Chandauli News: दिव्यांगता पर भारी, हौसलों की उड़ान: 5 वर्षीय रुद्रांश ने स्केटिंग में जीते 20 स्वर्ण पदक

Chandauli News: चंदौली के 5 वर्षीय दिव्यांग रुद्रांश विश्वकर्मा ने स्केटिंग में 20 स्वर्ण पदक जीतकर सबको चौंका दिया है। दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद, उनका आत्मविश्वास और संघर्ष हर किसी के लिए प्रेरणा है।

Sunil Kumar
Published on: 15 Aug 2025 8:19 AM IST
Chandauli News: दिव्यांगता पर भारी, हौसलों की उड़ान: 5 वर्षीय रुद्रांश ने स्केटिंग में जीते 20 स्वर्ण पदक
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Chandauli News: चंदौली के एक छोटे से गाँव डिग्घी के 5 वर्षीय रुद्रांश विश्वकर्मा ने यह साबित कर दिया है कि सच्ची लगन और अटूट आत्मविश्वास के आगे हर बाधा छोटी पड़ जाती है। दोनों पैरों से दिव्यांगता के बावजूद, इस नन्हें चैंपियन ने रोलर स्पीड स्केटिंग की दुनिया में एक अनोखी मिसाल कायम की है। अपनी छोटी सी उम्र में ही रुद्रांश ने अब तक 20 स्वर्ण पदक जीतकर न केवल अपने माता-पिता, बल्कि पूरे जनपद का नाम रोशन किया है। उनकी यह असाधारण सफलता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मानते हैं कि दिव्यांगता किसी के सपनों की उड़ान को रोक सकती है। रुद्रांश की कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि अदम्य साहस और हौसले की एक ऐसी दास्ताँ है, जो हर किसी को प्रेरित करती है।

सपनों को मिली गति: रोलर स्केटिंग का सफर

रुद्रांश का यह अद्भुत सफर आसान नहीं था। जन्म से ही दोनों पैरों में दिव्यांगता के कारण उनके लिए सामान्य चलना भी एक चुनौती थी। लेकिन उनके पिता जितेंद्र कुमार और माता पूजा ने कभी भी अपने बेटे को कमजोर नहीं समझा। उन्होंने रुद्रांश के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचाना और उसे सही दिशा दी। रुद्रांश ने अपनी मेहनत और लगन से रोलर स्केटिंग को न सिर्फ अपनाया, बल्कि इसमें महारत भी हासिल की। ब.रे.का. संस्थान में कोच फरज़म हुसैन के मार्गदर्शन में, रुद्रांश प्रतिदिन घंटों अभ्यास करते हैं। कोच का मानना है कि रुद्रांश बहुत जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का परचम लहराएँगे।

माता-पिता का अटूट विश्वास

रुद्रांश की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का गहरा योगदान है। एक निजी अस्पताल में कर्मचारी जितेंद्र कुमार और गृहिणी पूजा ने अपने बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए कई त्याग किए हैं। उन्होंने हर कदम पर रुद्रांश का साथ दिया, उसका हौसला बढ़ाया और उसे कभी भी दिव्यांगता का एहसास नहीं होने दिया। रुद्रांश की यह जीत सिर्फ पदक की नहीं, बल्कि उनके माता-पिता के विश्वास और उनके त्याग की भी जीत है। यह कहानी दर्शाती है कि जब परिवार का साथ हो और हौसले बुलंद हों, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।

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