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Rogan Art of Kutch: रोगन कला के आखिरी जादूगर अब्दुल गफूर खत्री की कहानी
Rogan Art of Kutch: गुजरात के कच्छ के निरोना गांव में अब्दुल गफूर खत्री 300 साल पुरानी रोगन कला को बचाने में जुटे हैं। जानिए इस अनूठी कला, उनके संघर्ष और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कहानी।
Rogan Art of Kutch | Gujarat Handicrafts, Traditional Indian Art | Newstrack Special Hindi
Rogan Art of Kutch: "कपड़े पर बिखरे ये रंग सिर्फ कला नहीं हैं, ये हमारे पुरखों की रूह हैं। अगर मेरी उँगलियों ने इस बारीक तार को थामना छोड़ दिया, तो ३०० साल पुराना यह हुनर हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।"
गुजरात के कच्छ जिले में एक छोटा सा, धूल से अटा गाँव है—निरोना। इस गाँव की एक तंग गली के आख़िरी छोर पर मिट्टी की दीवारों वाला एक पुराना मकान है। इस मकान के फर्श पर बैठे ६० साल से अधिक उम्र के एक बुज़ुर्ग अपनी हथेली पर गाढ़ा पीला रंग रगड़ रहे हैं। उनके दूसरे हाथ में लोहे की एक पतली सुई (स्टाइलस) है। वे बिना किसी रेखाचित्र या पेंसिल के निशान के, हवा में सुई को नचाते हैं और कपड़े पर एक ऐसा अद्भुत ऑर्गेनिक पैटर्न उभर आता है जिसे देखकर लगता है कि रंग खुद-ब-खुद कपड़े से बात कर रहे हैं। यह कोई साधारण पेंटिंग नहीं है। यह है 'रोगन कला' (Rogan Art), जो फ़ारसी मूल की ३०० साल पुरानी एक ऐसी अनूठी विधा है जिसमें अरंडी के तेल (Castor Oil) और प्राकृतिक रंगों के पेस्ट से कपड़े पर नक्काशी की जाती है। इस कला की सबसे बड़ी और खौफनाक सच्चाई यह है कि पूरी दुनिया में इस हुनर को जानने वाला अब सिर्फ एक ही परिवार बचा है, जिसके मुखिया हैं अब्दुल गफूर खत्री।
अब्दुल गफूर खत्री का जीवन इस प्राचीन कला को घुटने टेकने से बचाने की एक अंतहीन और बेहद कड़वी लड़ाई है। एक समय था जब कच्छ के दर्जनों गांवों में खत्री समुदाय के सैकड़ों लोग रोगन कला से अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन १९७० और ८० के दशक में जब बाज़ार में सस्ते, मशीनी प्रिंटेड कपड़े आने लगे, तो इस बारीक और हाड़-तोड़ मेहनत वाली कला की कद्र ख़त्म हो गई। रोगन कला में अरंडी के तेल को दो दिनों तक लगातार उबालना पड़ता है, जिससे निकलने वाला धुआं आँखों और फेफड़ों को बीमार कर देता है। इतनी मुस्तैदी और दर्द के बाद भी जब बाज़ार में इसके खरीदार नहीं मिले, तो गफूर खत्री के पूरे कुनबे ने इस काम को छोड़ दिया। उनके भाई-बाप पेट पालने के लिए मुंबई और अहमदाबाद की मिलों में मजदूरी करने चले गए। गफूर खत्री भी खुद भीख मांगने जैसी नौबत से बचने के लिए अहमदाबाद में एक छोटी सी दुकान पर मामूली पगार में सेल्समैन बन गए। वह दौर इस कला की मौत का पहला पड़ाव था।
लेकिन अपनी मिट्टी की महक और पुरखों के इस हुनर ने गफूर खत्री को चैन से जीने नहीं दिया। जब वे शहर में कपड़े बेचते थे, तो उन्हें रात में नींद नहीं आती थी। उन्हें लगता था कि यदि उन्होंने इस कला को छोड़ दिया, तो उनके दादा-परदादा का नाम इतिहास से मिट जाएगा। वे साल १९८३ में अपनी शहरी नौकरी लात मारकर वापस अपने सूखे गाँव निरोना लौट आए। उन्होंने कसम खाई कि चाहे भूखे मरना पड़े, वे इस कला को ज़िंदा रखेंगे। उनका असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। घर में दाने-दाने के लाले थे। लोग उन्हें ताना मारते थे कि "शहर की अच्छी भली पगार छोड़कर यह पागल फिर से तेल उबालने लगा है।" २० सालों तक उन्होंने गुमनामी के घने अंधेरे में काम किया। कोई सैलानी उनके गाँव नहीं आता था, कोई उनकी कला को देखने वाला नहीं था। वे दिन भर भूखे पेट कपड़े पर सुई से बारीक धागे जैसी नक्काशी करते और रात को लालटेन की रोशनी में रोते थे।
खत्री समुदाय का एक पुराना और सख्त नियम था—यह कला केवल परिवार के पुरुषों को ही सिखाई जाएगी, बेटियों या बहुओं को नहीं, ताकि हुनर घर से बाहर न जाए। लेकिन गफूर खत्री ने महसूस किया कि इस रूढ़िवादिता के कारण ही यह कला मर रही है। उन्होंने इस ३०० साल पुरानी परंपरा को तोड़ दिया, जो कि समाज में एक बहुत बड़ा विद्रोह था। उन्होंने अपने गाँव की गरीब और आदिवासी लड़कियों को इकट्ठा किया और उन्हें पूरी तरह मुफ्त में रोगन कला सिखाना शुरू किया। रूढ़िवादी समाज ने उनका हुक्का-पानी बंद करने की धमकी दी, लेकिन गफूर डिगे नहीं। आज उनके इस ऑर्गेनिक और विद्रोही प्रयास के कारण उनके गाँव की २० से अधिक लड़कियां इस बारीक कला में माहिर हो चुकी हैं, जिससे इस विधा को एक नया जीवनदान मिला है।
आज अब्दुल गफूर खत्री की आँखें कमज़ोर हो चुकी हैं, उंगलियां कांपती हैं, लेकिन जब वे हाथ में लोहे का तार लेते हैं, तो उनकी आत्मा जाग उठती है। हालांकि आज भी इस कला का भविष्य अधर में है क्योंकि यह बेहद महंगी और समय लेने वाली विधा है। एक छोटा सा कपड़ा तैयार करने में महीनों लग जाते हैं। गफूर खत्री आज भी उसी छोटे से मकान में बैठकर आने वाली पीढ़ी को इस कला की बारीकियां सौंप रहे हैं। उनका यह गुमनाम और एकाकी संघर्ष दिखाता है कि किसी देश की विरासत को बचाने के लिए बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियों की नहीं, बल्कि अपनी परंपरा के लिए अपनी पूरी जवानी और सेहत को कुर्बान कर देने वाले एक सच्चे और आखिरी 'चिराग' की ज़रूरत होती है।


