Roman Empire History: रोमन साम्राज्य 1,480 साल कैसे टिका? 1453 में कैसे हुआ अंत

Roman Empire History Explained: रोमन साम्राज्य करीब 1,480 साल तक कैसे टिका? जानिए उसकी सेना, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और कॉन्स्टेंटिनोपल की ताकत ने उसे कैसे बचाए रखा और 1453 में ओटोमन साम्राज्य के हाथों उसका अंत क्यों हुआ।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Sept 2026 4:13 PM IST
Roman Empire History Explained in Hindi
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Roman Empire History Explained in Hindi

Roman Empire History Explained: इतिहास में सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले साम्राज्य का नाम पूछें तो पहली नजर में जवाब आसान लगता है, लेकिन असल में यह सवाल काफी पेचीदा है। सबसे पहले यह तय करना पड़ता है कि हम एक ही साम्राज्य किसे मान रहे हैं। अगर राजवंश बदलने के बावजूद राज्य की राजनीतिक पहचान, संस्थाएं और शासन की परंपरा जारी रहती हैं तो जवाब अलग होगा, लेकिन अगर हर नए राजवंश को एक नया साम्राज्य माना जाए तो तस्वीर बदल जाएगी। चीन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। वहां चिन, हान, सुई, तांग, सोंग, युआन, मिंग और छिंग जैसे कई राजवंश आए, उनके बीच राज्य टूटे, अलग-अलग शक्तियां उभरीं और कई बार चीन का बड़ा हिस्सा अलग-अलग राज्यों में बंटा। फिर भी चीनी साम्राज्य की राजनीतिक परंपरा बहुत लंबे समय तक चलती रही। जापान के सम्राटों की परंपरा भी बेहद पुरानी है, लेकिन उसे लगातार एक ही विशाल साम्राज्य के रूप में देखना सही नहीं होगा।

इन सावधानियों के बाद अगर हम राजनीतिक और संस्थागत निरंतरता को आधार मानें, तो रोमन साम्राज्य सबसे मजबूत दावेदारों में आता है। इसकी शुरुआत 27 ईसा पूर्व में ऑगस्टस के सम्राट बनने से मानी जा सकती है और इसका अंतिम राजनीतिक केंद्र 29 मई 1453 को कॉन्स्टेंटिनोपल के पतन के साथ समाप्त हुआ। यानी करीब 1,480 वर्ष। आधुनिक इतिहासकार जिस हिस्से को ‘बीजान्टिन साम्राज्य’ कहते हैं, उसके लोग खुद को बीजान्टिन नहीं बल्कि रोमन कहते थे। उनके सम्राट रोमन सम्राट कहलाते थे, उनकी राज्य व्यवस्था खुद को रोमन साम्राज्य की निरंतरता मानती थी और रोमन कानून तथा राजनीतिक परंपराएं लंबे समय तक जारी रहीं। इसलिए 1453 तक चलने वाले पूर्वी रोमन राज्य को उसी लंबे रोमन साम्राज्य की निरंतरता मानना इतिहास में एक मजबूत और स्वीकार्य दृष्टिकोण है।

476 में रोमन साम्राज्य खत्म नहीं हुआ था

रोमन साम्राज्य की कहानी में 476 ईस्वी एक ऐसी तारीख है जो अक्सर भ्रम पैदा करती है। सामान्य इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि 476 में रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, जब जर्मनिक सेनानायक ओडोएसर ने पश्चिमी सम्राट रोमुलस ऑगस्टुलस को सत्ता से हटा दिया। लेकिन वास्तव में 476 में पूरे रोमन साम्राज्य का अंत नहीं हुआ था। पश्चिमी रोमन साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता जरूर समाप्त हुई, लेकिन पूर्वी रोमन साम्राज्य अपनी राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल से करीब एक हजार वर्ष और चलता रहा।

पूर्वी हिस्से के शासक खुद को रोमन सम्राट कहते रहे और वहां की जनता भी लंबे समय तक खुद को रोमन मानती रही। रोमन कानून, प्रशासन, सम्राट की संस्था और साम्राज्य की राजनीतिक वैधता की परंपरा जारी रही। ‘बीजान्टिन साम्राज्य’ नाम भी उस समय के लोगों ने अपने राज्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया था। यह नाम बाद के इतिहासकारों ने इस्तेमाल किया। इसलिए अगर राजनीतिक निरंतरता को आधार बनाया जाए तो 27 ईसा पूर्व से 1453 तक की कहानी को रोमन साम्राज्य की एक लंबी राजनीतिक यात्रा के रूप में देखना पूरी तरह उचित है।

रोमन साम्राज्य इतने लंबे समय तक टिका कैसे?

इस सवाल का जवाब किसी एक महान सम्राट, किसी एक सेना या किसी एक युद्ध में नहीं छिपा है। रोमन साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता थी। शुरुआती साम्राज्य में रोम के पास विशाल सेना, सड़कें, किले, कर व्यवस्था और मजबूत प्रशासन था। भूमध्यसागर के आसपास फैले विशाल भूभाग को इन्हीं व्यवस्थाओं के जरिए नियंत्रित किया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे साम्राज्य बहुत बड़ा हुआ, समस्याएं भी बढ़ीं। तीसरी शताब्दी में गृहयुद्ध, आर्थिक संकट और सीमाओं पर लगातार हमलों ने राज्य को हिला दिया। ऐसे समय में डायोक्लेटियन और बाद में कॉन्स्टेंटाइन जैसे शासकों ने प्रशासन, सेना और कर व्यवस्था में बड़े बदलाव किए।

राज्य के सत्ता केंद्र भी बदलने लगे। रोम अब साम्राज्य के हर हिस्से पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए सबसे सुविधाजनक स्थान नहीं रह गया था। कॉन्स्टेंटाइन ने कॉन्स्टेंटिनोपल को राजधानी के रूप में विकसित किया और धीरे-धीरे यह शहर साम्राज्य के पूर्वी हिस्से का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक केंद्र बन गया। यानी रोमन राज्य की एक बड़ी खूबी यह थी कि उसने ‘रोम’ को केवल एक शहर नहीं रहने दिया। जब पुरानी व्यवस्था पर्याप्त नहीं रही तो उसने सत्ता का केंद्र, प्रशासन और सेना तक बदल दी।

कॉन्स्टेंटिनोपल इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

कॉन्स्टेंटिनोपल का चुनाव रोमन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसलों में से एक साबित हुआ। यह शहर बोस्फोरस जलडमरूमध्य पर स्थित था, यानी यूरोप और एशिया के बीच उस जगह पर जहां से काला सागर और भूमध्यसागर के बीच आने-जाने वाले रास्तों पर नजर रखी जा सकती थी। तीन तरफ पानी और जमीन की तरफ विशाल दीवारों ने इसे प्राकृतिक और कृत्रिम सुरक्षा दोनों दी। बाद में बनाई गई थियोडोसियन दीवारें इतनी मजबूत थीं कि कई सदियों तक बड़ी-बड़ी सेनाएं भी उन्हें आसानी से नहीं तोड़ सकीं।

कॉन्स्टेंटिनोपल केवल किला नहीं था। यह व्यापार का बड़ा केंद्र भी था। यूरोप और एशिया के बीच आने-जाने वाले सामान, समुद्री व्यापार और आसपास के इलाकों से आने वाले संसाधनों ने शहर को आर्थिक ताकत दी। इस वजह से पूर्वी रोमन साम्राज्य को ऐसा राजनीतिक और आर्थिक केंद्र मिला जो लंबे समय तक उसकी रक्षा करने में मदद करता रहा। पश्चिमी साम्राज्य के कमजोर होने के बाद भी पूर्वी हिस्से के पास एक मजबूत राजधानी और अपेक्षाकृत समृद्ध आर्थिक आधार मौजूद था।

पैसा था तो सेना भी थी

किसी भी साम्राज्य को सिर्फ सैनिकों से नहीं चलाया जा सकता। सेना को हथियार, भोजन और वेतन चाहिए, किलों की मरम्मत करनी होती है और सीमाओं की रक्षा के लिए लगातार पैसा खर्च होता है। पश्चिमी रोमन साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बावजूद पूर्वी भूमध्यसागर के कई हिस्से लंबे समय तक अपेक्षाकृत समृद्ध रहे। मिस्र का अनाज, अनातोलिया की कृषि, लेवांत के व्यापारिक केंद्र और कॉन्स्टेंटिनोपल की व्यापारिक स्थिति ने राज्य को मजबूत कर-आधार दिया।

यही आर्थिक ताकत पूर्वी रोमन साम्राज्य की लंबी उम्र का एक बड़ा कारण बनी। उसके पास सेना चलाने, किले मजबूत करने, नौसेना बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर दूसरे राज्यों को धन देकर राजनीतिक समझौते करने की क्षमता थी। पश्चिम में जहां लगातार राजनीतिक और आर्थिक संकट गहराते गए, वहीं पूर्वी हिस्से के पास कई सदियों तक खुद को संभालने के लिए ज्यादा मजबूत संसाधन मौजूद रहे।

रोम सिर्फ लड़ता नहीं था, दुश्मनों को आपस में लड़ाता भी था

रोमन और बाद में पूर्वी रोमन शासकों की एक बड़ी ताकत उनकी कूटनीति थी। वे हर समस्या का जवाब युद्ध से नहीं देते थे। कई बार वे किसी पड़ोसी शक्ति को धन देते, किसी दूसरे शत्रु के खिलाफ उसका इस्तेमाल करते, विवाह संबंध बनाते, राजनीतिक शरणार्थियों को अपने हित में इस्तेमाल करते या किसी कबीले के भीतर मौजूद मतभेदों का फायदा उठाते। कई बार युद्ध जीतने से ज्यादा उपयोगी युद्ध को टालना होता था।

पूर्वी रोमन साम्राज्य ने इसी नीति के सहारे अपनी सीमित सैन्य ताकत का बेहतर इस्तेमाल किया। उसे फारसियों, अरबों, बुल्गारों, स्लावों, रूसी शक्तियों, सेल्जुक तुर्कों और कई दूसरी ताकतों से लगातार निपटना पड़ा, लेकिन हर बार युद्ध ही एकमात्र विकल्प नहीं था। रिश्वत, समझौते, विवाह, व्यापार, राजनीतिक चालें और एक दुश्मन के खिलाफ दूसरे दुश्मन का इस्तेमाल, सब उसकी सुरक्षा नीति का हिस्सा थे।

धर्म ने भी साम्राज्य को जोड़े रखा

चौथी शताब्दी के बाद ईसाई धर्म धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। सम्राट अब केवल सेना के प्रमुख या राजनीतिक शासक नहीं रहे, बल्कि खुद को ईसाई व्यवस्था के रक्षक के रूप में भी पेश करने लगे। इससे साम्राज्य को एक ऐसी साझा पहचान मिली जो किसी एक शहर या किसी एक जातीय समूह तक सीमित नहीं थी।

समय के साथ राज्य की भाषा और संस्कृति में भी बड़े बदलाव आए। पश्चिम में लैटिन का प्रभाव मजबूत रहा, जबकि पूर्वी साम्राज्य में यूनानी भाषा का महत्व लगातार बढ़ता गया। इसके बावजूद राजनीतिक पहचान बनी रही। यही रोमन साम्राज्य की असाधारण खूबी थी। उसकी भाषा बदल सकती थी, सेना बदल सकती थी, राजधानी बदल सकती थी, धर्म की भूमिका बदल सकती थी और भूभाग छोटा हो सकता था, लेकिन वह खुद को रोमन राज्य मानता रहा।

जस्टिनियन ने पुराने रोम को फिर खड़ा करने की कोशिश की

छठी शताब्दी में सम्राट जस्टिनियन प्रथम ने पश्चिमी भूमध्यसागर के उन क्षेत्रों को फिर से जीतने की कोशिश की जो रोमन नियंत्रण से बाहर हो चुके थे। उसकी सेनाओं ने उत्तर अफ्रीका, इटली और भूमध्यसागर के कुछ हिस्सों पर दोबारा कब्जा किया। इसी दौर में रोमन कानून का विशाल संकलन तैयार किया गया, जिसे आज ‘कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस’ के नाम से जाना जाता है। बाद के यूरोपीय कानून पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

इसी समय कॉन्स्टेंटिनोपल में हागिया सोफिया का निर्माण भी हुआ। यह पूरा दौर एक महत्वपूर्ण बात दिखाता है। 476 में पश्चिमी रोमन सत्ता के पतन के बाद पूर्वी राज्य खुद को किसी नए साम्राज्य के रूप में नहीं देख रहा था। वह खुद को पुराने रोम की वैध राजनीतिक निरंतरता मान रहा था और उसके शासक अब भी रोमन सम्राट होने का दावा करते थे।

फिर भी साम्राज्य लगातार छोटा क्यों होता गया?

पूर्वी रोमन साम्राज्य की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे एक साथ कई दिशाओं में लड़ना पड़ता था। सातवीं शताब्दी में सासानी फारस के साथ हुए लंबे और विनाशकारी युद्धों ने दोनों साम्राज्यों को कमजोर कर दिया। इसके तुरंत बाद अरब-इस्लामी सेनाओं ने सीरिया, फिलिस्तीन और मिस्र जैसे बेहद महत्वपूर्ण और समृद्ध क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इन इलाकों के जाने से साम्राज्य की आबादी, कर आय और खाद्य संसाधनों को भारी नुकसान हुआ।

फिर भी राज्य खत्म नहीं हुआ। उसने खुद को एक बार फिर बदला और अपने बचे हुए मुख्य क्षेत्रों, खासकर अनातोलिया और बाल्कन के आसपास, एक छोटे लेकिन ज्यादा संगठित राज्य के रूप में ढाला। यही वह क्षमता थी जिसने उसे बार-बार बचाया। वह जितना खोता गया, अपनी शासन व्यवस्था और सैन्य रणनीति को उतना ही बदलता गया। यही कारण है कि तीसरी शताब्दी का संकट, पश्चिमी साम्राज्य का पतन, अरब विजय और बाद में सेल्जुक तुर्कों का दबाव, इनमें से कोई भी अकेला झटका पूर्वी रोमन राज्य को समाप्त नहीं कर सका। हर बार उसका आकार घटा, लेकिन राजनीतिक परंपरा बची रही।

1204 में ईसाइयों ने ही कॉन्स्टेंटिनोपल लूट लिया

रोमन साम्राज्य के लंबे इतिहास की सबसे विडंबनापूर्ण घटनाओं में से एक 1204 में हुई। चौथे क्रूसेड के दौरान पश्चिमी यूरोप के ईसाई योद्धाओं ने पवित्र भूमि की ओर जाने के बजाय कॉन्स्टेंटिनोपल पर हमला कर दिया। शहर पर कब्जा हुआ और बड़े पैमाने पर लूटपाट की गई। रोमन साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता टूट गई और कुछ समय के लिए वहां लैटिन साम्राज्य स्थापित हो गया।

लेकिन रोमन राज्य की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में यूनानी-रोमन उत्तराधिकारी राज्य बने रहे और उन्होंने कॉन्स्टेंटिनोपल को वापस हासिल करने की कोशिश जारी रखी। 1261 में शहर फिर रोमन नियंत्रण में आ गया। हालांकि यह साम्राज्य अब पहले जैसा शक्तिशाली नहीं था, लेकिन उसकी राजनीतिक पहचान फिर जीवित हो गई।

1204 की घटना यह भी दिखाती है कि साम्राज्य केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं टूटते। अंदरूनी संघर्ष, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सहयोगियों के बीच अविश्वास भी किसी राज्य को कमजोर कर सकते हैं। कॉन्स्टेंटिनोपल 1204 में बाहरी दुश्मन के हाथों नहीं, बल्कि उसी व्यापक ईसाई दुनिया की सेनाओं के हाथों गिरा था जिसका वह खुद हिस्सा था।

आखिरी सदियों में रोमन साम्राज्य कितना कमजोर हो चुका था?

चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी तक पूर्वी रोमन साम्राज्य अपने पुराने विशाल रूप से लगभग गायब हो चुका था। अनातोलिया का बड़ा हिस्सा तुर्की शक्तियों के कब्जे में जा चुका था और बाल्कन में भी रोमन नियंत्रण तेजी से सिकुड़ रहा था। साम्राज्य के पास अब मुख्य रूप से कॉन्स्टेंटिनोपल और उसके आसपास के कुछ क्षेत्र तथा कुछ अलग-अलग इलाके ही बचे थे।

समस्या केवल भूभाग की नहीं थी। लंबे गृहयुद्धों, आर्थिक कमजोरी, घटती आबादी और लगातार युद्धों ने राज्य की ताकत कम कर दी थी। कई बार उसे अपने अस्तित्व के लिए बाहरी शक्तियों पर निर्भर होना पड़ता था। जिस साम्राज्य के पास कभी भूमध्यसागर की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक थी, वह अब अपनी राजधानी की रक्षा के लिए सीमित सैनिकों पर निर्भर था।

इसी दौरान ओटोमन तुर्क तेजी से ताकतवर हो रहे थे। उन्होंने अनातोलिया और बाल्कन में अपना क्षेत्र बढ़ाया और धीरे-धीरे कॉन्स्टेंटिनोपल को चारों तरफ से घेरने जैसी स्थिति पैदा कर दी। जिस शहर की भौगोलिक स्थिति सदियों तक उसकी सबसे बड़ी ताकत थी, अब वही शहर एक छोटे से बचे हुए राज्य की राजधानी बन चुका था, जिसके चारों ओर एक बहुत शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी मौजूद था।

मेहमद द्वितीय ने कॉन्स्टेंटिनोपल को कैसे जीता?

1451 में मेहमद द्वितीय ओटोमन सुल्तान बना और उसने कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्जा करने की तैयारी शुरू कर दी। उसने बोस्फोरस के यूरोपीय किनारे पर रूमेली हिसारी किला बनवाया, जिससे काला सागर की ओर से शहर तक सहायता पहुंचाना कठिन हो गया। उसने भारी तोपें तैयार कराईं और बड़ी सेना जुटाई। यह बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि युद्ध की तकनीक बदल चुकी थी। सदियों तक शहर की विशाल दीवारें दुश्मनों के लिए सबसे बड़ी बाधा रही थीं, लेकिन अब बारूद और भारी तोपों ने उन दीवारों की कमजोरी सामने ला दी थी।

29 मई 1453 से पहले लगभग दो महीने तक कॉन्स्टेंटिनोपल की घेराबंदी चली। शहर के रक्षकों की संख्या ओटोमन सेना की तुलना में बहुत कम थी। अंतिम सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ग्यारहवें के साथ सीमित बीजान्टिन सैनिक और कुछ पश्चिमी ईसाई योद्धा थे। इसके बावजूद शहर ने जोरदार प्रतिरोध किया। जब ओटोमन जहाज गोल्डन हॉर्न में प्रवेश नहीं कर पाए क्योंकि वहां बड़ी लोहे की जंजीर लगाई गई थी, तब मेहमद ने अपने जहाजों को जमीन के रास्ते खिंचवाकर दूसरी ओर समुद्र में उतार दिया। इससे शहर पर समुद्री और स्थलीय दोनों तरफ से दबाव बढ़ गया।

29 मई की सुबह अंतिम हमला शुरू हुआ। लगातार तोपों की गोलाबारी से दीवारों के कुछ हिस्से कमजोर हो चुके थे। जेनोआ के प्रमुख रक्षक जियोवानी जिउस्तिनियानी के घायल होने के बाद रक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ा। अंततः ओटोमन सैनिक शहर में प्रवेश करने में सफल हुए। अंतिम सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ग्यारहवें भी लड़ाई में मारे गए और कॉन्स्टेंटिनोपल ओटोमन नियंत्रण में चला गया।

29 मई 1453 को वास्तव में क्या खत्म हुआ?

1453 को केवल एक शहर के पतन के रूप में देखना इस घटना की ऐतिहासिक अहमियत को कम कर देता है। यह उस राजनीतिक राज्य का अंत था जिसकी परंपरा को हम लगभग डेढ़ हजार वर्षों पीछे ले जा सकते हैं। ऑगस्टस से शुरू हुई रोमन साम्राज्य की राजनीतिक यात्रा अब अपने अंतिम केंद्र से समाप्त हो चुकी थी।

लेकिन रोमन विरासत उसी दिन खत्म नहीं हुई। कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्जे के बाद मेहमद द्वितीय ने खुद को ‘कायसर-ए-रूम’, यानी रोम का सीज़र कहने का दावा किया। उसने शहर को अपनी राजधानी बनाया और रोमन प्रशासन तथा सांस्कृतिक परंपराओं के कुछ हिस्सों को भी अपने शासन में शामिल किया। यानी जिस ओटोमन साम्राज्य ने रोमन राज्य का अंत किया, उसने उसकी कुछ राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत भी अपने भीतर समाहित कर ली।

क्या चीन या ओटोमन साम्राज्य इससे ज्यादा लंबे समय तक चले?

यहां फिर वही परिभाषा महत्वपूर्ण हो जाती है। ओटोमन साम्राज्य लगभग छह शताब्दियों तक चला, जो अपने आप में असाधारण लंबा समय है, लेकिन रोमन राजनीतिक निरंतरता से काफी कम है। पवित्र रोमन साम्राज्य 962 से 1806 तक लगभग 844 वर्ष चला, लेकिन वह प्राचीन रोमन साम्राज्य की सीधी संस्थागत निरंतरता नहीं था। चीन की साम्राज्य व्यवस्था चिन से लेकर छिंग राजवंश तक दो हजार वर्ष से अधिक की लंबी राजनीतिक परंपरा दिखाती है, लेकिन उसके बीच कई बार राज्य टूटे, नए राजवंश आए और अलग-अलग शक्तियों ने चीन के हिस्सों पर शासन किया।

इसलिए अगर सवाल यह है कि सबसे लंबे समय तक चलने वाली एक ही राजनीतिक-संस्थागत साम्राज्य परंपरा कौन-सी थी, तो रोमन साम्राज्य का 27 ईसा पूर्व से 1453 तक का इतिहास सबसे मजबूत दावेदारों में है। अगर हर राजवंश को अलग साम्राज्य माना जाए तो जवाब बदल जाएगा। इसी वजह से इतिहास में ‘सबसे लंबा साम्राज्य’ का कोई एक निर्विवाद उत्तर नहीं है।

रोमन साम्राज्य की असली ताकत क्या थी?

शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि रोमन साम्राज्य करीब डेढ़ हजार वर्ष तक इसलिए नहीं बचा क्योंकि वह हर समय शक्तिशाली था। वास्तव में उसके इतिहास में कई ऐसे दौर आए जब वह टूटने के बिल्कुल करीब था। उसकी असली ताकत यह थी कि वह हर संकट के बाद अपना रूप बदल सकता था।

दूसरी शताब्दी का विशाल रोमन साम्राज्य और चौदहवीं शताब्दी का छोटा-सा पूर्वी रोमन राज्य एक-दूसरे से बहुत अलग दिखाई देते हैं। एक में भूमध्यसागर के विशाल हिस्से पर नियंत्रण था, दूसरे के पास अपनी राजधानी और कुछ छोटे इलाके ही बचे थे। उनकी भाषा, सेना, प्रशासन, धार्मिक जीवन और आर्थिक व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव आ चुका था। फिर भी दोनों खुद को एक ही रोमन राजनीतिक परंपरा का हिस्सा मानते थे।

यही शायद उसकी लंबी उम्र का सबसे बड़ा रहस्य था। उसने अपनी पहचान के मूल को बचाए रखा, लेकिन उस पहचान के बाहरी रूप को बदलने दिया। राजधानी बदल सकती थी, भाषा बदल सकती थी, सेना बदल सकती थी, सीमाएं छोटी हो सकती थीं और प्रशासन बदल सकता था, लेकिन राज्य की यह धारणा बनी रही कि वह रोम की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी है।

और आखिरकार रोम क्यों हार गया?

आखिरकार अनुकूलन की भी एक सीमा होती है। पंद्रहवीं शताब्दी तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के पास न पर्याप्त भूभाग बचा था, न पहले जैसी आर्थिक ताकत, न बड़ी सेना और न ही वह जनसंख्या और कर-आधार जिससे एक बड़े साम्राज्य को चलाया जा सके। सामने ओटोमन साम्राज्य था, जो सैन्य और आर्थिक रूप से कहीं ज्यादा शक्तिशाली था। बारूद और भारी तोपों ने उस समय की युद्ध तकनीक भी बदल दी थी।

कॉन्स्टेंटिनोपल की दीवारें लगभग एक हजार वर्षों तक साम्राज्य की ढाल बनी रहीं, लेकिन अंततः ऐसी तकनीक सामने आई जिसने उनकी कमजोरी उजागर कर दी। 1453 में शहर गिर गया और इसके साथ रोमन साम्राज्य की अंतिम राजनीतिक सत्ता भी समाप्त हो गई।

लेकिन रोमन साम्राज्य की कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि साम्राज्य खत्म हुआ, रोम की विरासत नहीं। उसका कानून यूरोप के कानूनी इतिहास में जीवित रहा, उसकी वास्तुकला और कला ने आने वाली सभ्यताओं को प्रभावित किया, उसकी धार्मिक परंपराओं ने दुनिया को बदला और ‘रोमन’ होने का राजनीतिक विचार उसके पतन के बाद भी कई सदियों तक अलग-अलग रूपों में मौजूद रहा।

इसलिए रोमन साम्राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं थी कि उसने कितना बड़ा भूभाग जीता। उसकी असली उपलब्धि यह थी कि उसने लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक बदलती दुनिया के बीच अपनी राजनीतिक पहचान को जीवित रखा। कई साम्राज्य बहुत तेजी से उभरे और कुछ ही सदियों में गायब हो गए। रोम बार-बार कमजोर हुआ, कई बार लगभग टूट गया, उसका आधा हिस्सा खत्म हो गया, उसकी भाषा और संस्कृति बदल गई और उसका भूभाग लगातार सिकुड़ता गया। फिर भी वह अपने को रोम मानता रहा।

29 मई 1453 को कॉन्स्टेंटिनोपल गिरा तो एक शहर और एक राज्य जरूर खत्म हुआ, लेकिन उससे कहीं ज्यादा पुरानी एक राजनीतिक परंपरा की आखिरी कड़ी भी टूट गई। शायद यही वजह है कि इतिहास में रोम केवल एक साम्राज्य का नाम नहीं है। वह इस बात का उदाहरण है कि कोई राज्य अपनी शक्ति खोने के बाद भी कितने लंबे समय तक जीवित रह सकता है, अगर वह बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को बदलने की क्षमता बनाए रखे।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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