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Houthi Attacks on Saudi Arabia: धमाकों से दहल उठा सऊदी अरब, हूती हमलों से क्यों बढ़ा युद्ध का खतरा?
Houthi Attacks on Saudi Arabia: जानिए यमन युद्ध, हूती मिसाइल और ड्रोन हमलों, ईरान की भूमिका, बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर संकट का सऊदी अरब व भारत पर क्या असर पड़ सकता है।
Houthi Attacks on Saudi Arabia |Saudi Arabia Yemen War | Houthi Rebels | Newstrack Hindi
Houthi Attacks on Saudi Arabia: सऊदी अरब पर यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों की कहानी केवल दो पड़ोसी देशों के बीच सैन्य संघर्ष की कहानी नहीं है। इसके पीछे अरब प्रायद्वीप का जटिल इतिहास, यमन की राजनीतिक अस्थिरता, शिया-सुन्नी पहचान से जुड़ी राजनीति, ईरान और सऊदी अरब की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता, अमेरिका की सुरक्षा नीति, इजरायल और फिलिस्तीन का संघर्ष तथा लाल सागर के समुद्री व्यापार पर नियंत्रण की लड़ाई जैसे अनेक कारण मौजूद हैं। लगभग एक दशक तक सऊदी अरब के हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों, सैन्य ठिकानों और सीमावर्ती इलाकों को हूती मिसाइलों और विस्फोटक ड्रोन का खतरा झेलना पड़ा। दूसरी ओर, सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के यमन में हवाई हमलों, आर्थिक प्रतिबंधों और लंबे गृहयुद्ध ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। इस संघर्ष ने यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध में अपेक्षाकृत कम संसाधनों वाला कोई सशस्त्र संगठन भी मिसाइलों, ड्रोन और बाहरी तकनीकी सहायता के सहारे किसी समृद्ध देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर चुनौती दे सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हूती कौन हैं, उनका सऊदी अरब से संघर्ष क्यों शुरू हुआ, ईरान उन्हें किस प्रकार सहायता देता रहा है, अमेरिका और इजरायल की इसमें क्या भूमिका है तथा क्या यह संघर्ष वास्तव में धार्मिक है या इसके पीछे सत्ता, भूगोल, तेल, व्यापार और क्षेत्रीय वर्चस्व की बड़ी लड़ाई छिपी हुई है। इन प्रश्नों को समझने के लिए केवल हाल के हमलों को देखना पर्याप्त नहीं है। हमें यमन के आधुनिक इतिहास, 2011 के अरब विद्रोह, 2014 में हूतियों के राजधानी सना पर कब्जे और मार्च 2015 में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप तक लौटना होगा।
रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमला : 12 लोगों की मौत, 309 घायल
11 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष ने अत्यंत गंभीर रूप ले लिया है। 10 अक्टूबर को सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में कम से कम 12 लोगों की मौत हुई और 309 अन्य घायल हो गए। मरने वालों में चार सऊदी नागरिक, दो बांग्लादेशी तथा अमेरिका, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, फिलिस्तीन और सूडान का एक-एक नागरिक शामिल था। घायलों में कई लोगों की हालत गंभीर बताई गई। यह पिछले एक दशक से अधिक समय में सऊदी अरब की धरती पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक माना जा रहा है। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने इसके लिए हूती संगठन को जिम्मेदार ठहराते हुए इसे युद्ध अपराध बताया है। हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हूतियों ने इस विशेष हमले की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं की थी। उन्होंने अगले दिन सऊदी हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र का उपयोग न करने की चेतावनी जरूर दोहराई। इसलिए हमले के लिए सऊदी सरकार के आरोप और हूतियों की ओर से औपचारिक जिम्मेदारी स्वीकार करने के बीच अंतर करना आवश्यक है।
इस हमले ने रियाद में सामान्य जनजीवन को प्रभावित किया। अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द करनी पड़ीं या दूसरे हवाई अड्डों की ओर मोड़ दी गईं। हवाई अड्डे का संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा और रियाद के विद्यालयों में एक सप्ताह के लिए दूरस्थ शिक्षण की व्यवस्था की गई। अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियों और विदेशी नागरिकों के लिए सुरक्षा संबंधी चेतावनियां जारी की गईं। यह हमला इसलिए भी विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि किसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मिसाइल या ड्रोन हमला केवल संबंधित देश की सुरक्षा का प्रश्न नहीं होता। वहां मौजूद विमान, ईंधन भंडार, कर्मचारी और विभिन्न देशों के यात्री एक साथ खतरे में पड़ जाते हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा करते हुए अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पालन पर जोर दिया।
इससे पहले अक्टूबर के पहले सप्ताह में भी सऊदी अरब के अनेक ठिकानों पर हमले हुए थे। जजान और नजरान के हवाई अड्डों को निशाना बनाया गया। आभा हवाई अड्डे तथा रियाद के किंग खालिद हवाई अड्डे पर हमलों में मौतें और घायल होने की घटनाएं सामने आईं। हूतियों ने लाल सागर के तट पर स्थित राबिग की तेल रिफाइनरी को भी निशाना बनाने का दावा किया, हालांकि इस दावे की तत्काल स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। आठ अक्टूबर को सऊदी गठबंधन ने रियाद की ओर बढ़ रही दो बैलिस्टिक मिसाइलों और खमीस मुशैत की ओर जा रही एक अन्य मिसाइल को नष्ट करने का दावा किया। इस प्रकार अक्टूबर के हमले किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि कई सप्ताह से बढ़ते सैन्य टकराव का हिस्सा हैं।
हूती कौन हैं और यमन में उनका उदय कैसे हुआ?
हूती संगठन का औपचारिक नाम अंसार अल्लाह है। इसकी जड़ें उत्तरी यमन के सादा प्रांत में हैं। यह संगठन मुख्यतः जैदी शिया मुस्लिम समुदाय से निकला है। जैदी इस्लाम शिया परंपरा की एक विशिष्ट शाखा है, जिसकी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान ईरान में प्रचलित बारह इमामी शिया परंपरा से अलग है। इस अंतर को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हूतियों को केवल ईरान के शिया विस्तार का परिणाम मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से अधूरा निष्कर्ष होगा। जैदी समुदाय का यमन में लगभग एक हजार वर्ष पुराना राजनीतिक और धार्मिक इतिहास रहा है। उत्तरी यमन में जैदी इमामों की सत्ता लंबे समय तक कायम रही और 1962 की क्रांति के बाद वहां गणतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में यमन के जैदी समुदाय के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत होने लगी कि उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान कमजोर की जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती और उनके सहयोगियों ने एक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप देना शुरू किया। शुरुआत में यह आंदोलन जैदी पहचान के संरक्षण, स्थानीय स्वायत्तता और यमन की केंद्रीय सत्ता की नीतियों के विरोध से जुड़ा था। धीरे-धीरे इसमें अमेरिका-विरोधी, इजरायल-विरोधी और सऊदी प्रभाव-विरोधी विचार प्रमुख होने लगे।
वर्ष 2004 में यमन की तत्कालीन सरकार और हूती समर्थकों के बीच सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ। इसी वर्ष हुसैन अल-हूती मारे गए। उनके मारे जाने के बाद आंदोलन समाप्त होने के बजाय अधिक उग्र हो गया। 2004 से 2010 के बीच यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच छह बड़े दौर के युद्ध हुए। इनमें हजारों लोग प्रभावित हुए और उत्तरी यमन में केंद्रीय सत्ता की पकड़ कमजोर होती चली गई। बाद में हुसैन के भाई अब्दुल मलिक अल-हूती आंदोलन के प्रमुख नेता बने। इस दौरान संगठन ने स्थानीय कबीलों के साथ संबंध बनाए, हथियार जुटाए और एक संगठित सैन्य शक्ति के रूप में अपनी पहचान विकसित की।
2011 का अरब विद्रोह और 2014 में राजधानी सना पर कब्जा
वर्ष 2011 में अरब देशों में शुरू हुए जनआंदोलनों ने यमन की राजनीति को भी बदल दिया। राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के लंबे शासन के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ी और अब्दरब्बुह मंसूर हादी राष्ट्रपति बने। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बावजूद यमन में स्थिरता स्थापित नहीं हो सकी। सेना, कबीलों, राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच गहरे मतभेद बने रहे। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक संकट और सरकारी संस्थाओं की कमजोरी ने असंतोष को और बढ़ाया।
हूतियों ने इस अस्थिरता का लाभ उठाया। सितंबर 2014 में उन्होंने राजधानी सना पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उनके इस अभियान में पूर्व राष्ट्रपति सालेह से जुड़े सैन्य और राजनीतिक तत्वों का भी सहयोग था, जबकि सालेह पहले हूतियों के विरुद्ध युद्ध लड़ चुके थे। यह गठबंधन विचारधारा के बजाय तत्कालीन राजनीतिक हितों पर आधारित था। 2015 की शुरुआत तक हूतियों ने राष्ट्रपति हादी की सरकार को गंभीर संकट में डाल दिया। हादी अंततः दक्षिणी शहर अदन पहुंचे और बाद में सऊदी अरब चले गए।
सऊदी अरब के लिए यह घटनाक्रम असाधारण रूप से चिंताजनक था। यमन उसकी दक्षिणी सीमा से लगा हुआ देश है। रियाद को आशंका थी कि यदि हूती पूरे यमन पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं तो उसकी सीमा पर ईरान से निकट संबंध रखने वाली एक शक्तिशाली सशस्त्र सत्ता स्थापित हो जाएगी। यह आशंका केवल धार्मिक मतभेद तक सीमित नहीं थी। इसमें सीमा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, मिसाइल क्षमता और अरब प्रायद्वीप में सऊदी प्रभाव जैसे प्रश्न भी शामिल थे।
मार्च 2015 : सऊदी अरब का सैन्य हस्तक्षेप और युद्ध का विस्तार
26 मार्च 2015 को सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू किए। इस अभियान का घोषित उद्देश्य राष्ट्रपति हादी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को बहाल करना और हूतियों की सैन्य बढ़त रोकना था। संयुक्त अरब अमीरात सहित कई अरब देशों ने इस गठबंधन में अलग-अलग स्तर पर भाग लिया। अमेरिका ने शुरुआती वर्षों में हथियार, खुफिया जानकारी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई।
सऊदी नेतृत्व का अनुमान था कि सैन्य दबाव से हूतियों को अपेक्षाकृत जल्दी पीछे हटाया जा सकेगा। लेकिन युद्ध लंबा खिंच गया। हूतियों ने उत्तरी यमन के पहाड़ी भूभाग, स्थानीय सामाजिक नेटवर्क और अपनी सैन्य संरचना का उपयोग करके प्रतिरोध जारी रखा। गठबंधन के हवाई हमलों ने अनेक सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन हूती नेतृत्व और संगठन की लड़ने की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
इस युद्ध में सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ा। यमन के अस्पतालों, विद्यालयों, बाजारों, सड़कों, बंदरगाहों और जलापूर्ति व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंची। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के कई हवाई हमलों में बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए। दूसरी ओर, हूतियों पर भी नागरिक इलाकों पर गोलाबारी, बारूदी सुरंगें बिछाने, मनमानी हिरासत, बच्चों की भर्ती और मानवीय सहायता में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोप लगे। इस प्रकार संघर्ष के दोनों पक्षों के आचरण पर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन के प्रश्न उठे।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने अपने 2021 के आकलन में अनुमान लगाया था कि 2021 के अंत तक युद्ध के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों से यमन में लगभग 3,77,000 मौतें हो सकती थीं। इस अनुमान में केवल गोलियों और बमों से मारे गए लोग शामिल नहीं थे, बल्कि भूख, बीमारी तथा स्वास्थ्य सेवाओं के ध्वस्त होने से होने वाली मौतें भी शामिल थीं। यह एक मॉडल-आधारित अनुमान था, किसी एक समय पर दर्ज प्रत्यक्ष मृतकों की सूची नहीं। इसलिए इसे वर्तमान युद्ध की अंतिम मृतक संख्या के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा।
सऊदी अरब पर हूती हमले कब और कैसे शुरू हुए?
यमन में सैन्य हस्तक्षेप के बाद हूतियों ने धीरे-धीरे सऊदी अरब के भीतर जवाबी हमले शुरू किए। प्रारंभिक वर्षों में मुख्यतः सीमा के निकट सैन्य चौकियों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। बाद में संगठन की मिसाइल और ड्रोन क्षमता बढ़ने के साथ हमलों का दायरा सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों तक फैल गया। राजधानी रियाद, दक्षिणी शहर नजरान, जजान और आभा तथा पूर्वी हिस्सों में स्थित तेल प्रतिष्ठान हूती हमलों के दायरे में आए।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का आधार तेल उत्पादन और निर्यात है। हूतियों ने इस आर्थिक निर्भरता को उसकी रणनीतिक कमजोरी के रूप में पहचाना। बड़े तेल संयंत्रों, भंडारण केंद्रों और परिवहन सुविधाओं पर हमला करके वे सीमित सैन्य संसाधनों से भी व्यापक आर्थिक नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आ सकते थे। इसी कारण तेल प्रतिष्ठान हूती हमलों के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल होते गए।
जून 2019 में आभा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए मिसाइल हमले ने नागरिक विमानन सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा की। इसके बाद भी सऊदी हवाई अड्डों पर हमले जारी रहे। संघर्ष संबंधी घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने वाली संस्था ACLED के अनुसार जून से सितंबर 2019 के बीच सऊदी नागरिक हवाई अड्डों को निशाना बनाने वाली रॉकेट और ड्रोन हमलों की 37 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि हूती संगठन केवल सीमावर्ती गुरिल्ला युद्ध तक सीमित नहीं रह गया था, बल्कि दूर तक मार करने वाले हथियारों का उपयोग कर रहा था।
सितंबर 2019 : सऊदी तेल उद्योग पर ऐसा हमला जिसने दुनिया को हिला दिया
14 सितंबर 2019 को सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के अबकैक और खुरैस स्थित प्रतिष्ठानों पर बड़े हमले हुए। इन हमलों से सऊदी तेल उत्पादन में अस्थायी रूप से लगभग 57 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई। यह उस समय सऊदी अरब के कुल तेल उत्पादन के आधे से अधिक और वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग पांच प्रतिशत के बराबर था। एक ही हमले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी।
हूतियों ने इस हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की। लेकिन अमेरिका और सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि हमले में ईरान की भूमिका थी। हमले में इस्तेमाल किए गए हथियारों, उनकी उड़ान की दिशा और तकनीकी क्षमता को लेकर जांच हुई। कई विश्लेषणों में यह आशंका व्यक्त की गई कि हमले के हथियार यमन के बजाय उत्तर दिशा से आए थे। ACLED के विश्लेषण में भी इस हमले को हूती-ईरानी सहयोग के संदर्भ में देखा गया है और यह संभावना व्यक्त की गई कि मिसाइलें ईरानी या इराकी क्षेत्र से छोड़ी गई हों। हालांकि यह विश्लेषण सभी परिचालन विवरणों का अंतिम न्यायिक निर्धारण नहीं है।
इस घटना से दो बड़े निष्कर्ष सामने आए। पहला, महंगी और आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों के बावजूद छोटे ड्रोन और क्रूज मिसाइलें अत्यंत संवेदनशील औद्योगिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। दूसरा, सऊदी अरब के तेल उद्योग पर बड़ा हमला केवल उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं करता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों, परिवहन लागत और ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है।
मार्च 2022 : जेद्दा के तेल प्रतिष्ठान पर हमला और युद्धविराम की शुरुआत
25 मार्च 2022 को हूतियों ने सऊदी अरब के विभिन्न तेल और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर मिसाइलों तथा ड्रोन से व्यापक हमले किए। जेद्दा में अरामको के एक ईंधन भंडारण प्रतिष्ठान में आग लग गई। यह हमला उस समय हुआ जब जेद्दा में फॉर्मूला वन ग्रां प्री आयोजित होने वाली थी। आग से उठते धुएं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया और सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था पर नए प्रश्न खड़े किए।
इसके कुछ ही दिन बाद 2 अप्रैल 2022 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम लागू हुआ। प्रारंभिक समझौते की औपचारिक अवधि अक्टूबर 2022 में समाप्त हो गई, लेकिन उसके बाद भी कई वर्षों तक सऊदी अरब और हूतियों के बीच बड़े पैमाने पर सीधे हमले अपेक्षाकृत कम रहे। इस दौरान बातचीत, कैदियों की अदला-बदली और राजनीतिक समाधान के प्रयास जारी रहे। यमन का युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर तनाव कम करने की संभावना बनी थी।
2026 में युद्ध फिर क्यों भड़क उठा?
2026 में संघर्ष दोबारा तेज होने के पीछे कई घटनाएं एक साथ जिम्मेदार रहीं। जुलाई में सऊदी अरब और हूतियों के बीच वर्षों से बनी अपेक्षाकृत शांति टूट गई। हूतियों ने आरोप लगाया कि सऊदी कार्रवाई में उनके नियंत्रण वाले एक हवाई अड्डे को निशाना बनाया गया। इसके बाद उन्होंने सऊदी अरब के आभा हवाई अड्डे पर हमला करने का दावा किया। सऊदी सैन्य गठबंधन ने हूती मिसाइलों को रोकने की जानकारी दी। यह 2022 के अनौपचारिक युद्धविराम के बाद सऊदी क्षेत्र पर हूतियों के पहले घोषित बड़े हमलों में शामिल था।
सितंबर में तनाव और बढ़ गया। आठ सितंबर को हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब में कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनमें 73 लोगों के घायल होने की खबर सामने आई। हूतियों ने इन्हें यमन के अल-जौफ प्रांत में कथित सऊदी हमले की जवाबी कार्रवाई बताया। इसके बाद लाल सागर के तटीय क्षेत्रों में हूतियों की सैन्य गतिविधियां तेज हुईं। उन्होंने मोखा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के निकट स्थित पेरिम द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने के दावे किए। इन इलाकों का महत्व इसलिए है क्योंकि यहां से लाल सागर में गुजरने वाले जहाजों पर दबाव बनाया जा सकता है।
अक्टूबर में सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बलों ने हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों को वापस लेने के लिए नया अभियान शुरू किया। चार अक्टूबर को शुरू हुए इस अभियान को 'डॉन ऑफ यमन' नाम दिया गया। सरकारी बलों ने मोखा और धुबाब सहित कुछ इलाकों पर फिर कब्जे का दावा किया, लेकिन हूतियों ने इन दावों को चुनौती दी। ताइज, मारिब और अल-जौफ जैसे क्षेत्रों में भी लड़ाई तेज हुई। इसलिए वर्तमान हमलों को केवल हूतियों की अचानक शुरू हुई एकतरफा कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह एक व्यापक युद्ध का नया चरण है, जिसमें सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान और हूती जवाबी हमले दोनों शामिल हैं। हालांकि किसी भी पक्ष की सैन्य कार्रवाई नागरिकों पर जानबूझकर या अंधाधुंध हमलों को कानूनी वैधता नहीं देती।
ईरान की भूमिका : क्या हूती उसके इशारे पर सऊदी अरब पर हमला करते हैं?
इस संघर्ष में ईरान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रश्नों में से एक है। ईरान और सऊदी अरब लंबे समय से पश्चिम एशिया में प्रभावशाली शक्तियां रहे हैं। सऊदी अरब का शासन सुन्नी इस्लामी परंपरा से जुड़ा है, जबकि ईरान में शिया इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। इराक, सीरिया, लेबनान, बहरीन और यमन जैसे देशों में इस प्रतिद्वंद्विता के अलग-अलग रूप दिखाई दिए हैं।
ईरान ने हूतियों को राजनीतिक समर्थन दिया है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय जांचों, हथियारों की बरामदगी और सैन्य विश्लेषणों में हूतियों तक ईरानी मूल की हथियार तकनीक, मिसाइल घटकों और ड्रोन उपकरणों के पहुंचने के प्रमाण सामने आए हैं। संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञ समितियों और पश्चिमी देशों ने बार-बार ईरान से हूतियों को हथियार उपलब्ध कराने का मुद्दा उठाया है। ईरान ने कई आरोपों को अस्वीकार किया है और हूतियों को एक स्वतंत्र यमनी राजनीतिक-सैन्य आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए। ईरान द्वारा हूतियों को हथियार, तकनीक, प्रशिक्षण या राजनीतिक सहायता देने के प्रमाण होना और प्रत्येक हूती हमले का आदेश सीधे तेहरान से जारी होने का प्रमाण होना दो अलग बातें हैं। हूती संगठन की अपनी नेतृत्व संरचना, स्थानीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और सैन्य प्राथमिकताएं हैं। वह केवल ईरान की आज्ञा का पालन करने वाला निष्क्रिय संगठन नहीं है। हालांकि ईरानी सहायता ने उसकी दूर तक हमला करने की क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
सितंबर 2026 के दौरान लाल सागर के तटीय क्षेत्रों में हूतियों की सैन्य बढ़त के समय ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के सलाहकारों की मौजूदगी और प्रत्यक्ष सहयोग संबंधी खबरें भी सामने आईं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों ने ईरान से हूतियों को हथियार उपलब्ध कराना बंद करने की मांग की। फिर भी प्रत्येक नए हमले में ईरानी अधिकारियों की प्रत्यक्ष परिचालन भूमिका की पुष्टि अलग से आवश्यक है।
ईरान को हूतियों का समर्थन करने से क्या लाभ मिलता है?
ईरान की रणनीतिक दृष्टि से यमन का भूगोल अत्यंत महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब की दक्षिणी सीमा पर हूतियों जैसी सशस्त्र शक्ति की मौजूदगी रियाद को निरंतर सुरक्षा चुनौती देती है। इससे सऊदी अरब को अपनी सीमाओं, हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा पर भारी संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। यदि हूती लाल सागर के जहाजों को भी निशाना बनाते हैं तो वे सऊदी अरब के साथ-साथ अमेरिका, इजरायल और यूरोपीय देशों के आर्थिक हितों पर दबाव बना सकते हैं।
ईरान के लिए इस प्रकार के सहयोग का एक रणनीतिक लाभ यह भी है कि उसे हर संघर्ष में अपनी नियमित सेना सीधे भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों के माध्यम से वह अपने प्रतिद्वंद्वियों पर दबाव बनाए रख सकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसे प्रायः परोक्ष युद्ध या प्रॉक्सी युद्ध की रणनीति कहा जाता है। हालांकि हूतियों की स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका को देखते हुए पूरे यमन संघर्ष को केवल ईरान और सऊदी अरब का प्रॉक्सी युद्ध कहना भी वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
अमेरिका की भूमिका : सऊदी अरब का सहयोगी और ईरान का प्रतिद्वंद्वी
अमेरिका दशकों से सऊदी अरब का महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार रहा है। दोनों देशों के संबंधों में तेल, हथियार व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान की सैन्य शक्ति को संतुलित करने जैसे तत्व शामिल हैं। 2015 में यमन में सऊदी सैन्य हस्तक्षेप के समय अमेरिका ने खुफिया जानकारी, सैन्य उपकरण और अन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। लेकिन जैसे-जैसे यमन में नागरिक हताहतों और मानवीय संकट की खबरें बढ़ीं, अमेरिकी नीति को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा।
2021 में राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने यमन में सऊदी नेतृत्व वाले आक्रामक सैन्य अभियानों के लिए अमेरिकी समर्थन समाप्त करने की घोषणा की। इसके बावजूद सऊदी अरब की रक्षात्मक सुरक्षा और अमेरिकी-सऊदी सैन्य संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। बाद के वर्षों में लाल सागर में जहाजों पर हूती हमलों ने अमेरिका को फिर प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की ओर धकेला.....आगे खबर अगले पेज पर पढ़ें


