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Videsh Yatra Kyo Na Karen: विदेश यात्रा पर भारतीयों का रिकॉर्ड खर्च, अर्थव्यवस्था पर कितना असर?
Videsh Yatra Kyo Na Karen: भारतीयों का विदेश यात्रा पर रिकॉर्ड खर्च तेजी से बढ़ रहा है। जानिए विदेशी यात्राओं, शिक्षा, रेमिटेंस और डॉलर आउटफ्लो का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है।
Videsh Yatra Kyo Na Karen
Videsh Yatra Kyo Na Karen: भारत अब केवल एक ऐसा देश नहीं रह गया है, जहां लोग कभी-कभार विदेश घूमने जाया करते थे। अब हर साल करोड़ों भारतीय दुनिया के अलग-अलग देशों की यात्रा कर रहे हैं। कोई नौकरी के लिए खाड़ी देशों की ओर जा रहा है। कोई अमेरिका और ब्रिटेन में पढ़ाई के सपने देख रहा है, तो कोई दुबई, थाईलैंड और यूरोप में छुट्टियां मनाने निकल रहा है। विदेश जाना अब भारतीय मध्यवर्ग की नई आकांक्षा और नई जीवनशैली बन चुका है।
लेकिन इस तेजी से बढ़ती विदेशी यात्राओं का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है? हर साल भारतीय विदेशों में कितना पैसा खर्च कर रहे हैं? क्या इससे देश से भारी मात्रा में डॉलर बाहर जा रहे हैं, या फिर विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा इस कमी की भरपाई कर देती है? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए प्रधानमंत्री की अपील पर गौर करना जरूरी हो जाता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस पाने वाला देश भी है। तेजी से विदेशों में पैसा खर्च करने वाला समाज भी। यही बदलाव भारत की बदलती आर्थिक और सामाजिक तस्वीर को समझने की सबसे बड़ी कुंजी बनता जा रहा है।
करोड़ों कर रहे विदेश यात्रा
भारत से विदेश जाने वालों की संख्या अब बहुत बड़ी हो चुकी है। 2024 में 3.08 करोड़ भारतीय नागरिक विदेश गए। 2023 में यह संख्या 2.78 करोड़ थी। यानी एक साल में लगभग 30 लाख अधिक भारतीय विदेश गए। यह संख्या यात्राओं की है। व्यक्तियों की नहीं। एक ही व्यक्ति साल में दो बार विदेश जाए तो वह दो बार गिना जाता है। सरकार के ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन के अनुसार 2024 में भारत आए विदेशी पर्यटक 99.51 लाख थे। 2023 में यह संख्या 95.20 लाख थी। यानी भारत से बाहर जाने वाले भारतीयों की संख्या भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों से लगभग तीन गुना अधिक है।
भारतीयों के विदेश जाने के प्रमुख गंतव्य हैं - UAE, सऊदी अरब, अमेरिका, थाईलैंड, सिंगापुर, ब्रिटेन, कतर, कनाडा, कुवैत, ओमान, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया। 2024 में सबसे अधिक भारतीय UAE गए, करीब 77.87 लाख। इसके बाद सऊदी अरब 34.23 लाख, अमेरिका 21.43 लाख, थाईलैंड 19.08 लाख, सिंगापुर 15.34 लाख, ब्रिटेन 13.22 लाख, कतर 11.40 लाख, कनाडा 9.45 लाख, कुवैत 9.06 लाख और ओमान 8.64 लाख रहे। इससे साफ है कि भारतीय विदेश यात्रा का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों, नौकरी-व्यवसाय वाले देशों और पर्यटन स्थलों में बंटा हुआ है।
29 अरब डॉलर कर दिए खर्च
खर्च की बात करें तो रिज़र्व बैंक के Liberalised Remittance Scheme यानी LRS के तहत 2024-25 में भारतीयों ने विदेश भेजे या खर्च किए लगभग 29.56 अरब डॉलर। भारतीय मुद्रा में यह धनराशि करीब ₹2.45 लाख करोड़ बैठती है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा विदेश यात्रा का है। विदेश यात्रा पर करीब 16.96 अरब डॉलर, यानी लगभग ₹1.40 लाख करोड़ खर्च हुए। विदेश में पढ़ाई पर करीब 2.92 अरब डॉलर, यानी लगभग ₹24,000 करोड़ खर्च हुए। पढ़ाई पर खर्च 2023-24 के 3.48 अरब डॉलर से घटा। विदेश यात्रा पर खर्च लगभग पिछले साल के बराबर रहा।
औसत निकालें तो तस्वीर साफ होती है। 2024 में भारत से 3.08 करोड़ विदेशी यात्राएं हुईं। केवल यात्रा मद में 16.96 अरब डॉलर खर्च मानें तो प्रति विदेशी यात्रा औसत खर्च करीब 550 डॉलर, यानी लगभग ₹45,000–₹47,000 बैठता है। लेकिन यह औसत है। असल खर्च बहुत अलग-अलग होता है। नेपाल, दुबई, थाईलैंड, सिंगापुर जैसी छोटी यात्राओं में खर्च कम हो सकता है। अमेरिका, यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसी यात्राओं में खर्च बहुत अधिक होता है। अगर LRS के कुल 29.56 अरब डॉलर को कुल यात्राओं से जोड़कर देखें तो प्रति यात्रा औसत लगभग 950–960 डॉलर, यानी करीब ₹80,000 बैठता है। लेकिन यह पूरा खर्च पर्यटन नहीं है। इसमें पढ़ाई, निवेश, रिश्तेदारों को मदद, इलाज और दूसरे खर्च भी शामिल हैं।
लाखों स्टूडेंट्स की विदेश यात्रा
पढ़ाई के लिए विदेश जाने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है। 2024 में 7,59,064 भारतीयों ने विदेश जाते समय अपना उद्देश्य शिक्षा बताया। 2023 में यह संख्या 8,92,989 थी। यानी 2024 में पढ़ाई के लिए जाने वालों में गिरावट आई। सबसे बड़े अध्ययन गंतव्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और रूस हैं। 2024 में अमेरिका के लिए 2,04,058, कनाडा के लिए 1,37,608, ब्रिटेन के लिए 98,890, ऑस्ट्रेलिया के लिए 68,572, जर्मनी के लिए 34,702 और रूस के लिए 31,444 भारतीय छात्र गए।
रोजगार का आंकड़ा
रोज़गार के लिए विदेश जाने वालों का पूरा आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। विदेश मंत्री ने संसद में कहा है कि सभी यात्री विदेश में रहने या नौकरी का उद्देश्य घोषित नहीं करते, इसलिए व्यापक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। सरकार केवल ईसीआर पासपोर्ट वाले श्रमिकों का आंकड़ा रखती है। 2023 में ऐसे 3,98,317 श्रमिकों को इमिग्रेशन क्लीयरेंस मिला। 2024 में 19 नवंबर तक 3,48,629 क्लीयरेंस दिए गए। ये मुख्यतः खाड़ी देशों में निर्माण, तेल-गैस, होटल, घरेलू काम, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, सर्विस सेक्टर में जाते हैं।
अर्थव्यवस्था पर असर
भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेश यात्राओं का प्रभाव दोतरफा है। नुकसान यह है कि विदेश यात्रा, विदेशी शिक्षा और विदेश में खर्च से डॉलर बाहर जाता है। इससे करेंट एकाउंट डेफिसिट पर दबाव बढ़ता है। रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। महंगे आयात वाले भारत जैसे देशों के लिए यह संवेदनशील विषय है। लेकिन लाभ भी है। विदेश शिक्षा से कौशल बनता है। विदेश रोजगार से भारतीयों को आय मिलती है। वे बाद में भारत को पैसा भेजते हैं। व्यापार, निवेश और ग्लोबल नेटवर्किंग भी बढ़ती है। इसलिए हर विदेश यात्रा को नुकसान नहीं कहा जा सकता। समस्या तब है जब लग्ज़री यात्रा और अनावश्यक विदेशी खर्च बहुत तेजी से बढ़े, जबकि देश तेल, सोना और तकनीक के आयात पर पहले ही भारी डॉलर खर्च कर रहा हो।
भारत में आने वाले विदेशी पर्यटकों से देश को बड़ा लाभ होता है। 2024 में इंटरनेशनल टूरिस्ट 2.05 करोड़ रहे और पर्यटन से विदेशी मुद्रा आय ₹2,93,033 करोड़ रही। 2023 में यह आय ₹2,66,045 करोड़ थी। पर्यटन से होटल, टैक्सी, विमानन, गाइड, हस्तशिल्प, रेस्टोरेंट, स्मारक, स्थानीय बाजार और छोटे कारोबारों को आय मिलती है। पर्यटन रोजगार भी देता है। सरकारी अनुमान के अनुसार 2023-24 में पर्यटन क्षेत्र से जुड़े रोजगार 8.46 करोड़ तक पहुंच गए।
प्रवासी भारतीय भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में हैं। 2024 में भारत को प्रवासियों से लगभग 138 अरब डॉलर की रेमिटेंसमिली। भारत इस मामले में दुनिया में पहले नंबर पर है। दूसरे नंबर पर मेक्सिको है, जिसे लगभग 68 अरब डॉलर मिले। तीसरे नंबर पर फिलीपींस है, जिसे लगभग 40 अरब डॉलर मिले। यानी भारत को मिलने वाली रेमिटेंस दुनिया में सबसे अधिक है और दूसरे नंबर वाले देश से लगभग दोगुनी है।
इस पूरे चित्र का निष्कर्ष यह है कि भारत से विदेश जाने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारतीय विदेशों में यात्रा, शिक्षा और निवेश पर बहुत खर्च कर रहे हैं। इससे डॉलर बाहर जाता है। लेकिन विदेश में बसे भारतीय उससे कहीं अधिक डॉलर भारत भेजते भी हैं। 2024-25 में भारतीयों ने LRS के तहत लगभग 29.56 अरब डॉलर बाहर भेजे, जबकि प्रवासी भारतीयों ने भारत को 135–138 अरब डॉलर के आसपास भेजे। इसलिए समस्या विदेश जाना नहीं है। समस्या अनुत्पादक और दिखावटी विदेशी खर्च है। समाधान यह है कि शिक्षा, कौशल, नौकरी और व्यापार वाली विदेश यात्रा को समर्थन मिले। लेकिन अनावश्यक विदेशी खर्च, सोना और लग्ज़री इम्पोर्ट पर संयम रखा जाए।


