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Disputed Islands: 'नो मैन्स लैंड' द्वीप, भारत-बांग्लादेश से जापान-रूस तक सीमा विवादों की पूरी कहानी
India Bangladesh Island Dispute: दुनिया के सबसे विवादित द्वीपों की पूरी कहानी जानिए। भारत-बांग्लादेश के न्यू मूर, जापान-रूस के कुरिल, सेनकाकू, स्प्रैटली, फॉकलैंड और अन्य द्वीपों पर क्यों है विवाद? समझिए EEZ, समुद्री सीमा और भू-राजनीति का पूरा गणित।
India Bangladesh Island Dispute No Mans Land Island
India Bangladesh Island Dispute: दुनिया के नक्शे पर कई ऐसे छोटे द्वीप हैं, जिनका क्षेत्रफल मुश्किल से कुछ वर्ग किलोमीटर है, लेकिन उनका रणनीतिक महत्व इतना बड़ा है कि दशकों से देशों के बीच विवाद का कारण बने हुए हैं। इन द्वीपों पर विवाद केवल जमीन का नहीं होता, बल्कि उनसे जुड़े समुद्री क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों, मत्स्य संपदा, समुद्री व्यापार मार्ग और सैन्य नियंत्रण का भी होता है। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के तहत किसी द्वीप पर संप्रभुता मिलने से उस देश को उसके आसपास के समुद्री क्षेत्र पर भी विशेष अधिकार मिल सकते हैं। यही कारण है कि कई निर्जन द्वीप भी वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन जाते हैं।
द्वीपों पर विवाद इतना महत्वपूर्ण क्यों होता है?
किसी द्वीप पर नियंत्रण का मतलब केवल उस जमीन का मालिक होना नहीं है। यदि कोई द्वीप कानूनी रूप से किसी देश का माना जाता है, तो उसके आधार पर 12 समुद्री मील तक प्रादेशिक जल और कुछ परिस्थितियों में 200 समुद्री मील तक विशेष आर्थिक क्षेत्र का दावा किया जा सकता है। इस क्षेत्र में मछली पकड़ने, तेल-गैस की खोज, समुद्री खनिजों के दोहन और सुरक्षा संबंधी अधिकार मिलते हैं। इसी वजह से छोटे-छोटे द्वीप भी अरबों डॉलर के आर्थिक और सामरिक महत्व के हो जाते हैं।
भारत और बांग्लादेश: न्यू मूर (दक्षिण तालपट्टी) द्वीप
भारत और बांग्लादेश के बीच कभी न्यू मूर द्वीप (भारत में न्यू मूर और बांग्लादेश में दक्षिण तालपट्टी) को लेकर विवाद था। यह द्वीप 1970 के दशक में बंगाल की खाड़ी में उभरा था। दोनों देशों ने इस पर दावा किया। बाद में समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटीय बदलावों के कारण यह द्वीप पूरी तरह समुद्र में समा गया। इसके बावजूद इस विवाद ने समुद्री सीमा निर्धारण को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक कानूनी और कूटनीतिक बहस को जन्म दिया। अंततः 2014 में अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फैसले के बाद समुद्री सीमा विवाद का समाधान हुआ।
जापान और रूस: कुरिल द्वीप
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद से जापान और रूस के बीच कुरिल द्वीप समूह (जापान इन्हें उत्तरी टेरिटरी कहता है) सबसे पुराने सीमा विवादों में से एक है। 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। जापान आज भी चार प्रमुख द्वीपों पर अपना दावा करता है, जबकि रूस उन्हें अपने नियंत्रण में रखे हुए है। इसी विवाद के कारण दोनों देशों के बीच आज तक औपचारिक शांति संधि भी नहीं हो सकी है। हाल के वर्षों में रूस ने इन द्वीपों पर सैन्य ढांचा मजबूत किया है, जिससे विवाद और संवेदनशील बना हुआ है।
जापान, चीन और ताइवान: सेनकाकू/दियाओयू द्वीप
पूर्वी चीन सागर में स्थित छोटे-से सेनकाकू द्वीप (चीन में दियाओयू) एशिया के सबसे संवेदनशील विवादित क्षेत्रों में गिने जाते हैं। इन पर जापान का प्रशासनिक नियंत्रण है, लेकिन चीन और ताइवान भी संप्रभुता का दावा करते हैं। यह क्षेत्र संभावित तेल और गैस संसाधनों, समृद्ध मत्स्य क्षेत्र और सामरिक स्थिति के कारण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां कई बार चीनी और जापानी तटरक्षक जहाज आमने-सामने आ चुके हैं।
दक्षिण चीन सागर: स्प्रैटली और पारासेल द्वीप
दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे जटिल समुद्री विवादों में शामिल है। स्प्रैटली द्वीप समूह पर चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान अलग-अलग स्तर पर दावा करते हैं। वहीं पारासेल द्वीप पर मुख्य रूप से चीन और वियतनाम का विवाद है। चीन ने इन क्षेत्रों में कृत्रिम द्वीप बनाकर हवाई पट्टियां, बंदरगाह और सैन्य सुविधाएं विकसित की हैं। 2016 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने चीन के कई समुद्री दावों को कानूनी आधारहीन माना था, लेकिन बीजिंग ने उस फैसले को स्वीकार नहीं किया।
ब्रिटेन और अर्जेंटीना: फॉकलैंड द्वीप
दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित फॉकलैंड द्वीप (अर्जेंटीना इन्हें इस्लास माल्विनास कहता है) पर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच दशकों से विवाद है। 1982 में इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच युद्ध भी हुआ था। युद्ध में ब्रिटेन ने दोबारा नियंत्रण स्थापित कर लिया, लेकिन अर्जेंटीना आज भी इन द्वीपों पर अपना दावा कायम रखता है।
दक्षिण कोरिया और जापान: डोक्डो/ताकेशिमा
जापान सागर (पूर्वी सागर) में स्थित डोक्डो (जापानी नाम ताकेशिमा) छोटे ज्वालामुखीय द्वीप हैं। इन पर दक्षिण कोरिया का वास्तविक नियंत्रण है, लेकिन जापान भी इन्हें अपना क्षेत्र मानता है। यह विवाद केवल भूभाग का नहीं, बल्कि दोनों देशों के औपनिवेशिक इतिहास और राष्ट्रीय पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
डेनमार्क और कनाडा: हैन्स द्वीप का शांतिपूर्ण समाधान
सभी विवाद युद्ध तक नहीं पहुंचते। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित हैन्स द्वीप पर कनाडा और डेनमार्क के बीच वर्षों तक दावा रहा। दोनों देशों के सैनिक यहां अपने-अपने राष्ट्रीय झंडे लगाते और प्रतीकात्मक रूप से व्हिस्की या स्थानीय शराब की बोतल छोड़ जाते थे। इसे मजाक में ‘व्हिस्की वॉर’ भी कहा गया। आखिरकार 2022 में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए सीमा तय कर विवाद समाप्त कर दिया। यह कूटनीति के सफल उदाहरणों में गिना जाता है।
क्या हर विवाद का समाधान अंतरराष्ट्रीय अदालत करती है?
कुछ विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता से होता है। कुछ मामलों में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण या मध्यस्थता न्यायाधिकरण की मदद ली जाती है। हालांकि किसी भी फैसले का पालन संबंधित देशों की राजनीतिक इच्छा पर भी निर्भर करता है।
जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही नई चुनौती
समुद्र का बढ़ता जलस्तर कई छोटे द्वीपों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहा है। यदि कोई द्वीप पूरी तरह जलमग्न हो जाता है, तो भविष्य में उससे जुड़े समुद्री अधिकारों और सीमा निर्धारण को लेकर नए कानूनी प्रश्न खड़े हो सकते हैं। प्रशांत महासागर के कई छोटे द्वीपीय देशों के सामने यह चुनौती तेजी से उभर रही है।
भारत की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और अंडमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप जैसे रणनीतिक द्वीप समूह हिंद महासागर में उसकी समुद्री सुरक्षा का आधार हैं। भारत ने अधिकांश समुद्री सीमा विवाद बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सुलझाए हैं। भारत-बांग्लादेश समुद्री सीमा समझौता इसका प्रमुख उदाहरण माना जाता है। वहीं हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए भारत अपने द्वीपीय क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे, नौसैनिक उपस्थिति और समुद्री निगरानी को लगातार मजबूत कर रहा है।
दुनिया के विवादित द्वीप यह दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूगोल का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। कई बार कुछ चट्टानों या छोटे निर्जन द्वीपों का महत्व उनके आकार से नहीं, बल्कि उनके आसपास के समुद्री संसाधनों, व्यापारिक मार्गों और सैन्य स्थिति से तय होता है।


