China Hukou System: चीन की एक अदृश्य दीवार जो करोड़ों लोगों को दो हिस्सों में बांटती है

China Hukou System Explained: इस सिस्टम का नाम है 'हुकोऊ' - यानी हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम। एक एक परिवार का रजिस्ट्रेशन। इसे अक्सर चीन का अंदरूनी पासपोर्ट कहा जाता है।

Neel Mani Lal
Published on: 19 Jun 2026 6:26 PM IST
China Hukou System Explained
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China Hukou System Explained 

China Hukou System Explained: चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। एक आर्थिक सुपरपावर। उसके पास दुनिया की सबसे तेज़ बुलेट ट्रेनें हैं। चमचमाते शहर हैं। मगर इनके बीच एक ऐसा कानून मौजूद है जो तय करता है कि किसी नागरिक को अस्पताल में अच्छा इलाज मिलेगा या नहीं, उसके बच्चे को शहर के स्कूल में दाखिला मिलेगा या नहीं, और पेंशन के हकदार हैं या नहीं। ये सब तय होता है इस आधार पर कि किसी नागरिक का जन्म कहां हुआ था। इस सिस्टम का नाम है 'हुकोऊ' - यानी हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम। एक एक परिवार का रजिस्ट्रेशन। इसे अक्सर चीन का अंदरूनी पासपोर्ट कहा जाता है।

हुकोऊ है क्या

हुकोऊ असल में एक रजिस्ट्रेशन बुकलेट है। ये हर चीनी नागरिक को उसके परिवार और जन्मस्थान के आधार पर ग्रामीण हुकोऊ या शहरी हुकोऊ कैटेगरी में बांट देती है। इसी दस्तावेज़ से तय होता है कि किसी को सरकारी स्कूल, सब्सिडी वाला इलाज, सस्ता मकान, पेंशन और दूसरी सामाजिक सुविधाएं कहां और कैसे मिलेंगी। अगर किसी नागरिक के पास ग्रामीण हुकोऊ है और वह शहर में काम करने चला जाए तो वह वहां सिर्फ मजदूरी कर सकता है। उस शहर की नागरिक सुविधाओं का पूरा हक उसे आसानी से नहीं मिलेगा।

हालांकि चीन में परिवार और निवास का रजिस्ट्रेशन रखने की परंपरा सदियों पुरानी रही है। लेकिन हुकोऊ सिस्टम की शुरुआत 1958 में माओ ज़ेदोंग के दौर में हुई थी। उस दौर में नई कम्युनिस्ट सरकार चाहती थी कि गांवों से शहरों की तरफ बेलगाम पलायन न हो, क्योंकि उस वक्त शहरी इलाकों में रोज़गार और सुविधाएं सीमित थीं। इसलिए हुकोऊ के ज़रिए हर नागरिक को उसके पैदाइशी इलाके से बांध दिया गया, ताकि सरकार ही तय करे कि किसे कहां राशन, नौकरी और मकान मिलेगा। यानी इसका मूल मकसद आबादी की आवाजाही पर कंट्रोल और संसाधनों का केंद्रीकृत बंटवारा था।

जब आर्थिक सुधारों ने मजदूरों की एक नई दुनिया बना दी

1978 में देंग शियाओपिंग के आर्थिक सुधारों ने चीन को दुनिया की फैक्ट्री तो बना दिया लेकिन इसके लिए लाखों मजदूरों को गांवों से शहरों में आना पड़ा। इसके लिए हुकोऊ हटाया नहीं गया बल्कि लोगों को काम के लिए शहर जाने की छूट दी गई।

नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक के बाद करोड़ों प्रवासी मजदूर ऐसे शहरों में रहने और काम करने लगे, जहां उनका हुकोऊ नहीं था। लेकिन उनके बच्चों को शहर के अच्छे स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता था, इलाज महंगा पड़ता था, और मकान खरीदना लगभग नामुमकिन था। इसी वजह से शहर में काम करने वाले मजदूर अपने बच्चों को गांवों में ही वृद्ध परिजनों के पास छोड़ देते थे।

अब क्या हाल है

2014 में चीन की सरकार ने न्यू-टाइप अर्बनाइज़ेशन प्लान के तहत हुकोऊ में बड़ा सुधार शुरू किया। इसमें ग्रामीण और शहरी हुकोऊ की पुरानी दो-स्तरीय श्रेणी को खत्म करके एक समान रेज़िडेंट श्रेणी बनाने की बात कही गई। शहरों को आकार के हिसाब से अलग-अलग नियम दिए गए। 10 लाख से कम आबादी के शहरों में हुकोऊ पाना आसान बना दिया गया। मझोले शहरों में शर्तें थोड़ी ढीली हुईं। लेकिन बीजिंग और शंघाई जैसे महानगरों में आज भी सख्त पॉइंट्स सिस्टम चलता है, जिसमें शिक्षा, संपत्ति, टैक्स भुगतान और नौकरी जैसे मानकों पर पॉइंट्स देकर ही हुकोऊ तय होता है।

सबसे बड़ा कदम मई 2026 में उठा, जब चीन की स्टेट काउंसिल ने एक नई गाइडलाइन जारी की, जिसमें सोशल इंश्योरेंस को हुकोऊ से पूरी तरह अलग कर दिया गया। यानी अब प्रवासी मजदूर अपने काम वाले शहर में ही पेंशन और बीमा जैसी सुविधाएं ले सकेंगे। यह बदलाव खासतौर पर डिलीवरी जैसे गिग मजदूरों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिनकी संख्या आज लगभग 29 करोड़ है। विश्लेषकों का कहना है कि यह दशकों पुरानी ग्रामीण-शहरी खाई को पाटने और घरेलू खपत बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है।

दुनिया में और कहां है ऐसा सिस्टम

चीन का हुकोऊ अकेला उदाहरण नहीं है, बल्कि पूर्वी एशिया और सोवियत दुनिया में इससे मिलते-जुलते सिस्टम पहले से रहे हैं। जापान में आज भी 'कोसेकी' नाम की व्यवस्था चलती है, जो जन्म, विवाह और मृत्यु जैसी पारिवारिक घटनाओं का आधिकारिक रिकॉर्ड रखती है।

वियतनाम में 'हो खाऊ' नाम का सिस्टम सीधे चीनी हुकोऊ से प्रेरित है और शुरुआत में शहरी आबादी को नियंत्रित करने के लिए ही लाया गया था। उत्तर कोरिया में भी पारिवारिक रजिस्ट्रेशन की एक सख्त व्यवस्था है, जबकि दक्षिण कोरिया ने अपनी पुरानी 'होजू' व्यवस्था को 2008 में पूरी तरह खत्म कर दिया।

सोवियत संघ में भी 'प्रोपिस्का' नाम की एक व्यवस्था थी जिसका मकसद लोगों की आवाजाही और शहरों में बसने पर सरकार का नियंत्रण था। आज रूस में इसका नरम रूप अब भी मौजूद है, जहां 90 दिन से ज़्यादा एक जगह रहने पर रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी होता है, फर्क सिर्फ यह है कि अब यह नागरिक अधिकारों से सीधे जुड़ा नहीं है। इन सबकी तुलना में चीन का हुकोऊ आज भी सबसे सख्त और सबसे ज़्यादा असर डालने वाला सिस्टम बना हुआ है। यही एक ऐसी व्यवस्था है जो अब भी सीधे तौर पर शिक्षा, इलाज और पेंशन जैसे बुनियादी अधिकारों को जन्मस्थान से जोड़े रखती है।

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