Pishach Mochan Kund: अकाल मृत्यु के बाद आत्मा को कैसे मिलती है मुक्ति? वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड से जुड़ी है ये मान्यता

Pishach Mochan Kund: वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड में अकाल मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध क्यों किया जाता है? जानें पीपल पर सिक्के और कील लगाने समेत इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।

Jyotsana Singh
Published on: 9 Oct 2026 8:48 AM IST (Updated on: 9 Oct 2026 8:48 AM IST)
Pishach Mochan Kund: How Does the Ritual for Peace After an Untimely Death Work?
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Pishach Mochan Kund: How Does the Ritual for Peace After an Untimely Death Work?

Pishach Mochan Kund:वाराणसी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। यहां गंगा के घाटों से लेकर प्राचीन मंदिरों तक हर जगह कोई न कोई धार्मिक मान्यता और परंपरा जुड़ी हुई है। लेकिन काशी का पिशाचमोचन कुंड अपने आप में कुछ अलग है। यहां अकाल मृत्यु और अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए ऐसे कर्मकांड किए जाते हैं, जिन्हें देखकर पहली बार आने वाला व्यक्ति भी हैरान रह जाता है।

पिशाचमोचन कुंड के पास मौजूद पीपल के पेड़ पर बड़ी संख्या में सिक्के और कीलें लगी दिखाई देती हैं। कई जगह मृत व्यक्ति की तस्वीर या उनसे जुड़ा कोई प्रतीक भी पेड़ पर लगाया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इनका संबंध उन पितरों और आत्माओं की शांति से है, जिनकी मृत्यु असमय हुई या जिनका कोई कर्मकांड अधूरा रह गया। पितृ पक्ष के दौरान इस तीर्थ पर देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध और दूसरे कर्मकांड कराने से पितरों को शांति मिलती है और यजमान पितृ ऋण से मुक्त होता है।

पिशाचमोचन कुंड में क्यों किया जाता है त्रिपिंडी श्राद्ध?

काशी के पिशाचमोचन तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता यहां होने वाला त्रिपिंडी श्राद्ध माना जाता है। सामान्य तौर पर गया को पिंडदान और पितृ श्राद्ध के प्रमुख तीर्थ के रूप में जाना जाता है, लेकिन पिशाचमोचन में पितरों के साथ-साथ अकाल मृत्यु और अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए भी विशेष कर्मकांड किए जाते हैं। तीर्थ पुरोहित दीपक पांडेय के अनुसार, पितृ पक्ष के 15 दिन इस कर्मकांड के लिए विशेष माने जाते हैं। हालांकि पेड़ पर सिक्का या कील लगाने से जुड़ा विधान पूरे वर्ष किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दौरान किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितृ लोक में रहने वाले पितरों तथा प्रेत योनि में भटक रही आत्माओं की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

यही वजह है कि जिन परिवारों में किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई हो या किसी दिवंगत परिजन की आत्मा की शांति को लेकर धार्मिक रूप से चिंता हो, वे पिशाचमोचन पहुंचकर विशेष कर्मकांड कराते हैं।

पीपल के पेड़ पर सिक्के और कील लगाने का क्या मतलब है?

पिशाचमोचन पहुंचने वाले लोगों के लिए यहां का पीपल का पेड़ सबसे ज्यादा कौतूहल पैदा करता है। पेड़ के तने पर जगह-जगह सिक्के और कीलें दिखाई देती हैं। कई श्रद्धालु मृत व्यक्ति की तस्वीर या उनके जीवन से जुड़ी कोई पहचान भी यहां लगाते हैं।

तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, यह प्रक्रिया धार्मिक आस्था और कर्मकांड से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि मृत व्यक्ति के नाम से पेड़ पर सिक्का या कील लगाने का विधान उनकी अतृप्त आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। श्रद्धालु इसे अपने दिवंगत परिजन से जुड़ी धार्मिक जिम्मेदारी पूरी करने के रूप में देखते हैं।

अकाल मृत्यु वालों के लिए क्यों खास है पिशाचमोचन?

पिशाचमोचन को काशी में अकाल मृत्यु से जुड़े कर्मकांडों का प्रमुख स्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सामान्य मृत्यु के बाद किए जाने वाले श्राद्ध से अलग अकाल मृत्यु, असामयिक निधन या कुछ विशेष परिस्थितियों में हुई मृत्यु के लिए यहां विशेष कर्मकांड किए जाते हैं।

यही कारण है कि पिशाचमोचन को उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जिनके किसी सदस्य की मृत्यु अचानक, दुर्घटना या किसी अन्य असामान्य परिस्थिति में हुई हो। परिवार के लोग यहां तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध कराकर दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हैं।

धार्मिक विश्वास यह है कि ऐसे कर्मकांड से आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और परिवार पर माने जाने वाले पितृ ऋण या पितृ संबंधी बाधाओं का निवारण होता है।

गरुड़ पुराण और काशी खंड में भी मिलता है पिशाचमोचन का उल्लेख

पिशाचमोचन की धार्मिक महत्ता केवल स्थानीय मान्यता तक सीमित नहीं है। इसके संबंध में गरुड़ पुराण और काशी से जुड़े धार्मिक ग्रंथों में भी वर्णन मिलने की बात कही जाती है। काशी खंड की मान्यता के अनुसार यह तीर्थ गंगा के धरती पर आने से पहले से मौजूद था। तीर्थ पुरोहित अजय पांडेय के अनुसार, प्राचीन समय में पिशाचमोचन को विमलोदक सरोवर के नाम से जाना जाता था। इससे जुड़ी धार्मिक कथा में पुष्कर के एक ब्राह्मण की अकाल मृत्यु का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद वह पिशाच योनि में भटकते हुए विमलोदक सरोवर तक पहुंचा। सरोवर में स्नान करते ही उसे पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। इसी धार्मिक कथा को पिशाचमोचन तीर्थ की महत्ता से जोड़कर देखा जाता है। यहां कुंड के किनारे अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति के लिए श्राद्ध करने को भी विशेष फलदायी माना जाता है।

पिशाचमोचन में अश्वदान की परंपरा भी है खास

पिशाचमोचन से जुड़ी एक और अनोखी परंपरा अश्वदान की है। काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी के अनुसार काशी को धार्मिक परंपरा में प्रथम पिंड से जोड़ा जाता है। इसी वजह से कई लोग पिंडदान की शुरुआत पिशाचमोचन से करते हैं और इसके बाद गया तथा अंत में केदारनाथ की यात्रा करते हैं।

उनके अनुसार पिशाचमोचन तीर्थ में अश्वदान की परंपरा भी बताई जाती है। धार्मिक मान्यता में यह परंपरा प्रयागराज और गया के श्राद्ध कर्म से अलग मानी जाती है। अश्वदान के बाद ही यजमान को प्रेत कुंड में पिंड अर्पित करने का अधिकारी माना जाता है।

पितृ पक्ष में क्यों बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़?

पितृ पक्ष को पूर्वजों को याद करने और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान करने का विशेष समय माना जाता है। इसी वजह से इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग काशी पहुंचते हैं। पिशाचमोचन कुंड पर भी इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। जिन परिवारों में किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई हो या जिनके यहां किसी दिवंगत परिजन के लिए विशेष कर्मकांड की परंपरा रही हो, उनके लिए पिशाचमोचन विशेष महत्व रखता है। लोग यहां पुरोहितों की देखरेख में अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार कर्मकांड कराते हैं और पितरों की शांति की प्रार्थना करते हैं।

पितृ पक्ष में सात्विक भोजन को क्यों दिया जाता है महत्व?

पितृ पक्ष के दौरान केवल श्राद्ध और तर्पण ही नहीं, बल्कि खान-पान और जीवनशैली को लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं हैं। ज्योतिषाचार्य आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार इस अवधि में तामसिक भोजन से बचने और सात्विक भोजन करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता में पितरों की प्रसन्नता के लिए इस दौरान संयमित जीवन जीने पर जोर दिया जाता है। इसी तरह बाल और दाढ़ी न कटवाने की भी कुछ परंपराएं प्रचलित हैं। इसे धार्मिक मान्यता के रूप में देखा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पितृ पक्ष से जुड़े नियमों में अंतर भी देखने को मिलता है।

पंचबलि से जुड़ी है पितृ पक्ष की परंपरा

पितृ पक्ष में पंचबलि की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन तैयार करने के बाद उसका एक हिस्सा अलग-अलग जीवों और देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसमें पहला ग्रास गाय के लिए, दूसरा कुत्ते के लिए और तीसरा कौए के लिए निकाला जाता है।

इसके बाद देव बलि के रूप में चौथा हिस्सा जल में प्रवाहित करने या गाय को देने की परंपरा बताई जाती है। पांचवां हिस्सा चीटियों के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यता में पंचबलि को पितरों की तृप्ति और पितृदोष के निवारण से जोड़कर देखा जाता है।

काशी में पिशाचमोचन की आस्था आज भी कायम

पिशाचमोचन कुंड सिर्फ एक प्राचीन जलाशय नहीं, बल्कि काशी की उस धार्मिक परंपरा का हिस्सा है जिसमें मृत्यु के बाद आत्मा की शांति और पितरों के प्रति कर्तव्य को विशेष महत्व दिया जाता है। कुंड के किनारे होने वाले श्राद्ध से लेकर पीपल के पेड़ पर लगे सिक्के और कील तक, यहां का हर दृश्य किसी न किसी धार्मिक विश्वास से जुड़ा नजर आता है। धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिए से पिशाचमोचन आज भी काशी का एक महत्वपूर्ण तीर्थ बना हुआ है। खासकर पितृ पक्ष में यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान अपने दिवंगत परिजनों को याद करने, उनके लिए तर्पण करने और उनकी आत्मा की शांति की कामना करने का एक भावनात्मक केंद्र है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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