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SBSP Political Journey: राजभर राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी ओपी राजभर, कैसे बनाई अपनी सियासी ताकत?
Suheldev Bharatiya Samaj Party Political Journey: सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) का पूरा इतिहास जानिए। ओमप्रकाश राजभर की राजनीतिक यात्रा, भाजपा-सपा गठबंधन, चुनावी प्रदर्शन, विधायक, मंत्री पद और 2027 की रणनीति। राजभर राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी ओपी राजभर? गठबंधन बदलकर कैसे बनाई सियासी ताकत
Suheldev Bharatiya Samaj Party Political Journey
Suheldev Bharatiya Samaj Party Political Journey: सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, जिसे सामान्यतः सुभासपा या एसबीएसपी कहा जाता है, उत्तर प्रदेश के उन छोटे क्षेत्रीय दलों में शामिल है जिनकी विधानसभा और लोकसभा में संख्या सीमित रही। लेकिन जिनका राजनीतिक महत्व उनकी सीटों से कहीं अधिक रहा है। इसका कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में राजभर, भर और उनसे संबंधित अत्यंत पिछड़े समुदायों की निर्णायक उपस्थिति है। पार्टी के संस्थापक ओमप्रकाश राजभर ने इसी सामाजिक आधार को संगठित करके पहले बहुजन समाज पार्टी से अलग पहचान बनाई। फिर लगभग डेढ़ दशक तक स्वतंत्र चुनावी संघर्ष किया और अंततः भाजपा तथा समाजवादी पार्टी—दोनों के साथ अलग-अलग समय पर गठबंधन कर सत्ता तथा विपक्ष की राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित किया।
पार्टी की पूरी यात्रा एक सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ी। 2002 में गठित सुभासपा ने 2004, 2007, 2009, 2012 और 2014 के चुनावों में स्वतंत्र या छोटे मोर्चों के साथ चुनाव लड़ा। लेकिन कोई लोकसभा या विधानसभा सीट नहीं जीत सकी। 2017 में भाजपा के साथ गठबंधन ने पहली बार उसे चार विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद दिलाया। 2019 में भाजपा से संबंध टूटे। ओमप्रकाश राजभर मंत्रिमंडल से बाहर हुए और पार्टी ने भाजपा-विरोधी मोर्चा बनाने का प्रयास किया। 2022 में समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़कर सुभासपा छह विधानसभा सीटें जीत गई।
उसका मत-प्रतिशत भी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचा। लेकिन चुनाव के कुछ ही महीनों बाद अखिलेश यादव और ओमप्रकाश राजभर के संबंध बिगड़ गए। जुलाई 2023 में सुभासपा पुनः भाजपा-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में लौट आई। मार्च 2024 में ओमप्रकाश राजभर दोबारा योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
अगस्त, 2026 तक सुभासपा ने लोकसभा में अभी तक कोई सीट नहीं जीती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आम चुनावों में उसने 2017 में चार और 2022 में छह सीटें जीतीं—अर्थात चुनाव-वार विधानसभा जीत का कुल योग दस है। विधान परिषद में उसका एक सदस्य विच्छेलाल राजभर है। राज्यसभा में पार्टी का कोई सदस्य कभी नहीं पहुँचा। वर्तमान विधानसभा में 2022 के निर्वाचित सदस्यों में से अधिकांश पार्टी के साथ हैं। मऊ से निर्वाचित अब्बास अंसारी की सदस्यता 2025 में सजा के बाद समाप्त की गई थी, हालांकि बाद में उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि स्थगित की, जिससे उनकी विधायी स्थिति पर कानूनी और प्रक्रियागत जटिलता पैदा हुई। आधिकारिक विधानसभा अभिलेखों में सुभासपा की वर्तमान संख्या का निर्धारण समय-समय पर अद्यतन सदस्य-सूची से किया जाना आवश्यक है।
ओमप्रकाश राजभर की राजनीतिक पृष्ठभूमि
ओमप्रकाश राजभर का राजनीतिक निर्माण बहुजन समाज पार्टी के शुरुआती सामाजिक आंदोलन के भीतर हुआ। कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के साथ-साथ पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समुदायों को एक व्यापक ‘बहुजन’ राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने का प्रयास किया था। राजभर समुदाय पूर्वी उत्तर प्रदेश में संख्या और स्थानीय प्रभाव के बावजूद लंबे समय तक अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित था। ओमप्रकाश राजभर ने बसपा के माध्यम से राजनीति शुरू की और 1991 तथा 1996 के विधानसभा चुनावों में बसपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा। लेकिन जीत नहीं सके। उपलब्ध चुनावी विवरण के अनुसार 1991 में उन्हें लगभग 18 हजार और 1996 में लगभग 32 हजार मत मिले तथा दोनों बार वे तीसरे स्थान पर रहे।
बसपा के भीतर ओमप्रकाश राजभर को यह अनुभव हुआ कि पार्टी की चुनावी और संगठनात्मक शक्ति मुख्यतः जाटव नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रही है और गैर-जाटव अत्यंत पिछड़ी जातियों को स्वतंत्र नेतृत्व तथा पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिल रही। टिकट वितरण, पूर्वांचल में संगठन और राजभर समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद बढ़े। 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय उन्हें बसपा का टिकट नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने बसपा से अलग होकर अपना राजनीतिक संगठन बनाने का निर्णय लिया। यह वही दौर था जब उत्तर प्रदेश में जाति-आधारित छोटे दलों का विस्तार हो रहा था—कुर्मी समुदाय में अपना दल, निषाद समुदाय में अलग संगठनों की शुरुआत, जाटों में राष्ट्रीय लोकदल और यादवों में समाजवादी पार्टी पहले से सक्रिय थे। सुभासपा इसी सामाजिक और राजनीतिक रिक्तता से निकली।
पार्टी कब और कैसे बनी?; 27 अक्टूबर 2002: सुभासपा की स्थापना
ओमप्रकाश राजभर ने 27 अक्टूबर, 2002 को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की स्थापना की। पार्टी का मुख्यालय बलिया जिले के रसड़ा क्षेत्र में रखा गया और पीला झंडा उसकी पहचान बना। संगठन ने महाराजा सुहेलदेव को अपना प्रमुख ऐतिहासिक प्रतीक बनाया। पार्टी का तर्क था कि महाराजा सुहेलदेव पूर्वांचल के वंचित और पिछड़े समुदायों के शौर्य, आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान के प्रतीक हैं। निर्वाचन आयोग के पंजीकरण अभिलेखों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में दर्ज है।
पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में केवल राजभर समाज का प्रतिनिधित्व नहीं। बल्कि अति पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के भीतर अलग हिस्सेदारी, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण का उप-वर्गीकरण, जातिगत जनगणना, प्राथमिक शिक्षा में सुधार, शराबबंदी, गरीबों को मुफ्त या सस्ती शिक्षा, स्थानीय रोजगार, किसानों की समस्याएँ और प्रशासनिक सेवाओं में वंचित समुदायों की भागीदारी शामिल रही। पार्टी ने लंबे समय तक यह माँग भी उठाई कि राजभर और संबंधित समुदायों की वास्तविक सामाजिक स्थिति का अध्ययन कर उन्हें अनुसूचित जनजाति अथवा पृथक आरक्षण श्रेणी में शामिल करने पर विचार किया जाए।
सुभासपा का वास्तविक सामाजिक आधार पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़, वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, देवरिया, कुशीनगर, गोरखपुर, अंबेडकरनगर और आसपास के जिलों में विकसित हुआ। इन क्षेत्रों में राजभर समाज अनेक विधानसभा सीटों पर निर्णायक अथवा प्रभावशाली संख्या में है। लेकिन समुदाय राज्यव्यापी रूप से इतना बड़ा नहीं है कि केवल उसके मतों से बड़ी संख्या में सीटें जीती जा सकें। इसलिए पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति दो स्तरों पर बनी—पहला, स्वतंत्र चुनाव लड़कर अपना सामाजिक मत प्रमाणित करना। दूसरा, बड़े दल से गठबंधन कर उस मत को सीट और सत्ता में बदलना।
2004 का लोकसभा चुनाव: पहली संसदीय परीक्षा
पार्टी गठन के लगभग डेढ़ वर्ष बाद सुभासपा ने 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा। उपलब्ध पार्टीवार निर्वाचन-संकलन के अनुसार उसने उत्तर प्रदेश में लगभग 14 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लगभग 2.75 लाख मत प्राप्त किए। लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी। उत्तर प्रदेश के कुल मतों में उसका हिस्सा अत्यंत सीमित था; अखिल भारतीय स्तर पर उसका मत-प्रतिशत लगभग 0.07 प्रतिशत के आसपास दर्ज किया गया।
यह चुनाव पार्टी के लिए जीत का चुनाव नहीं। बल्कि सामाजिक उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास था। उसके उम्मीदवार मुख्यतः पूर्वांचल की उन सीटों पर उतरे जहाँ राजभर मतदाता पर्याप्त संख्या में थे। लेकिन प्रथम-पास-द-पोस्ट प्रणाली में एक छोटे समुदाय-केंद्रित दल के लिए स्वतंत्र रूप से लोकसभा सीट जीतना कठिन था। पार्टी अनेक जगह कुछ हजार से लेकर कुछ दसियों हजार मत तक प्राप्त कर सकी, पर मुख्य मुकाबला भाजपा, समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के बीच रहा।
2007 का विधानसभा चुनाव: व्यापक चुनाव, लेकिन कोई सीट नहीं
2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सुभासपा ने पहली बार बड़े पैमाने पर अपनी स्वतंत्र शक्ति आजमाई। पार्टी ने लगभग 97 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। उसे कुल लगभग 4,91,347 मत और 0.94 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त हुए, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली।
विधानसभा चुनाव गठबंधन/स्थिति लड़ी सीटें जीती सीटें कुल मत मत-प्रतिशत
2007 मुख्यतः स्वतंत्र 97 0 4,91,347 0.94%
2012 स्वतंत्र 52 0 4,77,330 0.63%
2017 भाजपा–एनडीए 8 4 6,07,911 0.70%
2022 सपा गठबंधन 19 6 12,52,925 1.36%
2007 में लगभग एक प्रतिशत वोट प्राप्त करना एक नई और सीमित क्षेत्रीय पार्टी के लिए महत्वहीन नहीं था। लेकिन उसके वोट अनेक सीटों पर बिखरे हुए थे। कहीं पार्टी ने समाजवादी पार्टी का पिछड़ा वोट काटा, कहीं बसपा के गैर-जाटव बहुजन आधार को प्रभावित किया और कहीं भाजपा के गैर-यादव पिछड़े मतों में सेंध लगाई। इसके बावजूद वह किसी सीट पर आवश्यक सामाजिक बहुमत नहीं बना सकी। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने दलित–ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और सुभासपा जैसी छोटी जाति-आधारित पार्टियाँ सीटों से बाहर रहीं।
2009 का लोकसभा चुनाव और ‘अधिकार मंच’
2009 के लोकसभा चुनाव में सुभासपा ने लगभग 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। उसने छोटे पिछड़ा और सामाजिक न्याय समूहों के साथ ‘अधिकार मंच’ जैसे प्रयास किए। पार्टी को लगभग 3.19 लाख मत मिले, लेकिन कोई उम्मीदवार निर्वाचित नहीं हुआ। उपलब्ध चुनावी संकलन में उसका अखिल भारतीय मत-प्रतिशत लगभग 0.12 प्रतिशत दर्ज है।
इस दौर में ओमप्रकाश राजभर का उद्देश्य केवल सीट जीतना नहीं। बल्कि यह प्रमाणित करना था कि पूर्वांचल में राजभर समाज का अलग राजनीतिक मत मौजूद है। उन्होंने बड़े दलों पर आरोप लगाया कि वे चुनाव के समय राजभर मत चाहते हैं। लेकिन टिकट, संगठन, प्रशासन और सत्ता में उचित हिस्सेदारी नहीं देते। पार्टी की सभाओं में अति पिछड़ा आरक्षण, जातिगत गणना, शिक्षा और शराबबंदी प्रमुख मुद्दे बने। फिर भी चुनावी संसाधनों, मजबूत उम्मीदवारों और बूथ-स्तरीय संगठन की कमी के कारण मत सीटों में नहीं बदले।
2012 का विधानसभा चुनाव: वोट बरकरार, सफलता नहीं
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सुभासपा ने लगभग 52 सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी को 4,77,330 मत और 0.63 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त हुए, लेकिन कोई सीट नहीं मिली। मतों की कुल संख्या 2007 के लगभग बराबर रही, पर कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी जीत के स्तर तक नहीं पहुँच सकी।
2012 का परिणाम सुभासपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत था। लगभग दस वर्ष के संगठनात्मक संघर्ष के बाद भी पार्टी स्वतंत्र रूप से विधायक नहीं जिता सकी थी। उसका एक सामाजिक मत था। लेकिन उसे व्यापक जातीय गठबंधन, प्रभावशाली स्थानीय उम्मीदवार और बड़े दल के सहयोग की आवश्यकता थी। यही अनुभव आगे 2017 में भाजपा के साथ समझौते की बुनियाद बना।
2014 का लोकसभा चुनाव और ‘एकता मंच’
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच सुभासपा भाजपा के साथ नहीं थी। ओमप्रकाश राजभर ने छोटे दलों और सामाजिक समूहों को जोड़कर ‘एकता मंच’ जैसा मोर्चा बनाया और लगभग 13 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे। पार्टी को करीब 1.19 लाख मत मिले और कोई सीट नहीं जीत सकी। अखिल भारतीय मत-प्रतिशत लगभग 0.15 प्रतिशत दर्ज हुआ।
2014 ने पार्टी को यह कठोर वास्तविकता दिखाई कि भाजपा के तेज विस्तार के सामने गैर-यादव पिछड़े मतों का बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ओर जा चुका था। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, निषाद, राजभर और अन्य गैर-यादव पिछड़ी जातियों को ‘सामाजिक प्रतिनिधित्व’ और हिंदुत्व के साझा ढाँचे में जोड़ने की रणनीति अपनाई। सुभासपा स्वतंत्र रूप से इस ध्रुवीकरण का मुकाबला नहीं कर सकी। इसके बाद भाजपा और सुभासपा के बीच निकटता बढ़ी।
भाजपा के साथ पहला बड़ा गठबंधन; 2017 विधानसभा चुनाव
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन बनाया। भाजपा को पूर्वांचल में राजभर मतों के प्रतिनिधि चेहरे की आवश्यकता थी, जबकि सुभासपा को पहली बार अपने सामाजिक मत को सीट में बदलने के लिए भाजपा के व्यापक वोट और संगठन की जरूरत थी। समझौते के अंतर्गत सुभासपा ने आठ सीटों पर चुनाव लड़ा। उसने चार सीटें जीतीं और 6,07,911 मत तथा 0.70 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त किया।
चार विजेता थे—
नेता विधानसभा क्षेत्र
ओमप्रकाश राजभर जहूराबाद
रामानंद बौद्ध रामकोला
त्रिवेणी राम जखनियां
कैलाशनाथ सोनकर अजगरा
इन चार सीटों के साथ सुभासपा पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुँची। आठ में चार सीटें जीतने का अर्थ 50 प्रतिशत सफलता दर था। यह परिणाम पार्टी के स्वतंत्र मत और भाजपा के वोट हस्तांतरण—दोनों का संयुक्त प्रभाव था। भाजपा को सुभासपा से पूर्वांचल में राजभर मतों का एक हिस्सा मिला, जबकि सुभासपा प्रत्याशियों को भाजपा का सवर्ण, गैर-यादव पिछड़ा, दलित और हिंदुत्व समर्थक मत प्राप्त हुआ। ओमप्रकाश राजभर पहली बार मंत्री बने
19 मार्च 2017 को योगी आदित्यनाथ सरकार बनने पर ओमप्रकाश राजभर को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्हें पिछड़ा वर्ग कल्याण और दिव्यांगजन विकास जैसे विभाग मिले। यह सुभासपा के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी—पंद्रह वर्ष तक बिना सीट के संघर्ष करने वाली पार्टी पहली बार विधानसभा में पहुँची और उसका अध्यक्ष सीधे कैबिनेट मंत्री बना।
लेकिन भाजपा और सुभासपा के संबंध सरकार बनने के कुछ ही समय बाद तनावपूर्ण होने लगे। ओमप्रकाश राजभर ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि पिछड़े वर्गों के आरक्षण में उप-वर्गीकरण, सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों, प्राथमिक शिक्षा में सुधार और शराबबंदी जैसे मुद्दों पर सरकार पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही। उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री और भाजपा नेतृत्व की सार्वजनिक आलोचना की। उनकी राजनीतिक शैली गठबंधन में रहते हुए भी खुलकर असहमति जताने की रही, जिससे वे मीडिया और राजभर समाज के बीच लगातार चर्चा में बने रहे। लेकिन भाजपा नेतृत्व के साथ संबंध खराब होते गए।
ओमप्रकाश राजभर ने अति पिछड़ा वर्ग के भीतर अलग आरक्षण को अपनी सबसे महत्वपूर्ण माँग बनाया। उनका कहना था कि यादव, कुर्मी और कुछ अपेक्षाकृत मजबूत पिछड़ी जातियों को आरक्षण का बड़ा लाभ मिलता है, जबकि राजभर, नोनिया, बिंद, प्रजापति, पाल और अन्य अत्यंत पिछड़े समूह पीछे रह जाते हैं। भाजपा ने इस प्रश्न पर सामाजिक न्याय समिति गठित की। लेकिन उसकी सिफारिशें तत्काल लागू नहीं हुईं। राजभर ने इसे सरकार की राजनीतिक अनिच्छा बताया।
2019 में भाजपा से संबंध क्यों टूटे?
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सुभासपा ने भाजपा से पूर्वांचल में अधिक सीटों और अपने चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारने की माँग की। भाजपा ने सुभासपा को घोसी जैसी सीट देने के बजाय कुछ उम्मीदवारों को भाजपा के चिह्न पर लड़ाने का विकल्प सुझाया। ओमप्रकाश राजभर ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद सुभासपा ने भाजपा गठबंधन से दूरी बनाकर स्वतंत्र रूप से अनेक सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए।
लोकसभा चुनाव में सुभासपा का कोई उम्मीदवार नहीं जीता। उपलब्ध चुनावी संकलन में पार्टी को लगभग 2.77 लाख मत और उत्तर प्रदेश में करीब 0.30 प्रतिशत वोट मिला। कुछ सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने भाजपा उम्मीदवारों को सीमित नुकसान पहुँचाया। लेकिन स्वयं निर्णायक मुकाबले में नहीं आ सके।
चुनाव के बाद 20 मई, 2019 को योगी आदित्यनाथ सरकार ने ओमप्रकाश राजभर को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। उनके विभाग दूसरे मंत्री को सौंपे गए। सरकार ने गठबंधन-विरोधी गतिविधियों को कारण बताया, जबकि राजभर ने कहा कि वे सामाजिक न्याय के मुद्दों पर समझौता नहीं कर सकते।
भाजपा–सुभासपा का पहला गठबंधन इस प्रकार 2017 से 2019 तक चला। इसने पार्टी को पहली बार चार विधायक और मंत्री पद दिया। लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी के साथ सामाजिक न्याय की माँगों को लागू कराने में उसकी सीमाएँ भी सामने आईं।
भाजपा-विरोधी ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’
भाजपा से अलग होने के बाद ओमप्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश और बिहार के छोटे जाति-आधारित तथा क्षेत्रीय दलों को जोड़कर ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’ बनाने का प्रयास किया। इसमें समय-समय पर जन अधिकार पार्टी, एआईएमआईएम और अन्य छोटे दलों के साथ संवाद हुआ। राजभर का उद्देश्य अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों का ऐसा मोर्चा बनाना था जो भाजपा, समाजवादी पार्टी और बसपा—तीनों से अलग विकल्प प्रस्तुत करे।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में सुभासपा ने ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट जैसे छोटे दलों के मोर्चे के साथ चुनावी प्रयोग किया। लेकिन बिहार में संगठन सीमित होने के कारण कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। पार्टी का आधार उत्तर प्रदेश से बाहर स्थायी रूप से विकसित नहीं हो सका। 2025 के बिहार चुनाव से पहले भी सुभासपा ने एनडीए में सीट न मिलने पर स्वतंत्र रूप से लड़ने की घोषणा की और राजभर, भर तथा राजवंशी आबादी वाले क्षेत्रों में प्रत्याशी उतारने की बात कही। इससे स्पष्ट होता है कि पार्टी उत्तर प्रदेश से बाहर विस्तार का प्रयास करती रही। लेकिन उसकी वास्तविक चुनावी शक्ति अभी भी पूर्वांचल तक सीमित है।
समाजवादी पार्टी से गठबंधन; 2021 में अखिलेश–राजभर समझौता
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने बड़े राष्ट्रीय दलों के बजाय छोटे जाति-आधारित क्षेत्रीय दलों को साथ लेने की रणनीति अपनाई। राष्ट्रीय लोकदल के साथ जाट आधार, सुभासपा के साथ राजभर और अत्यंत पिछड़ा आधार, अपना दल कमेरावादी के साथ कुर्मी आधार तथा अन्य छोटे दलों के माध्यम से गैर-यादव पिछड़ी जातियों को जोड़ने का प्रयास किया गया।
अक्टूबर, 2021 में ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की औपचारिक घोषणा की। इससे पहले वे भाजपा के विरुद्ध भागीदारी संकल्प मोर्चा बना रहे थे। लेकिन उन्हें लगा कि अकेले छोटे दल भाजपा को पराजित नहीं कर सकते। सपा को भी पूर्वांचल में भाजपा के गैर-यादव पिछड़े गठबंधन को तोड़ने के लिए राजभर की आवश्यकता थी।
ओमप्रकाश राजभर ने चुनाव अभियान में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। उन्होंने भाजपा पर पिछड़ों की उपेक्षा, महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा की खराब स्थिति और आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लागू न करने के आरोप लगाए। वे सपा गठबंधन के सबसे आक्रामक प्रचारकों में शामिल रहे।
2022 का चुनाव: सुभासपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
2022 के विधानसभा चुनाव में सुभासपा ने समाजवादी पार्टी गठबंधन के अंतर्गत 19 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटें जीतीं। उसे 12,52,925 मत और 1.36 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त हुआ। यह पार्टी के इतिहास का सर्वोच्च मत और सर्वोच्च मत-प्रतिशत था।
छह विजेता थे—
नेता विधानसभा क्षेत्र
ओमप्रकाश राजभर जहूराबाद
दूधराम महादेवा
हंसू राम बेल्थरा रोड
अब्बास अंसारी मऊ
जगदीश नारायण जफराबाद
त्रिवेणी राम/बेदी जखनियां
2017 की तुलना में पार्टी की सीटें चार से बढ़कर छह और मत लगभग छह लाख से बढ़कर साढ़े बारह लाख हो गए। मत-प्रतिशत 0.70 से बढ़कर 1.36 प्रतिशत हुआ। यह वृद्धि केवल अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण नहीं थी। सपा के मुस्लिम–यादव आधार और सुभासपा के राजभर–अति पिछड़ा आधार का अनेक क्षेत्रों में प्रभावी हस्तांतरण हुआ।
फिर भी गठबंधन सत्ता में नहीं आ सका। सपा गठबंधन ने कुल 125 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए ने 273 सीटों के साथ सरकार दोबारा बना ली। सुभासपा को छह सीटें मिलने के बावजूद ओमप्रकाश राजभर विपक्ष में रहे।
मुख्तार अंसारी परिवार और अब्बास अंसारी का टिकट
2022 में मऊ सदर सीट से मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी सुभासपा के टिकट पर लड़े और जीते। यह टिकट समाजवादी पार्टी–सुभासपा गठबंधन की सीट व्यवस्था का हिस्सा था। अब्बास अंसारी की जीत ने सुभासपा को एक मजबूत मुस्लिम-बहुल सीट दिलाई। लेकिन पार्टी की सामाजिक न्याय की छवि के साथ आपराधिक मामलों में घिरे अंसारी परिवार को टिकट देने पर गंभीर आलोचना भी हुई।
मई, 2025 में एक घृणास्पद भाषण मामले में अब्बास अंसारी को दो वर्ष की सजा सुनाई गई और 1 जून, 2025 को उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई। अगस्त, 2025 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि स्थगित कर दी, जिससे सदस्यता बहाली का कानूनी मार्ग खुला। हालांकि विधानसभा में उनकी वास्तविक और वर्तमान स्थिति सचिवालय की अधिसूचना तथा न्यायिक आदेशों के अनुपालन पर निर्भर रही।
यह प्रसंग सुभासपा के प्रतिनिधित्व की गणना में सावधानी की माँग करता है। 2022 के आम चुनाव में पार्टी ने निश्चित रूप से छह सीटें जीती थीं। बाद में किसी विधायक की सदस्यता समाप्त या बहाल होना मूल चुनावी जीत को नहीं बदलता। लेकिन वर्तमान संख्या को प्रभावित करता है।
अखिलेश यादव और ओमप्रकाश राजभर का गठबंधन क्यों टूटा?
2022 के चुनाव के बाद सपा और सुभासपा के बीच जल्द ही तनाव शुरू हो गया। ओमप्रकाश राजभर ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव केवल सीमित नेताओं से घिरे रहते हैं। जमीन पर पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाते। पिछड़े वर्गों के छोटे सहयोगी दलों को उचित सम्मान नहीं देते। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के नेताओं का आरोप था कि राजभर सार्वजनिक रूप से गठबंधन की आलोचना कर रहे हैं। भाजपा के संपर्क में हैं।
जुलाई 2022 के राष्ट्रपति चुनाव ने दरार को खुला बना दिया। समाजवादी पार्टी ने विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा का समर्थन किया, जबकि ओमप्रकाश राजभर ने एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन किया। इसके बाद सपा ने उन्हें राजनीतिक रूप से ‘स्वतंत्र’ होने का संकेत दिया और दोनों दलों का गठबंधन लगभग समाप्त हो गया। राजभर ने यह तर्क दिया कि द्रौपदी मुर्मू आदिवासी और वंचित समाज से आती हैं, इसलिए उनका समर्थन सामाजिक न्याय के अनुरूप है। सपा ने इसे भाजपा से निकटता का बहाना माना। इसके बाद ओमप्रकाश राजभर लगातार भाजपा के प्रति नरम और सपा के प्रति आक्रामक होते गए।
2022 में पार्टी के भीतर बड़ी टूट
सपा से संबंध टूटने के साथ-साथ सुभासपा के भीतर भी गंभीर विद्रोह हुआ। पार्टी के पुराने संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और ओमप्रकाश राजभर के लंबे समय के सहयोगी महेंद्र राजभर ने सितंबर, 2022 में पार्टी छोड़ दी।
उनके साथ दो दर्जन से अधिक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के जाने की खबर सामने आई। महेंद्र राजभर ने आरोप लगाया कि ओमप्रकाश राजभर पार्टी के मूल मिशन—गरीबों, वंचितों और राजभर समाज के अधिकार—से भटक गए हैं तथा संगठन को परिवार-केंद्रित बना रहे हैं।
सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी
27 सितंबर, 2022 को महेंद्र राजभर ने सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी की स्थापना की और उसके पहले अध्यक्ष बने। यह सुभासपा से निकली सबसे स्पष्ट और संगठित औपचारिक टूट थी। नई पार्टी ने भी महाराजा सुहेलदेव और राजभर स्वाभिमान की राजनीति पर दावा किया, जिससे एक ही सामाजिक आधार पर दो दल सामने आ गए।
महेंद्र राजभर का सुभासपा से अलग होना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वे केवल सामान्य पदाधिकारी नहीं। बल्कि संस्थापक नेताओं में गिने जाते थे और 2017 में मऊ सदर से मुख्तार अंसारी के विरुद्ध सुभासपा उम्मीदवार के रूप में मजबूत चुनाव लड़ चुके थे। उनके अलग होने से यह संदेश गया कि पार्टी के पुराने कैडर में नेतृत्व के केंद्रीकरण और परिवारवाद को लेकर असंतोष है।
हालांकि सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी अभी तक कोई बड़ी विधानसभा या लोकसभा सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। उसके गठन ने सुभासपा के राजभर मतों को चुनौती अवश्य दी। लेकिन ओमप्रकाश राजभर की व्यापक पहचान, विधायक दल, संसाधन और बड़े गठबंधनों तक पहुँच के सामने नया दल सीमित रहा।
शशि प्रताप सिंह और राष्ट्रीय समता पार्टी
2022 में ही सुभासपा के पूर्व प्रवक्ता और ओमप्रकाश राजभर के करीबी सहयोगी रहे शशि प्रताप सिंह ने भी पार्टी छोड़ दी। उन्होंने संगठन पर परिवारवाद, पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और राजनीतिक दिशा बदलने के आरोप लगाए। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय समता पार्टी नाम से अलग संगठन बनाया। राष्ट्रीय समता पार्टी ने समाजवादी पार्टी सहित भाजपा-विरोधी दलों से संवाद किया। लेकिन वह भी बड़े चुनावी प्रभाव वाली पार्टी नहीं बन सकी। इसके बावजूद शशि प्रताप सिंह और महेंद्र राजभर की अलग-अलग बगावतों ने यह दिखाया कि 2022 के बाद सुभासपा में असंतोष केवल गठबंधन को लेकर नहीं था। संगठन में ओमप्रकाश राजभर और उनके परिवार के बढ़ते प्रभाव पर भी प्रश्न उठ रहे थे।
परिवारवाद का प्रश्न
सुभासपा का गठन सामाजिक प्रतिनिधित्व और वंचित समुदायों की भागीदारी के नाम पर हुआ था। लेकिन समय के साथ पार्टी में ओमप्रकाश राजभर के परिवार की भूमिका बढ़ी। उनके पुत्र अरविंद राजभर पार्टी के प्रमुख राष्ट्रीय नेता बने और 2024 में घोसी से लोकसभा उम्मीदवार बनाए गए। दूसरे पुत्र अरुण राजभर संगठन और मीडिया में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। विरोधियों और पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने आरोप लगाया कि संगठन के प्रमुख पद और चुनावी अवसर परिवार के आसपास केंद्रित होते जा रहे हैं। ओमप्रकाश राजभर ने इन आरोपों का उत्तर देते हुए कहा कि उनके पुत्र लंबे समय से संगठन में काम कर रहे हैं। राजनीतिक परिवार से होना किसी व्यक्ति को स्वतः अयोग्य नहीं बनाता। लेकिन 2024 में एनडीए से मिली एकमात्र लोकसभा सीट पर अरविंद राजभर की उम्मीदवारी ने परिवारवाद की आलोचना को फिर तेज किया।
सुभासपा में बसपा या समाजवादी पार्टी की तरह चुनाव आयोग के समक्ष दो बड़े गुटों द्वारा मूल पार्टी और चिह्न का दावा करने वाली स्थिति कभी नहीं बनी। इसलिए 2022 की घटनाएँ कानूनी अर्थ में मूल पार्टी का विभाजन नहीं थीं। लेकिन महेंद्र राजभर और शशि प्रताप सिंह द्वारा अलग-अलग दल बनाना संगठनात्मक और सामाजिक आधार की वास्तविक टूट अवश्य थी।
जुलाई 2023 में भाजपा–एनडीए में वापसी
16 जुलाई, 2023 को ओमप्रकाश राजभर ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद भाजपा-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में लौटने की घोषणा की। भाजपा ने इसे पूर्वांचल में गैर-यादव पिछड़े मतों को मजबूत करने की रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि राजभर ने कहा कि सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग और अपने समुदाय के विकास के लिए सत्ता के साथ मिलकर काम करना आवश्यक है।
यह राजनीतिक वापसी उल्लेखनीय थी क्योंकि 2019 से 2022 तक ओमप्रकाश राजभर भाजपा और योगी सरकार के सबसे तीखे आलोचकों में रहे थे। 2022 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से भाजपा को हराने और अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का अभियान चलाया था। लेकिन सपा से गठबंधन टूटने के एक वर्ष के भीतर वे फिर एनडीए में लौट आए।आलोचकों ने इसे अवसरवादी राजनीति कहा। समर्थकों ने इसे एक छोटे दल की व्यावहारिक गठबंधन रणनीति बताया। सुभासपा का तर्क रहा कि उसकी प्राथमिकता किसी बड़े दल से वैचारिक स्थायी शत्रुता नहीं। बल्कि अपने सामाजिक आधार के लिए सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करना है।
ओमप्रकाश राजभर दूसरी बार मंत्री बने
5 मार्च, 2024 को उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल के विस्तार में ओमप्रकाश राजभर को दोबारा कैबिनेट मंत्री बनाया गया। इस बार उन्हें पंचायती राज, अल्पसंख्यक कल्याण, हज और वक्फ से संबंधित दायित्व दिए गए। इस प्रकार 2019 में मंत्रिमंडल से बर्खास्त होने के लगभग पाँच वर्ष बाद वे उसी योगी आदित्यनाथ सरकार में दोबारा शामिल हुए। उनकी वापसी ने यह स्थापित किया कि भाजपा सुभासपा को केवल एक विधायक दल के रूप में नहीं। बल्कि पूर्वांचल में राजभर समाज तक पहुँच के माध्यम के रूप में देखती है। दूसरी ओर सुभासपा को मंत्री पद, विधान परिषद सीट और 2024 में लोकसभा सीट मिली।
2024 लोकसभा चुनाव: घोसी से पहली वास्तविक चुनौती
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने एनडीए गठबंधन के अंतर्गत सुभासपा को घोसी सीट दी। ओमप्रकाश राजभर के पुत्र और पार्टी नेता अरविंद राजभर उम्मीदवार बने। उन्हें 3,40,188 मत और घोसी सीट पर 29.57 प्रतिशत वोट मिला। लेकिन समाजवादी पार्टी के राजीव राय ने 5,03,131 मत प्राप्त कर उन्हें 1,62,943 मतों से पराजित कर दिया।
लोकसभा चुनाव स्थिति/मोर्चा लड़ी सीटें जीती सीटें प्राप्त मत मत-प्रतिशत*
2004 स्वतंत्र लगभग 14 0 2,75,267 लगभग 0.07% राष्ट्रीय
2009 अधिकार मंच लगभग 20 0 3,19,307 लगभग 0.12% राष्ट्रीय
2014 एकता मंच लगभग 13 0 1,18,947 लगभग 0.15%
2019 भाजपा से अलग/स्वतंत्र अनेक सीटें 0 लगभग 2,77,260 लगभग 0.30% उत्तर प्रदेश
2024 भाजपा–एनडीए 1 0 3,40,188
अरविंद राजभर की हार ने पार्टी के सामने कई प्रश्न खड़े किए। पहला, क्या भाजपा का पूरा मत सुभासपा उम्मीदवार को हस्तांतरित हुआ? दूसरा, क्या समाजवादी पार्टी का पीडीए अभियान राजभर और अन्य पिछड़े मतों में सेंध लगाने में सफल रहा? तीसरा, क्या परिवार के सदस्य को टिकट देने से स्थानीय संगठन और एनडीए कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हुआ? घोसी परिणाम से यह भी स्पष्ट हुआ कि गठबंधन के सहारे विधानसभा की सीमित और चुनी हुई सीटें जीतना लोकसभा सीट जीतने से अलग चुनौती है। लोकसभा क्षेत्र में कई विधानसभा क्षेत्रों, विविध जातीय समूहों और बड़े राजनीतिक नैरेटिव को जोड़ना पड़ता है। सुभासपा अब तक यह स्तर हासिल नहीं कर सकी है...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें


