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डिजिटल दौर में भी सिक्कों की बल्ले-बल्ले, कांवड़िया पथ पर नोट बदलकर हो रही मोटी कमाई
Kanwar Yatra Coin Exchange 2026: डिजिटल दौर में भी कांवड़िया पथ पर सिक्कों की बढ़ी मांग, नोट बदलकर हो रही मोटी कमाई
Kanwariya Path Coin Exchange: Why Coins Are in High Demand During Sawan Yatra
Kanwariya Path Coin Exchange: डिजिटल पेमेंट के दौर में जहां जेब से सिक्के लगभग गायब हो चुके हैं, वहीं बिहार के बांका जिले से गुजरने वाले कांवड़िया पथ पर इन दिनों सिक्कों की खनक फिर सुनाई दे रही है। सावन मेले के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था ने सिक्कों की मांग इतनी बढ़ा दी है कि कई युवाओं ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है। नोट के बदले सिक्के देकर वे अच्छी आमदनी कर रहे हैं। यह अनोखा कारोबार न केवल स्थानीय लोगों के लिए मौसमी रोजगार बन गया है, बल्कि कांवड़ यात्रा से जुड़ी पुरानी परंपराओं को भी जीवित रखने का जरिया भी बना हुआ है।
डिजिटल दौर में भी कांवड़िया पथ पर आज कम नहीं हुई सिक्कों की चमक
देशभर में यूपीआई और ऑनलाइन भुगतान के बढ़ते चलन के कारण बाजार में सिक्कों का इस्तेमाल लगातार घटा है। चाय की दुकान हो या सब्जी मंडी, ज्यादातर लोग मोबाइल से भुगतान करना पसंद करते हैं। ऐसे में सिक्के बैंकों और लोगों की तिजोरियों तक सीमित होते जा रहे हैं।
लेकिन बांका के कांवड़िया पथ का नजारा बिल्कुल अलग है। अजगैवीनाथ धाम से देवघर स्थित बाबाधाम तक करीब 100 किलोमीटर लंबे कांवड़िया मार्ग पर श्रद्धालुओं की धार्मिक मान्यताओं के कारण सिक्कों की मांग अचानक बढ़ जाती है।
नोट के बदले सिक्के देकर हो रही अच्छी कमाई
सावन मेले के दौरान रास्ते में कई युवा थैलों और बोरियों में सिक्के लेकर बैठ जाते हैं। श्रद्धालु 10, 20, 50 या 100 रुपये के नोट देकर बदले में छोटे मूल्य के सिक्के लेते हैं।
कई जगह सुविधा शुल्क या अतिरिक्त राशि लेकर सिक्के दिए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 100 रुपये के सिक्कों के बदले श्रद्धालु 105 या 110 रुपये तक चुका देते हैं। पूरे दिन में हजारों रुपये के सिक्कों का लेनदेन होने से युवाओं की अच्छी कमाई हो जाती है। यही वजह है कि हर साल सावन में यह अस्थायी रोजगार दर्जनों स्थानीय युवाओं को आय का अवसर देता है।
आखिर कांवड़ियों को क्यों चाहिए इतने सिक्के?
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु रास्ते में आने वाले छोटे-छोटे मंदिरों, शिवलिंगों और धार्मिक स्थलों पर सिक्के अर्पित करते हैं। कई श्रद्धालु भिक्षुओं, साधु-संतों और जरूरतमंद लोगों को भी दान देते हैं। छोटे मूल्य के सिक्के होने से दान देना आसान रहता है। यही कारण है कि यात्रा शुरू करने से पहले ही कांवड़िये पर्याप्त मात्रा में सिक्के अपने साथ रखना पसंद करते हैं।
बैंकों से लेकर बाजार तक बढ़ जाती है मांग
सावन शुरू होने से पहले स्थानीय दुकानदार, कारोबारी और सिक्कों का कारोबार करने वाले लोग बैंकों से बड़ी मात्रा में सिक्के जुटाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हर किसी को जरूरत के हिसाब से पर्याप्त सिक्के नहीं मिल पाते। ऐसे में जिन लोगों के पास पहले से सिक्कों का संग्रह होता है, वे मेले के दौरान इन्हें श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराकर अतिरिक्त कमाई करते हैं।
हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं बाबाधाम
सुल्तानगंज के अजगैवीनाथ धाम से गंगाजल लेकर कांवड़िये पैदल यात्रा करते हुए झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं। सावन और भादो के दौरान इस मार्ग पर लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही होती है। रास्ते में जगह-जगह सेवा शिविर, चिकित्सा केंद्र, भोजन, विश्राम स्थल और पूजा सामग्री की दुकानें सज जाती हैं।
इसी धार्मिक यात्रा से जुड़े कई छोटे-छोटे मौसमी व्यवसाय भी फलते-फूलते हैं। पूजा सामग्री, चप्पल, वर्षा से बचाव के सामान, फल, पेयजल और अब सिक्कों का कारोबार भी इनमें प्रमुख बन गया है।
आस्था के साथ रोजगार का भी बना जरिया
कांवड़ यात्रा धार्मिक आयोजन के साथ ही साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी भूमिक निभाती है। होटल, ढाबे, दुकानदार, वाहन चालक, अस्थायी स्टॉल संचालक और स्थानीय मजदूरों के रोजगार में तेजी लाने के साथ-साथ सिक्के बदलने का यह अनोखा कारोबार भी लोगों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है।


