Kailash Parvat Mystery: कैलाश पर्वत का रहस्य, 4 धर्मों के लिए पवित्र, फिर कोई चढ़ता क्यों नहीं?

Kailash Parvat Mystery Explained: कैलाश पर्वत हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन परंपराओं के लिए इतना पवित्र क्यों है? जानिए कैलाश पर कोई चढ़ता क्यों नहीं...

Neel Mani Lal
Published on: 5 Sept 2026 7:05 PM IST
Kailash Parvat Mystery Explained in Hindi
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Kailash Parvat Mystery Explained in Hindi 

Kailash Parvat Mystery Explained: तिब्बत के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित कैलाश पर्वत समुद्र तल से करीब 6,638 मीटर यानी 21,778 फीट की ऊंचाई पर है। यह हिमालय के सबसे ऊंचे पहाड़ों में नहीं है, लेकिन अपनी लगभग पूरी तरह अलग, बेहद सममित और पिरामिड जैसी आकृति के कारण दूर से ही अलग दिखाई देता है। कैलाश पर्वत की सबसे बड़ी खासियत उसकी ऊंचाई नहीं, बल्कि उसका धार्मिक महत्व है। हिंदू मान्यता में कैलाश भगवान शिव और माता पार्वती का निवास है। बौद्ध परंपरा में इसे डेमचोक से जोड़ा जाता है और कई परंपराओं में यह ब्रह्मांड की धुरी यानी मेरु पर्वत का भौतिक रूप माना जाता है। जैन परंपरा में इसे अष्टापद से जोड़ा जाता है और मान्यता है कि पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने इसी क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त किया। तिब्बती बोन परंपरा के लिए भी कैलाश बेहद पवित्र है और इसे आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र माना जाता है। यानी एक ही पहाड़ चार अलग धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग अर्थ रखता है। और यहीं से कैलाश की पहली पहेली शुरू होती है।

कैलाश को 'दुनिया का केंद्र' क्यों माना गया?

कैलाश के आसपास का भूगोल भी उसकी धार्मिक प्रतिष्ठा को असाधारण बनाता है। इसके आसपास से एशिया की चार महत्वपूर्ण नदी प्रणालियां जुड़ी हैं। उत्तर की ओर सिंधु, पूर्व की ओर यारलुंग त्सांगपो यानी आगे चलकर ब्रह्मपुत्र, पश्चिम की ओर सतलुज और दक्षिण की ओर कर्णाली की जल प्रणालियां निकलती हैं। यही बात प्राचीन लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही होगी। कल्पना कीजिए, एक ऊंचा और लगभग अकेला खड़ा पहाड़, उसके आसपास विशाल झीलें और अलग-अलग दिशाओं में बहने वाली बड़ी नदियां। ऐसे भूगोल को प्राचीन समाजों ने सिर्फ प्राकृतिक घटना की तरह नहीं देखा। उसे ब्रह्मांड की संरचना से जोड़ना स्वाभाविक था। यही वजह है कि कैलाश को मेरु यानी ब्रह्मांड की धुरी से जोड़ने वाली धार्मिक कल्पनाएं इतनी मजबूत हुईं।

क्या कैलाश हमेशा से बड़ा तीर्थ था?

हम अक्सर सुनते हैं कि कैलाश पर्वत हजारों वर्षों से लाखों लोगों का प्रमुख तीर्थ रहा है। लेकिन इतिहासकार एलेक्स मैके इस धारणा को चुनौती देते हैं। उनकी 2015 की किताब ‘Kailas Histories: Renunciate Traditions and the Construction of Himalayan Sacred Geography’ में तर्क दिया गया है कि कैलाश को आज जिस तरह एक बड़े लोकप्रिय तीर्थ के रूप में देखा जाता है, उसकी आधुनिक छवि काफी हद तक बाद के दौर में बनी। मैके के अनुसार शुरुआती दौर में वास्तविक कैलाश तक आम श्रद्धालुओं की पहुंच नहीं थी। वहां कभी-कभार साधु, तपस्वी और धार्मिक साधक पहुंचते थे। यानी कैलाश का धार्मिक विचार बहुत पुराना हो सकता है, लेकिन कैलाश को एक बड़े जन-तीर्थ में बदलने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आधुनिक है। किसी जगह का हजारों साल पुरानी धार्मिक कल्पना में होना और हजारों साल से वहां लाखों लोगों का तीर्थ करना, दोनों एक बात नहीं हैं।

प्राचीन ग्रंथों में कैलाश का उल्लेख कितना है?

एलेक्स मैके के अध्ययन के मुताबिक वैदिक साहित्य में आज के कैलाश की स्पष्ट पहचान को लेकर सवाल हैं। महाभारत और रामायण जैसे विशाल ग्रंथों में भी कैलाश-मानसरोवर से जुड़े उल्लेख अपेक्षाकृत सीमित हैं। बाद की धार्मिक परंपराओं में कैलाश की पहचान ज्यादा स्पष्ट और मजबूत होती गई। और एक दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती भारतीय धार्मिक कल्पना में मानसरोवर झील का महत्व कई बार पहाड़ से ज्यादा दिखाई देता है। क्योंकि प्राचीन भारत में नदी के स्रोत और पवित्र जल का धार्मिक महत्व बहुत बड़ा था। कैलाश के आसपास की झील और उससे जुड़े नदी तंत्र ने इस पूरे इलाके को धार्मिक भूगोल का हिस्सा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

कैलाश पर्वत पर कोई चढ़ता क्यों नहीं?

कैलाश पर्वत की सबसे लोकप्रिय पहेलियों में से एक है कि दुनिया के हजारों पर्वतारोही एवरेस्ट समेत कठिन चोटियों पर चढ़ चुके हैं, लेकिन कैलाश अब भी अछूता है। इसका कारण सिर्फ तकनीकी कठिनाई नहीं है। कैलाश पर चढ़ना धार्मिक रूप से अपवित्र माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु इसकी चोटी पर जाने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय वे पहाड़ की परिक्रमा यानी ‘कोरा’ करते हैं। परिक्रमा का रास्ता करीब 52-53 किलोमीटर का माना जाता है और इसे पूरा करने में आम तौर पर लगभग तीन दिन लगते हैं। रास्ते का सबसे ऊंचा हिस्सा डोलमा ला पास है, जिसकी ऊंचाई करीब 5,630 मीटर तक पहुंचती है। यानी जिस पहाड़ की चोटी 6,638 मीटर है, उसकी परिक्रमा के दौरान भी श्रद्धालु 5,600 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर पहुंचते हैं। यह कोई सामान्य धार्मिक यात्रा नहीं है। यहां कम ऑक्सीजन, बेहद ठंड, तेज हवाएं और अचानक बदलता मौसम यात्रा को खतरनाक बना सकते हैं।

एक ही पहाड़ की परिक्रमा अलग दिशा में क्यों?

हिंदू और बौद्ध श्रद्धालु आम तौर पर कैलाश की परिक्रमा घड़ी की दिशा में करते हैं। ‘बोन’ परंपरा में परिक्रमा इसके उलट दिशा में की जाती है। यानी एक ही पवित्र पहाड़, लेकिन अलग धार्मिक परंपराओं में उसके चारों ओर घूमने का तरीका भी अलग।और यही कैलाश को सिर्फ एक हिंदू तीर्थ की बजाय एक साझा हिमालयी धार्मिक भूगोल बनाता है।

कैलाश की लोकप्रियता अचानक कैसे बढ़ी?

19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश अधिकारियों और यूरोपीय यात्रियों ने हिमालय और तिब्बत के बारे में व्यवस्थित जानकारी इकट्ठी करनी शुरू की। नक्शे बने, रास्तों का अध्ययन हुआ और व्यापार तथा प्रशासन के लिए हिमालय को समझने की कोशिश हुई। इसी दौर में कैलाश पर्वत भी बाहरी दुनिया की नजर में तेजी से आया। 1905 में अल्मोड़ा के ब्रिटिश अधिकारी चार्ल्स शेरिंग ने कैलाश की यात्रा की। उन्होंने माना कि अगर रास्ते बेहतर बनाए जाएं तो धार्मिक यात्रियों की संख्या बढ़ सकती है और उसके साथ व्यापार भी विकसित हो सकता है। यहां एक बड़ा बदलाव हुआ। जहाँ पहले रास्ता तीर्थयात्रा की मुश्किल था। फिर रास्ता खुद तीर्थयात्रा बढ़ाने का साधन बन गया। मैके के मुताबिक आधुनिक कैलाश तीर्थ के निर्माण में औपनिवेशिक परिवहन, कानून-व्यवस्था, नक्शे और बाद में भारतीय धार्मिक पुनर्जागरण, सभी ने भूमिका निभाई।

भारत-चीन सीमा ने कैलाश को रोक दिया

कैलाश की कहानी सिर्फ धर्म की नहीं, भू-राजनीति की भी है। 1950 में चीन के तिब्बत पर नियंत्रण के बाद हालात बदल गए। 1959 में सीमा बंद होने के बाद भारतीय श्रद्धालुओं के लिए कैलाश यात्रा लंबे समय तक रुक गई। भारत-चीन युद्ध के बाद हिमालय में सड़कों और सैन्य ढांचे का निर्माण भी तेज हुआ। बाद में यही बेहतर बुनियादी ढांचा धार्मिक यात्रा के लिए भी उपयोगी साबित हुआ। 1981 में भारत-चीन के बीच बातचीत के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू हुई। पहली वापसी वाली यात्रा में 60 भारतीय श्रद्धालु शामिल थे। इस तरह एक धार्मिक यात्रा फिर से दो देशों के बीच संबंधों का हिस्सा बन गई।

भारत के लिए कैलाश सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है। वह तिब्बत और चीन के साथ भारत के संबंधों से भी जुड़ा हुआ है। भारत-चीन संबंध जब सामान्य होते हैं तो कैलाश यात्रा दोनों देशों के बीच सीमित सांस्कृतिक संपर्क का माध्यम बन सकती है। जब रिश्तों में तनाव आता है, तो यात्रा पर भी उसका असर पड़ता है। यही कारण है कि कैलाश यात्रा को कई विशेषज्ञ आस्था और कूटनीति के बीच एक पुल के रूप में देखते हैं।

चीन के लिए भी इसका आर्थिक पहलू है। विदेशी और भारतीय तीर्थयात्रियों से जुड़े पर्यटन से तिब्बत के स्थानीय इलाकों में कारोबार और रोजगार पैदा होता है। लेकिन तिब्बत से जुड़ा कोई भी मामला चीन के लिए संवेदनशील भी है। इसलिए कैलाश की यात्रा धार्मिक होने के बावजूद पूरी तरह राजनीति से अलग नहीं हो सकती।

मानसरोवर का पानी इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

कैलाश पर्वत के दक्षिण में स्थित मानसरोवर झील भी इस पूरी धार्मिक भूगोल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हिंदू परंपरा में मानसरोवर को अत्यंत पवित्र माना जाता है। कई श्रद्धालु यहां स्नान को धार्मिक शुद्धि से जोड़ते हैं। कैलाश की परिक्रमा और मानसरोवर दर्शन आम तौर पर एक ही आध्यात्मिक यात्रा के हिस्से माने जाते हैं। इसके पास ही राक्षस ताल भी है। दो झीलें लगभग एक ही इलाके में होने के बावजूद धार्मिक कथाओं में उनका अर्थ बिल्कुल अलग है। मानसरोवर को पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है, जबकि राक्षस ताल को रावण और दूसरी धार्मिक कथाओं से जोड़ा जाता है।

कैलाश की आकृति इतनी रहस्यमय क्यों लगती है?

कैलाश को देखकर उसकी आकृति किसी सामान्य पहाड़ जैसी नहीं लगती। उसका ऊपरी हिस्सा लगभग चारों दिशाओं में व्यवस्थित दिखाई देता है और चट्टानी सतहों पर बर्फ की रेखाएं कई तस्वीरों में प्राकृतिक क्रॉस जैसी आकृतियां बनाती हैं। इसी वजह से इंटरनेट पर कैलाश को लेकर कई दावे किए जाते हैं। कहीं इसे पिरामिड कहा जाता है, कहीं इसे किसी प्राचीन सभ्यता की बनाई संरचना बताया जाता है। कुछ दावों में यहां समय तेजी से बीतने, बाल और नाखून तेजी से बढ़ने या असामान्य चुंबकीय प्रभाव जैसी बातें कही जाती हैं। लेकिन इन दावों के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं।

कैलाश की आधुनिक कहानी में सबसे नया अध्याय पर्यावरण का है। सड़कें बेहतर हो रही हैं। पर्यटन बढ़ रहा है। होमस्टे और होटल बन रहे हैं। दूरदराज के इलाकों तक पहुंच आसान हो रही है। यह श्रद्धालुओं के लिए अच्छी खबर है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा में ही कितनी बार आपदाएं भूस्खलन, बाढ़ आदि के रूप में आ चुकी हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि हर आपदा को सिर्फ प्राकृतिक घटना मानना सही नहीं होगा। पहाड़ काटकर सड़क बनाना, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण करना और दूरदराज के इलाकों को बड़े पर्यटन केंद्रों में बदलना आपदा के असर को बढ़ा सकता है। यह चिंता सिर्फ कैलाश तक सीमित नहीं है। हिमालय भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियरों और अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। हाल की नेपाल-तिब्बत सीमा की भयावह बाढ़ ने भी दिखाया कि इस इलाके में पर्यटन और तीर्थयात्रा कितनी कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच होती है।

अब एक नया सवाल सामने है कि क्या हम कैलाश तक पहुंचने के लिए हिमालय को इतना बदल देंगे कि जिस प्रकृति को पवित्र मानकर वहां जाते हैं, वही प्रकृति धीरे-धीरे खत्म होने लगे? कैलाश की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है। आस्था को वहां तक पहुंचने का रास्ता चाहिए, लेकिन हिमालय को अपनी सीमाएं बचाए रखने के लिए रास्ते पर ब्रेक भी चाहिए। और इसी टकराव में कैलाश की अगली कहानी लिखी जा रही है।

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