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एआई ने गणित की दुनिया में मचाई हलचल, 372 समूहों में सैकड़ों नए परिणाम जारी
New York: ओपनएआई ने एआई की मदद से तैयार 722 गणितीय शोध-पांडुलिपियां जारी की हैं। इन्हें 372 परिणाम-समूहों में बांटा गया है। अब गणितज्ञों के सामने इन प्रमाणों के सत्यापन की चुनौती है।
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New York: गणित के जिन सवालों को सुलझाने में दुनिया के बड़े-बड़े गणितज्ञ वर्षों लगा देते हैं, उन पर अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ घंटों में नए समाधान प्रस्तुत कर रही है। अमेरिकी कंपनी ओपनएआई ने अपने एक अत्याधुनिक, अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराए गए एआई मॉडल से तैयार 722 गणितीय शोध-पांडुलिपियां जारी की हैं। इन्हें 372 परिणाम-समूहों में व्यवस्थित किया गया है। इनमें बीजगणित, संख्या सिद्धांत, ज्यामिति, सैद्धांतिक कंप्यूटर विज्ञान, गणितीय तर्कशास्त्र और दूसरे क्षेत्रों की अनेक पुरानी समस्याओं के समाधान के दावे तथा महत्वपूर्ण नए निष्कर्ष शामिल हैं। इस घोषणा ने गणित की दुनिया में उत्साह के साथ एक गंभीर बहस भी छेड़ दी है। सवाल केवल यह नहीं है कि मशीन कितनी कठिन गणित कर सकती है, बल्कि यह भी है कि उसके प्रस्तुत किए गए प्रमाणों को कौन जांचेगा, उन्हें समझेगा कौन और गणितीय खोज का श्रेय किसे मिलेगा।
ओपनएआई ने छह अक्टूबर 2026 को इन शोध परिणामों को सार्वजनिक किया। कंपनी के अनुसार यह काम उसके एक ऐसे आंतरिक एआई मॉडल की सहायता से हुआ है, जिसका विकास अभी जारी है। इस मॉडल को लगभग चार हजार गणितीय समस्याओं पर आजमाया गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार एक परिणाम तक पहुंचने में औसतन लगभग तीन घंटे की चैटजीपीटी प्रो स्तर की गणनात्मक क्षमता का इस्तेमाल हुआ। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कठिन समस्या तीन घंटे में हल हो गई। अलग-अलग सवालों की जटिलता, उन पर किए गए प्रयास और उपयोग किए गए संसाधन अलग हो सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि एआई अब केवल पहले से उपलब्ध गणितीय ज्ञान के आधार पर उत्तर देने तक सीमित नहीं रह गया है। वह ऐसे नए प्रमाण और गणितीय तर्क भी प्रस्तुत कर रहा है, जिनकी पहले व्यापक रूप से जानकारी नहीं थी।
गणित में किसी समस्या का समाधान केवल उसका उत्तर बता देना नहीं होता। इसके लिए ऐसा तार्किक प्रमाण देना पड़ता है, जिससे यह स्थापित हो सके कि प्रस्तुत निष्कर्ष निर्धारित शर्तों के अंतर्गत हमेशा सही है। उदाहरण के लिए, किसी समीकरण के कुछ विशेष मानों के लिए उत्तर निकाल लेना और यह सिद्ध करना कि वह निष्कर्ष सभी स्वीकार्य मानों पर लागू होता है, दो अलग उपलब्धियां हैं। गणितज्ञ किसी प्रमाण में प्रयुक्त प्रत्येक धारणा, तर्क और निष्कर्ष की जांच करते हैं। इसी कारण ओपनएआई की सैकड़ों शोध-पांडुलिपियों को जारी किया जाना एक बड़ी घटना जरूर है, लेकिन उन सभी को अंतिम रूप से प्रमाणित गणितीय खोज मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
इस घोषणा की पृष्ठभूमि में सितंबर में सामने आया नेवियर-स्टोक्स समीकरण का विवाद भी है। आठ सितंबर को ओपनएआई ने दावा किया था कि उसके एआई मॉडल ने द्रवों की गति से जुड़ी नेवियर-स्टोक्स समस्या का समाधान प्रस्तुत किया है। यह गणित की प्रसिद्ध मिलेनियम पुरस्कार समस्याओं में शामिल है। क्ले मैथमेटिक्स इंस्टीट्यूट ने वर्ष 2000 में सात अत्यंत कठिन समस्याओं के लिए दस-दस लाख डॉलर के पुरस्कार घोषित किए थे। नेवियर-स्टोक्स की समस्या इस बात से जुड़ी है कि तीन आयामों में द्रव की गति का वर्णन करने वाले समीकरणों के सुचारु समाधान हमेशा बने रहते हैं या कुछ परिस्थितियों में उनमें ऐसी गणितीय विलक्षणता पैदा हो सकती है, जहां सामान्य समाधान की नियमितता समाप्त हो जाती है।
ओपनएआई ने सितंबर में दावा किया कि उसके मॉडल ने ऐसी परिस्थिति का गणितीय प्रमाण तैयार किया है, जिसमें प्रारंभ में सुचारु द्रव गति सीमित समय के भीतर विलक्षणता तक पहुंच सकती है। कंपनी ने इसके साथ एक औपचारिक कंप्यूटर-सत्यापन योग्य प्रमाण भी प्रस्तुत किया। यह दावा इसलिए असाधारण था क्योंकि नेवियर-स्टोक्स की समस्या दशकों से आधुनिक गणित की सबसे कठिन चुनौतियों में गिनी जाती रही है। लेकिन कंपनी का दावा और गणितीय समुदाय द्वारा पूर्ण स्वीकृति दो अलग चरण हैं। मिलेनियम पुरस्कार की औपचारिक मान्यता के लिए संबंधित संस्थान की निर्धारित समीक्षा प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है। ओपनएआई ने भी कहा है कि वह इस परिणाम के लिए पुरस्कार का दावा नहीं कर रही है।
अक्टूबर में जारी नए परिणामों का दायरा नेवियर-स्टोक्स से कहीं अधिक व्यापक है। इनमें संख्या सिद्धांत, बीजगणितीय ज्यामिति, टोपोलॉजी और सैद्धांतिक कंप्यूटर विज्ञान जैसे विषय शामिल हैं। संख्या सिद्धांत में पूर्णांकों, अभाज्य संख्याओं और उनके बीच संबंधों का अध्ययन होता है। बीजगणितीय ज्यामिति में समीकरणों से बनने वाली ज्यामितीय संरचनाओं को समझा जाता है। टोपोलॉजी वस्तुओं के उन गुणों का अध्ययन करती है जो उन्हें लगातार खींचने या मोड़ने पर भी बने रहते हैं। सैद्धांतिक कंप्यूटर विज्ञान में यह समझने का प्रयास किया जाता है कि कौन-सी समस्याएं गणना के माध्यम से हल की जा सकती हैं और उन्हें हल करने के लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता होगी। इन क्षेत्रों में नए परिणाम भविष्य के गणितीय शोध और कुछ तकनीकी क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
जारी सामग्री में रीमान परिकल्पना, हॉज अनुमान और बर्च-स्विनर्टन-डायर अनुमान जैसी प्रसिद्ध समस्याओं से संबंधित आंशिक या विशेष परिस्थितियों में प्राप्त परिणामों की भी चर्चा है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी प्रसिद्ध समस्या के विशेष रूप को हल करना या उससे जुड़ा नया परिणाम निकालना, उस पूरी समस्या का समाधान कर देना नहीं होता। रीमान परिकल्पना जैसी समस्या का पूर्ण समाधान गणित की ऐतिहासिक उपलब्धि होगा, लेकिन वर्तमान घोषणा के आधार पर ऐसा दावा करना उचित नहीं है। ओपनएआई के परिणामों में कुछ समस्याओं के नए रूपों, विशेष परिस्थितियों और संबंधित प्रमेयों पर प्रगति शामिल है।
कंपनी ने शोध सामग्री को सार्वजनिक संग्रह में उपलब्ध कराया है, ताकि दूसरे गणितज्ञ उसे पढ़ सकें, त्रुटियों की पहचान कर सकें और जहां आवश्यक हो वहां संशोधन सुझा सकें। कुछ प्रमाणों को लीन नामक औपचारिक गणितीय भाषा में भी प्रस्तुत किया गया है। लीन ऐसी प्रणाली है जिसमें गणितीय तर्कों को औपचारिक नियमों के आधार पर कंप्यूटर से जांचा जा सकता है। इससे प्रमाण की तार्किक संरचना की पुष्टि करने में सहायता मिलती है। हालांकि कंप्यूटर से किसी औपचारिक प्रमाण का सत्यापन होना और उस परिणाम के व्यापक गणितीय महत्व को समझना अलग बातें हैं। किसी प्रमाण में इस्तेमाल की गई परिभाषाएं और मान्यताएं मूल समस्या से सही ढंग से मेल खाती हैं या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण है।
इतनी बड़ी संख्या में गणितीय परिणाम एक साथ जारी करने से एक नई समस्या पैदा हुई है। यदि किसी वैज्ञानिक पत्रिका में एक या दो नए शोधपत्र आते हैं तो संबंधित विशेषज्ञ उनकी समीक्षा कर सकते हैं। लेकिन जब एक ही एआई प्रणाली सैकड़ों शोध-पांडुलिपियां तैयार कर दे तो उनकी जांच के लिए गणितज्ञों को कितना समय देना होगा? क्या शोध समुदाय के पास इतनी क्षमता है कि वह तेजी से बढ़ते एआई-निर्मित प्रमाणों का मूल्यांकन कर सके? और यदि भविष्य में एआई प्रतिदिन बड़ी संख्या में नए प्रमेय प्रस्तुत करने लगे तो गणितीय शोध की पारंपरिक समीक्षा व्यवस्था किस तरह काम करेगी? ये प्रश्न अब केवल कल्पना नहीं रह गए हैं।
इस स्थिति को देखते हुए सितंबर में प्रिंसटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी में गणित और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक स्वतंत्र सलाहकार समूह गठित किया गया। इसमें प्रतिष्ठित गणितज्ञों को शामिल किया गया है। समूह का उद्देश्य एआई कंपनियों को यह सलाह देना है कि गणितीय परिणाम किस तरह सार्वजनिक किए जाएं, उनकी समीक्षा कैसे हो और शोध समुदाय को पर्याप्त जानकारी किस रूप में उपलब्ध कराई जाए। समूह ने एआई से तैयार गणितीय शोध के साथ इस्तेमाल किए गए मॉडल, दिए गए निर्देशों, तर्क प्रक्रिया के सार, गणना में लगे समय और अनुमानित लागत जैसी जानकारियां उपलब्ध कराने की सिफारिश की है। इससे दूसरे वैज्ञानिक परिणामों की पृष्ठभूमि को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
सलाहकार समूह ने एक और महत्वपूर्ण चिंता जताई है। उसके अनुसार गणित की पुरानी और कठिन समस्याओं को केवल निजी एआई मॉडल की क्षमता परखने का साधन बनाना उचित नहीं है। गणितीय शोध का उद्देश्य सिर्फ किसी समस्या पर सबसे पहले समाधान घोषित करना नहीं, बल्कि उसके पीछे के विचारों को समझना और उस ज्ञान को व्यापक वैज्ञानिक समुदाय के लिए उपयोगी बनाना भी है। समूह ने एआई कंपनियों से ऐसे परिणामों को केवल प्रचार का माध्यम बनाने से बचने की अपील की है। इस बहस में एक पक्ष एआई की बढ़ती क्षमता को वैज्ञानिक खोज की गति तेज करने वाला अवसर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इस बात पर जोर देता है कि शोध की पारदर्शिता, स्वतंत्र समीक्षा और गणितज्ञों की भागीदारी कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।
यह विवाद गणित में रचनात्मकता की प्रकृति से भी जुड़ा है। परंपरागत रूप से गणितज्ञ किसी समस्या को हल करते समय उसके पीछे छिपे संबंधों को समझने, नई परिकल्पनाएं बनाने और पुराने सिद्धांतों को नए ढंग से जोड़ने का प्रयास करते हैं। एआई भी अब बड़े पैमाने पर गणितीय संरचनाओं के बीच संबंध खोजकर नए प्रमाण तैयार कर रहा है। लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि मशीन मनुष्य की तरह गणितीय अर्थ को समझती है। वर्तमान एआई प्रणालियों की कार्यप्रणाली और मानव गणितज्ञ की वैचारिक समझ के बीच महत्वपूर्ण अंतर बने हुए हैं। इसीलिए यह बहस भी जारी है कि एआई के नए परिणामों को स्वतंत्र मशीन-रचनात्मकता कहा जाए या मानव द्वारा विकसित गणितीय ज्ञान और मशीन की गणनात्मक क्षमता के संयुक्त परिणाम के रूप में देखा जाए।
इस पूरे घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि गणितज्ञों के पास अब ऐसे नए उपकरण आ रहे हैं जो कठिन समस्याओं पर संभावित रास्ते खोजने में सहायता कर सकते हैं। जिन सवालों पर शोधकर्ता लंबे समय तक काम करते रहे हैं, उनके लिए एआई नए अनुमान, वैकल्पिक प्रमाण या पहले अनदेखे संबंध प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। यदि एआई से तैयार परिणाम इतने अधिक हो जाएं कि उन्हें समझना और जांचना कठिन हो जाए तो वैज्ञानिक समुदाय के सामने ज्ञान की गुणवत्ता बनाए रखने की नई चुनौती खड़ी होगी।
ओपनएआई की अक्टूबर घोषणा इसलिए ऐतिहासिक महत्व की हो सकती है कि उसने गणितीय शोध में मशीनों की बढ़ती भूमिका को बहुत बड़े पैमाने पर सामने रखा है। हालांकि इसका वास्तविक वैज्ञानिक महत्व आने वाले समय में स्पष्ट होगा, जब स्वतंत्र गणितज्ञ इन प्रमाणों की जांच करेंगे, त्रुटियों को पहचानेंगे और यह निर्धारित करेंगे कि कौन-से परिणाम वास्तव में नए तथा महत्वपूर्ण हैं।
गणित की दुनिया के सामने अब दो समानांतर चुनौतियां हैं। पहली, एआई की असाधारण गणनात्मक क्षमता का उपयोग करके नए ज्ञान की खोज करना। दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि तेजी से तैयार होने वाले गणितीय परिणाम केवल मशीन के उत्तर बनकर न रह जाएं, बल्कि मनुष्य उन्हें समझ सके, जांच सके और आगे विकसित कर सके। गणित में किसी पहेली का समाधान मिलना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उस समाधान का सही होना और उसके पीछे के सिद्धांत को समझ पाना ही उसे स्थायी वैज्ञानिक ज्ञान बनाता है।


