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Ravan Temple Mystery: दशहरे पर जलाया जाता है रावण का पुतला, लेकिन कानपुर में होती है दशानन की पूजा..
Ravan Temple Mystery: कानपुर के दशानन मंदिर में दशहरे पर रावण की पूजा होती है। जानें शिवाला स्थित इस अनोखे मंदिर का इतिहास, साल में एक दिन खुलने वाले कपाट और तरोई के फूल चढ़ाने की मान्यता।
Ravan Temple Mystery: Why Kanpur’s Ravana Temple Opens Only Once a Year on Dussehra
Ravan Temple:दशहरे का त्यौहार करीब आते ही देश भर में रावण दहन की तैयारियां अपने अंतिम चरण पर पहुंच चुकी हैं। भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता हुआ ये त्यौहार लोगों को हमेशा ही रोमांचित कर जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने से पहले उसके दर्शन और पूजा-अर्चना की जाती है? यहां लंकापति रावण को केवल रामायण के खलनायक के रूप में नहीं, बल्कि महान विद्वान और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी देखा जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार विजयादशमी पर खुलते हैं। सुबह पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के लिए खुलने वाला मंदिर शाम को फिर बंद कर दिया जाता है। कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित इस दशानन मंदिर का इतिहास, इससे जुड़ी मान्यताएं और दशहरे की परंपरा इसे देश के अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।
कानपुर में कहां स्थित है दशानन रावण का मंदिर?
दशानन मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर, फूल मंडी के पास स्थित है। इस मंदिर की खास पहचान रावण की प्रतिमा और उससे जुड़ी सालाना पूजा की परंपरा है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी पर रावण दहन किया जाता है, वहीं यहां श्रद्धालु लंकाधिपति की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं। यह मंदिर भगवान शिव के मंदिर और परिसर में स्थापित अन्य देवी-देवताओं के निकट स्थित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण को यहां शक्ति के प्रहरी के रूप में स्थापित किया गया था। इसी वजह से इस मंदिर में रावण की मौजूदगी को केवल रामायण की कथा से जोड़कर नहीं देखा जाता, बल्कि उसकी शिवभक्ति और विद्वता को भी महत्व दिया जाता है।
कब बना था मंदिर?
कानपुर के दशानन मंदिर के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण सवाल इसकी स्थापना के वर्ष को लेकर है। इस संबंध में दो अलग-अलग जानकारियां प्रचिलत हैं। जिनके मुताबिक, कैलाश मंदिर की स्थापना वर्ष 1868 में उन्नाव के महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराई थी और उसके लगभग पांच वर्ष बाद परिसर में दशानन मंदिर स्थापित किया गया। इस विवरण के अनुसार, रावण मंदिर की स्थापना लगभग 1873 के आसपास हुई होगी। वहीं, दूसरी रिपोर्टों में दशानन मंदिर का निर्माण सीधे तौर पर वर्ष 1890 के आसपास बताया गया है।
बताया जाता है कि उन्नाव के महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल भगवान शिव के भक्त थे और इसी धार्मिक परिसर में रावण को भी स्थान दिया गया।
रावण को क्यों बनाया गया भगवान शिव के मंदिर का प्रहरी?
दशानन मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण को भगवान शिव के परम भक्त और महान विद्वान के रूप में देखा जाता है। धार्मिक कथाओं में उसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, कुशल संगीतकार और शक्तिशाली राजा बताया गया है। भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति का भी कई पौराणिक प्रसंगों में उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि कैलाश मंदिर परिसर में रावण को शक्ति के प्रहरी के रूप में स्थापित किया गया था। कुछ स्थानीय मान्यताओं में देवी छिन्नमस्तिका की आराधना और रावण की शिवभक्ति को भी इस परंपरा से जोड़ा जाता है।
यही कारण है कि दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने की परंपरा के साथ-साथ इस मंदिर में उसकी पूजा की परंपरा भी जारी है।
दशहरे पर सुबह खुलते हैं मंदिर के कपाट
दशानन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार विजयादशमी के दिन प्रातः काल खोले जाते हैं। मंदिर खुलने के बाद सबसे पहले रावण की प्रतिमा का अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद वैदिक मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना और आरती होती है। श्रद्धालु दर्शन करते हैं और अपनी मान्यताओं के अनुसार दीपक जलाकर प्रार्थना करते हैं। शाम को रावण दहन के आसपास मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं और अगले दशहरे तक दर्शन का अवसर नहीं मिलता।
साल में केवल एक दिन दर्शन की यह परंपरा मंदिर को खास बनाती है। श्रद्धालुओं के लिए विजयादशमी केवल रावण दहन का पर्व नहीं रह जाती, बल्कि इस दिन वे रावण के उस स्वरूप की पूजा भी करते हैं जिसे विद्वता और शिवभक्ति से जोड़ा जाता है।
तरोई के फूल और सरसों के तेल के दीपक का क्या है महत्व?
दशानन मंदिर की पूजा परंपरा में तरोई के फूल और सरसों के तेल के दीपक से जुड़ी खास मान्यता है। मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु रावण की प्रतिमा पर तरोई के फूल चढ़ाते हैं और सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं। महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ फूल अर्पित करती हैं। स्थानीय धार्मिक कथा में तरोई के फूल को रावण की पत्नी मंदोदरी की पूजा से भी जोड़ा जाता है। इन परंपराओं के कारण इस मंदिर की पूजा सामान्य दशहरा आयोजनों से अलग है।
दशहरे पर कैसा रहता है मंदिर का माहौल?
विजयादशमी के दिन मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रावण की प्रतिमा के अभिषेक, श्रृंगार और आरती के दौरान भक्त धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होते हैं। मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना के बाद लोग रावण के दर्शन करते हैं और अपनी मान्यताओं के अनुसार प्रार्थना करते हैं।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने है। कानपुर में दशहरे का यह दृश्य खास है। शहर में एक ओर रामलीला के आयोजन होते हैं और रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। दूसरी ओर, दशानन मंदिर में रावण की पूजा की जाती है। इस तरह एक ही दिन शहर में धार्मिक परंपरा के दो अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।
दशानन मंदिर के बारे में सबसे अधिक जिज्ञासा इस बात को लेकर होती है कि इसके कपाट पूरे साल बंद क्यों रहते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण को परिसर में देवी-देवताओं के प्रहरी के रूप में स्थापित किया गया था और दशहरे पर उसकी विशेष पूजा की जाती है। कुछ धार्मिक कथाओं में रावण के देवी की आराधना में लीन रहने की बात भी कही जाती है। दशहरे के अवसर पर दशानन मंदिर लोगों की जिज्ञासा और आस्था, दोनों का केंद्र बना रहता है।
कैसे पहुंचें दशानन मंदिर?
दशानन मंदिर कानपुर के शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर, फूल मंडी के पास स्थित है। कानपुर पहुंचने के बाद स्थानीय परिवहन की मदद से शिवाला क्षेत्र तक पहुंचा जा सकता है। दशहरे के दिन आसपास रामलीला और अन्य धार्मिक आयोजनों के कारण भीड़ तथा यातायात में बदलाव हो सकता है, इसलिए यात्रा की योजना पहले से बनाना बेहतर रहेगा।
मंदिर के कपाट केवल विजयादशमी पर खोले जाने की परंपरा के कारण दर्शन के लिए निकलने से पहले स्थानीय मंदिर प्रबंधन से समय की पुष्टि जरूर कर लें।


