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भारत-अमेरिका ट्रेड डील: टैरिफ, कृषि और टेक्नोलॉजी पर अटकी बातचीत, दोनों देशों के लिए क्या हैं फायदे
India-US Trade Deal Benefits: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की कोशिश नहीं है बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति, सप्लाई चेन और आर्थिक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
India-US Trade Deal Benefits Challenges and Key Issues
India-US Trade Deal Benefits: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की कोशिश नहीं है बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति, सप्लाई चेन और आर्थिक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। एक तरफ अमेरिका, चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत भारत को एक महत्वपूर्ण विनिर्माण और व्यापारिक साझेदार के रूप में देख रहा है, वहीं भारत भी निवेश, तकनीक और निर्यात बढ़ाने के लिए अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच चाहता है।
इसके बावजूद टैरिफ, कृषि और डेयरी बाजार, डेटा स्थानीयकरण, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), तेल आयात और लेबर मानकों जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। यही वजह है कि लंबे समय से चल रही बातचीत के बावजूद व्यापार समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका है।
क्या है सेक्शन 301 और भारत क्यों आया इसके दायरे में?
अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974 का सेक्शन 301 (Section 301) अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) को यह अधिकार देता है कि यदि किसी देश की व्यापारिक नीतियां अमेरिका के लिए भेदभावपूर्ण या अनुचित मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ जांच शुरू कर दंडात्मक आयात शुल्क लगाया जा सकता है। इसी प्रावधान के तहत अमेरिका ने भारत समेत कई देशों की व्यापारिक नीतियों की समीक्षा की है। अमेरिकी पक्ष का आरोप था कि भारत में सप्लाई चेन से जुड़े श्रम मानकों, कुछ नियामकीय प्रक्रियाओं और व्यापारिक नियमों में ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो अमेरिकी कंपनियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित नहीं करतीं।
शुरुआत में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त सीमा शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी। हालांकि बाद में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ता और भारत द्वारा कुछ व्यापारिक सुधारों के बाद इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। इसके बावजूद यह अतिरिक्त शुल्क कई भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि इससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
जेनेरिक दवाओं को राहत, लेकिन दबाव अभी भी बरकरार
भारत दुनिया में सस्ती जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है और अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था में भारतीय दवा कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अमेरिकी मरीजों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने में भारतीय फार्मा उद्योग का बड़ा योगदान माना जाता है। हालिया निर्णयों के तहत अमेरिका ने भारतीय जेनेरिक दवाओं और स्मार्टफोन जैसे प्रमुख उत्पादों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त सेक्शन 301 शुल्क से छूट दी है। इससे भारत के अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अतिरिक्त टैरिफ से बच गया है।
हालांकि विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अमेरिका लगातार भारत पर दवाओं की पेटेंट अवधि बढ़ाने, डेटा एक्सक्लूसिविटी लागू करने और दवा मूल्य नियंत्रण प्रणाली को उदार बनाने का दबाव बना रहा है। यदि भविष्य के व्यापार समझौते में इन मुद्दों पर भारत को समझौता करना पड़ता है, तो भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग की लागत और लाभ दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
क्यों अटक रही है व्यापार डील?
भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा विवाद कृषि और डेयरी क्षेत्र को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी पोल्ट्री उत्पादों, जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) कृषि उत्पादों और डेयरी वस्तुओं के लिए अधिक खोले। भारत का कहना है कि ऐसा करने से करोड़ों छोटे किसानों और पशुपालकों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
तेल क्षेत्र भी बातचीत का अहम हिस्सा बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करे और उसकी जगह अमेरिकी एलएनजी, एलपीजी और कच्चे तेल के दीर्घकालिक अनुबंध करे। भारत इस प्रस्ताव पर व्यावसायिक शर्तों और कीमतों के आधार पर निर्णय लेना चाहता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था भी दोनों देशों के बीच मतभेद का बड़ा कारण है। भारत के डेटा स्थानीयकरण नियम, डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून और गूगल, अमेज़न तथा मेटा जैसी बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों पर बढ़ती नियामकीय निगरानी को लेकर अमेरिका लगातार अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है। इसके अलावा अमेरिका भारत के अपेक्षाकृत ऊंचे आयात शुल्क और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं की आलोचना करता है, जबकि भारत का तर्क है कि घरेलू विनिर्माण को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने हेतु ऐसे प्रोत्साहन आवश्यक हैं।
भारत को क्या मिल सकता है फायदा?
अगर व्यापार समझौता संतुलित रूप में होता है तो भारत को कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता है। 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) रणनीति के कारण भारत सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान और महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, इंजीनियरिंग उत्पादों और उच्च तकनीक आधारित विनिर्माण को बेहतर अवसर मिलने की संभावना भी बढ़ेगी। इससे विदेशी निवेश और रोजगार सृजन को भी गति मिल सकती है।
भारत के सामने चुनौतियां विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत कृषि और डेयरी क्षेत्र में अत्यधिक रियायत देता है तो इसका सबसे अधिक असर छोटे किसानों और दुग्ध सहकारी संस्थाओं पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, जिन भारतीय उत्पादों को सेक्शन 301 शुल्क से छूट नहीं मिली है, उन पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क लागू रहने से फार्मा और स्मार्टफोन को छोड़कर कई अन्य निर्यात क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है। इससे भारतीय निर्यातकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका है।
अमेरिका के लिए क्या हैं अवसर और जोखिम?
भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक है। ऐसे में व्यापार समझौते से अमेरिकी कृषि उत्पादों, ऑटोमोबाइल, चिकित्सा उपकरणों, रक्षा सामग्री और ऊर्जा कंपनियों के लिए बड़ा बाजार खुल सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका से कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि की है। इससे अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि अमेरिका के लिए चुनौती यह भी है कि भारतीय जेनेरिक दवाओं की बढ़ती मौजूदगी अमेरिकी घरेलू फार्मा कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है, क्योंकि भारतीय दवाएं अपेक्षाकृत काफी कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार का मौजूदा गणित
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। द्विपक्षीय व्यापार का कुल आकार लगभग 140 अरब डॉलर (करीब 11.6 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच चुका है। भारत का अमेरिका को निर्यात लगभग 87.3 अरब डॉलर है। इसमें जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफोन एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, तराशे हुए हीरे और आभूषण, वस्त्र एवं रेडीमेड परिधान, इंजीनियरिंग उत्पाद तथा ऑटोमोबाइल कलपुर्जे प्रमुख हैं।
वहीं अमेरिका से भारत का आयात लगभग 53.5 अरब डॉलर है। इसमें कच्चा तेल, एलएनजी, एलपीजी, असैनिक विमान और उनके पुर्जे, रक्षा उपकरण, आधुनिक चिकित्सा उपकरण तथा भारी मशीनरी शामिल हैं। ऊर्जा आयात में हाल के वर्षों में 17 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे दोनों देशों के व्यापार संतुलन में भी बदलाव देखने को मिला है।
कुल मिलकर, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल आयात-निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक सप्लाई चेन के पुनर्गठन और चीन पर निर्भरता कम करने की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है।
हालांकि यह समझौता तभी सफल माना जाएगा जब दोनों देश अपने-अपने संवेदनशील क्षेत्रों—भारत के लिए कृषि, डेयरी, दवा उद्योग और डेटा संप्रभुता तथा अमेरिका के लिए बाजार पहुंच, बौद्धिक संपदा और निवेश सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित कर सकें। यदि यह संतुलन बनता है तो प्रस्तावित व्यापार समझौता आने वाले वर्षों में दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई दे सकता है। लेकिन यदि मतभेद बने रहते हैं, तो व्यापारिक अवसरों के बावजूद यह बहुप्रतीक्षित डील और लंबे समय तक अधर में लटक सकती है।


