Meerut Shiv Temples: रावण की ससुराल से जुड़ा है मेरठ! यहां के शिव मंदिरों में छिपी हैं पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां

Meerut Shiv Temples: मेरठ के इन प्राचीन शिव मंदिरों की कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान, रामायण से लेकर 1857 तक का इतिहास जुड़ा

Jyotsana Singh
Published on: 12 July 2026 3:59 PM IST (Updated on: 12 July 2026 4:00 PM IST)
Meerut Shiv Temples: रावण की ससुराल से जुड़ा है मेरठ! यहां के शिव मंदिरों में छिपी हैं पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां
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Meerut Shiva Temples: उत्तर प्रदेश का मेरठ केवल 1857 की क्रांति की जन्मस्थली नहीं, बल्कि भगवान शिव की अनादि आराधना की भूमि भी माना जाता है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में फैले प्राचीन शिव मंदिर इस बात का प्रमाण हैं कि यहां हजारों वर्षों से शिव भक्ति की परंपरा चली आ रही है। पौराणिक मान्यताओं में मेरठ का प्राचीन नाम मयराष्ट्र बताया गया है, जिसका संबंध मयदानव और उनकी पुत्री मंदोदरी से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि मेरठ को कई लोग 'शिव की नगरी' भी कहते हैं। यहां के कई मंदिर मराठा काल की वास्तुकला, स्वतंत्रता संग्राम और पुरातात्विक धरोहर के रूप में भी विशेष पहचान रखते हैं।

मेरठ में शिव भक्ति की शुरुआत पौराणिक काल से मानी जाती है

इतिहास और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मेरठ का प्राचीन नाम मयराष्ट्र था, जिसे मयदानव ने बसाया था। रामायण में वर्णित मंदोदरी, जो आगे चलकर रावण की पत्नी बनीं, उन्हें भगवान शिव की परम भक्त माना जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार मंदोदरी मेरठ के प्राचीन शिवालयों में नियमित रूप से पूजा-अर्चना करती थीं। यही कारण है कि आज भी मेरठ के कई मंदिरों का संबंध रामायण काल की कथाओं से जोड़ा जाता है। शहर के पुराने इलाकों में मौजूद अनेक शिवालय इस प्राचीन परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।

बिल्वेश्वर महादेव मंदिर, जहां मंदोदरी ने मांगा था वरदान

सदर क्षेत्र स्थित बिल्वेश्वर महादेव मंदिर मेरठ के सबसे प्राचीन शिवालयों में गिना जाता है। मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां बेल (बिल्व) के वृक्षों का विशाल वन था और पास में एक सरोवर स्थित था। मंदोदरी इसी सरोवर में स्नान करने के बाद भगवान शिव की पूजा करने आती थीं। उन्होंने यहीं भगवान शिव से संसार के सबसे विद्वान और शक्तिशाली पति का वरदान मांगा था, जिसके बाद उनका विवाह लंकापति रावण से हुआ।

इतिहासकार बताते हैं कि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा शासन के दौरान कराया गया था। मंदिर के शिखर और प्रवेश द्वार में मराठा स्थापत्य शैली की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। वर्षों की पूजा-अर्चना के कारण शिवलिंग काफी घिस चुका है, इसलिए उस पर तांबे का सुरक्षा कवच चढ़ाया गया है। मंदिर परिसर में संस्कृत विद्यालय भी संचालित होता है और यह आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

पुरातत्व विभाग ने बिल्वेश्वर मंदिर को संरक्षित धरोहर का दर्जा दिया

बिल्वेश्वर महादेव मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक धरोहर भी है। मंदिर परिसर में देवी-देवताओं की प्राचीन पत्थर की मूर्तियां, पुराने स्थापत्य अवशेष और ऐतिहासिक संरचनाएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए इसकी मूल संरचना को संरक्षित रखा गया है और बिना अनुमति किसी प्रकार का नया निर्माण या बदलाव प्रतिबंधित है। इससे मंदिर की ऐतिहासिक पहचान भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनी हुई है।

औघड़नाथ मंदिर, जहां से 1857 की क्रांति की जुड़ी है चिंगारी

मेरठ का औघड़नाथ मंदिर, जिसे काली पलटन मंदिर भी कहा जाता है, धार्मिक और राष्ट्रीय दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू माने जाते हैं। सावन और महाशिवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। इस मंदिर का नाम 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ा है। अंग्रेज सेना के भारतीय सैनिक इसी क्षेत्र में तैनात थे और मंदिर के आसपास उनका आना-जाना होता था। यहीं से अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष ने स्वरूप लेना शुरू किया और 10 मई 1857 की ऐतिहासिक क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार हुई। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 1968 में शुरू हुआ और बाद के वर्षों में इसमें कई विस्तार किए गए। मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश भी स्थापित किया गया है।

पंचमुखी महादेव मंदिर, जहां आज भी जीवित है प्राचीन मयराष्ट्र की परंपरा

ठठेरवाड़ा (सराय लालदास क्षेत्र) स्थित सिद्धपीठ पंचमुखी महादेव मंदिर मेरठ के सबसे पुराने शिवालयों में शामिल है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना स्वयं मयदानव ने कराई थी। बाद में मराठा काल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और मराठाओं के गुरु यादव गिरि ने इसके रखरखाव के लिए भूमि भी दान की थी।

करीब छह बीघा क्षेत्र में फैले इस परिसर में पंचमुखी महादेव के अलावा महामाया, भगवती और मनसा देवी के मंदिर भी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों श्रद्धालु यहां नियमित रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं और सावन के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।

अपनी ऊंचाई और दुर्लभ प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है हरिद्वारेश्वर महादेव मंदिर

मोरीपाड़ा स्थित हरिद्वारेश्वर महादेव मंदिर मेरठ के सबसे अनूठे शिवालयों में माना जाता है। मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग हरिद्वार से लाकर स्थापित किया गया था, इसलिए इसका नाम हरिद्वारेश्वर पड़ा। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप सहित लगभग 27 प्राचीन मूर्तियां मौजूद हैं। इस मंदिर की एक और विशेषता इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह शहर के सबसे ऊंचे स्थलों में स्थित माना जाता है और इसकी छत से लगभग पूरा पुराना मेरठ दिखाई देता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार जगद्गुरु करपात्री महाराज और कृष्णबोधाश्रम महाराज जैसे संत भी यहां समय-समय पर प्रवास करते रहे।

सावन में मेरठ बन जाता है भोलेनाथ की भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र

सावन शुरू होते ही मेरठ के सभी प्रमुख शिवालयों में भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं। हरिद्वार से कांवड़ लाकर श्रद्धालु औघड़नाथ, बिल्वेश्वर, पंचमुखी महादेव और हरिद्वारेश्वर मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। पूरे शहर में भजन-कीर्तन, रुद्राभिषेक, भंडारे और धार्मिक आयोजन चलते हैं। प्रशासन भी श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष सुरक्षा और यातायात व्यवस्था करता है।

मेरठ के प्राचीन शिव मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और वास्तुकला के जीवंत दस्तावेज भी हैं। यहां कहीं रामायण काल की मान्यताएं मिलती हैं तो कहीं मराठा स्थापत्य की झलक दिखाई देती है। मेरठ की प्राचीन धार्मिक विरासत को यहां के मंदिर आज भी संजोए हुए हैं। यही कारण है कि मेरठ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शिव भक्ति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

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