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धुंआ-धुंआ हो गया ‘मुस्लिम वर्ल्ड’... ईरान-इजराइल तनाव के बीच खुल गई OIC की पोल! टूटेगा इस्लामी एकजुटता का मिथक?
Iran-Israel Tensions Expose OIC: दशकों से इस्लामी देशों की सामूहिक आवाज़ के रूप में पेश की जाने वाली Organization of Islamic Cooperation (OIC) की भूमिका पर अब गंभीर सवाल खड़े होना शुरू हो गए हैं।
Iran-Israel Tensions Expose OIC (PHOTO: social media)
Iran-Israel Tensions Expose OIC: इस वक़्त अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तेजी से बढ़ते भयंकर तनाव ने जहां पूरे विश्व की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है, तो वहीं एक और मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है, कि क्या तथाकथित 'मुस्लिम वर्ल्ड' वास्तव में एकजुट है? दशकों से इस्लामी देशों की सामूहिक आवाज़ के रूप में पेश की जाने वाली Organization of Islamic Cooperation (OIC) की भूमिका पर अब गंभीर सवाल खड़े होना शुरू हो गए हैं।
पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रमों के बीच यह देखा गया कि कई खाड़ी देशों ने खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से साफ़ इनकार किया है। कुछ देशों के अमेरिका और इजराइल के साथ रणनीतिक, सैन्य और आर्थिक संबंध पहले से मजबूत हैं। ऐसे में जब ईरान पर दबाव बढ़ा, तो 'मुस्लिम ब्रदरहुड' या इस्लामी एकजुटता का नारा जमीन पर उतना प्रभावी नज़र नहीं आया, जितना सैद्धांतिक रूप से प्रस्तुत किया जाता रहा है।
OIC की भूमिका पर उठे रहे सवाल
बता दे, OIC की स्थापना साल 1969 में इस मकसद से की गई थी कि मुस्लिम बहुल देशों के बीच सहयोग और एकजुटता को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन मौजूदा वक़्त में इसके कुल 57 सदस्य देश हैं। यह संगठन कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सामूहिक बयान जारी करता रहा है। भारत के संदर्भ में अयोध्या और कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी OIC ने पहले बयान दिए हैं, जिससे नई दिल्ली ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
लेकिन मौजूदा ईरान संकट में OIC की तरफ से कोई तीखा या निर्णायक सामूहिक रुख सामने नहीं आया। यही वजह है कि विश्लेषक सवाल खड़े कर रहे हैं कि क्या संगठन अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप प्रभावी भूमिका निभा पा रहा है या नहीं।
खाड़ी देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं
इसे लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों की विदेश नीति अब सिर्फ धार्मिक एकजुटता पर आधारित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय हितों और आर्थिक सुरक्षा पर केंद्रित है। अमेरिका के साथ रक्षा समझौते, इजराइल के साथ बढ़ते कूटनीतिक संबंध और क्षेत्रीय संतुलन की राजनीति- इन सबने समीकरण बदल दिए हैं।
कई अरब देशों ने हाल के सालों में इजराइल के साथ रिश्ते सुधारे हैं। ऐसे में ईरान और इजराइल के बीच टकराव की स्थिति में वे खुलकर किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने से बच रहे हैं। यही वजह है कि 'एक मुस्लिम उम्माह' की अवधारणा व्यवहारिक राजनीति में कमजोर पड़ती नज़र आ रही है।
भारत के संदर्भ मेंतीखी बहस
भारत में भी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि जब भारत के आंतरिक मामलों पर OIC सक्रिय नज़र आता था, तो अब क्षेत्रीय युद्ध जैसे बड़े मुद्दे पर उसकी चुप्पी क्यों है? वहीं दूसरी तरफ कई विशेषज्ञ यह तर्क दे रहे हैं कि हर देश की अपनी संप्रभु विदेश नीति होती है और धार्मिक पहचान के आधार पर एकजुटता की अपेक्षा करना व्यवहारिक नहीं है।
क्या 'मुस्लिम वर्ल्ड' एक मिथक?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'मुस्लिम वर्ल्ड' शब्द अधिकतर सांस्कृतिक या धार्मिक संदर्भ में प्रयोग होता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्र अपने-अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। तुर्की, सऊदी अरब, ईरान, कतर, यूएई जैसे देशों के आपसी संबंध भी हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। कई बार ये देश क्षेत्रीय प्रभुत्व, ऊर्जा राजनीति और सुरक्षा हितों को लेकर आमने-सामने भी रहे हैं।
ऐसे में यह साफ़ होता है कि केवल धार्मिक समानता के आधार पर स्थायी राजनीतिक एकता संभव नहीं है। यही वजह है कि ईरान संकट ने इस धारणा को और कमजोर किया है कि सभी मुस्लिम देश हर परिस्थिति में एक साथ खड़े होंगे।
तो अब क्या?
पश्चिम एशिया में हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं। आगामी दिनों में अगर तनाव और बढ़ता है, तो OIC पर भी गंभीर रूप से दबाव बढ़ सकता है कि वह ज्यादा स्पष्ट और ठोस रुख अपनाए। हालांकि, यह भी संभव है कि सदस्य देश अपनी-अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार अलग-अलग रास्ता चुनें।
फिलहाल इतना तय तो है कि मौजूदा संकट ने वैश्विक राजनीति में धार्मिक एकजुटता बनाम राष्ट्रीय हित की बहस को फिर से जीवित कर दिया है। 'मुस्लिम वर्ल्ड' की अवधारणा कितनी व्यावहारिक है और कितनी प्रतीकात्मक- यह सवाल अब आगामी कुछ वक़्त में और गहराई से उठ सकता है।


