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Varanasi News: काशी में स्मार्ट सिटी का दावा, हकीकत में गंदगी और दलदल की राजधानी!
Varanasi News: आज काशी के अधिकतर मोहल्ले – चाहे बजरडीहा हो या सरैया, जलालीपुरा हो या पक्के महाल – बदबू, गंदगी और दलदल के प्रतीक बन चुके हैं।
काशी में 'स्मार्ट सिटी' का पोस्टर और ज़मीन पर ‘गंदगी की राजधानी (photo: social media )
Varanasi News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी से संसद में प्रतिनिधित्व करते हुए ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं। इन वर्षों में काशी को 'क्योटो' बनाने से लेकर 'स्मार्ट सिटी' में तब्दील करने तक के तमाम वादे हुए, बजट की बारिश भी हुई और घोषणाओं की गूंज भी, लेकिन यदि आप काशी की गलियों से गुज़र जाएं, तो 'स्मार्ट सिटी' नहीं, बल्कि 'सड़ांध सिटी' की असलियत से साक्षात्कार हो जाएगा।
सड़कों पर कीचड़, मोहल्लों में बदबू – विकास की कहानी सिर्फ काग़ज़ पर
आज काशी के अधिकतर मोहल्ले – चाहे बजरडीहा हो या सरैया, जलालीपुरा हो या पक्के महाल – बदबू, गंदगी और दलदल के प्रतीक बन चुके हैं। बजरडीहा में लगभग 1.5 किलोमीटर लंबी सड़क कीचड़ और सीवर के पानी में डूबी हुई है, लेकिन अधिकारी अब भी “विकास कार्य प्रगति पर है” की रटी-रटाई स्क्रिप्ट सुना रहे हैं।
जलालीपुरा और सरैया की गलियाँ अब नालों में तब्दील हो चुकी हैं। वहाँ के निवासियों को न तो आवागमन की सुविधा है, न ही स्वास्थ्य की। पक्के महाल, जो काशी का सांस्कृतिक और धार्मिक हृदयस्थल माना जाता है, अब कूड़े और करप्शन का प्रतीक बन गया है।
दालमंडी: सैकड़ों वर्षों की आजीविका पर प्रशासनिक बुलडोज़र
दालमंडी, जो कभी पूर्वांचल, बिहार और नेपाल तक के व्यापारियों की आर्थिक जीवनरेखा थी, अब प्रशासनिक दमन और अनदेखी की बली चढ़ चुका है। नालियों से गंदगी उफान मार रही है, सड़कों की हालत दलदल से बदतर है और व्यापारियों को खदेड़ा जा रहा है — विकास के नाम पर विस्थापन का खेल रचा जा रहा है।
यह वही बनारस है, जहाँ विकास के नाम पर करोड़ों रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन उनकी जांच न तो ज़मीनी स्तर पर हुई और न ही जनता को कोई पारदर्शिता दी गई। अब सवाल है —
"कहां गया वो बजट? किस जेब में समा गया वो विकास?"
अब तो बीजेपी नेताओं के मोहल्ले भी दुर्गंध से त्रस्त हैं
स्थिति इतनी विषम हो चुकी है कि भारतीय जनता पार्टी के अपने नेता भी अब अपने ही मोहल्लों की बदबू से परेशान हैं। जिन्हें कभी 'मॉडल वार्ड' कहा जाता था, आज वहाँ भी कूड़े के ढेर और कीचड़ की फिसलन पसरी है। ये हाल तब है जब देश के सबसे ताक़तवर नेता का संसदीय क्षेत्र है यह शहर।
महानगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे ने इस पूरी प्रशासनिक विफलता के खिलाफ संगठित और सशक्त आवाज़ उठाई है। उन्होंने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विधि प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष अधिवक्ता अशोक सिंह के माध्यम से वाराणसी जिलाधिकारी को औपचारिक पत्र सौंपा, जिसमें प्रधानमंत्री के आगामी दौरे के दौरान उनसे मुलाकात कर काशी की दुर्दशा को प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करने की मांग की गई तथा विकास के नाम पर काशी को बर्बादी की ओर धकेला गया है। जनता की गाढ़ी कमाई को किन अफसरों ने डकारा, इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। प्रधानमंत्री को अपने ही क्षेत्र की हकीकत से रूबरू कराना अब ज़रूरी हो गया है।"
पोस्टर पर चमक, ज़मीन पर सड़ांध
काशी की जनता आज पूछ रही है:
“प्रधानमंत्री जी, अगर यही क्योटो है तो फिर नरक कैसा होता है?”
“दलमंडी से लेकर बजरडीहा तक, क्या इन मोहल्लों के लोग स्मार्ट सिटी के नागरिक नहीं?”
सत्ता अब कैमरों की चमक में जी रही है और ज़मीन पर सड़ांध फैली है। लेकिन जब जनता की सहनशीलता जवाब देने लगे, तब इतिहास बदलता है। महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे जैसे नेतृत्वकर्ता उसी बदलाव की चेतावनी दे रहे हैं।
यह लेख जनता की उस आवाज़ का प्रतिनिधित्व करता है जो सालों से विकास के नाम पर ठगी जा रही है। यदि कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री से मिलने का अवसर मिलता है, तो संभवतः काशी की सड़ांध पर दिल्ली की दीवारों में भी हलचल होगी।


