ऊंचे इस रथ में 12 पहिए होते हैं। लाल और काले रंगों से सजा यह रथ यात्रा के दौरान बलभद्र और जगन्नाथ के रथों के बीच चलता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे अहंकार के विनाश और विनम्रता का प्रतीक माना गया है।

हर साल नए रथ बनाने की परंपरा जगन्नाथ संस्कृति की है खास पहचान

रथ यात्रा की सबसे अनोखी बात यह है कि भगवानों के रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। इनके निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से शुरू हो जाता है। विशेष प्रकार की लकड़ियों से तैयार किए जाने वाले इन रथों को पारंपरिक नियमों और विधियों के अनुसार बनाया जाता है। सैकड़ों कारीगर कई सप्ताह तक मेहनत करके इन्हें तैयार करते हैं। यही परंपरा इस उत्सव को और भी विशेष बनाती है।

समानता और सेवा का संदेश देती है छेरा पहरा की परंपरा

रथ यात्रा के दौरान एक विशेष अनुष्ठान ‘छेरा पहरा’ किया जाता है। इसमें पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के आसपास सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान के सामने सभी समान हैं। चाहे राजा हो या आम व्यक्ति, सभी भगवान के सेवक हैं। यही वजह है कि इस परंपरा को रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में गिना जाता है।

भगवान के मौसी घर जाने से क्या जुड़ाव रखती है गुंडिचा मंदिर की यात्रा

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान का मौसी घर माना जाता है। यहां तीनों देवता सात दिनों तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से वापस जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं पुरी

जगन्नाथ रथ यात्रा की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्राएं निकाली जाती हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक पुरी पहुंचकर इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बनते हैं। यही वजह है कि इसे विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में शामिल किया जाता है।

रथ यात्रा 2026 का पूरा कार्यक्रम एक नजर में

स्नान पूर्णिमा 29 जून 2026 को मनाई जाएगी। इसके बाद लगभग 15 दिनों तक अनसर काल रहेगा। नवयौवन दर्शन के बाद 16 जुलाई को रथ यात्रा शुरू होगी। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचेंगे और वहां प्रवास के बाद बहुदा यात्रा के जरिए वापस लौटेंगे। पूरे उत्सव का समापन 24 जुलाई 2026 को होगा।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सदियों पुरानी परंपरा, भक्ति, समानता और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु इस महापर्व का इंतजार करते हैं और भगवान के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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