SBSP Political Journey: राजभर राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी ओपी राजभर, कैसे बनाई अपनी सियासी ताकत?

Suheldev Bharatiya Samaj Party Political Journey: सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) का पूरा इतिहास जानिए। ओमप्रकाश राजभर की राजनीतिक यात्रा, भाजपा-सपा गठबंधन, चुनावी प्रदर्शन, विधायक, मंत्री पद और 2027 की रणनीति। राजभर राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी ओपी राजभर? गठबंधन बदलकर कैसे बनाई सियासी ताकत

Yogesh Mishra
Published on: 9 Aug 2026 5:02 PM IST

लोकसभा में कितने लोग पहुँचे?

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का कोई भी उम्मीदवार अब तक लोकसभा चुनाव नहीं जीत सका है।

2004 — शून्य

2009 — शून्य

2014 — शून्य

2019 — शून्य

2024 — शून्य

इसलिए—

लोकसभा में पहुँचे अलग-अलग व्यक्ति: शून्य
लोकसभा की चुनाव-वार जीती सीटों का कुल योग: शून्य

2024 में अरविंद राजभर घोसी में दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन निर्वाचित नहीं हुए।

विधानसभा में कितने लोग पहुँचे?

2017 में चार विधायक

1. ओमप्रकाश राजभर—जहूराबाद

2. रामानंद बौद्ध—रामकोला

3. त्रिवेणी राम—जखनियां

4. कैलाशनाथ सोनकर—अजगरा

2022 में छह विधायक

1. ओमप्रकाश राजभर—जहूराबाद

2. दूधराम—महादेवा

3. हंसू राम—बेल्थरा रोड

4. अब्बास अंसारी—मऊ

5. जगदीश नारायण—जफराबाद

6. त्रिवेणी राम/बेदी—जखनियां

इस प्रकार आम विधानसभा चुनावों में पार्टी की सीट-विजय का योग—4 + 6 = 10

है। यह दस अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या नहीं है, क्योंकि ओमप्रकाश राजभर और जखनियां से पार्टी के प्रतिनिधि दो चुनावों में दोबारा निर्वाचित हुए। अलग-अलग निर्वाचित व्यक्तियों की संख्या चुनाव-वार योग से कम है।

राज्यसभा में प्रतिनिधित्व

सुभासपा का कोई नेता अब तक पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में राज्यसभा नहीं पहुँचा है। पार्टी की विधानसभा संख्या कभी इतनी नहीं रही कि वह स्वतंत्र रूप से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित करा सके। भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद उसे अभी तक राज्यसभा सीट नहीं दी गई।

इसलिए—

राज्यसभा में पहुँचे सदस्य: शून्य
राज्यसभा कार्यकालों का कुल योग: शून्य

विधान परिषद में प्रतिनिधित्व

2024 में भाजपा–एनडीए गठबंधन ने सुभासपा को उत्तर प्रदेश विधान परिषद में एक सीट दी। पार्टी की ओर से विच्छेलाल राजभर निर्वाचित हुए। आधिकारिक विधान परिषद सदस्य सूची में उनका नाम सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के सदस्य के रूप में दर्ज है और उनका कार्यकाल मई 2030 तक है।

इस प्रकार—

विधान परिषद में पहुँचे अलग-अलग सदस्य: एक—विच्छेलाल राजभर
वर्तमान विधान परिषद संख्या: एक

यह पार्टी के लिए महत्वपूर्ण संस्थागत उपलब्धि थी। क्योंकि इससे विधानसभा के अतिरिक्त उच्च सदन में भी उसका प्रतिनिधित्व बना।

सुभासपा कब किसके साथ चुनाव लड़ी?

वर्ष/चुनाव सहयोगी या मोर्चा परिणाम

2004 लोकसभा स्वतंत्र कोई सीट नहीं

2007 विधानसभा मुख्यतः स्वतंत्र 97 में शून्य

2009 लोकसभा अधिकार मंच कोई सीट नहीं

2012 विधानसभा स्वतंत्र 52 में शून्य

2014 लोकसभा एकता मंच कोई सीट नहीं

2017 विधानसभा भाजपा, अपना दल (सोनेलाल)—एनडीए आठ में चार

2019 लोकसभा भाजपा से अलग; स्वतंत्र उम्मीदवार कोई सीट नहीं

2020 बिहार विधानसभा छोटे दलों का ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं

2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा समाजवादी पार्टी, रालोद और अन्य सहयोगी 19 में छह

2024 लोकसभा भाजपा–एनडीए घोसी की एक सीट, हार

2025 बिहार विधानसभा एनडीए में सीट न मिलने पर स्वतंत्र प्रयास संगठनात्मक विस्तार का प्रया

सुभासपा के चुनावी इतिहास से स्पष्ट है कि पार्टी ने स्वतंत्र रूप से बहुत मत तो प्राप्त किए। लेकिन कोई विधानसभा या लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। उसकी सभी विधानसभा सफलताएँ बड़े गठबंधन में आईं—2017 में भाजपा के साथ और 2022 में समाजवादी पार्टी के साथ।

गठबंधन बदलने की राजनीति

ओमप्रकाश राजभर की राजनीति की सबसे विशिष्ट विशेषता गठबंधनों के प्रति लचीलापन है। वे भाजपा के साथ सरकार में रहे। भाजपा से अलग होकर उसके विरुद्ध चुनाव लड़े। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया। फिर उससे अलग होकर दोबारा भाजपा में लौट आए। इस कारण आलोचक उन्हें अवसरवादी नेता कहते हैं। लेकिन छोटे क्षेत्रीय दलों की दृष्टि से इस रणनीति का दूसरा पक्ष भी है। राजभर समाज पूरे उत्तर प्रदेश में समान रूप से फैला हुआ नहीं है। पार्टी का स्वतंत्र राज्यव्यापी मत लगभग एक से डेढ़ प्रतिशत के बीच रहा है। इतने मत से अकेले सत्ता अथवा बड़ी संख्या में सीटें हासिल करना कठिन है। इसलिए सुभासपा अपने सामाजिक मत को उस बड़े दल के साथ जोड़ती है जो उसे सीटें, पद और राजनीतिक हिस्सेदारी देने को तैयार हो।

2017 में भाजपा ने आठ सीटें देकर चार विधायक और मंत्री पद दिलाया। 2022 में सपा ने अधिक सीटें दीं और पार्टी छह विधायक जीत गई। 2023 के बाद भाजपा ने फिर मंत्री पद, विधान परिषद सीट और लोकसभा सीट दी। इस प्रकार गठबंधन बदलना सुभासपा के लिए वैचारिक अस्थिरता के साथ-साथ राजनीतिक सौदेबाजी का साधन भी रहा है।

सुभासपा के उभार के प्रमुख कारण

राजभर समाज की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान—सुभासपा ने राजभर समुदाय से कहा कि वह भाजपा, सपा, बसपा या कांग्रेस का केवल सहायक वोट न बने। बल्कि अपना नेतृत्व और राजनीतिक दल विकसित करे। यह संदेश पूर्वांचल में प्रभावी हुआ।

अति पिछड़ा वर्ग के भीतर हिस्सेदारी का प्रश्न—पार्टी ने पिछड़ा वर्ग को एक समान समूह मानने के बजाय उसके भीतर मजबूत और कमजोर जातियों के अंतर को राजनीतिक मुद्दा बनाया। आरक्षण के उप-वर्गीकरण ने उसे यादव-केंद्रित सपा और व्यापक ओबीसी राजनीति करने वाली भाजपा—दोनों से अलग पहचान दी।

ओमप्रकाश राजभर की आक्रामक वक्तृत्व शैली—राजभर सरल ग्रामीण भाषा, तीखे व्यंग्य और सीधे राजनीतिक आरोपों के कारण मीडिया और जनता में लगातार दिखाई देते रहे। छोटी पार्टी होने के बावजूद वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े नेताओं जितनी चर्चा उत्पन्न करते हैं।

पूर्वांचल में केंद्रित सामाजिक आधार—पार्टी का मत पूरे राज्य में बिखरा हुआ नहीं। बल्कि कुछ जिलों में अपेक्षाकृत केंद्रित है। इस कारण गठबंधन में सही सीटें मिलने पर वह जीत सकती है।

बड़े दलों के लिए उपयोगिता—भाजपा को गैर-यादव पिछड़ा और सपा को यादवों से बाहर पिछड़ा विस्तार चाहिए। दोनों के लिए सुभासपा उपयोगी सहयोगी बनती है। यही स्थिति पार्टी की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाती है।

सत्ता और विपक्ष दोनों का अनुभव—पार्टी ने भाजपा सरकार में रहते हुए सत्ता का और सपा गठबंधन में रहते हुए विपक्ष का अनुभव प्राप्त किया। इससे उसके कार्यकर्ताओं और नेतृत्व को राजनीतिक पहचान मिली।

पार्टी की प्रमुख कमजोरियाँ

राजभर-केंद्रित सीमित आधार—पार्टी सामाजिक न्याय और सभी अति पिछड़ों की बात करती है। लेकिन उसकी मुख्य पहचान राजभर समुदाय तक सीमित है। अन्य पिछड़ी जातियों का स्थायी समर्थन अभी नहीं बन पाया।

स्वतंत्र चुनावी सफलता का अभाव—2004 से 2014 तक कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ने के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसकी सभी विधानसभा जीत बड़े सहयोगियों के वोट हस्तांतरण से जुड़ी हैं।

बार-बार गठबंधन बदलना—भाजपा से सपा और फिर भाजपा में वापसी से पार्टी की वैचारिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं। मतदाता यह तय नहीं कर पाता कि पार्टी की स्थायी राजनीतिक दिशा क्या है।

परिवारवाद—ओमप्रकाश राजभर के पुत्रों की प्रमुख संगठनात्मक भूमिका और अरविंद राजभर को 2024 का लोकसभा टिकट दिए जाने से परिवार-केंद्रित नेतृत्व की आलोचना बढ़ी।

पुराने नेताओं का अलग होना—महेंद्र राजभर और शशि प्रताप सिंह जैसे नेताओं ने अलग दल बनाए। इससे पार्टी के संस्थापक कैडर और व्यापक राजभर नेतृत्व के भीतर विभाजन हुआ।

उत्तर प्रदेश से बाहर नगण्य प्रभाव—बिहार सहित अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने की घोषणाओं के बावजूद पार्टी का वास्तविक संगठन पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित है।

विवादित उम्मीदवार—अब्बास अंसारी जैसे उम्मीदवार को टिकट देने से पार्टी को सीट तो मिली। लेकिन अपराध, परिवारवादी प्रभाव और नैतिक राजनीति के प्रश्नों पर आलोचना भी झेलनी पड़ी।

सबसे सफल चुनाव कौन-सा रहा?

सीटों के आधार पर

2022 का विधानसभा चुनाव पार्टी का सबसे सफल चुनाव था—

19 सीटों पर चुनाव;

छह सीटों पर जीत;

12,52,925 मत;

1.36 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट।

सफलता दर के आधार पर

2017 में पार्टी ने आठ में चार सीटें जीतीं—50 प्रतिशत सफलता दर। 2022 में 19 में छह सीटें जीतीं—लगभग 31.6 प्रतिशत सफलता दर। इसलिए सीट संख्या में 2022 और प्रत्याशी सफलता दर में 2017 श्रेष्ठ रहा।

लोकसभा में सर्वोच्च प्रदर्शन

2024 में अरविंद राजभर ने अकेली घोसी सीट पर 3,40,188 मत और 29.57 प्रतिशत वोट प्राप्त किया। यह किसी सुभासपा लोकसभा उम्मीदवार का अब तक का सबसे मजबूत व्यक्तिगत प्रदर्शन था।लेकिन सीट नहीं मिली।

कुल प्रतिनिधित्व का संक्षिप्त लेखा

लोकसभा

जीती सीटें: शून्य

अलग-अलग सांसद: शून्य

उत्तर प्रदेश विधानसभा

2017: चार विधायक

2022: छह विधायक

चुनाव-वार कुल जीत: दस

अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या: दोबारा निर्वाचित नेताओं के कारण दस से कम।

राज्यसभा

सदस्य: शून्य

विधान परिषद

सदस्य: एक—विच्छेलाल राजभर

वर्तमान कार्यकाल: 2024–2030

उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल

ओमप्रकाश राजभर: 2017–2019

ओमप्रकाश राजभर: मार्च 2024 से पुनः कैबिनेट मंत्री

पार्टी से निकले प्रमुख दल

राष्ट्रीय समता पार्टी—शशि प्रताप सिंह

सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी—महेंद्र राजभर

सुभासपा के इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास

सुभासपा का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि पार्टी ने स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने के लिए जन्म लिया। लेकिन स्वतंत्र चुनावों में आज तक कोई विधानसभा या लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। उसकी सभी विधानसभा सफलताएँ उन्हीं बड़े दलों के साथ आईं जिन पर वह समय-समय पर पिछड़ों की उपेक्षा का आरोप लगाती रही।

दूसरा विरोधाभास यह है कि 2017 में भाजपा के साथ उसे केवल 0.70 प्रतिशत वोट पर चार सीटें मिलीं, जबकि 2007 में स्वतंत्र रूप से 0.94 प्रतिशत वोट प्राप्त करने पर एक भी सीट नहीं मिली। इसी तरह 2022 में 1.36 प्रतिशत वोट पर छह सीटें मिलीं। इससे सिद्ध होता है कि छोटे दल के लिए कुल वोट से अधिक महत्वपूर्ण उसका गठबंधन, सीट चयन और सहयोगी दल का वोट हस्तांतरण है।

तीसरा विरोधाभास यह है कि पार्टी सामाजिक न्याय और परिवारों के राजनीतिक वर्चस्व का विरोध करती रही। लेकिन स्वयं उस पर परिवार-केंद्रित संगठन के आरोप लगे और इसी कारण कुछ पुराने नेता अलग हो गए।

चौथा विरोधाभास महाराजा सुहेलदेव की प्रतीकात्मक राजनीति में है। सुभासपा उन्हें वंचित और पिछड़े समाज के नायक के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि भाजपा उन्हें हिंदू प्रतिरोध और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। दोनों दल एक ही ऐतिहासिक प्रतीक का अलग राजनीतिक अर्थ लगाते हुए भी गठबंधन में हैं।

शून्य सीटों से दो बार सत्ता तक, लेकिन स्वतंत्र शक्ति बनने की चुनौती कायम

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की यात्रा को पाँच चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण 2002 से 2014 तक स्वतंत्र संगठन निर्माण और लगातार चुनावी असफलताओं का था। पार्टी ने लाखों मत प्राप्त किए। लेकिन कोई सीट नहीं जीती। दूसरा चरण 2017 से 2019 तक भाजपा गठबंधन, चार विधायक और पहली बार मंत्री पद का था। तीसरा चरण भाजपा-विरोध, छोटे दलों के मोर्चे और समाजवादी पार्टी से निकटता का रहा। चौथा चरण 2022 में छह विधायक और अब तक के सर्वोच्च मत-प्रतिशत की सफलता का था। पाँचवाँ चरण 2022 के बाद सपा से अलगाव, पार्टी के भीतर महेंद्र राजभर और शशि प्रताप सिंह की बगावत तथा 2023 में भाजपा–एनडीए में वापसी का है।

ओमप्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह सिद्ध किया कि लगभग एक से डेढ़ प्रतिशत राज्यव्यापी वोट वाला दल भी सही सामाजिक और क्षेत्रीय केंद्रण के कारण बड़े दलों से सीटें, मंत्री पद और विधान परिषद प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकता है। उन्होंने राजभर समाज को स्वतंत्र राजनीतिक आवाज दी और अति पिछड़ा आरक्षण के उप-वर्गीकरण को राज्य की मुख्य राजनीतिक बहसों में शामिल किया।

इसके बावजूद पार्टी की सीमाएँ स्पष्ट हैं। वह अभी तक कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। उसका स्वतंत्र चुनावी प्रदर्शन कमजोर रहा है। राजभर समाज के भीतर भी भाजपा, सपा, बसपा और अलग हुए छोटे दलों की उपस्थिति है। परिवारवाद, गठबंधन परिवर्तन और पुराने नेताओं के अलग होने से संगठनात्मक विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।

2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सुभासपा के लिए अगली निर्णायक परीक्षा होगा। पार्टी इस समय भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए में है और सीटों के शीघ्र बँटवारे की माँग कर रही है। उसका लक्ष्य 2017 की चार और 2022 की छह सीटों से आगे बढ़ना होगा। लेकिन इसके लिए उसे यह सिद्ध करना पड़ेगा कि वह केवल ओमप्रकाश राजभर और उनके परिवार की पार्टी नहीं। बल्कि राजभर समुदाय से आगे बढ़कर अति पिछड़ों, दलितों, गरीब किसानों, युवाओं और अल्पसंख्यकों का व्यापक राजनीतिक मंच बन सकती है।

सुभासपा की अब तक की यात्रा का सार यही है—स्वतंत्र मत ने पहचान दी, गठबंधन ने सीटें दीं और सत्ता ने प्रभाव दिया। लेकिन स्थायी वैचारिक और संगठनात्मक विस्तार अभी अधूरा है।

आँकड़ों संबंधी सावधानी

पुराने चुनावों में सुभासपा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल के रूप में बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारती थी। कुछ स्रोत लोकसभा का मत-प्रतिशत अखिल भारतीय स्तर पर और कुछ केवल उत्तर प्रदेश स्तर पर देते हैं; इसलिए रिपोर्ट में मतों की संख्या के साथ उसका स्तर स्पष्ट किया गया है। 2022 में सुभासपा की लड़ी सीटों की संख्या कुछ राजनीतिक रिपोर्टों में 17 और अंतिम निर्वाचन तालिका में 19 दर्ज मिलती है।यहाँ अंतिम पार्टीवार परिणाम को प्राथमिकता दी गई है। अब्बास अंसारी की सदस्यता पर सजा, अयोग्यता और बाद में न्यायिक स्थगन के कारण वर्तमान विधायक संख्या सामान्य चुनाव की छह सीटों से अलग दिखाई दे सकती है। विधान परिषद में विच्छेलाल राजभर की सदस्यता आधिकारिक परिषद अभिलेख से पुष्ट है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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