Ucchi Pillaiyar Koil Temple: उच्ची पिल्लियार कोइल मंदिर, त्रिची की चट्टान पर विराजमान गणेश जी से जुड़ा है पौराणिक काल का नाता

Ucchi Pillaiyar Koil Temple: तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली त्रिची में स्थित पुली पिलियर कोयल मंदिर में गणेश चतुर्थी के मौके पर बेहद खुबसुरती से सजाया जाता है...

Jyotsana Singh
Published on: 22 Aug 2025 12:52 PM IST
Ucchi Pillaiyar Koil Temple
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Ucchi Pillaiyar Koil Temple (Image Credit-Social Media)

Ucchi Pillaiyar Koil Temple : तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली त्रिची में स्थित पुली पिलियर कोयल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि इतिहास आस्था और पौराणिक गाथाओं का जीवंत संगम भी है। जहां 273 फुट ऊंची विशाल चट्टान की चोटी पर बने इस मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 400 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। जो भक्त यहां पहुंचते हैं उन्हें ऐसा अनुभव होता है,जैसे गणेश जी स्वयं उन्हें अपनी और बुला रहे हों। इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक कथा रावण के भाई विभीषण और भगवान राम से भी जुड़ी है। जिसने इस स्थल को सिर्फ पूजा का केंद्र ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत की एक सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान भी बना दिया है। गणेश चतुर्थी के मौके पर इस स्थल की दिव्यता और रौनक देखते ही बनती है। हजारों संख्या में भक्त 400 सीढ़ियों की चढ़ाई कर इनके दर्शन को उत्साहित रहते हैं।

त्रिची का रॉक फोर्ट और उसका आध्यात्मिक महत्व


त्रिची का रॉक फोर्ट अपने आप में ही एक अनोखा प्राकृतिक आश्चर्य है। इस करोड़ों साल पुरानी चट्टान को भूगर्भ शास्त्री दुनिया की सबसे प्राचीन संरचनाओं में से एक मानते हैं। इसी पर स्थित है उच्ची पिल्लियार कोइल मंदिर। जहां पहुंचते ही भक्तों को एक गहरी शांति और दिव्यता का अनुभव होता है वहीं दूसरी और यहां मौजूद प्राकृतिक भव्यता अपने अनोखे रूप में लोगों को अचंभित करती है। चट्टान की ऊंचाई से नीचे देखने पर त्रिची का पूरा शहर बहती हुई कावेरी नदी और आसपास का प्राकृतिक विस्तार दिखाई देता है। यही कारण है कि मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

उच्ची पिल्लियार कोइल मंदिर के नाम के पीछे की कहानी


उच्ची पिल्लियार कोइल मंदिर नाम हो सकता है लोगों को सुनने में अटपटा लगे। लेकिन यह नाम तमिल भाषा में है। जिसमें उच्ची का अर्थ होता है ऊंचाई का शिखर और पिल्लियार का अर्थ है भगवान गणेश। इसी तरह उच्ची पिल्लियार का अर्थ होता है 'चोटी पर विराजमान गणेश जी'। नाम से ही स्पष्ट है कि यह मंदिर भगवान गणेश के उसे स्वरूप का प्रतीक है। मान्यता है कि यहां मौजूद गणेश जी भक्तों की सभी विघ्न बाधाओं को दूर करते हैं। अपने भक्तों को जीवन में ऊंचाइयों तक पहुंचाने की प्रेरणा देते हैं।

विभीषण और भगवान राम से भी है इस जगह का संबंध


इस मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा भी है। जो की यहां स्थानीय लोगों के बीच बहुत ज्यादा प्रचलित है। वह विभीषण और गणेश जी की लीला से जुड़ी है। इस मंदिर से जुड़ी कथा रामायण काल से भी संबंध रखती है। कथा के अनुसार जब भगवान राम ने रावण का वध कर दिया और माता सीता को लंका से मुक्त कराया तब उन्होंने रावण के भाई विभीषण को आशीर्वाद दिया। विभीषण धर्म निष्ठा और भगवान विष्णु के भक्त थे। उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए श्री राम ने उन्हें भगवान विष्णु के स्वरूप की रंगनाथ की मूर्ति भेंट की। मूर्ति देते समय श्री राम ने विभीषण से कहा ध्यान रखना यह दिव्य मूर्ति जहां एक बार रख दी जाएगी वहीं स्थिर हो जाएगी। उसे फिर कहीं और नहीं ले जाया जा सकेगा। विभीषण उस मूर्ति को लेकर लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे तभी रास्ते में जब तिरुचिरापल्ली पहुंचे तो कावेरी नदी के तट पर उन्हें थकान के कारण स्नान करने की इच्छा हुई। अब विभीषण के सामने समस्या ये थी की मूर्ति को बिना रखे स्नान करना संभव नहीं था। तभी भगवान गणेश बालक के रूप में प्रकट हुए। विभीषण ने उन्हें मूर्ति थमाते हुए बताया था कि जब तक वे स्नान करके ना लौटे इसे सुरक्षित रखना और भूमि पर मत रखना। गणेश जी ने यह बात कही कि, अगर वह देर करेंगे तो वे थककर मूर्ति को धरती पर रख देंगे। विभीषण ने गणेश जी की बात पर सहमति जताई और वे बेहद कम समय में ही स्नान करके वापस लौट आए तो उन्होंने देखा कि मूर्ति तो पहले ही धरती पर स्थापित हो चुकी है। यह देखकर वे बेहद क्रोधित हो उठे। उन्होंने उस बालक को पकड़ने का प्रयास किया लेकिन गणेश जी चट्टान पर चढ़ते हुए सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंच गए और वहां से अदृश्य हो गए। आज भी उसी स्थान पर उच्ची पिल्लियार का मंदिर स्थापित है। गणेश जी की इस लीला के पीछे का राज यह था कि विभीषण चाहते थे की मूर्ति लंका जाए। लेकिन भगवान चाहते थे कि रंगनाथ की मूर्ति त्रिची में ही स्थापित हो।

स्थापत्य शैली और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी बेहद लोकप्रिय है यह स्थल


उच्ची पिल्लियार मंदिर अपने स्थापत्य के लिए भी लोकप्रिय है। मंदिर का प्रवेश मार्ग बेहद सकरे और ऊंचाई वाले सीढ़ीदार रास्तों से होकर जाता है। सीढ़ियों पर चढ़ते समय भक्तों के आराम के लिए कई विश्राम स्थल बनाए गए हैं। जहां से वह नीचे का नजारा देख सकते हैं। भले ही यह मंदिर छोटा हो लेकिन दिव्य वातावरण से भरा हुआ है। इस मंदिर के गर्भगृह में विराजमान गणेश जी की मूर्ति साधारण किंतु अत्यंत दिव्य प्रतीत होती है। मंदिर की दीवारों पर प्राचीन शिलालेख और मूर्ति कला मौजूद हैं। जो इस स्थल को ऐतिहासिक धरोहर बनाते हैं। त्योहार और विशेष अवसरों के अलावा इस मंदिर में साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर यहां भारी भीड़ एकत्र होती है। खासतौर से गणेश चतुर्थी के दिन मंदिर में विशेष पूजा होती है और हजारों भक्त गणेश जी के दर्शन के लिए आते हैं। पंगुनी उत्सव तमिल पंचांग के अनुसार मनाया जाने वाला यह उत्सव यहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा रविवार और हर त्योहार पर मंदिर के आसपास मेले जैसा माहौल बना रहता है।

स्थानीय मान्यता और संस्कृति

इस के क्षेत्र के लोग मानते हैं कि जो भी भक्त सच्चे मन से उच्ची पिल्लियार मंदिर में गणेश प्रतिमा का दर्शन करता है तो उसकी सभी बाधाएं दूर होती हैं। विद्यार्थी यहां परीक्षा से पहले सफलता के लिए प्रार्थना करते हैं। व्यापारी और व्यवसाय नए कार्य की शुरुआत से पहले गणेश जी की पूजा यहां आकर करते हैं। नवविवाहित दंपति भी यहां आकर गणेश जी से आशीर्वाद लेते हैं। इस प्रकार यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। आज के समय में उच्ची पिल्लियार मंदिर श्रद्धालुओं की भक्ति और पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र के तौर पर भी प्रचलित है। विदेशी सैलानी यहां आकर भारतीय पौराणिक मान्यताओं और यहां की स्थापत्य कला से प्रभावित होते हैं। यहां से त्रिची शहर और कावेरी नदी का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। मंदिर तक पहुंचने की कठिन चढ़ाई भी पर्यटकों को रोमांस और आध्यात्मिक अनुभव एक साथ देती है। उच्ची पिल्लियार मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था संस्कृति इतिहास और पौराणिक गाथाओं का संगम है। जिसे विभीषण और गणेश जी की पौराणिक कथा ऐसे अद्वितीय बनाती है। वहीं इसकी भौगोलिक स्थिति और स्थापत्य कला से विश्व भर में विशेष पहचान दिलाती है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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