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80 की उम्र में भी 50 साल जैसा तेज दिमाग! वैज्ञानिकों ने खोजा सुपरएजर्स की याददाश्त का राज
New Delhi: अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के 25 वर्षों के शोध में सामने आए 'सुपरएजर्स'; कुछ बुजुर्गों के मस्तिष्क में उम्र बढ़ने के बावजूद बहुत कम सिकुड़ती है बाहरी परत, याददाश्त से जुड़ी कोशिकाएं भी रहती हैं अधिक सुरक्षित.
फोटो-सोशल मीडिया
New Delhi: उम्र बढ़ने के साथ शरीर की ताकत कम होना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन क्या दिमाग के साथ भी ऐसा होना जरूरी है? क्या अस्सी या नब्बे वर्ष की उम्र में भी कोई व्यक्ति अपनी याददाश्त, सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता को काफी हद तक सुरक्षित रख सकता है? आधुनिक तंत्रिका विज्ञान इन सवालों का दिलचस्प उत्तर दे रहा है। दुनिया में ऐसे बुजुर्ग मौजूद हैं जिनकी उम्र अस्सी वर्ष से अधिक है, लेकिन याददाश्त के विशेष परीक्षणों में उनका प्रदर्शन उनसे बीस से तीस वर्ष छोटे व्यक्तियों के बराबर पाया गया है। वैज्ञानिक इन्हें 'सुपरएजर्स' कहते हैं। अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में पिछले ढाई दशकों से चल रहे शोध में ऐसे लोगों के मस्तिष्क की संरचना, तंत्रिका कोशिकाओं और जीवनशैली का अध्ययन किया गया है। इसमें पता चला है कि कुछ बुजुर्गों के मस्तिष्क की बाहरी परत सामान्य वृद्धावस्था की अपेक्षा अधिक सुरक्षित रहती है। याददाश्त से जुड़े कुछ हिस्सों में कोशिकाओं की बनावट भी विशेष पाई गई है। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह नहीं जानते कि कोई व्यक्ति सुपरएजर क्यों बनता है और क्या केवल जीवनशैली बदलकर हर व्यक्ति वैसी याददाश्त हासिल कर सकता है।
इस विषय पर हाल के वर्षों में हुई वैज्ञानिक प्रगति ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है। उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति में याददाश्त समान गति से कमजोर होगी। कुछ लोगों में उम्र के साथ सामान्य बदलाव आते हैं, कुछ में संज्ञानात्मक क्षमता अपेक्षाकृत तेजी से गिरती है और कुछ लोग असाधारण रूप से अच्छी याददाश्त बनाए रखते हैं। इसमें आनुवंशिक बनावट, मस्तिष्क की संरचना, जीवनभर की गतिविधियां, शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक संबंध जैसे अनेक कारकों की भूमिका हो सकती है। अच्छी बात यह है कि ऐसे कई जोखिम कारक हैं जिन पर व्यक्ति अपनी दिनचर्या में बदलाव करके प्रभाव डाल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जुलाई 2026 में जारी डिमेंशिया और संज्ञानात्मक गिरावट की रोकथाम संबंधी नए दिशा-निर्देशों में भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया है।
कौन हैं सुपरएजर्स और वैज्ञानिक उन्हें कैसे पहचानते हैं?
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के सुपरएजिंग शोध कार्यक्रम में ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है जिनकी उम्र कम से कम अस्सी वर्ष हो और जिनकी विलंबित स्मरण क्षमता बीस से तीस वर्ष छोटे स्वस्थ व्यक्तियों के बराबर हो। विलंबित स्मरण का अर्थ है कि किसी व्यक्ति को शब्दों या सूचनाओं की एक सूची याद कराई जाए और कुछ समय बाद उससे पूछा जाए कि वह कितनी बातें याद रख पाया है।
अध्ययन में सामान्यतः पंद्रह शब्दों की सूची का प्रयोग किया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार औसतन अस्सी वर्ष के व्यक्ति का प्रदर्शन पंद्रह में लगभग पांच शब्द याद रखने के स्तर पर हो सकता है, जबकि पचास से साठ वर्ष की उम्र के स्वस्थ व्यक्तियों का औसत लगभग नौ शब्द रहता है। सुपरएजर्स इस दूसरे समूह के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि अस्सी वर्ष का सुपरएजर हर काम में पच्चीस वर्ष के युवा जितना तेज होता है। उसकी शारीरिक प्रतिक्रिया, नई जानकारी को संसाधित करने की गति या अन्य संज्ञानात्मक क्षमताएं अलग हो सकती हैं। सुपरएजर की पहचान मुख्य रूप से असाधारण स्मरण क्षमता के आधार पर होती है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के सुपरएजिंग कार्यक्रम के पच्चीस वर्षों के शोध की समीक्षा ने इस अवधारणा को और मजबूती दी। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे बुजुर्ग केवल याददाश्त की परीक्षा में अलग नहीं होते, बल्कि उनके मस्तिष्क की कुछ जैविक विशेषताएं भी सामान्य उम्रदराज लोगों से भिन्न होती हैं।
सुपरएजर्स के मस्तिष्क में क्या है खास?
मनुष्य का मस्तिष्क उम्र के साथ कुछ संरचनात्मक बदलावों से गुजरता है। मस्तिष्क की बाहरी परत, जिसे सेरेब्रल कॉर्टेक्स कहते हैं, सामान्य वृद्धावस्था में पतली हो सकती है। याददाश्त से जुड़े हिप्पोकैम्पस और अन्य हिस्सों के आकार में भी बदलाव आ सकते हैं।
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोध में पाया गया कि सुपरएजर्स में मस्तिष्क की बाहरी परत का आकार उनसे बीस से तीस वर्ष छोटे स्वस्थ व्यक्तियों के लगभग बराबर हो सकता है। उनके मस्तिष्क के 'एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स' नामक हिस्से की परत कुछ अध्ययनों में युवा व्यक्तियों की तुलना में भी अधिक मोटी पाई गई। यह क्षेत्र ध्यान, प्रेरणा, भावनाओं और निर्णय संबंधी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है।
इन बुजुर्गों के मस्तिष्क में 'वॉन इकोनोमो न्यूरॉन्स' नामक विशेष तंत्रिका कोशिकाएं भी अधिक संख्या में देखी गई हैं। ये कोशिकाएं सामाजिक व्यवहार और जटिल मानसिक प्रक्रियाओं से संबंधित मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त याददाश्त से जुड़े एंटोराइनल कॉर्टेक्स के कुछ न्यूरॉन्स अपेक्षाकृत बड़े पाए गए हैं।
शोधकर्ताओं के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ये विशेषताएं जन्म से मौजूद थीं या जीवनभर के अनुभवों और गतिविधियों ने इन्हें सुरक्षित रखने में भूमिका निभाई। फिलहाल इसका निर्णायक उत्तर उपलब्ध नहीं है।
क्या सुपरएजर्स को अल्जाइमर से भी सुरक्षा मिलती है?
अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क में एमिलॉयड बीटा और टाउ नामक प्रोटीन से संबंधित असामान्य बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लंबे समय के साथ ये बदलाव तंत्रिका कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।
सुपरएजर्स पर किए गए शोध से दो संभावित जैविक प्रक्रियाओं की जानकारी मिली है। पहली को 'रेजिस्टेंस' यानी प्रतिरोध कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियों के मस्तिष्क में अल्जाइमर से संबंधित कुछ असामान्य प्रोटीन संरचनाएं अपेक्षाकृत कम विकसित होती हैं। दूसरी प्रक्रिया 'रेजिलिएंस' यानी सहनशीलता है। इसमें मस्तिष्क में कुछ रोग संबंधी बदलाव मौजूद होने के बावजूद व्यक्ति की याददाश्त अपेक्षाकृत अच्छी बनी रहती है।
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इन दोनों प्रकार की विशेषताओं वाले सुपरएजर्स का अध्ययन किया है। इससे संकेत मिलता है कि अच्छी याददाश्त बनाए रखने के एक से अधिक जैविक रास्ते हो सकते हैं।
लेकिन सुपरएजर होना अल्जाइमर रोग से आजीवन सुरक्षा मिलने की गारंटी नहीं है। शोध का उद्देश्य उन प्रक्रियाओं को समझना है जो मस्तिष्क को असाधारण रूप से स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती हैं। भविष्य में इनसे नई चिकित्सकीय रणनीतियां विकसित होने की संभावना हो सकती है।
ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर क्या हैं, इनके बिना दिमाग कैसे काम करेगा?
मस्तिष्क की संरचना को समझने के लिए ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर का अंतर जानना उपयोगी है। मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा सेरेब्रम है, जिसमें सोचने, भाषा, स्मरण, संवेदना और स्वैच्छिक गतिविधियों से संबंधित अनेक क्षेत्र मौजूद हैं। इसके अलावा सेरेबेलम शरीर के संतुलन और गतिविधियों के समन्वय में भूमिका निभाता है, जबकि ब्रेनस्टेम सांस, हृदयगति और कई अनैच्छिक शारीरिक क्रियाओं के नियंत्रण में महत्वपूर्ण है।
सेरेब्रम की बाहरी परत सेरेब्रल कॉर्टेक्स मुख्यतः ग्रे मैटर से बनी होती है। यह सामान्यतः लगभग दो से चार मिलीमीटर मोटी होती है। ग्रे मैटर में तंत्रिका कोशिकाओं के शरीर, उनके संपर्क और अन्य सहायक संरचनाएं होती हैं। लेकिन ग्रे मैटर केवल बाहरी परत में नहीं पाया जाता। मस्तिष्क के भीतर भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से मौजूद हैं।
व्हाइट मैटर मुख्यतः ऐसे तंत्रिका तंतुओं से बना होता है जिन पर मायलिन नामक आवरण होता है। ये तंतु मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों के बीच सूचना का आदान-प्रदान करने में मदद करते हैं। इसे एक बड़े शहर की संचार व्यवस्था से समझा जा सकता है। ग्रे मैटर में सूचना के प्रसंस्करण से संबंधित गतिविधियां होती हैं, जबकि व्हाइट मैटर अलग-अलग क्षेत्रों के बीच तेज संचार सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उम्र के साथ दोनों प्रकार के ऊतकों में बदलाव आ सकते हैं। लेकिन केवल ग्रे मैटर का आकार देखकर किसी व्यक्ति की पूरी बौद्धिक क्षमता निर्धारित नहीं की जा सकती। याददाश्त और सोचने की क्षमता मस्तिष्क के अनेक हिस्सों तथा उनके बीच बने नेटवर्क के संयुक्त काम का परिणाम है।
दिमाग में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स, फिर भी नए संपर्क बनाने की क्षमता बनी रहती है
मानव मस्तिष्क में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होने का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला वैज्ञानिक अनुमान है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क करती हैं। न्यूरॉन्स के बीच संपर्क स्थलों को सिनैप्स कहा जाता है।
जब हम नई जानकारी सीखते हैं, किसी कौशल का अभ्यास करते हैं या कोई अनुभव प्राप्त करते हैं, तब मस्तिष्क के कुछ तंत्रिका नेटवर्क की गतिविधियों और संपर्कों में बदलाव हो सकते हैं। इसी व्यापक क्षमता को 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' कहा जाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर बार नई भाषा सीखने या पहेली हल करने पर बड़ी संख्या में नए न्यूरॉन्स बन जाते हैं। वयस्क मनुष्य के मस्तिष्क में नए न्यूरॉन्स बनने की सीमा और मात्रा पर वैज्ञानिक अध्ययन जारी हैं। सीखने की प्रक्रिया में पहले से मौजूद न्यूरॉन्स के बीच संपर्कों की कार्यक्षमता बदलना अधिक स्थापित प्रक्रिया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यूरोप्लास्टिसिटी केवल बचपन तक सीमित नहीं रहती। वृद्धावस्था में भी मस्तिष्क सीखने और अपने नेटवर्क में बदलाव करने की क्षमता बनाए रख सकता है। यह क्षमता उम्र, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
कॉग्निटिव रिजर्व: दिमाग की वह अतिरिक्त क्षमता जो उम्र के असर को कम कर सकती है
वृद्धावस्था में मानसिक स्वास्थ्य के अध्ययन में 'कॉग्निटिव रिजर्व' एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका सामान्य अर्थ है मस्तिष्क की वह क्षमता जिसके सहारे व्यक्ति उम्र बढ़ने अथवा कुछ रोग संबंधी बदलाव होने के बावजूद अपनी मानसिक गतिविधियां अपेक्षाकृत बेहतर बनाए रख सकता है।
इसे समझने के लिए दो व्यक्तियों का उदाहरण लिया जा सकता है। दोनों के मस्तिष्क में उम्र से संबंधित लगभग समान जैविक बदलाव हैं।लेकिन एक की याददाश्त और दैनिक कामकाज की क्षमता दूसरे से बेहतर बनी रहती है। शोधकर्ताओं के अनुसार इस अंतर में कॉग्निटिव रिजर्व की भूमिका हो सकती है। शिक्षा, जटिल मानसिक कार्य, विभिन्न प्रकार की बौद्धिक गतिविधियां और जीवनभर के अनुभव इस क्षमता से जुड़े पाए गए हैं।
लेकिन कॉग्निटिव रिजर्व किसी निश्चित स्थान पर जमा होने वाली ऊर्जा या कोशिकाओं का भंडार नहीं है। यह मस्तिष्क के नेटवर्क की कार्यक्षमता और लचीलेपन को समझाने वाला वैज्ञानिक विचार है।
इसलिए जीवनभर पढ़ने, सीखने और मानसिक रूप से सक्रिय रहने को महत्व दिया जाता है। कोई व्यक्ति नई भाषा सीखे, संगीत वाद्य बजाने का अभ्यास करे, चित्रकारी सीखे अथवा नई तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू करे, तो उसे नई मानसिक चुनौतियां मिलती हैं। हालांकि यह दावा करना सही नहीं होगा कि ऐसे किसी एक अभ्यास से अल्जाइमर पूरी तरह रुक जाएगा।
जुलाई 2026 की डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट में क्या सामने आया?
दिमाग को स्वस्थ रखने के मामले में सबसे महत्वपूर्ण नया वैज्ञानिक दस्तावेज विश्व स्वास्थ्य संगठन की 15 जुलाई, 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट है। इसका शीर्षक 'रिस्क रिडक्शन ऑफ कॉग्निटिव डिक्लाइन एंड डिमेंशिया' है। यह वर्ष 2019 में प्रकाशित दिशा-निर्देशों का संशोधित संस्करण है।
इस रिपोर्ट में डब्ल्यूएचओ ने जीवनभर मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए कई ऐसे कारकों पर ध्यान देने की सलाह दी है जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, असंतुलित भोजन, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, सुनने और देखने की समस्याएं, अवसाद तथा वायु प्रदूषण जैसे कारक शामिल हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में डिमेंशिया के लगभग 45 प्रतिशत मामलों को संभावित रूप से रोका या देर से उत्पन्न होने वाला बनाया जा सकता है, यदि संबंधित जोखिम कारकों को प्रभावी ढंग से कम किया जाए। यह जनसंख्या स्तर का अनुमान है, किसी एक व्यक्ति के लिए डिमेंशिया से 45 प्रतिशत सुरक्षा मिलने की गारंटी नहीं।
यह अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया केवल मानसिक अभ्यास से प्रभावित नहीं होती। हृदय, रक्तवाहिकाओं, चयापचय और शरीर के अन्य अंगों की स्थिति भी मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़ी है।
केवल दिमाग की कसरत नहीं, पैरों की कसरत भी जरूरी
बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के चिकित्सक डॉ. विजयनाथ मिश्रा मानसिक सक्रियता और जिज्ञासा बनाए रखने को महत्वपूर्ण मानते हैं। इसका एक व्यावहारिक पहलू यह है कि व्यक्ति को ऐसे काम करते रहना चाहिए जिनमें उसे नई बातें सीखनी पड़ें और ध्यान लगाना पड़े।
लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों में शारीरिक व्यायाम का भी विशेष महत्व सामने आया है। तेज पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैरना और उम्र तथा शारीरिक क्षमता के अनुसार अन्य व्यायाम करना मस्तिष्क के लिए लाभकारी हो सकता है।
व्यायाम से रक्त संचार और हृदय स्वास्थ्य बेहतर हो सकते हैं। कुछ अध्ययनों में व्यायाम का संबंध मस्तिष्क की प्लास्टिसिटी तथा ब्रेन-डिराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर यानी बीडीएनएफ जैसे प्रोटीन से भी पाया गया है। यह प्रोटीन तंत्रिका कोशिकाओं के स्वास्थ्य और उनकी कार्यप्रणाली से जुड़ा है।
हालांकि व्यायाम करने से हर व्यक्ति का हिप्पोकैम्पस निश्चित रूप से सिकुड़ना बंद कर देगा, ऐसा कहना उचित नहीं है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जुलाई 2026 के दिशा-निर्देशों में सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता वाले वयस्कों के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि की मजबूत अनुशंसा की है। वृद्ध व्यक्तियों को भी अपनी क्षमता के अनुसार नियमित चलना, मांसपेशियां मजबूत करने वाले व्यायाम और संतुलन सुधारने वाली गतिविधियां करनी चाहिए।
पूरी नींद में छिपा है याददाश्त का एक महत्वपूर्ण रहस्य
मस्तिष्क के स्वास्थ्य में नींद की भूमिका केवल आराम तक सीमित नहीं है। नींद के दौरान दिनभर प्राप्त सूचनाओं को व्यवस्थित करने और कुछ स्मृतियों को मजबूत करने से संबंधित प्रक्रियाएं सक्रिय रहती हैं।
मस्तिष्क में 'ग्लिम्फेटिक सिस्टम' नाम से जानी जाने वाली एक अपशिष्ट निकासी व्यवस्था का भी अध्ययन किया जा रहा है। पशुओं पर हुए शोध में नींद के दौरान मस्तिष्क से कुछ अपशिष्ट पदार्थों को हटाने की प्रक्रिया अधिक सक्रिय पाई गई है। मनुष्यों में इस व्यवस्था की सटीक कार्यप्रणाली और डिमेंशिया से उसके संबंध पर शोध जारी है।
यह कहना कि गहरी नींद लेने से अल्जाइमर पैदा करने वाले सभी विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन नियमित और पर्याप्त नींद याददाश्त, ध्यान, मनोदशा और समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
अधिकांश वयस्कों के लिए लगभग सात से नौ घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद सामान्य सलाह है। वृद्धावस्था में भी नींद की जरूरत पूरी तरह समाप्त नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति को खर्राटों के साथ सांस रुकने, अत्यधिक दिन की नींद या लगातार अनिद्रा की समस्या है, तो चिकित्सकीय जांच उपयोगी हो सकती है।
सामाजिक संबंधों का दिमाग से क्या रिश्ता?
सुपरएजर्स के अध्ययन में एक दिलचस्प विशेषता बार-बार सामने आई है। ऐसे अनेक बुजुर्गों के सामाजिक संबंध मजबूत पाए गए हैं। वे मित्रों, परिवार और समुदाय के साथ संपर्क बनाए रखते हैं।
सामाजिक गतिविधियों के दौरान व्यक्ति को बातचीत, स्मरण, भावनाओं की समझ और नई परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया जैसी अनेक मानसिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसलिए सामाजिक संबंध दिमाग को विभिन्न तरीकों से सक्रिय रखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
अकेलापन और सामाजिक अलगाव को संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए संभावित जोखिम कारकों में शामिल किया गया है। हालांकि सामाजिक संबंध और अच्छी याददाश्त के बीच संबंध होने से यह सिद्ध नहीं होता कि केवल अधिक लोगों से मिलने से कोई व्यक्ति सुपरएजर बन जाएगा।
इसके बावजूद वृद्ध लोगों के लिए परिवार से बातचीत, मित्रों के संपर्क में रहना, सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लेना और अपनी रुचि से जुड़ी गतिविधियां जारी रखना महत्वपूर्ण है। किताब पढ़कर उस पर चर्चा करना, किसी समूह को पढ़ाना या नई पीढ़ी को अपने अनुभव बताना भी मानसिक सक्रियता के उपयोगी तरीके हो सकते हैं।
भोजन कैसा हो? जादुई खाद्य पदार्थ नहीं, संतुलित आहार महत्वपूर्ण
मस्तिष्क के लिए कुछ खाद्य पदार्थों को चमत्कारी बताने का चलन बढ़ा है। कभी अखरोट को याददाश्त बढ़ाने वाला बताया जाता है तो कभी ओमेगा-3, बेरीज या किसी विशेष सप्लीमेंट को दिमाग जवान रखने का उपाय कहा जाता है।
वास्तविक वैज्ञानिक प्रमाण अधिक संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, मेवे और स्वस्थ वसा वाले विविधतापूर्ण भोजन का संबंध बेहतर समग्र स्वास्थ्य से है। भूमध्यसागरीय भोजन पद्धति और एमआईएनडी डाइट जैसी आहार प्रणालियों पर हुए कुछ अध्ययनों में बेहतर संज्ञानात्मक स्वास्थ्य से संबंध देखा गया है।
भारत में भी मौसमी फल, हरी सब्जियां, दालें, पर्याप्त प्रोटीन, उचित मात्रा में मेवे और सीमित अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन पर आधारित संतुलित आहार उपयोगी हो सकता है।
लेकिन भोजन से मिलने वाले पोषक तत्व और कैप्सूल के रूप में लिए जाने वाले सप्लीमेंट समान बात नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2026 के दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिन लोगों में विटामिन की कमी प्रमाणित नहीं है, उन्हें केवल डिमेंशिया की रोकथाम के लिए विटामिन बी, विटामिन ई, ओमेगा-3 या मल्टीविटामिन सप्लीमेंट लेने की सलाह नहीं दी जाती। इनसे अपेक्षित लाभ का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला है।
यदि किसी व्यक्ति में विटामिन बी-12 या अन्य पोषक तत्वों की कमी है, तो उसका उपचार अलग चिकित्सकीय आवश्यकता है। कमी का इलाज करना और सामान्य व्यक्ति में स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए अनावश्यक सप्लीमेंट लेना एक जैसी बातें नहीं हैं।
सुडोकू और शतरंज से क्या सचमुच दिमाग तेज होता है?
दिमाग की कसरत के नाम पर सुडोकू, वर्ग पहेली, शतरंज और विभिन्न मोबाइल एप लोकप्रिय हैं। इनके बारे में दो अतिवादी धारणाएं प्रचलित हैं। पहली, इन्हें खेलने से व्यक्ति डिमेंशिया से सुरक्षित हो जाता है। दूसरी, इनका दिमाग के स्वास्थ्य से कोई संबंध नहीं है।
वैज्ञानिक प्रमाण इन दोनों धारणाओं के बीच हैं। किसी मानसिक खेल का अभ्यास करने से व्यक्ति उस विशेष गतिविधि में बेहतर हो सकता है। कुछ अध्ययनों में संज्ञानात्मक प्रशिक्षण से याददाश्त, ध्यान या कार्यकारी क्षमता के विशेष परीक्षणों में सीमित सुधार भी पाया गया है।
लेकिन यह प्रमाण पर्याप्त नहीं है कि केवल सुडोकू खेलने से मस्तिष्क के सभी हिस्से मजबूत हो जाते हैं या डिमेंशिया का जोखिम निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है।
इसलिए पहेलियां हल करना, किताब पढ़ना, शतरंज खेलना और नई भाषा सीखना उपयोगी मानसिक गतिविधियां हो सकती हैं। लेकिन इन्हें पर्याप्त नींद, शारीरिक व्यायाम और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के उपचार का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
मल्टीटास्किंग से दिमाग तेज नहीं होता
आज की जीवनशैली में एक साथ अनेक काम करना दक्षता का प्रतीक माना जाने लगा है। लोग फोन पर बातचीत करते हुए ईमेल पढ़ते हैं, टीवी देखते हुए सोशल मीडिया चलाते हैं और एक काम के बीच बार-बार दूसरे काम पर ध्यान देते हैं।
मस्तिष्क में ध्यान और कार्यकारी नियंत्रण से संबंधित प्रक्रियाओं की अपनी सीमाएं होती हैं। जब दो कामों को एक साथ पर्याप्त ध्यान की जरूरत होती है, तो अक्सर व्यक्ति तेजी से एक काम से दूसरे काम की ओर ध्यान बदल रहा होता है। इससे त्रुटियां बढ़ सकती हैं और काम पूरा करने में अधिक समय लग सकता है।
हालांकि हर प्रकार का मल्टीटास्किंग हानिकारक नहीं है। उदाहरण के लिए कुछ अभ्यास से स्वचालित हो चुकी गतिविधियां दूसरी गतिविधियों के साथ की जा सकती हैं। लेकिन लगातार ध्यान बदलने को दिमाग को जवान रखने की वैज्ञानिक विधि नहीं माना जा सकता।
विशेष रूप से उम्रदराज लोगों के लिए किसी नए और जटिल काम को सीखते समय पर्याप्त ध्यान देना अधिक उपयोगी हो सकता है। मानसिक चुनौती और अनावश्यक मानसिक तनाव में अंतर समझना भी जरूरी है।
ध्यान और प्राणायाम कितने उपयोगी?
योग, ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास तनाव कम करने, मानसिक शांति और एकाग्रता बनाए रखने के लिए किया जाता है। कुछ अध्ययनों में ध्यान के अभ्यास का संबंध ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, मनोदशा और मस्तिष्क की कुछ संरचनात्मक विशेषताओं से पाया गया है।
लेकिन अध्ययनों के परिणाम एक जैसे नहीं हैं। यह दावा कि ध्यान करने से प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में ग्रे मैटर की मात्रा बढ़ जाएगी या अल्जाइमर रोग रुक जाएगा, प्रमाणित नहीं है।
योग और प्राणायाम को शारीरिक गतिविधि, तनाव प्रबंधन तथा बेहतर दिनचर्या के एक सहायक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। वृद्ध व्यक्तियों को ऐसे अभ्यास अपनी शारीरिक क्षमता और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार करने चाहिए।
रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल का दिमाग से सीधा संबंध
मस्तिष्क शरीर का एक ऐसा अंग है जिसे निरंतर पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। रक्तवाहिकाओं का स्वास्थ्य खराब होने से मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
उच्च रक्तचाप, मधुमेह और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग तथा स्ट्रोक के जोखिम बढ़ाते हैं। इनका संबंध संज्ञानात्मक गिरावट और कुछ प्रकार के डिमेंशिया से भी पाया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन बीमारियों की समय पर पहचान और प्रभावी प्रबंधन को मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान छोड़ना, अत्यधिक शराब के सेवन से बचना और शारीरिक रूप से सक्रिय रहना भी आवश्यक है।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारक सुनने की क्षमता में कमी है। लंबे समय तक सुनने में परेशानी होने से व्यक्ति बातचीत और सामाजिक गतिविधियों से दूर हो सकता है। डब्ल्यूएचओ ने आवश्यकता के अनुसार हियरिंग एड तथा सुनने की समस्या के उपचार को भी डिमेंशिया का जोखिम कम करने वाली रणनीतियों में स्थान दिया है।
इसी तरह दृष्टि संबंधी समस्याओं, अवसाद और वायु प्रदूषण के प्रभाव पर भी ध्यान देने की सलाह दी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को केवल याददाश्त के अभ्यास तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता।
सामान्य भूलने की आदत और डिमेंशिया में अंतर कैसे पहचानें?
बढ़ती उम्र में कभी-कभी किसी परिचित व्यक्ति का नाम तुरंत याद न आना, चश्मा कहां रखा था यह भूल जाना या नई तकनीक सीखने में अधिक समय लगना सामान्य बदलावों का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति को हाल की बातचीत लगातार याद नहीं रहती, वह बार-बार एक ही सवाल पूछता है, परिचित स्थानों पर रास्ता भूलने लगता है या रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में स्पष्ट गिरावट आती है, तो चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।
विशेष रूप से आर्थिक लेन-देन में असामान्य गलतियां, दवाओं का सेवन भूलना, परिचित कार्यों को पूरा न कर पाना तथा व्यवहार या व्यक्तित्व में महत्वपूर्ण बदलाव चिंता का विषय हो सकते हैं।
हालांकि ऐसे लक्षणों का कारण हमेशा अल्जाइमर रोग नहीं होता। विटामिन बी-12 की कमी, थायरॉयड संबंधी समस्याएं, अवसाद, नींद की बीमारी, कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव और अन्य उपचार योग्य स्थितियां भी याददाश्त को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए समय पर चिकित्सक से जांच कराना महत्वपूर्ण है। अचानक भ्रम, बोलने में कठिनाई, शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या अचानक चेतना में बदलाव दिखाई दे तो इसे सामान्य भूलने की समस्या न मानकर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
क्या हर व्यक्ति सुपरएजर बन सकता है?
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अभी इस प्रश्न का निर्णायक उत्तर नहीं दे पाए हैं। सुपरएजर्स में असाधारण स्मरण क्षमता और मस्तिष्क की विशेष संरचनाएं पाई गई हैं, लेकिन यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इनमें आनुवंशिकी और जीवनशैली की कितनी-कितनी भूमिका है।
यह भी उल्लेखनीय है कि सुपरएजर्स की जीवनशैली एक जैसी नहीं होती। कुछ लोग नियमित व्यायाम करते हैं, कुछ उतने सक्रिय नहीं होते। कुछ का खानपान अत्यधिक अनुशासित होता है, जबकि दूसरे अपेक्षाकृत सामान्य जीवनशैली अपनाते हैं। मजबूत सामाजिक संबंध और सक्रिय जीवन में भागीदारी अनेक सुपरएजर्स में दिखाई देती है, लेकिन कोई एक आदत अभी सुपरएजिंग का निश्चित कारण साबित नहीं हुई है।
इसलिए अस्सी वर्ष की उम्र में पचास वर्ष जैसी याददाश्त पाने का कोई प्रमाणित नुस्खा उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि व्यक्ति मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए कुछ कर ही नहीं सकता।
वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित पोषण, पर्याप्त नींद, सामाजिक संपर्क, नया सीखने की आदत और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का नियंत्रण संज्ञानात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भूमिका निभा सकते हैं।
मस्तिष्क की बढ़ती उम्र को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। लेकिन कुछ जोखिमों को कम करना और मानसिक तथा शारीरिक सक्रियता बनाए रखना संभव है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने नए दिशानिर्देशों में जीवन के किसी एक चरण के बजाय पूरे जीवनकाल में मस्तिष्क स्वास्थ्य का ध्यान रखने पर जोर दिया है।
सुपरएजर्स पर हुए शोध का सबसे बड़ा संदेश यह नहीं है कि हर व्यक्ति अस्सी की उम्र में युवा जैसा दिमाग पा सकता है। उसका संदेश यह है कि मस्तिष्क की कार्यक्षमता में गिरावट हर व्यक्ति की नियति एक जैसी नहीं होती। उम्र बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन जिज्ञासा, सीखने की इच्छा, सामाजिक सक्रियता और स्वस्थ दिनचर्या को छोड़ देना आवश्यक नहीं।


