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हिंदू तो दूर... पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के ही खून के प्यासे क्यों बने लोग? वजह जान चौंक जाएंगे
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक भीषण आतंकी हमला सामने आया है। जुमे की नमाज के दौरान एक शिया मस्जिद (इमामबाड़ा) को निशाना बनाकर किए गए हमले में 50 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है, जबकि करीब 70 लोग घायल बताए जा रहे हैं। घटना के बाद प्रशासन ने पूरे शहर में आपातकाल घोषित कर दिया है।
पाकिस्तान में मजहबी हिंसा केवल गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि शिया मुसलमान भी लगातार आतंकवादी हमलों का शिकार बनते रहे हैं। ताजा मामला राजधानी इस्लामाबाद का है, जहां शुक्रवार को जुमे की नमाज के दौरान एक शिया मस्जिद (इमामबाड़ा) में आत्मघाती हमला किया गया। इस धमाके में अब तक 30 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं।
घटना के बाद प्रशासन ने पूरे शहर में आपातकाल जैसे हालात घोषित करते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। फिलहाल किसी भी आतंकी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन संदेह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और इस्लामिक स्टेट (IS) जैसे संगठनों पर जताया जा रहा है, जो पहले भी शिया समुदाय को निशाना बनाते रहे हैं।
शिया मस्जिदें क्यों बनती हैं निशाना
पाकिस्तान में शिया मुसलमानों पर हमले कोई नई बात नहीं हैं। देश की कुल मुस्लिम आबादी में लगभग 10 से 15 प्रतिशत शिया हैं और ईरान के बाद पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है। इसके बावजूद यह समुदाय लंबे समय से सांप्रदायिक हिंसा का सामना कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ कट्टरपंथी सुन्नी आतंकी संगठन शियाओं को इस्लाम से बाहर मानते हैं, इसी विचारधारा के चलते शिया मस्जिदें, इमामबाड़े, जुलूस और धार्मिक सभाएं बार-बार निशाना बनती हैं।
मुहर्रम के दौरान बढ़ जाती है नफरत
मुहर्रम के दौरान हालात और ज्यादा तनावपूर्ण हो जाते हैं। जब शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत का मातम करता है, तब नफरत फैलाने वाले तत्व और अधिक सक्रिय हो जाते हैं। कराची जैसे बड़े शहरों में मुहर्रम के बाद दीवारों पर शिया विरोधी नारे लिखे जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। यह सांप्रदायिक सोच 1980 के दशक से लगातार जड़ पकड़ती चली गई है।
हज़ारा शिया सबसे ज्यादा निशाने पर
शिया समुदाय के भीतर हज़ारा शिया सबसे ज्यादा खतरे में हैं, जो मुख्य रूप से बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में रहते हैं। उनकी पहचान चेहरे के हाव-भाव और भाषा से आसानी से हो जाती है, जिससे वे आतंकियों का आसान निशाना बन जाते हैं। बीते वर्षों में क्वेटा में हज़ारा शियाओं पर कई बड़े और घातक हमले हो चुके हैं।
विडंबना: पाकिस्तान के संस्थापक थे शिया
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं शिया मुस्लिम थे। उन्होंने एक ऐसे पाकिस्तान की कल्पना की थी, जहां हर नागरिक को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता मिले। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि न सिर्फ गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक, बल्कि शिया जैसे मुस्लिम संप्रदाय भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
आतंक के आंकड़े बताते हैं गंभीर हालात
ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2025 के अनुसार, पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आतंक प्रभावित देश बन चुका है। रिपोर्ट में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमलों में 90 प्रतिशत और बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के हमलों में 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस्लामाबाद में हुआ ताजा धमाका ऐसे समय पर हुआ है, जब देश पहले से ही बढ़ती हिंसा और अस्थिरता से जूझ रहा है।
हाल के महीनों में TTP और BLA जैसे आतंकी व विद्रोही संगठन न सिर्फ खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान, बल्कि राजधानी इस्लामाबाद जैसे हाई-सिक्योरिटी इलाकों को भी निशाना बनाने लगे हैं, जिससे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।


