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Khade Hanuman Ujjain: खड़े हनुमानजी को हटाने पहुंचा प्रशासन, मगर 4 बार फेल हुई कोशिश, क्या है प्रतिमा के न हिलने का राज?
Khade Hanuman Ujjain: सिंहस्थ 2028 के लिए सड़क चौड़ीकरण के दौरान मंदिर ढहाया गया, लेकिन 8 फुट की हनुमान प्रतिमा 4 कोशिशों के बाद भी नहीं हिली। जानें वजह।
Khade Hanuman Ujjain: 8-Ft Idol Stays Put After 4 Removal Attempts, Know the Mystery
Khade Hanuman Ujjain: हनुमान जी को भक्त शक्ति, साहस और अटूट विश्वास का प्रतीक मानते हैं। देशभर में उनके ऐसे कई मंदिर हैं, जहां लोगों की आस्था से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं और चमत्कारों की कहानियां सुनने को मिलती हैं। लेकिन उज्जैन में इन दिनों खड़े हनुमान जी की कहानी कुछ अलग ही वजह से चर्चा में है।
अपनी अपार शक्ति के लिए भक्तों के बीच गहरी आस्था का केंद्र बन चुके खड़े हनुमान जी इन दिनों अपने अस्तित्व का साक्षात दर्शन देते हुए लोगों के बीच रहस्य और रोचकता का केंद्र बने हुए हैं। सिंहस्थ महाकुंभ 2028 की तैयारियों के लिए सड़क चौड़ीकरण के दौरान मंदिर का ढांचा तो हटा दिया गया, लेकिन करीब 8 फुट ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा को अपनी जगह से हटाने की कोशिशें बार-बार नाकाम हो गईं। चार दिनों में चार बार प्रयास के बावजूद प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। अब भक्त इसे भगवान की इच्छा और दैवीय संकेत मान रहे हैं, जबकि प्रशासन और पुरातत्व विशेषज्ञ इस रहस्य को तकनीकी और ऐतिहासिक नजरिए से समझने में जुटे हैं।
मंदिर टूटा, प्रतिमा वहीं खड़ी रही
स्थानीय लोगों और मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक प्रशासन ने मशीनों की मदद से प्रतिमा को हटाने की कोशिश की। हाइड्रोलिक मशीन का इस्तेमाल भी किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद प्रतिमा के आसपास की जमीन और नींव को समझने की कोशिश की गई।
मंदिर का ढांचा हटाए जाने के बाद फिलहाल प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए उसके ऊपर कैनोपी टेंट लगाया गया है। यानी मंदिर की पुरानी संरचना भले ही अब वहां नहीं है, लेकिन खड़े हनुमानजी अभी भी अपने मूल स्थान पर मौजूद हैं। भक्तों के लिए यही बात सबसे बड़ा सवाल बन गई है। कई लोग इसे भगवान की इच्छा से जोड़कर देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग इसे चमत्कार और दैवीय संकेत बता रहे हैं। वहीं प्रशासन और विशेषज्ञ इस घटना को तकनीकी और पुरातात्विक नजरिए से समझने में जुटे हैं।
प्रतिमा जमीन में कितनी गहराई तक जुड़ी है?
प्रतिमा के नहीं हिलने की एक बड़ी वजह उसकी नींव हो सकती है। जमीन के ऊपर दिखाई देने वाली प्रतिमा करीब 8 फुट की है, लेकिन उसके नीचे कितना हिस्सा मौजूद है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
मंदिर के पुजारी पंडित महेश बैरागी के अनुसार, प्रतिमा के आसपास करीब डेढ़ फुट तक खुदाई करके नींव को समझने का प्रयास किया गया, लेकिन इससे कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। आशंका है कि प्रतिमा किसी गहरी और मजबूत आधार संरचना से जुड़ी हो सकती है।
यह भी माना जा रहा है कि प्रतिमा मालवा क्षेत्र में पाए जाने वाले मजबूत बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है। ऐसे में सीधे खींचकर उसे हटाने का प्रयास प्रतिमा को नुकसान पहुंचा सकता है।
170 साल पुरानी या इससे भी ज्यादा प्राचीन?
खड़े हनुमानजी के मंदिर को स्थानीय स्तर पर करीब 170 साल पुराना बताया जाता है और इसका संबंध 1857 के आसपास के दौर से जोड़ा जाता है। हालांकि प्रतिमा की वास्तविक उम्र को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
अब भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम भी मामले से जुड़ गई है। प्रतिमा और मंदिर के इतिहास की जांच की जा रही है। कुछ दावे इसे परमार वंश और राजा भोज के काल से भी जोड़ते हैं। अगर पुरातात्विक जांच में ऐसा कोई ठोस प्रमाण मिलता है तो प्रतिमा की उम्र करीब एक हजार साल तक मानी जा सकती है।
सिंदूर की मोटी परत से छिपी है असली बनावट
विशेषज्ञों के सामने एक और चुनौती है। प्रतिमा पर वर्षों से सिंदूर की मोटी परत चढ़ाई जाती रही है। इससे उसकी मूल शिल्प शैली और चेहरे की बारीक विशेषताओं को सीधे देखना मुश्किल है।
विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, प्रतिमा जिस तरह के मजबूत बेसाल्ट पत्थर पर बनी बताई जा रही है, उसका इस्तेमाल मालवा क्षेत्र में प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकला में होता रहा है। यही वजह है कि प्रतिमा की उम्र और निर्माण काल जानने के लिए वैज्ञानिक जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
अब आस्था के साथ विज्ञान की भी परीक्षा
फिलहाल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिमा को बिना नुकसान पहुंचाए उसके स्थान से हटाने की है। इसके लिए ग्राउंड स्कैनिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल करने की तैयारी की जा रही है। इससे जमीन के भीतर मौजूद आधार संरचना के बारे में जानकारी मिल सकती है।
दूसरी तरफ श्रद्धालु प्रतिमा को हटाने के पक्ष में नहीं हैं। कई हिंदू संगठनों ने प्रशासन से प्रतिमा के साथ किसी तरह का प्रयोग नहीं करने की मांग की है और उसे हटाने से पहले सुरक्षा की लिखित गारंटी मांगी है।
यही वजह है कि सती गेट का यह मामला अब केवल सड़क चौड़ीकरण का विषय नहीं रह गया है। एक तरफ सिंहस्थ 2028 के लिए शहर को आधुनिक सुविधाओं से तैयार करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी आस्था और संभावित ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने का सवाल भी उठ रहा है।


