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Atomic Bomb Survivor Story: दो परमाणु बम हमलों से कैसे बचे? Hiroshima और Nagasaki की कहानी
Atomic Bomb Survivor Story: सुतोमु यामागुची कौन थे और कैसे Hiroshima तथा Nagasaki दोनों Atomic Bomb attacks से बच गए?
Atomic Bomb Survivor Hiroshima Nagasaki Story in Hindi
Atomic Bomb Survivor Story: छह अगस्त और नौ अगस्त 1945, यह दो तारीखें इंसानी इतिहास की सबसे भयावह तारीखों में गिनी जाती हैं। इन्हीं दो दिनों में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराए थे, जिनमें लाखों लोग मारे गए और दोनों शहर पूरी तरह तबाह हो गए। इस भयानक तबाही के बीच एक ऐसा इंसान भी था जो दोनों हमलों से जिंदा बच निकला। जापान सरकार ने आधिकारिक रूप से सिर्फ उसी एक व्यक्ति को दोनों हमलों का प्रमाणित उत्तरजीवी माना। इस शख्स का नाम था सुतोमु यामागुची।
एक साधारण व्यापारिक यात्रा जो जिंदगी बदल गई
सुतोमु यामागुची का जन्म 16 मार्च 1916 को नागासाकी में हुआ था। वे मित्सुबिशी हैवी इंडस्ट्रीज नाम की कंपनी में इंजीनियर के तौर पर काम करते थे और तेल ले जाने वाले जहाजों का डिजाइन तैयार करते थे। अगस्त 1945 में वे एक व्यापारिक काम से हिरोशिमा गए हुए थे, जहां वे तीन महीने से अपनी कंपनी के लिए काम कर रहे थे। छह अगस्त की सुबह वे अपने साथियों के साथ वापस नागासाकी लौटने की तैयारी में थे। स्टेशन पहुंचने पर उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने यात्रा दस्तावेज पर लगने वाली एक जरूरी मुहर दफ्तर में ही भूल आए हैं। यही एक छोटी सी भूल उन्हें वापस दफ्तर की तरफ ले गई, और यही भूल आगे चलकर उनकी जिंदगी और मौत के बीच का फासला तय करने वाली थी।
हिरोशिमा में वह भयानक पल
दफ्तर वापस जाते समय सुतोमु ने आसमान में एक अमेरिकी बी उनतीस विमान को उड़ते देखा, जिससे एक छोटी सी वस्तु नीचे गिरती दिखी और उसके साथ दो पैराशूट खुले हुए थे। यह वही परमाणु बम था जिसे इतिहास में लिटिल बॉय के नाम से जाना जाता है। कुछ ही पलों में आसमान में एक जबरदस्त तेज रोशनी चमकी और उसके बाद जो विस्फोट हुआ, उसने सुतोमु को हवा में उड़ाकर जमीन पर पटक दिया। वे उस वक्त धमाके की जगह से करीब दो मील के दायरे में ही मौजूद थे। धमाके ने उनके कानों के पर्दे फाड़ दिए, कुछ देर के लिए उनकी आंखों की रोशनी चली गई, और उनके शरीर के ऊपरी हिस्से पर गंभीर जलन के निशान बन गए। कुछ देर बाद होश संभालते ही वे रेंगते हुए किसी शरण स्थल तक पहुंचे और वहां थोड़ा आराम करने के बाद अपने साथियों को खोजने निकल पड़े।
रात भर उन्होंने हिरोशिमा की तबाही के बीच किसी तरह गुजारा किया और अगली सुबह अपने दो साथियों के साथ स्टेशन की तरफ बढ़े, ताकि किसी तरह अपने घर नागासाकी लौट सकें। बुरी तरह घायल और झुलसी हालत में उन्होंने ट्रेन पकड़ी और वापस अपने घर की तरफ रवाना हो गए। शायद उस वक्त उन्हें यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि जिस शहर की तरफ वे राहत की सांस लेते हुए लौट रहे हैं, वहां कुछ ही दिनों में एक और भयानक तबाही उनका इंतजार कर रही थी।
घर लौटते ही दूसरी तबाही का सामना
नागासाकी पहुंचकर सुतोमु को अस्पताल में अपने जख्मों की पट्टी करानी पड़ी, फिर भी वे कुछ ही दिनों बाद अपने दफ्तर पहुंच गए। नौ अगस्त की सुबह वे अपने बॉस को हिरोशिमा में हुई पूरी भयानक घटना के बारे में बता रहे थे। उनका बॉस उनकी बातों पर भरोसा नहीं कर पा रहा था और कह रहा था कि एक अकेला बम पूरे शहर को इस तरह तबाह नहीं कर सकता। ठीक उसी वक्त, सुबह करीब सवा ग्यारह बजे, नागासाकी के आसमान में भी वैसी ही तेज रोशनी चमकी। अमेरिका ने नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिरा दिया था, जिसे फैट मैन के नाम से जाना जाता है। सुतोमु उस वक्त भी धमाके की जगह से करीब दो मील के दायरे में ही मौजूद थे, ठीक वैसी ही दूरी पर जैसी हिरोशिमा में थी। हैरानी की बात यह रही कि इस बार वे शारीरिक रूप से गंभीर रूप से घायल नहीं हुए, हालांकि विकिरण का असर उनके शरीर पर जरूर पड़ा। इस तरह वे कुछ ही दिनों के भीतर दो अलग अलग परमाणु हमलों से बचकर निकलने वाले शायद दुनिया के इकलौते ऐसे इंसान बन गए जिन्हें बाद में सरकार ने आधिकारिक मान्यता दी।
जिंदा बचे लोगों में भी वे अकेले नहीं थे
यह जानना जरूरी है कि सुतोमु अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो दोनों हमलों से बच निकले। अनुमान है कि दोनों शहरों में मिलाकर करीब दो लाख साठ हजार लोग इन हमलों से जिंदा बचे थे, और इनमें से करीब एक सौ पैंसठ लोगों के बारे में माना जाता है कि वे दोनों ही हमलों की चपेट में आए और दोनों में बच गए। लेकिन इन सबमें से सिर्फ सुतोमु यामागुची को ही जापान सरकार ने आधिकारिक तौर पर दोहरे परमाणु पीड़ित के रूप में प्रमाणित किया। यह मान्यता उन्हें 2009 में, यानी हमलों के करीब चौंसठ साल बाद मिली, जब नागासाकी नगर प्रशासन ने उनके अनुरोध पर उनके सरकारी दस्तावेजों में हिरोशिमा में हुई उनकी विकिरण चपेट को भी दर्ज कर लिया। इससे पहले उनके दस्तावेजों में सिर्फ नागासाकी की घटना ही दर्ज थी।
जिंदगी की दूसरी लड़ाई और खामोशी का लंबा दौर
दोनों हमलों से बचने के बाद सुतोमु ने अपनी जिंदगी फिर से शुरू की। वे शादी करके अपने परिवार के साथ रहने लगे और अपनी कंपनी में काम करते रहे। लंबे समय तक उन्होंने अपने अनुभव के बारे में सार्वजनिक रूप से खुलकर बात नहीं की। यह खामोशी उनकी जिंदगी में एक बड़े व्यक्तिगत सदमे के बाद टूटी। उनका दूसरा बेटा, जो हमले के वक्त बहुत छोटा था और उस विकिरण के प्रभाव में जीवित बच गया था, 2005 में कैंसर से चल बसा। इस व्यक्तिगत क्षति ने सुतोमु को गहराई से झकझोर दिया, और उन्होंने महसूस किया कि अब अपने अनुभव को दुनिया के सामने रखना उनकी जिम्मेदारी बन गया है।
शांति के लिए आवाज बनना
अपने आखिरी सालों में सुतोमु यामागुची परमाणु हथियारों के खिलाफ एक मुखर आवाज बन गए। उन्होंने कई सार्वजनिक भाषण दिए, दस्तावेजी फिल्मों में हिस्सा लिया और परमाणु हथियारों के खात्मे की अपील की। 2006 में बनी एक दस्तावेजी फिल्म में उन्होंने अपनी और कुछ दूसरे दोहरे उत्तरजीवियों की कहानी साझा की, और इसी फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपनी बात रखी। उनका मानना था कि दो बार परमाणु हमले से बचकर निकलना और जीवित रहना उनकी नियति है, और इसी नियति का तकाजा है कि वे इस भयावहता के बारे में लोगों को बताते रहें। उन्होंने एक बार कहा था कि परमाणु बम से उन्हें सबसे ज्यादा नफरत इस बात से है कि यह इंसानी गरिमा को किस तरह मिटा देता है।
आखिरी सालों की यात्रा
सुतोमु यामागुची ने हमलों के बाद पूरे पैंसठ साल और जिए। वे उम्र के आखिरी पड़ाव तक शांति और परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए बोलते रहे। जनवरी 2010 में, तिरानवे साल की उम्र में, पेट के कैंसर से उनका निधन हो गया। अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले ही उन्होंने नागासाकी में एक सार्वजनिक भाषण दिया था, जिसके बारे में उन्होंने खुद कहा था कि शायद यह शांति के लिए उनकी आखिरी सार्वजनिक अपील होगी। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उन्होंने विदेशी पत्रकारों को इंटरव्यू देना जारी रखा, क्योंकि वे चाहते थे कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक जरूर पहुंचे।
यह कहानी आज भी क्यों मायने रखती है
सुतोमु यामागुची की कहानी सिर्फ एक चमत्कारिक बचाव की कहानी नहीं है, यह परमाणु युद्ध की भयावहता को समझने का एक जीता जागता सबूत भी है। एक ही इंसान का दो अलग अलग शहरों में, दो अलग अलग मौकों पर, मौत के इतना करीब पहुंचकर भी बच निकलना यह दिखाता है कि तबाही का दायरा और उसकी अनिश्चितता कितनी बड़ी थी। साथ ही उनकी बाद की जिंदगी यह भी दिखाती है कि इंसान किस तरह सबसे भयानक अनुभवों से गुजरकर भी उसे एक सकारात्मक मकसद में बदल सकता है। सुतोमु ने अपनी बाकी जिंदगी इस कोशिश में लगाई कि जो कुछ उन्होंने झेला, वह किसी और को न झेलना पड़े। यही वजह है कि आज जब भी परमाणु हथियारों के खतरे की बात होती है, सुतोमु यामागुची का नाम और उनकी कहानी एक जरूरी चेतावनी के तौर पर याद की जाती है।


