Gen-Z Protest News: दुनिया में क्यों भड़क रहा यूथ का गुस्सा? फ्रांस से अर्जेंटीना तक युवा सड़कों पर

Gen-Z Protest Latest News: फ्रांस से अमेरिका, इटली और अर्जेंटीना तक Gen-Z का विरोध क्यों बढ़ रहा है? जानिए युवा आंदोलनों के कारण, किन नेताओं को चुनौती मिली और इनके पीछे कौन-सी ताकतें हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 18 Oct 2026 4:07 PM IST
Gen-Z Protest 2026 Global Youth Protest Story in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News
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Gen-Z Protest 2026 Global Youth Protest Story in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News

Gen-Z Protest Latest News: दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक नया राजनीतिक और सामाजिक असंतोष आकार ले रहा है। फ्रांस में स्कूली विद्यार्थी अपनी शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार से टकरा रहे हैं। इटली में प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की नीतियों के खिलाफ युवा सड़कों पर हैं। तुर्किये में राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन की सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल उठ रहा है। अर्जेंटीना में राष्ट्रपति हाविएर मिलेई की आर्थिक नीतियों और विश्वविद्यालयों के बजट में कटौती ने विद्यार्थियों को आंदोलित किया है। बेल्जियम में महँगी शिक्षा, पुर्तगाल में आवास संकट और कम वेतन, जबकि अल्बानिया में भ्रष्टाचार तथा पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली विकास परियोजनाएँ विरोध का कारण बनी हैं। अमेरिका में लोकतांत्रिक संस्थाओं, आप्रवासन नीति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली को लेकर व्यापक विरोध दिखाई दे रहा है। इन सभी आंदोलनों में युवा पीढ़ी की भागीदारी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर दुनिया के इतने अलग-अलग देशों के युवाओं में लगभग एक साथ असंतोष क्यों बढ़ रहा है? क्या यह महज संयोग है कि यूरोप से अमेरिका और दक्षिण अमेरिका तक एक नई पीढ़ी अपने राजनीतिक नेतृत्व से सवाल पूछ रही है? क्या इन आंदोलनों के पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन, राजनीतिक विचारधारा अथवा सुनियोजित नेटवर्क काम कर रहा है? या फिर यह एक ऐसे वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संकट का परिणाम है जिसमें शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, लेकिन सम्मानजनक रोजगार, सस्ते आवास, सामाजिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य की संभावनाएँ कमजोर पड़ रही हैं?

इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए सबसे पहले एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। हर वह आंदोलन जिसमें बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं, जेन-ज़ी का आंदोलन नहीं होता। सामान्यतः 1997 से 2012 के आसपास जन्मी पीढ़ी को जेनरेशन-ज़ेड कहा जाता है, हालाँकि इसकी जन्म-वर्ष सीमाओं पर पूर्ण सहमति नहीं है। अक्टूबर 2026 में इस पीढ़ी के सदस्य लगभग 14 से 29 वर्ष के हैं। फ्रांस, इटली और अल्बानिया में हालिया आंदोलनों में युवाओं की केंद्रीय भूमिका अपेक्षाकृत स्पष्ट है। बेल्जियम में छात्र संगठनों का नेतृत्व महत्वपूर्ण है। तुर्किये में विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने लोकतंत्र के आंदोलन को नई शक्ति दी है। दूसरी ओर अमेरिका, अर्जेंटीना और पुर्तगाल के आंदोलन व्यापक नागरिक, श्रमिक और राजनीतिक गठबंधनों के भी आंदोलन हैं। इसलिए इन आठ देशों को एक ही संगठन अथवा एक समान नेतृत्व वाले वैश्विक जेन-ज़ी विद्रोह के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

17 अक्टूबर 2026 को फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। अंतरराष्ट्रीय समाचार रिपोर्टों के अनुसार, इन प्रदर्शनों में जीवनयापन की बढ़ती लागत, शिक्षा पर सरकारी खर्च, वेतन और भविष्य की आर्थिक असुरक्षा जैसे साझा सवाल दिखाई दिए। हालाँकि ये प्रदर्शन एक ही अंतरराष्ट्रीय संगठन द्वारा संचालित नहीं थे। इसी तरह अल्बानिया का आंदोलन अपनी अलग राजनीतिक और पर्यावरणीय पृष्ठभूमि से विकसित हुआ है।

1. फ्रांस : शिक्षा व्यवस्था से शुरू हुआ विद्रोह, अब राष्ट्रपति मैक्रों की सरकार के सामने चुनौती

फ्रांस इस समय यूरोप में बढ़ते युवा असंतोष का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। सितंबर 2026 के मध्य में पेरिस के आसपास के विद्यालयों से आरंभ हुआ विरोध अक्टूबर आते-आते राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया। इसकी शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक सिद्धांत या राष्ट्रपति को हटाने की माँग से नहीं हुई थी। विद्यार्थियों की शुरुआती शिकायतें बेहद व्यावहारिक थीं। विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक है, पुरानी इमारतों की मरम्मत नहीं हो रही, गर्मी के दौरान कक्षाओं का तापमान असहनीय हो जाता है और पढ़ाई का समय इतना लंबा है कि विद्यार्थियों के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। पेरिस के उपनगर क्रेतई में विद्यालयों की खराब स्थिति के खिलाफ शुरू हुआ असंतोष जल्दी ही दूसरे शहरों तक पहुँच गया। विद्यार्थियों ने विद्यालयों के प्रवेश द्वारों पर प्रदर्शन किए, अनेक स्थानों पर कक्षाओं का बहिष्कार हुआ और प्रशासन से शिक्षकों तथा सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की माँग उठी।

फ्रांस के आंदोलन की एक खास बात यह है कि विद्यार्थी केवल विद्यालयों की वर्तमान स्थिति से नाराज नहीं हैं। उनकी शिकायत उच्च शिक्षा में प्रवेश की व्यवस्था से भी है। फ्रांस की विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली 'पार्कूरसुप' को लेकर विद्यार्थियों में असुरक्षा है। अनेक युवा मानते हैं कि उन्हें लगातार परीक्षा, मूल्यांकन और प्रतिस्पर्धा की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, लेकिन अच्छी उच्च शिक्षा और उसके बाद बेहतर रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। यह असंतोष उन परिवारों में अधिक गंभीर है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। संपन्न परिवारों के बच्चे निजी शिक्षण संसाधनों और बेहतर शैक्षिक वातावरण का लाभ उठा सकते हैं, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों के सामने अवसरों की असमानता बनी रहती है। इस प्रकार आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था से सामाजिक असमानता तक का सफर तय किया।

अक्टूबर के पहले सप्ताह में आंदोलन में शिक्षक संगठनों, अभिभावकों और श्रमिक संगठनों की भागीदारी बढ़ने लगी। फ्रांस पहले से महँगाई, सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च, वेतन, पेंशन और राजकोषीय संकट को लेकर राजनीतिक तनाव झेल रहा था। ऐसे वातावरण में विद्यार्थियों की माँगों ने व्यापक सामाजिक असंतोष को अभिव्यक्ति का अवसर दे दिया। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में पाँच लाख से अधिक लोगों की भागीदारी की खबरें सामने आईं। अलग-अलग सूत्रों ने प्रदर्शनकारियों की संख्या अलग बताई है। कुछ स्थानों पर शांतिपूर्ण रैलियाँ हुईं, जबकि पेरिस सहित कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक भी हो गए। सरकारी इमारतों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचने तथा बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी की खबरें आईं। इस हिंसा को पूरे छात्र आंदोलन का चरित्र मान लेना गलत होगा, क्योंकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों, श्रमिकों तथा हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों के बीच अंतर करना आवश्यक है।

फ्रांस में जेन-ज़ी ने किसे निशाना बनाया?

यहाँ मुख्य राजनीतिक जवाबदेही राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के नेतृत्व वाली शासन व्यवस्था और प्रधानमंत्री सेबास्तियाँ लेकोर्नू की सरकार से माँगी जा रही है। शिक्षा संबंधी शिकायतों का सीधा संबंध शिक्षा प्रशासन तथा सरकारी बजट से है, जबकि व्यापक आंदोलन में आर्थिक नीति, सामाजिक सुरक्षा और पुलिस कार्रवाई भी विवाद के विषय बन गए हैं। फ्रांस की राजनीति में वामपंथी दलों तथा श्रमिक संगठनों ने आंदोलन की माँगों का समर्थन किया है। राष्ट्रपति चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं, इसलिए यह असंतोष राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। सरकार और उसके समर्थकों का आरोप है कि कुछ अतिवामपंथी तथा हिंसक तत्व आंदोलन की आड़ में अराजकता फैला रहे हैं। दूसरी ओर छात्र और नागरिक अधिकार समूह पुलिस बल के प्रयोग को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दोनों दावों का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है।

फ्रांस के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने शिक्षा को केवल विद्यालयों का मामला नहीं रहने दिया। अब यह प्रश्न बन गया है कि क्या आधुनिक विकसित राष्ट्र अपनी नई पीढ़ी को वह सार्वजनिक शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसर दे पा रहे हैं जिनके आधार पर उन्होंने समृद्ध समाज बनने का दावा किया था। फ्रांस में विद्यार्थी मूलतः यह पूछ रहे हैं कि यदि देश आर्थिक रूप से विकसित है, तो उसके सरकारी विद्यालयों की हालत इतनी खराब क्यों है? यही सवाल आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन देने वाला एक प्रमुख कारण बना है।

2. इटली : 'नो मेलोनी डे' के माध्यम से प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की नीतियों को चुनौती

इटली में जेन-ज़ी का असंतोष अधिक स्पष्ट रूप से राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करता दिखाई दे रहा है। 16 अक्टूबर 2026 को विभिन्न शहरों में विद्यार्थियों ने 'नो मेलोनी डे' के नाम से प्रदर्शन आयोजित किए। यह नाम ही बताता है कि विद्यार्थियों ने अपनी नाराजगी का प्रमुख राजनीतिक केंद्र प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को बनाया है। हालाँकि आंदोलन केवल उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता या राजनीतिक विचारधारा के विरोध तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों की शिकायत है कि सार्वजनिक विद्यालयों की इमारतें खराब स्थिति में हैं, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं और शिक्षा के लिए अधिक बजट की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवस्था में विदेशी मूल के विद्यार्थियों से संबंधित प्रस्तावित या विवादास्पद प्रतिबंधों को लेकर भी विरोध सामने आया है।

इटली में इस आंदोलन का एक प्रभावशाली नारा है—'युद्ध के बजाय विद्यालयों पर पैसा खर्च करो।' इस नारे के पीछे विद्यार्थियों का तर्क है कि सरकार को सैन्य व्यय तथा हथियारों के स्थान पर शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और युवाओं की सामाजिक सुरक्षा को अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। सार्डिनिया के काग्लियारी शहर में 16 अक्टूबर को लगभग 600 विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किया। इटली की समाचार एजेंसी ANSA के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और जर्जर भवनों का मामला उठाया। उनका आरोप था कि सरकार विदेशी विद्यार्थियों को समस्या के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि विद्यालयों की वास्तविक समस्याएँ अपर्याप्त संसाधनों और प्रशासनिक उपेक्षा से जुड़ी हैं। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्री जुसेप्पे वाल्दितारा की नीतियों की भी आलोचना की।

इटली का युवा असंतोष केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। पिछले वर्षों से देश में नौजवानों के सामने कम वेतन, अस्थायी रोजगार, महँगा आवास और काम की तलाश में दूसरे यूरोपीय देशों की ओर पलायन जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। इटली के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता भी महत्वपूर्ण है। उत्तरी औद्योगिक क्षेत्रों और दक्षिणी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की स्थिति अलग-अलग है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अनेक युवाओं को ऐसा स्थायी रोजगार प्राप्त करने में कठिनाई होती है जिससे वे स्वतंत्र रूप से आवास और परिवार का खर्च उठा सकें। इसलिए विद्यालयों की खराब हालत को लेकर प्रारंभ हुआ आंदोलन उस व्यापक आर्थिक असुरक्षा से जुड़ गया है जो नई पीढ़ी के भविष्य को प्रभावित करती है।

17 अक्टूबर को मिलान और बोलोन्या में प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव की खबरें भी सामने आईं। कई स्थानों पर पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया, जबकि कुछ प्रदर्शनकारियों पर पत्थर फेंकने और हिंसा करने के आरोप लगे। इस तरह इटली का आंदोलन फ्रांस के विरोध प्रदर्शनों से प्रेरित तो है, लेकिन इसके अपने राष्ट्रीय मुद्दे भी हैं।

इटली में किसे राजनीतिक मुद्दा बनाया गया है?

यहाँ प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी तथा उनकी सरकार की शिक्षा, सामाजिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को सीधे चुनौती दी जा रही है। विद्यार्थियों ने शिक्षा मंत्री वाल्दितारा को भी जवाबदेह ठहराया है। आंदोलन में छात्र समूहों के अतिरिक्त वामपंथी विचारधारा से जुड़े संगठनों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी देखी जा रही है। परंतु इन समूहों की मौजूदगी से यह सिद्ध नहीं होता कि पूरा आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल के नियंत्रण में है।

इटली का उदाहरण दर्शाता है कि नई पीढ़ी के लिए शिक्षा, युद्ध पर सरकारी खर्च, पहचान की राजनीति और रोजगार अलग-अलग प्रश्न नहीं रह गए हैं। युवा अपने भविष्य को सरकार की समग्र राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देख रहे हैं।

3. अमेरिका : ट्रंप के विरुद्ध लोकतंत्र, नागरिक अधिकार और आप्रवासन नीति के सवाल

अमेरिका में नई पीढ़ी के राजनीतिक असंतोष का स्वरूप फ्रांस और इटली से अलग है। यहाँ विरोध का एक प्रमुख केंद्र राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ तथा उनके दूसरे कार्यकाल में संघीय सरकार की शक्तियों का उपयोग है। अमेरिकी युवाओं में राजनीतिक विचारों के आधार पर गहरा विभाजन भी है। बड़ी संख्या में युवा ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि अमेरिका की पूरी जेन-ज़ी पीढ़ी ट्रंप के खिलाफ खड़ी है। युवा मतदाताओं में रिपब्लिकन पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी, वामपंथी आंदोलनों और स्वतंत्र राजनीतिक समूहों के समर्थक मौजूद हैं। इसीलिए अमेरिका में विरोध का विश्लेषण करते समय प्रदर्शनकारी युवाओं और समग्र युवा मतदाता वर्ग में अंतर बनाए रखना चाहिए।

अमेरिकी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा है। 'नो किंग्स' अर्थात 'कोई राजा नहीं' नामक आंदोलन इसी राजनीतिक चिंता को व्यक्त करता है। इसके समर्थकों का तर्क है कि अमेरिका में राष्ट्रपति जनता द्वारा निर्वाचित संवैधानिक पदाधिकारी है, कोई निरंकुश शासक नहीं। वे सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही, स्वतंत्र चुनाव, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक संतुलन की रक्षा की माँग कर रहे हैं। 17 अक्टूबर 2026 को अमेरिका के विभिन्न शहरों में 'नो किंग्स : वोट अर्ली' अभियान के अंतर्गत रैलियाँ आयोजित हुईं। इनका प्रमुख उद्देश्य नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनाव से पहले मतदाताओं, विशेषकर असंतुष्ट नागरिकों, को मतदान के लिए प्रेरित करना था। वाशिंगटन, अटलांटा, ह्यूस्टन और कैलिफोर्निया के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्रम हुए। इस चरण में आंदोलन ने सड़क पर विरोध प्रदर्शन के साथ चुनावी भागीदारी को भी महत्वपूर्ण रणनीति बनाया।

अमेरिकी युवाओं में असंतोष का दूसरा बड़ा विषय आप्रवासन नीति है। ट्रंप प्रशासन की अवैध आप्रवासन के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, आप्रवासियों को हिरासत में रखने की व्यवस्था और इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट अर्थात ICE की कार्यप्रणाली को लेकर विरोध हुआ है। विशेष रूप से मिनेसोटा में जनवरी 2026 की कार्रवाई और नागरिकों की मौत से जुड़े घटनाक्रमों ने प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए। अनेक छात्र समूहों और नागरिक अधिकार संगठनों ने प्रवासी समुदायों के अधिकारों, हिरासत की प्रक्रियाओं तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा बल प्रयोग की समीक्षा की माँग की। विरोध करने वाले समूह इसे केवल आव्रजन नियंत्रण का प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं तथा सरकारी शक्तियों के दुरुपयोग की आशंका से जुड़ा मुद्दा मानते हैं। दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का पक्ष है कि आव्रजन कानूनों को लागू करना और सीमा सुरक्षा बनाए रखना संघीय सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है। इस विवाद में कानून लागू करने की आवश्यकता और उस प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के बीच वास्तविक राजनीतिक टकराव मौजूद है।

अमेरिका के विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी युवा राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। इजरायल-गाजा युद्ध को लेकर 2023 से प्रारंभ हुए परिसर आंदोलनों के बाद कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन संबंधी नियम सख्त हुए। सितंबर 2026 में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन और एमनेस्टी इंटरनेशनल अमेरिका की एक शोध रिपोर्ट ने 28 राज्यों तथा वाशिंगटन डीसी के 80 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से संबंधित नीतियों तथा कार्रवाइयों का अध्ययन किया। रिपोर्ट ने फिलिस्तीन समर्थक अभिव्यक्ति और छात्र विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयों को लेकर चिंता व्यक्त की। इस विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि परिसर में सुरक्षा, पढ़ाई की निरंतरता और उत्पीड़न से विद्यार्थियों का संरक्षण सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है। छात्र अधिकार समूहों का सवाल है कि इन उद्देश्यों को पूरा करते समय शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति पर अनुपातहीन प्रतिबंध क्यों लगाए जाएँ।

आर्थिक समस्याएँ भी अमेरिकी युवा असंतोष की पृष्ठभूमि में मौजूद हैं। महँगी उच्च शिक्षा, छात्र ऋण, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और महानगरों में आवास की कीमतों ने युवा पीढ़ी की आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। जलवायु परिवर्तन, गर्भपात संबंधी अधिकार और सामाजिक समानता जैसे प्रश्न भी अनेक युवा समूहों की राजनीतिक सक्रियता का हिस्सा हैं। हालाँकि इन सभी मुद्दों पर सक्रिय संगठन एक ही विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उदाहरण के लिए जलवायु आंदोलन में सनराइज मूवमेंट जैसे संगठन सक्रिय हैं, जबकि लोकतंत्र और चुनावी अधिकारों के प्रश्न पर इंडिविजिबल तथा अन्य नागरिक गठबंधन महत्वपूर्ण हैं।

अमेरिका में किसे बनाया गया है मुद्दा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उनकी प्रशासनिक नीतियाँ, ICE की कार्रवाई और चुनावी प्रक्रियाओं में संघीय सरकार की भूमिका विरोध का प्रमुख केंद्र हैं। लेकिन आंदोलन का लक्ष्य केवल किसी राष्ट्रपति को हटाना नहीं है। इसमें चुनावों के माध्यम से राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित करने, नागरिक स्वतंत्रताओं के संरक्षण और सरकारी शक्तियों पर संवैधानिक नियंत्रण की माँग भी शामिल है। अमेरिका इस अर्थ में अलग है कि यहाँ युवा असंतोष का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्र छात्र विद्रोह के बजाय स्थापित नागरिक संगठनों, चुनावी अभियानों और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से जुड़ा हुआ है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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