Lucknow Temples:नवरात्र में जरूर जानें लखनऊ की इन 7 देवियों का इतिहास, हर मंदिर की अपनी अनोखी कहानी

Lucknow Temples से जुड़ी 7 प्राचीन देवी मंदिरों की मान्यताएं, प्राचीन प्रतिमाएं, लोक परंपराएं और अनोखा इतिहास जानें।

Jyotsana Singh
Published on: 26 Sept 2026 4:40 PM IST
Lucknow Temples: Discover the Untold Stories of 7 Ancient Goddess Temples
X

Lucknow Temples: Discover the Untold Stories of 7 Ancient Goddess Temples

Lucknow Temples: शारदीय नवरात्र शुरू होते ही देशभर में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा शुरू हो जाती है। लखनऊ भी इस आस्था से अछूता नहीं है। शहर में कई प्राचीन देवी मंदिर हैं, जहां सालभर श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्र में इनकी रौनक अलग ही नजर आती है।

लखनऊ के पुराने हिस्सों में स्थित बड़ी काली, मनसा देवी, संदोहन देवी, मसानी देवी और शीतला माता के मंदिरों को स्थानीय परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है। इनके साथ भुइयन देवी और संकटा देवी भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। इन सातों मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं, प्राचीन अवशेष और लोक परंपराएं इन्हें सामान्य मंदिरों से अलग पहचान देते हैं।

बड़ी काली मंदिर में रजत वेदी पर विराजमान हैं प्राचीन प्रतिमाएं

चौक इलाके में दहला कुआं और बानवाली गली के बीच स्थित बड़ी काली मंदिर लखनऊ के पुराने देवी मंदिरों में गिना जाता है। मंदिर का आसन काफी ऊंचा है। स्थानीय मान्यता है कि कभी आदि गंगा गोमती की धारा इसके आसपास से बहती थी। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे-बड़े मंदिर भी हैं। इनमें एक मंदिर का शिखर गया शैली से प्रभावित बताया जाता है। परंपरा के अनुसार इस मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य से जोड़ी जाती है और यहां के पुजारियों का संबंध गया के ब्राह्मण परिवारों से रहा है।

मंदिर की एक खास पहचान रजत वेदी पर स्थापित लक्ष्मी-नारायण की प्राचीन चतुर्भुज प्रतिमाएं हैं। इन प्रतिमाओं को करीब एक हजार वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। कुछ विद्वान इन्हें नर-नारायण की प्रतिमा भी मानते हैं। मान्यता है कि ये प्रतिमाएं इसी क्षेत्र में मिले पुरातात्विक अवशेषों से जुड़ी हैं।

मसानी देवी मंदिर में आज भी चढ़ाई जाती हैं कौड़ियां

सआदतगंज में स्थित मसानी देवी मंदिर अपनी अलग परंपराओं के लिए जाना जाता है। लोक मान्यता में भगवान शिव को श्मशान से जोड़कर देखा जाता है और देवी के इसी स्वरूप को मसानी या श्मशानी देवी कहा जाता है।

मंदिर में फूलों के साथ कौड़ियां चढ़ाने की परंपरा आज भी दिखाई देती है। मान्यता है कि यहां मनोकामना पूरी होने की कामना से श्रद्धालु विशेष पूजा करते हैं। ‘सात बुध’ की परंपरा भी यहां से जुड़ी बताई जाती है, जिसमें श्रद्धालु सात बुधवार तक देवी की चौखट पर फूल, पान, लौंग, बताशे और कौड़ियां चढ़ाते हैं।

मंदिर की वर्तमान संरचना से जुड़ा इतिहास भी दिलचस्प है। बताया जाता है कि 19वीं सदी में पुजारी मंसादीन माली ने मंदिर की नई रूपरेखा तैयार कराई थी। मंदिर के पीतल के प्रवेश द्वार पर गणपति और राजलक्ष्मी की कलात्मक आकृतियां बनी हैं। गंगा को भी उनके वाहन मगर के साथ दर्शाया गया है।

भुइयन देवी को मिली थी पीपल के नीचे प्राचीन मूर्ति

गणेशगंज की भुइयन देवी मंदिर की कहानी खुद शहर के पुराने बसने की कहानी से जुड़ती है। मान्यता के अनुसार 19वीं सदी की शुरुआत में बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के शासनकाल में जब पुराना गणेशगंज विकसित हो रहा था, तब यहां जंगल और मरघटा हुआ करता था।

खुदाई के दौरान पीपल के पेड़ के नीचे देवी की एक प्राचीन प्रतिमा मिलने की बात कही जाती है। इसे छोटी मठिया में स्थापित किया गया और बाद में भूमिया स्वरूप की यह प्रतिमा भुइयन देवी के नाम से पूजी जाने लगी।

अवध में विष्णु पत्नी भू देवी यानी भुइयन देवी की उपासना की पुरानी परंपरा बताई जाती है। बाद में स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ी और मंदिर का विस्तार हुआ। मंदिर परिसर और उसकी वास्तु संरचना में स्थानीय परिवारों के योगदान का भी उल्लेख मिलता है।

संकटा देवी मंदिर में ‘संकटा की पिन्नी’ की परंपरा

रानी कटरा के बड़ा शिवाला परिसर में स्थित संकटा देवी मंदिर भी लखनऊ की पुरानी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। यहां देवी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा होने की मान्यता है।

लोक परंपरा में संकटा देवी को संकट दूर करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। अवध के कई इलाकों में संकटा देवी की पूजा की परंपरा रही है। किसी मनोरथ की पूर्ति के लिए सात सुहागिन महिलाओं को बुलाकर भोजन कराने की परंपरा को कई जगह ‘संकटा की पिन्नी’ कहा जाता है।

इसी परिसर में कश्मीरी ब्राह्मणों की आराध्य मानी जाने वाली आद्या देवी की प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह मंदिर एक ही जगह पर अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का संगम दिखाई देता है।

मनसा देवी मंदिर और नागकुल से जुड़ी मान्यता

सराय माली खां में माहूलाल की चढ़ाई के पास स्थित मनसा देवी मंदिर भी लखनऊ के पुराने धार्मिक स्थलों में शामिल है। बंगाल और बिहार में मनसा देवी की पूजा विशेष रूप से प्रचलित रही है। उन्हें नागकुल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

इसी वजह से मनसा देवी की पूजा से नागों और उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं का संबंध भी देखने को मिलता है। लखनऊ में स्थित इस मंदिर की प्राचीनता इसकी स्थानीय पहचान को खास बनाती है।

मंदिर के आसपास स्थित ऐतिहासिक जियालाल फाटक भी इस इलाके के पुराने स्थापत्य की याद दिलाता है। लखौरी ईंटों की बारीक चुनाई इसे देखने लायक बनाती है।

संदोहन देवी के आसपास मिले थे प्राचीन अवशेष

चौपटिया चौराहे पर स्थित संदोहन देवी मंदिर का इतिहास लखनऊ के प्राचीन भूगोल से जुड़ा बताया जाता है। मान्यता है कि इस क्षेत्र को कभी ‘सिंधुवन’ कहा जाता था। यहां एक तालाब था, जिसके अवशेष मंदिर के आसपास मिलने की बात कही जाती है।

मंदिर परिसर में मौर्यकालीन मूर्तियों के मिलने का भी उल्लेख मिलता है। इनमें से कुछ प्राचीन प्रतिमाएं आज भी परिसर में देखी जा सकती हैं। वर्तमान मंदिर पुराने मंदिरों के भग्नावशेषों के ऊपर ऊंचे आसन पर निर्मित बताया जाता है।

स्थानीय धार्मिक परंपरा में संदोहन देवी को लखनऊ के पांच प्रमुख देवी मंदिरों की ‘रत्नमाला’ की मध्यमणि कहा जाता है।

शीतला माता मंदिर में आज भी होती है ‘आठों का मेला’

मेहंदीगंज का शीतला देवी मंदिर भी अपनी प्राचीन मान्यताओं के कारण खास है। लोक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की स्थापना लव-कुश ने की थी। कहा जाता है कि पुराने समय में गोमती नदी की धारा मंदिर के पास से होकर बहती थी।

मंदिर की प्रमुख प्रतिमा मध्यकालीन आक्रमणों में खंडित होने की मान्यता है। इसके बाद उसी स्थान पर पिंडी के रूप में देवी की पूजा जारी रही। मंदिर के परिक्रमा पथ में दसवीं सदी की उमा-महेश्वर की खंडित प्रतिमा भी बताई जाती है।

मंदिर के पुनर्निर्माण को बंजारों से जोड़ा जाता है। बाद में कश्मीरी ब्राह्मण परिवारों ने भी देवी को अपनी आराध्य देवी के रूप में स्वीकार किया। होली के बाद अष्टमी के दिन यहां लगने वाला ‘आठों का मेला’ इस मंदिर की पुरानी लोक परंपरा को आज भी जीवित रखता है।

आस्था के साथ शहर के इतिहास की भी पहचान

लखनऊ की ये सात देवी चौखटें सिर्फ पूजा-पाठ के स्थान नहीं हैं। इनके साथ जुड़ी मूर्तियां, पुराने अवशेष, स्थापत्य, लोककथाएं और पूजा की परंपराएं शहर के बदलते इतिहास की कई परतें सामने लाती हैं।

नवरात्र में जब इन मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं और श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, तब लखनऊ की पुरानी गलियों में आस्था के साथ इतिहास भी जीवंत होता दिखाई देता है। यही वजह है कि बड़ी काली से लेकर शीतला माता और संदोहन देवी तक, इन सात मंदिरों को स्थानीय लोग आज भी अपनी ‘सात बहनों’ के रूप में याद करते हैं।

Jyotsana Singh
ABOUT THE AUTHOR

Jyotsana Singh

Content Writer Mail ID - jyotsana.b.singh@gmail.comjyotsana.b.singh@gmail.com

Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

Next Story