UP Electricity Privatization: निजीकरण का विफल प्रयोग उत्तर प्रदेश की गरीब जनता पर न थोपा जाए: संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील की

UP Electricity Privatization: बिजली कर्मचारियों ने आज लगातार 240वें दिन निजीकरण के विरोध में अपना प्रदर्शन जारी रखा।

Newstrack Network
Published on: 25 July 2025 8:27 PM IST
UP Electricity Privatization: निजीकरण का विफल प्रयोग उत्तर प्रदेश की गरीब जनता पर न थोपा जाए: संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील की
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निजीकरण का विफल प्रयोग उत्तर प्रदेश की गरीब जनता पर न थोपा जाए  (photo: social media )

UP Electricity Privatization: विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि वे हस्तक्षेप कर देश के अन्य हिस्सों में विफल हो चुके बिजली निजीकरण के प्रयोग को उत्तर प्रदेश की गरीब जनता पर न थोपने दें। बिजली कर्मचारियों ने आज लगातार 240वें दिन निजीकरण के विरोध में अपना प्रदर्शन जारी रखा।

संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन में बिजली कर्मचारियों ने रिकॉर्ड विद्युत आपूर्ति की है और लाइन हानियों (line losses) को राष्ट्रीय मानक से नीचे लाया है। महाकुंभ के दौरान भी बिजली कर्मियों ने अथक परिश्रम कर 65 दिनों तक चली इस विशाल आयोजन में एक पल के लिए भी विद्युत आपूर्ति में कोई व्यवधान नहीं आने दिया। यहां तक कि भीषण गर्मी के दौरान भी आंदोलनरत रहते हुए बिजली कर्मियों ने लगातार बेहतर विद्युत आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया।

निजीकरण का प्रयोग एक विफल प्रयोग

संघर्ष समिति ने जोर देकर कहा कि बिजली के क्षेत्र में निजीकरण का प्रयोग एक विफल प्रयोग साबित हुआ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि ओडिशा में वर्ष 1999 में सबसे पहले विद्युत वितरण का निजीकरण किया गया था, लेकिन यह प्रयोग राज्य के सबसे अधिक औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्र में एक वर्ष के भीतर ही विफल हो गया। अमेरिकी कंपनी एईएस एक वर्ष बाद ही काम छोड़कर भाग गई और उसने महाचक्रवात के दौरान टूटे बिजली ढांचे के पुनर्निर्माण से इनकार कर दिया। रिलायंस पावर अन्य तीन विद्युत वितरण निगमों में काम करता रहा, लेकिन फरवरी 2015 में ओडिशा के विद्युत नियामक आयोग ने बेहद खराब प्रदर्शन के कारण रिलायंस पावर के भी तीनों लाइसेंस रद्द कर दिए। यह ओडिशा में दूसरी विफलता थी।

समिति ने आगे बताया कि कोरोना काल के दौरान जून 2020 में ओडिशा के चारों विद्युत वितरण निगमों का लाइसेंस टाटा पावर को दे दिया गया। लेकिन इसी महीने 15 जुलाई को ओडिशा के विद्युत नियामक आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए बेहद खराब प्रदर्शन के कारण टाटा की चारों कंपनियों को नोटिस जारी किया है और उनके प्रदर्शन पर जनसुनवाई का आदेश जारी कर दिया है। यह ओडिशा में निजीकरण की तीसरी विफलता है। उल्लेखनीय है कि ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी स्वयं टाटा पावर के विरोध में लगातार आंदोलन कर रही है।

संघर्ष समिति ने यह भी बताया कि पड़ोसी राज्य बिहार में गया, भागलपुर और समस्तीपुर में अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी के नाम पर निजीकरण का प्रयोग किया गया था, जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूरी तरह असफल रहने के चलते एक साल बाद ही रद्द कर दिया। इसी तरह, महाराष्ट्र में औरंगाबाद, जलगांव, नागपुर और झारखंड में रांची तथा जमशेदपुर में भी निजीकरण के विफल प्रयोग निरस्त किए जा चुके हैं।

ग्रेटर नोएडा में आए दिन किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं की शिकायतें

समिति ने उत्तर प्रदेश में ग्रेटर नोएडा और आगरा के अनुभवों का भी हवाला दिया, जहां निजीकरण का प्रयोग असफल रहा है। ग्रेटर नोएडा में आए दिन किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं की शिकायतें सामने आ रही हैं, और स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार निजी कंपनी का लाइसेंस निरस्त कराने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा लड़ रही है। आगरा में टोरेंट पावर कंपनी अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी के करार का खुलेआम उल्लंघन कर रही है।

संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से अपील की कि निजी कंपनी मुनाफे के लिए काम करती है, और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम तथा दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के अंतर्गत आने वाले 42 जनपदों में बेहद गरीब जनता रहती है। अतः प्रदेश और आम जनता के व्यापक हित में निजीकरण का यह विफल प्रयोग उत्तर प्रदेश में लागू न किया जाए और इसे तत्काल निरस्त किया जाए।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मचारियों के आंदोलन के आज 8 महीने पूरे हो गए हैं। आंदोलन के 240वें दिन आज प्रदेश के समस्त जनपदों और परियोजनाओं पर बिजली कर्मियों ने विरोध सभा कर निजीकरण का निर्णय निरस्त करने की मांग की।

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