क्या अंतरिक्ष को मिलेगा शांति का नोबेल? धरती के संघर्षों के बीच ISS बना सहयोग की अनोखी मिसाल

ISS Nobel Peace Prize 2026: क्या अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ISS को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिल सकता है? जानिए अमेरिका-रूस समेत कई देशों के सहयोग की कहानी।

Newstrack Network
Published on: 3 Oct 2026 7:39 PM IST
ISS Nobel Peace Prize 2026
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ISS Nobel Peace Prize 2026 (Image Credit-Social Media)

ओस्लो। धरती पर अमेरिका और रूस के रिश्ते दशकों के सबसे कठिन दौर से गुजरते रहे हैं, दुनिया यूक्रेन से पश्चिम एशिया और सूडान तक संघर्षों से जूझ रही है, लेकिन पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर एक ऐसी जगह है जहां अमेरिका और रूस के अंतरिक्ष यात्री आज भी एक ही परिसर में रहते हैं, एक-दूसरे पर निर्भर हैं और मिलकर वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। यही अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी ISS अब 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर चल रही अंतरराष्ट्रीय चर्चा के सबसे दिलचस्प नामों में शामिल हो गया है। नॉर्वे के शांति विशेषज्ञों और नोबेल पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस बार नॉर्वेजियन नोबेल समिति युद्ध और बढ़ते राष्ट्रवाद के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग का संदेश देना चाहे तो ISS उसके सामने एक असाधारण प्रतीक हो सकता है। 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा 9 अक्टूबर को ओस्लो में होगी।

लेकिन यहां एक बात शुरुआत में ही स्पष्ट कर देना जरूरी है। ISS को नोबेल शांति पुरस्कार की किसी आधिकारिक ‘शॉर्टलिस्ट’ में शामिल नहीं किया गया है। वास्तव में ऐसी कोई सार्वजनिक आधिकारिक सूची होती ही नहीं। नॉर्वेजियन नोबेल समिति नामांकित व्यक्तियों और संगठनों के नाम सार्वजनिक नहीं करती और नामांकन से संबंधित दस्तावेज 50 वर्ष तक गोपनीय रहते हैं। कोई व्यक्ति या संस्था स्वयं बता सकती है कि उसने किसे नामित किया है, इसी आधार पर दुनिया को कुछ नामों की जानकारी मिलती है। इसके बाद शांति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ संभावित विजेताओं पर अनुमान लगाते हैं। इसलिए ISS, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी या दूसरे चर्चित नामों को संभावित दावेदार कहना ठीक है, लेकिन इन्हें नोबेल समिति की आधिकारिक अंतिम सूची कहना गलत होगा।

इस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार के लिए 287 नामांकन प्राप्त हुए हैं। इनमें 208 व्यक्ति और 79 संगठन हैं। सार्वजनिक रूप से सामने आए या विशेषज्ञों की चर्चा में मौजूद नामों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, सूडान में युद्ध के बीच नागरिकों की मदद करने वाले Emergency Response Rooms, यूक्रेन में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले मायकोला कुलेबा, पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली Committee to Protect Journalists, International Court of Justice और International Criminal Court जैसे संस्थानों का उल्लेख किया जा रहा है। लेकिन इनमें से कौन वास्तव में नॉर्वेजियन नोबेल समिति की अंतिम आंतरिक सूची में है, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती। (AP News⁠)

आखिर अंतरिक्ष स्टेशन को शांति के पुरस्कार से क्यों जोड़ा जा रहा है?

ISS को लेकर उत्सुकता की सबसे बड़ी वजह उसका विज्ञान नहीं बल्कि सहयोग का इतिहास है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा शक्ति प्रदर्शन का माध्यम थी। दोनों देश चंद्रमा और अंतरिक्ष में एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में थे। लेकिन शीत युद्ध समाप्त होने के बाद यही अंतरिक्ष कार्यक्रम धीरे-धीरे सहयोग की प्रयोगशाला में बदल गया। अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन विकसित किया और नवंबर 2000 से वहां मनुष्य की लगातार उपस्थिति बनी हुई है।

ISS का निर्माण किसी एक देश ने नहीं किया। अमेरिका की NASA, रूस की Roscosmos, European Space Agency, जापान की JAXA और Canadian Space Agency इसके प्रमुख साझेदार रहे हैं। अलग-अलग देशों ने स्टेशन के अलग हिस्से, प्रयोगशालाएं, रोबोटिक प्रणालियां और दूसरी तकनीकें विकसित कीं। अंतरिक्ष यात्रियों को वहां पहुंचाने और वापस लाने की जिम्मेदारियां भी समय के साथ अलग-अलग देशों और संस्थाओं ने संभाली हैं। इसी पारस्परिक निर्भरता ने ISS को साधारण वैज्ञानिक प्रयोगशाला से कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक प्रतीक बना दिया।

इसकी सबसे असाधारण बात यह है कि धरती पर संबंध खराब होने के बाद भी अंतरिक्ष में सहयोग पूरी तरह नहीं टूटा। रूस और पश्चिम के बीच राजनीतिक तनाव और प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिकी और रूसी अंतरिक्ष यात्री स्टेशन पर साथ काम करते रहे। स्टेशन की संरचना ही ऐसी है कि उसके संचालन में दोनों पक्षों की क्षमताएं लंबे समय तक एक-दूसरे की पूरक रही हैं। इसीलिए नोबेल विशेषज्ञ ISS को इस विचार के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं कि गंभीर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कुछ क्षेत्रों में साझा मानव हित देशों को सहयोग के लिए मजबूर ही नहीं बल्कि प्रेरित भी कर सकते हैं।

धरती पर तनाव, अंतरिक्ष में अमेरिका-रूस-कनाडा एक साथ

इस विचार को संयोग से इसी सप्ताह एक और घटना ने और दिलचस्प बना दिया। NASA और SpaceX का Crew-13 मिशन 1 अक्टूबर को चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर ISS के लिए रवाना हुआ। इसमें NASA की जेसिका वाटकिंस और ल्यूक डेलानी, कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी के जोशुआ कुट्रिक और रूस के कॉस्मोनॉट सर्गेई टेटेरियात्निकोव शामिल हैं। यानी एक ही अमेरिकी Dragon अंतरिक्ष यान में अमेरिका, कनाडा और रूस के अंतरिक्ष यात्री साथ बैठे और एक ही अंतरिक्ष स्टेशन पर छह महीने तक मिलकर काम करने पहुंचे।

इस मिशन की कमांडर जेसिका वाटकिंस हैं। भूविज्ञानी वाटकिंस इससे पहले 2022 में Crew-4 मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लंबा समय बिता चुकी हैं। Crew-13 के साथ उन्होंने एक और इतिहास बनाया—वह कक्षा में जाने वाले किसी अमेरिकी चालक दल का नेतृत्व करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उनके साथ NASA के ल्यूक डेलानी, कनाडा के जोशुआ कुट्रिक और रूस के सर्गेई टेटेरियात्निकोव अपनी पहली अंतरिक्ष उड़ान पर गए हैं।

आठ घंटे से भी कम समय में अंतरिक्ष स्टेशन

Crew-13 ने एक और रिकॉर्ड बनाया। Cape Canaveral Space Force Station से उड़ान भरने के बाद SpaceX का Dragon यान केवल 7 घंटे 55 मिनट में ISS से जुड़ गया। NASA ने इसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के इतिहास में किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यान की सबसे तेज launch-to-docking यात्रा बताया है। प्रक्षेपण 1 अक्टूबर को सुबह 11:10 बजे अमेरिकी पूर्वी समय के अनुसार हुआ और करीब आठ घंटे बाद Dragon स्टेशन से जुड़ गया।

इतनी तेज यात्रा का अर्थ यह नहीं कि SpaceX ने कोई नया अधिक तेज रॉकेट इंजन लगाकर दूरी अचानक कम कर दी। अंतरिक्ष में किसी स्टेशन तक पहुंचने का समय काफी हद तक कक्षीय गणना और प्रक्षेपण के समय स्टेशन की स्थिति पर निर्भर करता है। अंतरिक्ष यान को केवल ऊपर जाकर स्टेशन तक नहीं पहुंचना होता, उसे पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे स्टेशन की कक्षा, गति और स्थिति से स्वयं को बेहद सटीक ढंग से मिलाना होता है। इस बार ISS की स्थिति और प्रक्षेपण का समय ऐसा था कि Dragon को बहुत कम समय में आवश्यक कक्षीय समायोजन करने का अवसर मिला। NASA ने उड़ान से पहले लगभग 7 घंटे 50 मिनट की यात्रा का अनुमान लगाया था और वास्तविक docking लगभग 7 घंटे 55 मिनट में हुई।

लेकिन इसे दुनिया में ISS तक की सबसे तेज यात्रा कहना गलत होगा। रूस के Soyuz MS-17 अंतरिक्ष यान ने अक्टूबर 2020 में लगभग 3 घंटे 3 मिनट में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुंचकर कहीं तेज यात्रा की थी। इसलिए Crew-13 का रिकॉर्ड अमेरिकी अंतरिक्ष यान के संदर्भ में है।

छह महीने अंतरिक्ष में क्या करेंगे चारों यात्री?

Crew-13 लगभग छह महीने अंतरिक्ष स्टेशन पर रहेगा। इस दौरान दल कई ऐसे वैज्ञानिक प्रयोग करेगा जिनका संबंध भविष्य की अंतरिक्ष यात्राओं के साथ धरती पर चिकित्सा से भी है। NASA के मुताबिक अंतरिक्ष यात्री मानव स्टेम सेल से विकसित ऊतकों पर काम करेंगे, जिससे हृदय रोग और Parkinson’s जैसी बीमारियों के अध्ययन तथा दवाओं के परीक्षण में मदद मिलने की संभावना है। एक नई काफी हद तक स्वचालित प्रणाली के जरिए पौधे उगाने के प्रयोग भी किए जाएंगे। इसके अलावा सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में रक्त प्रवाह से जुड़ी असामान्यताओं और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए नई जांच तकनीक पर काम होगा।

ये प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने पर मानव शरीर में कई बदलाव होते हैं। गुरुत्वाकर्षण लगभग न होने के कारण मांसपेशियों और हड्डियों पर सामान्य दबाव कम हो जाता है, शरीर के तरल पदार्थों का वितरण बदलता है और हृदय तथा रक्त परिसंचरण प्रणाली को अलग परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। चंद्रमा और भविष्य में मंगल तक लंबी मानव यात्राओं की योजना के लिए यह समझना जरूरी है कि महीनों तक अंतरिक्ष में रहने वाले मनुष्य को स्वस्थ कैसे रखा जाए।

ISS को नोबेल मिला तो पुरस्कार किसे मिलेगा?

यही इस दिलचस्प संभावना का सबसे जटिल सवाल भी है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन स्वयं कोई सामान्य कानूनी व्यक्ति या अकेली संस्था नहीं है जिसे सीधे पुरस्कार की राशि सौंप दी जाए। यह कई देशों और अंतरिक्ष एजेंसियों की साझी परियोजना है। यदि नॉर्वेजियन नोबेल समिति वास्तव में ISS से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सम्मानित करना चाहे तो उसे पुरस्कार किस संस्था या किन संस्थाओं को देना है, इसका स्वरूप तय करना होगा। विशेषज्ञों की चर्चा का केंद्र इसलिए केवल अंतरिक्ष में घूम रही विशाल संरचना नहीं बल्कि उसके पीछे मौजूद बहुराष्ट्रीय सहयोग व्यवस्था है।

नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास में संगठनों को सम्मानित किए जाने की लंबी परंपरा है। International Committee of the Red Cross, संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी एजेंसियां, European Union, World Food Programme और विभिन्न मानवाधिकार तथा निरस्त्रीकरण संगठन पहले पुरस्कार पा चुके हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्था या साझा प्रयास को पुरस्कार मिलना असामान्य नहीं होगा। लेकिन ISS की संस्थागत संरचना इनसे अलग और अधिक जटिल है।

ट्रंप भी चर्चा में, लेकिन नोबेल समिति ने नहीं खोले पत्ते

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी सार्वजनिक चर्चा में है। उनके समर्थकों और विभिन्न नामांकनकर्ताओं ने शांति समझौतों तथा कूटनीतिक प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्हें पुरस्कार दिए जाने की वकालत की है। दूसरी ओर आलोचक अमेरिकी विदेश नीति और चल रहे संघर्षों में अमेरिका की भूमिका को लेकर उनके नामांकन पर सवाल उठाते हैं। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने न तो ट्रंप के बारे में कोई संकेत दिया है और न किसी दूसरे संभावित उम्मीदवार के बारे में। इसलिए इस स्तर पर उनके अवसरों का कोई वस्तुनिष्ठ क्रम या संभावना प्रतिशत बताना संभव नहीं है।

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का नाम भी विशेषज्ञों की चर्चाओं में आया है। इसके अलावा सूडान की Emergency Response Rooms विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सूडान के गृहयुद्ध के बीच स्थानीय स्वयंसेवकों के ये समूह भोजन, चिकित्सा सहायता और दूसरी आवश्यक सेवाएं पहुंचाते रहे हैं। यूक्रेन में युद्ध से प्रभावित बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले मायकोला कुलेबा का नाम भी सार्वजनिक चर्चाओं में है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी ICJ और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी ICC को भी कुछ पर्यवेक्षक संभावित संस्थागत विकल्पों में देखते हैं।

महिलाओं पर भी नजर

2026 के पुरस्कार को लेकर महिला उम्मीदवारों की भी चर्चा है। इनमें गाजा की सर्जन सारा अल-सक्का और दिवंगत रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवलनी की पत्नी यूलिया नवलनाया जैसे नाम विशेषज्ञों और अनुमान बाजारों में सामने आए हैं। लेकिन यहां भी वही सावधानी जरूरी है—यह नॉर्वेजियन नोबेल समिति की प्रकाशित सूची नहीं है। ये सार्वजनिक नामांकन, विशेषज्ञों के अनुमान और बाजार की अटकलें हैं।

नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास में लैंगिक असंतुलन काफी स्पष्ट रहा है। 125 वर्ष के इतिहास में शांति पुरस्कार पाने वाले व्यक्तिगत विजेताओं में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत कम रही है। हालांकि पिछले डेढ़ दशक में महिलाओं को सम्मानित किए जाने की आवृत्ति पहले की तुलना में बढ़ी है। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इस वर्ष महिला संभावित उम्मीदवारों को लेकर होने वाली चर्चा का एक कारण है।

5 अक्टूबर से शुरू होगा नोबेल सप्ताह

2026 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा 5 अक्टूबर को चिकित्सा के पुरस्कार से शुरू होगी। इसके बाद 6 अक्टूबर को भौतिकी, 7 अक्टूबर को रसायन विज्ञान और 8 अक्टूबर को साहित्य का पुरस्कार घोषित किया जाएगा। 9 अक्टूबर को ओस्लो में नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा होगी। आर्थिक विज्ञान के पुरस्कार का ऐलान 12 अक्टूबर को किया जाएगा। शांति पुरस्कार को छोड़कर बाकी नोबेल पुरस्कारों की घोषणाएं मुख्य रूप से स्टॉकहोम में होती हैं, जबकि अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार शांति पुरस्कार नॉर्वे की पांच सदस्यीय नोबेल समिति तय करती है।

इस वर्ष प्रत्येक पूर्ण नोबेल पुरस्कार के साथ 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर की पुरस्कार राशि है, जो मौजूदा विनिमय दर पर करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर के आसपास बैठती है। लेकिन शांति पुरस्कार की प्रतिष्ठा उसकी रकम से कहीं बड़ी है। इसका इस्तेमाल नोबेल समिति अक्सर किसी व्यक्ति या संस्था के काम को सम्मानित करने के साथ दुनिया को किसी व्यापक विचार की ओर ध्यान दिलाने के लिए भी करती रही है।

अंतरिक्ष स्टेशन का नाम इस बार इतना प्रतीकात्मक क्यों?

ISS को लेकर 2026 की चर्चा इसलिए असाधारण लगती है क्योंकि यह स्टेशन स्वयं अपने अंतिम वर्षों की ओर बढ़ रहा है। NASA की मौजूदा योजना अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को 2030 तक संचालित करने की है। उसके बाद इसे नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वातावरण में वापस लाकर प्रशांत महासागर के निर्जन क्षेत्र की ओर उतारने की योजना है। लगभग तीन दशक तक अंतरिक्ष में मनुष्य की स्थायी उपस्थिति का केंद्र रहा यह स्टेशन इस तरह अपने ऐतिहासिक जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश कर रहा है।

इस दौरान ISS ने केवल विज्ञान नहीं किया। उसने अंतरिक्ष में देशों के बीच निर्भरता का एक ऐसा मॉडल बनाया जिसमें किसी एक देश की राजनीतिक इच्छा से पूरी परियोजना आसानी से नहीं चल सकती थी। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री रूसी Soyuz से अंतरिक्ष गए, रूसी कॉस्मोनॉट अमेरिकी SpaceX Dragon में बैठे, यूरोप और जापान की प्रयोगशालाओं में अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों के प्रयोग हुए और कनाडा की रोबोटिक तकनीक पूरे स्टेशन के संचालन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

इसीलिए 2026 के शांति नोबेल की चर्चा में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का आना अपने आप में एक दिलचस्प विरोधाभास पैदा करता है। जिस समय धरती पर देशों के बीच दीवारें, प्रतिबंध और युद्ध बढ़े हैं, उसी समय पृथ्वी के ऊपर घूम रही प्रयोगशाला में उन्हीं देशों के नागरिक एक-दूसरे पर भरोसा करके जीवित रहते और काम करते हैं। 9 अक्टूबर को नोबेल समिति किसे चुनेगी, यह केवल वही समिति जानती है। लेकिन ISS का संभावित नाम ही एक सवाल जरूर सामने रखता है—यदि विज्ञान के लिए प्रतिद्वंद्वी देश अंतरिक्ष में साथ रह सकते हैं, तो क्या वही सहयोग धरती पर शांति के लिए भी कोई सबक दे सकता है?

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