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Somnath Mandir Ka Itihas: टूटा, लूटा, फिर खड़ा हुआ... मुगलों से नेहरू तक विरोध झेलता रहा सोमनाथ
Somnath Mandir Ka Itihas in Hindi: गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है।
Somnath Mandir Ka Itihas in Hindi
Somnath Mandir Ka Itihas: जिस सोमनाथ मंदिर को लेकर मान्यता है कि स्वयं चंद्रदेव ने उसे सोने से बनवाया था, त्रेतायुग में परम शिवभक्त रावण ने उसे चांदी से पुनर्निर्मित कराया और द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से उसका पुनः निर्माण करवाया। वही सोमनाथ मंदिर सदियों से केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सनातन धर्म की अदम्य जीवटता और राष्ट्र के पुनर्जागरण का प्रतीक बना हुआ है। अरब सागर के किनारे खड़ा यह मंदिर जितनी बार टूटा, उतनी ही बार फिर अपने पूरे वैभव, तेज और श्रद्धा के साथ खड़ा हो गया। इतिहास में इस पर अनगिनत आक्रमण हुए, इसकी संपत्ति लूटी गई, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए गए, लेकिन सोमनाथ हर बार राख से उठते उस फीनिक्स की तरह फिर जीवित हो उठा, जिसे मिटा पाना कभी संभव नहीं हुआ।17 बार तोड़ा गया सोमनाथ मंदिर महमूद गजनवी के हमलों से लेकर औरंगजेब के दौर तक, अंग्रेजों की राजनीतिक दखलंदाजी से लेकर आज़ाद भारत में इसके पुनर्निर्माण को लेकर छिड़ी धर्मनिरपेक्षता की बहस तक हर युग में चर्चा, विवाद और श्रद्धा का केंद्र बना रहा।
जहां अंग्रेजों ने भी इसे अपनी कुटिल डिवाइड एंड रुल की रणनीति का हिस्सा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं 75 वर्ष पहले जब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया, तब यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत में धर्म और राज्य के संबंधों को लेकर एक ऐतिहासिक बहस का क्षण बन गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जहां सरकार के धार्मिक आयोजनों से जुड़ने पर चिंता जताई, वहीं सरदार पटेल और के.एम. मुंशी ने इसे भारतीय आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया। सोमनाथ इसलिए केवल एक ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि एक जीता जागता गवाह है कि, आस्था को तलवारों और राजनीतिक हथियार से मिटाया जाना असंभव है।
पौराणिक मान्यताओं में क्यों खास है सोमनाथ
गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है। सोमनाथ शब्द का अर्थ है सोम यानी चंद्रमा के नाथ। पुराणों के अनुसार चंद्रदेव ने अपने ससुर दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति पाने के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें श्रापमुक्त किया और तभी से यहां स्थापित ज्योतिर्लिंग सोमनाथ कहलाया।
महाभारत, श्रीमद्भागवत और स्कंद पुराण में भी प्रभास क्षेत्र की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इसी पवित्र भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने देह त्यागी थी। यही वजह है कि यह क्षेत्र हिंदू आस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
हवा में झूलते शिवलिंग की रहस्यमयी कहानी
सोमनाथ मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में से एक यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग कभी हवा में स्थित था। कहा जाता है कि मंदिर की वास्तुकला इतनी अद्भुत थी कि चुम्बकीय शक्ति के कारण शिवलिंग जमीन से ऊपर संतुलित दिखाई देता था। हालांकि इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन लोककथाओं और जनश्रुतियों में इसका उल्लेख लंबे समय से मिलता रहा है।
कहा जाता है कि जब महमूद गजनवी मंदिर पहुंचा तो वह इस अद्भुत स्थापत्य को देखकर हैरान रह गया था। इतिहासकार भी मानते हैं कि प्राचीन भारत में वास्तु और धातु विज्ञान काफी विकसित था, इसलिए ऐसी कथाएं लोगों की कल्पना और आस्था दोनों का हिस्सा बन गईं।
बार-बार टूटा, फिर भी हर बार खड़ा हुआ सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी है। इस मंदिर को कई बार तोड़ा गया और कई बार दोबारा बनाया गया। यही वजह है कि इसे भारतीय सभ्यता के पुनर्जन्म का प्रतीक भी कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर प्राचीन काल से अस्तित्व में था। सातवीं शताब्दी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद 725 ईस्वी में सिंध के अरब मुस्लिम सूबेदार अल-जुनैद ने मंदिर पर हमला कर इसे नुकसान पहुंचाया। बाद में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने इसका फिर से निर्माण करवाया।
महमूद गजनवी के हमले ने बदल दी मंदिर की पहचान
सोमनाथ पर सबसे चर्चित हमला 1025-26 ईस्वी में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने किया था। कहा जाता है कि वह 30 हजार से अधिक सैनिकों के साथ मंदिर पहुंचा और यहां की अपार संपत्ति लूट ली। कई विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदिर की रक्षा करते हुए 50,000 से अधिक निहत्थे भक्तों का नरसंहार किया।
उस समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में मौजूद थे। स्थानीय लोग भी निहत्थे होकर मंदिर बचाने के लिए दौड़े, लेकिन गजनवी की सेना के सामने टिक नहीं सके। कुछ इसे धार्मिक कट्टरता से प्रेरित हमला मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि मुख्य उद्देश्य मंदिर की संपत्ति लूटना था। वहीं इस घटना ने सोमनाथ को भारतीय जनमानस में मुगलों द्वारा विदेशी आक्रमण और हिंदुओं के धार्मिक अपमान की एक ज्वाला भी भड़का दी ओर एक प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया।
हिंदू राजाओं ने हर बार कराया पुनर्निर्माण
गजनवी के हमले के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद भी कई हिंदू शासकों ने समय-समय पर मंदिर के संरक्षण और सौंदर्यीकरण में योगदान दिया।
1093 में सिद्धराज जयसिंह और 1168 में कुमारपाल तथा सौराष्ट्र के राजा खंगार ने मंदिर के पुनर्निर्माण और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हर बार मंदिर टूटता रहा, लेकिन हर बार उसे फिर से खड़ा कर दिया गया। यही उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।
खिलजी से लेकर गुजरात सल्तनत तक जारी रहे हमले
1297 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खान ने गुजरात पर हमला किया और सोमनाथ मंदिर को फिर नुकसान पहुंचाया। मंदिर की संपत्ति लूट ली गई। इसके बाद 14वीं और 15वीं शताब्दी में गुजरात सल्तनत के शासकों मुजफ्फर शाह और अहमद शाह ने भी मंदिर को क्षति पहुंचाई। हर दौर में मंदिर पर हमले हुए, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था कभी खत्म नहीं हुई।
औरंगजेब के दौर में भी नहीं थमी तबाही
मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में भी सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया। पहली बार 1665 में और दूसरी बार 1706 में मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया।
कहा जाता है कि मंदिर तोड़े जाने के बाद भी श्रद्धालु वहां पूजा करने पहुंचते रहे। इसके बाद वहां सैनिक भेजे गए और दमनात्मक कार्रवाई की गई। उस दौर में मंदिर को भारी नुकसान पहुंचा।
अहिल्याबाई होल्कर ने फिर जगाई श्रद्धा की लौ
18वीं शताब्दी में जब मराठा शक्ति मजबूत हुई, तब इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1783 में मूल मंदिर के पास एक नया शिव मंदिर बनवाया। लंबे समय तक श्रद्धालु वहीं पूजा-अर्चना करते रहे। अहिल्याबाई का यह योगदान आज भी अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है। उन्होंने केवल सोमनाथ ही नहीं, बल्कि देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों के पुनर्निर्माण और संरक्षण में अहम भूमिका निभाई थी।
अंग्रेजों ने कैसे बनाया सोमनाथ को राजनीतिक प्रतीक
सोमनाथ मंदिर को हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के प्रतीक के रूप में स्थापित करने में अंग्रेजों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 1842 में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड एलेनबोरो ने दावा किया कि उन्होंने अफगानिस्तान से सोमनाथ के द्वार वापस लाकर 800 साल पुराने अपमान का बदला लिया है। अंग्रेजों ने इस घटना का खूब प्रचार किया और इसे हिंदुओं की भावनाओं से जोड़ने की कोशिश की। बाद में इतिहासकारों ने पाया कि जिन दरवाजों को सोमनाथ के द्वार बताया गया, उनका इस मंदिर से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। दरअसल अंग्रेज इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनी फूट डालो और राज करो नीति के तहत सांप्रदायिक भावनाओं को प्रभावित करने के लिए कर रहे थे।
आजादी के बाद सरदार पटेल ने लिया पुनर्निर्माण का संकल्प
1947 में भारत की आज़ादी के साथ ही देश विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा और रियासतों के विलय की बड़ी चुनौती से गुजर रहा था। गुजरात की जूनागढ़ रियासत, जहां सोमनाथ मंदिर स्थित है, वहां की लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदू थी, लेकिन उसके मुस्लिम नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला कर लिया। भौगोलिक रूप से जूनागढ़ चारों तरफ से भारत से घिरा हुआ था और पाकिस्तान से उसका कोई सीधा संपर्क नहीं था। नवाब के इस फैसले का जनता ने भारी विरोध किया। विरोध बढ़ने पर रियासत में अस्थिरता फैल गई और लोगों ने भारत में विलय की मांग शुरू कर दी।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मामले को गंभीरता से संभाला। बढ़ते दबाव और अशांति के बीच नवाब पाकिस्तान भाग गया। इसके बाद भारत सरकार ने जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। फरवरी 1948 में जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें भारी बहुमत ने भारत में विलय के पक्ष में मतदान किया।
इसी दौरान सरदार पटेल ने जर्जर हालत में पड़े सोमनाथ मंदिर को देखा और उसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, जो बाद में स्वतंत्र भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और धर्मनिरपेक्षता की बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।
मंदिर के पुनर्निर्माण में गांधीजी ने क्या रखी थी शर्त
जब सरदार पटेल और के.एम. मुंशी ने महात्मा गांधी को इस योजना के बारे में बताया, तब गांधीजी ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि मंदिर का निर्माण सरकारी धन से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग से होना चाहिए। गांधीजी का मानना था कि धर्म और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनके सुझाव को स्वीकार कर लिया गया और बाद में के.एम. मुंशी की देखरेख में एक ट्रस्ट बनाया गया। के.एम. मुंशी केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि गुजराती साहित्य के बड़े लेखक भी थे। उन्होंने इतिहास, संस्कृति और भारतीय परंपराओं पर कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण के लिए उन्होंने 1938 में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की, जो आज भी शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संस्थान माना जाता है। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में उनकी भूमिका सबसे अधिक चर्चित रही। सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ मिलकर उन्होंने मंदिर पुनर्निर्माण अभियान को आगे बढ़ाया। पटेल के निधन के बाद भी मुंशी इस परियोजना से जुड़े रहे और उन्होंने ही राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित किया था। जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरकार के धार्मिक आयोजन से जुड़ने पर आपत्ति जताई, तब के.एम. मुंशी ने सोमनाथ पुनर्निर्माण को भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय आत्मगौरव के पुनर्जागरण का प्रतीक बताया। इसी कारण उनका नाम सोमनाथ इतिहास के साथ स्थायी रूप से जुड़ गया।
नेहरू को आखिर किस बात पर थी आपत्ति
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व्यक्तिगत रूप से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के खिलाफ नहीं थे, लेकिन उन्हें सरकार और धार्मिक आयोजनों के अत्यधिक जुड़ाव पर आपत्ति थी। नेहरू का मानना था कि नया भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सरकार को किसी धार्मिक कार्यक्रम से औपचारिक रूप से नहीं जुड़ना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर उद्घाटन समारोह में शामिल होने पर चिंता व्यक्त की।
नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखे और सौराष्ट्र सरकार द्वारा समारोह के लिए दिए गए 5 लाख रुपए के योगदान पर सवाल उठाए। उस समय देश आर्थिक संकट और पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा था। उन्होंने विदेश मंत्रालय के जरिए भेजे गए उस परिपत्र का भी विरोध किया, जिसमें भारतीय दूतावासों से विभिन्न देशों की नदियों का जल और पहाड़ों की मिट्टी मंगाने का अनुरोध किया गया था। नेहरू ने विदेश मंत्रालय से ऐसे अनुरोधों को नजरअंदाज करने को कहा।
नेहरू के विरोध के बावजूद पहुंचे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद
नेहरू की असहमति के बावजूद राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1951 में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के पुनर्जागरण का प्रतीक है।
उनका यह कदम उस समय बेहद चर्चित रहा। एक ओर लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा के सम्मान के रूप में देखा, तो दूसरी ओर इसे धर्मनिरपेक्ष राज्य की सीमाओं पर बहस का कारण माना गया।
क्या नेहरू सच में सोमनाथ के विरोधी थे?
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में नेहरू का अप्रत्यक्ष रूप से विरोध समय के साथ राजनीतिक विमर्श में इस तरह प्रचारित किया गया कि नेहरू सोमनाथ विरोधी थे।
नेहरू का मुख्य सवाल यह था कि क्या लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सरकार को किसी धार्मिक आयोजन में औपचारिक भूमिका निभानी चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि नवस्वतंत्र भारत की सरकार किसी एक धर्म विशेष के प्रतीकात्मक कार्यक्रम से आधिकारिक रूप से जुड़ी दिखाई दे। दूसरी ओर के.एम. मुंशी, सरदार पटेल और कई अन्य नेताओं का मानना था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है और इसे केवल धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यही वैचारिक अंतर उस समय की राजनीति का बड़ा विषय बन गया था। आज सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अपने गौरवशाली इतिहास में सोमनाथ कई बार टूटा भी, लूटा भी, विवादों में भी घिरा, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ। शायद यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है, विनाश के बाद पुनर्जन्म।अरब सागर के किनारे खड़ा सोमनाथ शिव शंभू के उस स्वरूप की अनुभूति कराता है, जो संहार के बाद सृजन का संदेश देता है।


