TRENDING TAGS :
Carbon Border Tax Explained: यूरोप का ये टैक्स भारत को दे सकता है बड़ा झटका! BRICS ने क्यों जताई नाराजगी?
Carbon Border Tax यानी EU के CBAM पर BRICS ने आपत्ति जताई है। जानें यह व्यवस्था कैसे काम करती है और भारत के स्टील-एल्युमिनियम निर्यात पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
Carbon Border Tax: Why Is BRICS Angry and How Could It Impact India?
Carbon Border Tax Explained: जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश अब सिर्फ प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं रह गई है। इसका असर दुनिया के देशों के बीच होने वाले कारोबार पर भी दिखाई देने लगा है। यूरोपीय संघ का Carbon Border Adjustment Mechanism यानी CBAM इसका बड़ा उदाहरण है। इसके तहत ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाले कुछ उत्पादों के आयात पर उनकी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े उत्सर्जन की कीमत को ध्यान में रखा जाता है।
यही वजह है कि कार्बन बॉर्डर टैक्स अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बड़ा मुद्दा बन गया है। 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों ने EU के CBAM जैसे उपायों पर आपत्ति जताई है। BRICS ने ऐसे कदमों को एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी बताते हुए इनके व्यापारिक प्रभाव पर चिंता जताई है। आइए जानते हैं कि आखिर कार्बन बॉर्डर टैक्स क्या है, यह कैसे काम करता है और भारत जैसे विकासशील देश पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
क्या होता है कार्बन बॉर्डर टैक्स?
कार्बन बॉर्डर टैक्स को आधिकारिक तौर पर Carbon Border Adjustment Mechanism यानी CBAM कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसी देश या क्षेत्र में बाहर से आने वाले कुछ ऐसे उत्पादों की कार्बन लागत को ध्यान में रखा जाता है, जिन्हें बनाने में बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है।
यूरोपीय संघ का तर्क है कि अगर उसके अपने उद्योगों पर प्रदूषण कम करने के लिए अतिरिक्त खर्च हो रहा है, लेकिन दूसरे देशों से आने वाले उत्पादों पर ऐसी कार्बन लागत नहीं है, तो यूरोपीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकती हैं। CBAM का उद्देश्य इसी अंतर को कम करना है, ताकि यूरोप में बने और बाहर से आयात किए गए उत्पादों के बीच कार्बन लागत में बड़ा अंतर न रहे।
कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?
CBAM के पीछे सबसे महत्वपूर्ण वजह Carbon Leakage यानी कार्बन लीकेज को रोकना है। यानी अगर किसी देश में कंपनियों पर प्रदूषण कम करने के लिए कड़े नियम लागू हैं, तो उन्हें स्वच्छ तकनीक और महंगे उपकरणों पर निवेश करना पड़ सकता है। इससे वहां तैयार होने वाले उत्पादों की लागत बढ़ सकती है।
इसके उलट किसी दूसरे देश में पर्यावरणीय नियम अपेक्षाकृत कमजोर हैं तो वहां वही उत्पाद कम लागत में तैयार हो सकता है। इससे कंपनियों को उत्पादन ऐसे देशों में स्थानांतरित करने का प्रोत्साहन मिल सकता है जहां कार्बन उत्सर्जन की लागत कम है। उत्पादन के साथ प्रदूषण भी दूसरे देश में चला जाता है। इसी स्थिति को कार्बन लीकेज कहा जाता है। CBAM का मकसद इस अंतर को कम करना है, ताकि कंपनियों को केवल कम पर्यावरणीय लागत वाले देशों में उत्पादन करने का फायदा न मिले।
कार्बन बॉर्डर टैक्स कैसे काम करता है?
मान लीजिए भारत की कोई कंपनी स्टील बनाकर यूरोपीय बाजार में बेचती है। स्टील बनाने की प्रक्रिया में कितना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हुआ, इसकी गणना की जाएगी। इसके बाद EU के नियमों के अनुसार उस उत्सर्जन की कार्बन लागत तय होगी।
अगर उस उत्पाद पर संबंधित देश में पहले से कोई मान्य कार्बन कीमत चुकाई गई है, तो नियमों के तहत उसका समायोजन किया जा सकता है। लेकिन अगर ऐसी कार्बन कीमत नहीं चुकाई गई है, तो EU में आयात करने वाले कारोबारी को CBAM प्रमाणपत्र खरीदने की जरूरत पड़ सकती है।
इस तरह CBAM सामान्य आयात शुल्क से अलग है। यहां सिर्फ सामान की कीमत या मात्रा नहीं देखी जाती, बल्कि उसके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन को भी आर्थिक लागत से जोड़ा जाता है।
किन सामान पर लागू है यूरोपीय संघ का CBAM?
यूरोपीय संघ ने फिलहाल CBAM के दायरे में उन क्षेत्रों को शामिल किया है जिनमें कार्बन उत्सर्जन काफी अधिक होता है। इनमें सीमेंट, लोहा और स्टील, एल्युमिनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। CBAM की संक्रमण अवधि अक्टूबर 2023 में शुरू हुई थी। इस दौरान आयातकों को संबंधित उत्पादों में शामिल उत्सर्जन की रिपोर्टिंग करनी थी। 1 जनवरी 2026 से CBAM की अंतिम व्यवस्था लागू हो गई, जिसके तहत संबंधित आयातों पर कार्बन प्रमाणपत्रों से जुड़ी वित्तीय जिम्मेदारियां भी शुरू हुईं।
कार्बन उत्सर्जन की गणना कैसे होती है?
CBAM में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसी उत्पाद को बनाने में कितना कार्बन उत्सर्जित हुआ। इसके लिए उत्पादन के दौरान सीधे होने वाले उत्सर्जन और कुछ मामलों में उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली बिजली या अन्य इनपुट से जुड़े उत्सर्जन को भी देखा जाता है।
यानी किसी स्टील प्लांट में उत्पादन प्रक्रिया के दौरान निकलने वाली गैसें प्रत्यक्ष उत्सर्जन का हिस्सा हो सकती हैं। वहीं अगर उस उत्पादन में इस्तेमाल बिजली किसी कोयला आधारित बिजली संयंत्र से आती है तो उससे जुड़े उत्सर्जन की गणना भी नियमों के अनुसार महत्वपूर्ण हो सकती है। यही वजह है कि CBAM केवल टैक्स की व्यवस्था नहीं है। इसमें कंपनियों के लिए उत्सर्जन का सही आंकड़ा तैयार करना, उसका रिकॉर्ड रखना और जरूरत पड़ने पर उसे प्रमाणित कराना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
BRICS देशों को कार्बन बॉर्डर टैक्स पर आपत्ति क्यों है?
BRICS देशों की मुख्य चिंता यह है कि विकसित देशों की ओर से बनाए गए ऐसे नियम विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अतिरिक्त लागत पैदा कर सकते हैं। भारत, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा जरूरतें अभी भी बड़े स्तर पर कोयला, तेल और गैस जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर यूरोप में कार्बन-गहन उत्पादों पर अतिरिक्त कार्बन लागत लगती है तो विकासशील देशों से होने वाला निर्यात महंगा हो सकता है। इसका सीधा असर वहां की कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर पड़ सकता है।
BRICS का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जो विकासशील देशों के व्यापार पर अतिरिक्त बोझ डाल दे। इसी वजह से BRICS ने CBAM जैसे उपायों को एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी बताया है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत के लिए CBAM का मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यूरोपीय संघ भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है। अगर भारतीय स्टील, एल्युमिनियम या अन्य कार्बन-गहन उत्पादों पर यूरोपीय बाजार में अतिरिक्त कार्बन लागत आती है तो इन उत्पादों की कुल कीमत बढ़ सकती है। इसका असर सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि निर्यात करने वाली कंपनियों को उत्सर्जन का सटीक डेटा तैयार करने, उसकी निगरानी करने और सत्यापन कराने पर भी खर्च करना पड़ सकता है। जिन कंपनियों के पास आधुनिक और कम-कार्बन तकनीक नहीं है, उनके लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है।
वहीं दूसरी तरफ CBAM भारत की कंपनियों को स्वच्छ तकनीक अपनाने और उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है। यानी इसका असर चुनौती के साथ-साथ बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है।
क्या CBAM सिर्फ टैक्स है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक CBAM केवल एक सामान्य आयात टैक्स नहीं है। यूरोपीय संघ इसे अपनी जलवायु नीति का हिस्सा मानता है। EU का कहना है कि इसका उद्देश्य यूरोपीय कंपनियों और विदेशी उत्पादकों के बीच कार्बन लागत का अंतर कम करना और उद्योगों को कम-कार्बन उत्पादन की दिशा में बढ़ावा देना है। BRICS देश कार्बन उत्सर्जन घटाने के खिलाफ नहीं खड़े बल्कि उनकी चिंता यह है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ऐसी व्यवस्था कहीं नया व्यापार अवरोध न बन जाए। इसलिए विवाद इस बात पर भी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बनाए गए नियम अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांतों और विकासशील देशों की परिस्थितियों के साथ कितने संतुलित होने चाहिए। एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत के लिए आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अपने उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखते हुए उत्पादन को धीरे-धीरे कम-कार्बन और स्वच्छ तकनीक की ओर ले जाए। यानी Carbon Border Tax अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह भारत के निर्यात, उद्योग और वैश्विक व्यापार से जुड़ी अहम चुनौती बन चुका है।


