Iran Unique Village: जहां सड़क की जगह घरों की छतें हैं रास्ता, ईरान का यह गांव दुनिया को करता है हैरान

Masuleh Village Iran: न सड़क, न गाड़ियां... फिर भी पूरी दुनिया को हैरान करता है ईरान का यह अनोखा गांव

Jyotsana Singh
Published on: 9 July 2026 12:02 PM IST (Updated on: 9 July 2026 12:39 PM IST)
Masuleh Village Iran
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Masuleh Village Iran

Iran Unique Village: क्या आपने कभी ऐसे गांव की कल्पना की है, जहां एक भी सड़क न हो, लेकिन फिर भी लोगों की जिंदगी पूरी तरह सामान्य ढंग से चलती हो? जहां कार और बाइक नहीं पहुंच सकतीं, लेकिन बाजार भी लगता है, कैफे भी चलते हैं और लोग रोजमर्रा के काम भी आसानी से करते हैं। ईरान के उत्तर में पहाड़ों के बीच बसा मसुलेह (Masuleh) ऐसा ही एक अनोखा गांव है। यहां एक घर की छत दूसरे घर का रास्ता बन जाती है। सदियों पुरानी वास्तुकला, प्रकृति के बीच बसा शांत वातावरण और अनोखी जीवनशैली इस गांव को दुनिया के सबसे खास पर्यटन स्थलों में शामिल करती है। यही वजह है कि हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटक इस अनोखी बस्ती को अपनी आंखों से देखने पहुंचते हैं।आइए ईरान के इस अनोखे गांव के बारे में विस्तार से जानते हैं -

पहाड़ की ढलान पर बसा है अनोखा गांव

मसुलेह ईरान के उत्तरी गीलान (Gilan) प्रांत में एल्बोर्ज पर्वत श्रृंखला की ढलानों पर स्थित है। यह गांव समुद्र तल से लगभग 1,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर बसा हुआ है। पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां सामान्य तरीके से सड़कें बनाना आसान नहीं था। इसलिए स्थानीय लोगों ने सदियों पहले ऐसा निर्माण किया, जिसने आज इसे दुनिया भर में प्रसिद्ध बना दिया। यह गांव प्राकृतिक ढलान के अनुसार विकसित हुआ है। यही वजह है कि यहां घर सीढ़ीनुमा तरीके से एक-दूसरे के ऊपर बने हुए दिखाई देते हैं।

जहां एक घर की छत दूसरे घर की सड़क है

मसुलेह की सबसे बड़ी पहचान इसकी अनोखी वास्तुकला है। यहां नीचे बने घर की छत ऊपर बने घर के लिए रास्ता, आंगन और सार्वजनिक जगह का काम करती है। यानी जिस जगह पर लोग चलते हैं, वही किसी दूसरे परिवार के घर की छत होती है।

इसी कारण गांव में अलग से सड़क बनाने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई। पूरा गांव पैदल यात्रियों के हिसाब से विकसित हुआ है। यही विशेषता इसे दुनिया के सबसे अलग और अनूठे गांवों में शामिल करती है।

गांव के अंदर नहीं चलती कोई कार

मसुलेह के भीतर कार, बाइक या किसी बड़े वाहन का प्रवेश संभव नहीं है। गांव की संकरी गलियां और छतों से जुड़े रास्ते केवल पैदल चलने वालों के लिए बने हैं। स्थानीय लोग अपने रोजमर्रा के काम पैदल ही करते हैं। सामान ढोने के लिए छोटे हाथ ठेले, जानवरों या मानव श्रम का सहारा लिया जाता है। यही कारण है कि यहां ट्रैफिक जाम, हॉर्न और प्रदूषण जैसी समस्याएं देखने को नहीं मिलतीं। आज जब दुनिया के बड़े शहर ट्रैफिक और प्रदूषण से जूझ रहे हैं, तब मसुलेह एक शांत और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली की मिसाल पेश करता है।

छतों पर सजता है बाजार, वहीं चलते हैं कैफे

मसुलेह की छतें केवल रास्ता नहीं हैं। यही जगह गांव की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी है। यहां छोटी-छोटी दुकानों में स्थानीय हस्तशिल्प, ऊनी कपड़े, पारंपरिक वस्तुएं, मसाले, सूखे मेवे और हाथ से बनी सजावटी चीजें बिकती हैं। कई छोटे कैफे और रेस्टोरेंट भी इन्हीं छतों पर बने हुए हैं। पर्यटक यहां बैठकर पारंपरिक ईरानी चाय, स्थानीय व्यंजनों और पहाड़ों के खूबसूरत नजारों का आनंद लेते हैं। शाम के समय पूरा इलाका पर्यटकों और स्थानीय लोगों की चहल-पहल से जीवंत हो उठता है।

कोहरे में छिप जाता है पूरा गांव

मसुलेह की प्राकृतिक सुंदरता भी इसकी लोकप्रियता की बड़ी वजह है। चारों ओर फैले घने जंगल, पहाड़ और हरियाली इस गांव को बेहद आकर्षक बनाते हैं। सुबह के समय अक्सर पूरा गांव घने कोहरे से ढक जाता है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो घर बादलों के बीच तैर रहे हों। बारिश के मौसम में यहां की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। वहीं शाम को डूबते सूरज की सुनहरी रोशनी पूरे गांव को अलग ही रंग में रंग देती है।

इसी कारण फोटोग्राफरों और प्रकृति प्रेमियों के बीच यह जगह बेहद लोकप्रिय है।

कई सौ साल पुरानी है मसुलेह की पहचान

इतिहासकारों के अनुसार मसुलेह का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना माना जाता है। माना जाता है कि वर्तमान गांव पुराने मसुलेह क्षेत्र से स्थानांतरित होकर विकसित हुआ था।

यहां के अधिकांश घर लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और स्थानीय निर्माण सामग्री से बनाए गए हैं। इनकी बनावट ऐसी है कि सर्दियों की ठंड और लगातार होने वाली बारिश से लोगों को सुरक्षा मिल सके।

आज भी गांव की पारंपरिक शैली को संरक्षित रखा गया है। नए निर्माण भी पुराने डिजाइन के अनुरूप ही किए जाते हैं ताकि इसकी ऐतिहासिक पहचान बनी रहे। घरों का रंग भी है खास

मसुलेह के अधिकांश घर पीले या मिट्टी जैसे हल्के रंगों में रंगे हुए दिखाई देते हैं। इसके पीछे भी व्यावहारिक कारण है।

इस क्षेत्र में अक्सर घना कोहरा रहता है। हल्के रंग के घर कोहरे में भी आसानी से दिखाई देते हैं। जिससे लोगों को आने-जाने में सुविधा रहती है। यह परंपरा आज भी जारी है।

यूनेस्को की सूची में शामिल कराने की कोशिश

मसुलेह को ईरान की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में गिना जाता है। इसे राष्ट्रीय विरासत के रूप में संरक्षित किया गया है। इसके ऐतिहासिक और वास्तु महत्व को देखते हुए इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयास भी किए गए हैं। सरकार और स्थानीय प्रशासन पर्यटन सुविधाओं का विकास तो कर रहे हैं, लेकिन इस बात का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि गांव की मूल संरचना और पारंपरिक स्वरूप में कोई बदलाव न आए।

प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर जीते हैं लोग

मसुलेह के लोगों का जीवन आज भी काफी हद तक पारंपरिक है। यहां के लोग खेती, पशुपालन, पर्यटन और हस्तशिल्प के जरिए अपनी आजीविका कमाते हैं। महिलाएं हाथ से बनी ऊनी वस्तुएं, कपड़े और सजावटी सामान तैयार करती हैं। जबकि पुरुष खेती और पर्यटकों से जुड़े व्यवसायों में लगे रहते हैं। स्थानीय समुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को आज भी पूरी शिद्दत से निभाता है।

पर्यटकों के लिए क्यों खास है मसुलेह?

मसुलेह केवल अपनी वास्तुकला की वजह से ही नहीं, बल्कि अपने शांत वातावरण के कारण भी लोगों को आकर्षित करता है। यहां आने वाले पर्यटक ट्रैकिंग, फोटोग्राफी, स्थानीय संस्कृति को करीब से देखने और पारंपरिक ईरानी भोजन का आनंद लेने के लिए पहुंचते हैं। सोशल मीडिया पर गांव की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने के बाद इसकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ी है। कई अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल मैगजीन और ब्लॉगर इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत पर्वतीय बस्तियों में शामिल कर चुके हैं।


भारतीय पर्यटकों के बीच भी बढ़ रही लोकप्रियता


हाल के वर्षों में भारत से ईरान जाने वाले पर्यटकों के बीच भी मसुलेह की लोकप्रियता बढ़ी है। जो लोग सामान्य पर्यटन स्थलों से हटकर कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, उनके लिए यह गांव आकर्षण का केंद्र बन रहा है। यहां का शांत माहौल, पारंपरिक जीवन, पहाड़ों के मनोरम दृश्य और बिना सड़क वाला अनोखा ढांचा लोगों को हमेशा याद रहने वाला अनुभव देता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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