Israel Election 2026 Result: नेतन्याहू बहुमत से 8 सीट दूर, अरब दलों के समर्थन पर विपक्ष में दरार

Israel Election 2026 Result Latest News: इज़रायल चुनाव में नेतन्याहू गठबंधन 53 सीटों पर, विपक्ष 48 और अरब दल 19 सीटों पर आगे। बहुमत के लिए 8 सीटें जरूरी, लेकिन सरकार गठन पर विपक्ष में मतभेद।

Neel Mani Lal
Published on: 29 Oct 2026 5:15 PM IST
Israel Election 2026 Live Update in Hindi | Netanyahu Winning Seats | Arab Parties Seats | Newstrack
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Israel Election 2026 Live Update in Hindi | Netanyahu Winning Seats | Arab Parties Seats | Newstrack

Israel Election 2026 Update: इज़रायल के संसदीय चुनाव में लगभग सभी वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी अगली सरकार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। मंगलवार, 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। लेकिन उनके नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन के पास सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटें नहीं हैं। दूसरी ओर पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइज़नकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों को भी अपने बल पर बहुमत नहीं मिला है। लगभग 98.17 प्रतिशत मतों की गणना के आधार पर नेतन्याहू समर्थक दलों को 53, आइज़नकोट के सहयोगी दलों को 48 और अरब राजनीतिक दलों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इससे इज़रायल में त्रिशंकु संसद की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।

29 अक्टूबर को उपलब्ध नवीनतम विस्तृत मतगणना संकलन 'द पेटेक' के अनुसार 98.17 प्रतिशत मतों की गिनती हो चुकी है और 51 लाख 32 हजार से अधिक वैध वोट गिने जा चुके हैं। मतदान केंद्रों की गणना लगभग पूरी होने के बावजूद कुछ विशेष मतपत्रों की जाँच और अंतिम सीट आवंटन की प्रक्रिया शेष है। आधिकारिक अंतिम परिणाम चार नवंबर को प्रकाशित होने हैं। इस बीच राजनीतिक दलों ने सरकार गठन की संभावनाओं पर विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। हालाँकि अभी तक किसी नए गठबंधन के बनने या किसी नेता को सरकार बनाने का औपचारिक अवसर दिए जाने की पुष्टि नहीं हुई है।

यह चुनाव इज़रायल में सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े युद्धों के बाद पहला संसदीय चुनाव है। चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्धकालीन नेतृत्व, सात अक्टूबर की सुरक्षा विफलता की जवाबदेही, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अति-रूढ़िवादी यहूदियों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट जैसे मुद्दे उठे थे। मतदान में लगभग 77.7 प्रतिशत लोगों ने हिस्सा लिया। विशेष रूप से अरब नागरिकों की बढ़ी हुई भागीदारी ने संसद के नए समीकरण को प्रभावित किया है। राजनीतिक रूप से स्थिति यह है कि नेतन्याहू के पास सबसे बड़ा गठबंधन है, लेकिन संसदीय बहुमत नहीं। विपक्ष के पास अरब पार्टियों का समर्थन मिलने पर बहुमत का गणित बन सकता है, लेकिन उसे लेकर विपक्षी दलों के भीतर गंभीर मतभेद हैं।

अब तक किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?

29 अक्टूबर को उपलब्ध 98.17 प्रतिशत मतगणना के अनुमान के अनुसार नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिल रही हैं। दूसरे स्थान पर गादी आइज़नकोट की यशार पार्टी है, जिसे 21 सीटें मिलने का अनुमान है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद की संयुक्त पार्टी बेयाखाद को 12 सीटें, अरब पार्टियों के गठबंधन जॉइंट लिस्ट को 12, याइर गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी को आठ, अविगडोर लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनू को सात और मंसूर अब्बास की रा'अम पार्टी को सात सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं।

नेतन्याहू के सहयोगी दलों में इतामार बेन-गवीर की ओत्ज़मा येहुदित को सात सीटें, अति-रूढ़िवादी यहूदी दल यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को सात, शास को छह तथा बेज़लेल स्मोट्रिच के धार्मिक ज़ायनिज़्म और ज़ेहुत गठबंधन को छह सीटें मिलने का अनुमान है। इस गणना में लिकुड और उसके सहयोगियों की कुल सीटें 53 होती हैं। दूसरी ओर यशार, बेयाखाद, डेमोक्रेट्स और यिस्राएल बेतेनू को मिलाकर विपक्ष के 48 सांसद बनते हैं। अरब दलों की 19 सीटों को अलग रखा गया है। ये संख्याएँ अंतरिम सीट अनुमान हैं।

मतगणना के दौरान कुछ दलों के आँकड़े बदले हैं। बुधवार के प्रारंभिक चरण में लिकुड को 26 और शास को सात सीटें मिलती दिखाई गई थीं। बाद में लिकुड का अनुमान बढ़कर 27 और शास का घटकर छह हो गया। लेकिन इससे नेतन्याहू समर्थक गठबंधन की कुल 53 सीटों में बदलाव नहीं हुआ। इसी तरह आइज़नकोट का गठबंधन 48 और अरब दल 19 सीटों पर बने रहे। यही वजह है कि लगभग पूरी मतगणना होने के बाद भी सरकार गठन का मूल राजनीतिक गतिरोध कायम है।

छोटे दलों की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है। 'रिज़र्विस्ट्स-इकोनॉमिक पार्टी' को लगभग 2.63 प्रतिशत और 'अमखा यिस्राएल' को लगभग 1.6 प्रतिशत मत मिले हैं। इज़रायल की चुनावी व्यवस्था में संसद में प्रवेश के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए ये दोनों दल अभी संसद से बाहर हैं। अंतिम मतगणना पूरी होने के बाद ही चुनाव आयोग सभी दलों की सीटों की आधिकारिक घोषणा करेगा।

नेतन्याहू की पहली चुनौती : आठ सांसद कहाँ से आएँगे?

नेतन्याहू के गठबंधन को मौजूदा अनुमान में 53 सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं। इसका अर्थ है कि उन्हें बहुमत के लिए आठ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा। उनकी पार्टी लिकुड सबसे बड़ी है, लेकिन उसका पुराना राजनीतिक गठबंधन बहुमत से पीछे है। उसके प्रमुख सहयोगी शास, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म, ओत्ज़मा येहुदित और धार्मिक ज़ायनिज़्म हैं। इन दलों का राजनीतिक आधार धार्मिक हितों, यहूदी राष्ट्रवाद और सुरक्षा संबंधी कठोर नीतियों से जुड़ा है। यही गठबंधन नेतन्याहू सरकार का आधार रहा है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 28 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार नेतन्याहू के सामने अपने गठबंधन का विस्तार करने की चुनौती है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इसके लिए उन्हें अभी विरोधी खेमे में मौजूद किसी दल या उसके कुछ सांसदों का समर्थन प्राप्त करना होगा। रॉयटर्स ने नेतन्याहू के पूर्व सलाहकार अवीव बुशिंस्की और पूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी डैनी सिट्रिनोविच के विश्लेषण का उल्लेख किया है। दोनों का ध्यान इस तथ्य पर है कि नेतन्याहू संसदीय बहुमत से पीछे रहने के बावजूद सबसे बड़े दल और गठबंधन के नेता बने हुए हैं। हालाँकि किसी विपक्षी दल के उनके साथ आने पर अब तक औपचारिक सहमति नहीं बनी है।

नेतन्याहू ने चुनाव के बाद अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए मजबूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार बनाने की बात कही है। उन्होंने ईरान से जुड़े सुरक्षा प्रश्न को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार इज़रायल और अमेरिका के सामने ईरान से उत्पन्न खतरे को समाप्त करने का ऐतिहासिक अवसर है। इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि नेतन्याहू चुनाव के बाद भी अपनी राजनीतिक अपील में राष्ट्रीय सुरक्षा और ईरान संबंधी नीति को केंद्र में रख रहे हैं।

इसी बीच इज़रायली अख़बार 'द टाइम्स ऑफ इज़रायल' ने खबर दी है कि नेतन्याहू ने अपने सहयोगी इतामार बेन-गवीर और बेज़लेल स्मोट्रिच को आश्वस्त किया है कि वह उनका साथ नहीं छोड़ेंगे। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने के लिए कुछ राजनीतिक विश्लेषक नेतन्याहू को कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगियों के स्थान पर मध्यमार्गी विपक्षी दलों को साथ लेने का विकल्प सुझा रहे हैं। नेतन्याहू का अपने पुराने सहयोगियों के प्रति आश्वासन ऐसी संभावनाओं के सामने एक राजनीतिक शर्त के रूप में मौजूद है।

गादी आइज़नकोट की कोशिश : विपक्ष की एकजुटता, लेकिन अरब दलों पर सहमति नहीं

पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइज़नकोट ने चुनाव के बाद घोषणा की है कि वे नई सरकार बनाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने ऐसी सरकार की आवश्यकता पर जोर दिया है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सेना में भर्ती की व्यवस्था में समानता सुनिश्चित करे। आइज़नकोट ने नेतन्याहू सरकार पर जनता का भरोसा खोने का आरोप लगाया और कहा कि चुनाव ने राजनीतिक बदलाव की माँग को सामने रखा है। हालाँकि उन्होंने यह दावा नहीं किया कि उनके गठबंधन को अकेले बहुमत मिल चुका है। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक कठिनाई यही है कि उनके साथ खड़े चार दलों के पास कुल 48 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए उन्हें कम से कम 13 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन चाहिए।

आइज़नकोट के राजनीतिक सहयोगियों में बेनेट और लापिद की संयुक्त बेयाखाद पार्टी, याइर गोलान की डेमोक्रेट्स और अविगडोर लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनू प्रमुख हैं। इनमें आइज़नकोट और बेनेट का सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण दक्षिणपंथी राजनीतिक परंपरा से जुड़ा है। लापिद मध्यमार्गी राजनीति के प्रतिनिधि हैं, जबकि गोलान उदारवादी राजनीतिक धारा का नेतृत्व करते हैं। लिबरमैन धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ के नेता हैं। इन सबमें नेतन्याहू के नेतृत्व का विरोध एक साझा बिंदु है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक नीति, नागरिक अधिकारों और फ़िलिस्तीनी प्रश्न पर सभी की एक जैसी राय है। चुनाव के बाद यह वैचारिक अंतर सरकार गठन में एक बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।

याइर गोलान ने कहा—अरब दलों के साथ सरकार बनाने से डरना बंद करें

विपक्षी गठबंधन के भीतर सबसे स्पष्ट प्रस्ताव डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता याइर गोलान की ओर से आया है। उन्होंने अरब राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने की वकालत की है। गोलान ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इज़रायल की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अरब नागरिकों के वोटों का वही महत्व है जो यहूदी नागरिकों के वोटों का है। उनका कहना था कि यदि नेतन्याहू के विरोधी दलों के पास अरब पार्टियों को मिलाकर बहुमत है, तो उन्हें सरकार बनाने की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने विपक्ष से भय और सामाजिक विभाजन से ऊपर उठने का आग्रह किया।

गोलान का यह वक्तव्य चुनाव के बाद की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलों में शामिल है। इसके पीछे उनका तर्क है कि यदि अरब पार्टियों की सीटों को केवल इसलिए अलग रख दिया जाता है कि वे अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो संसदीय बहुमत का एक बड़ा हिस्सा सरकार गठन की प्रक्रिया से बाहर हो जाएगा। दूसरी ओर इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले नेता राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक विचारधारा और अरब दलों की कुछ नीतियों को लेकर अपनी असहमतियाँ रखते हैं। इसलिए विवाद केवल संख्याओं का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि इज़रायल में किन राजनीतिक शक्तियों के साथ सरकार बनाने को स्वीकार्य माना जाए।

गोलान ने इज़रायल के चैनल 12 को बताया कि वह गुरुवार को तीन विपक्षी दलों के नेताओं से सरकार गठन के बारे में बातचीत करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने इन नेताओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए। उनका कहना था कि रविवार तक सभी प्रमुख सहयोगी नेताओं के साथ बातचीत की कोशिश करेंगे। गोलान ने न्यायिक बदलावों, सुरक्षा नीति और युवा पीढ़ी के भविष्य को नई सरकार के साझा कार्यक्रम का आधार बनाने की बात कही। हालाँकि अभी तक इन प्रस्तावित मुलाकातों के परिणाम या किसी औपचारिक गठबंधन समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।

लिबरमैन की नाराजगी से विपक्ष में नई उलझन, चैनल 12 ने किया बड़ा खुलासा

इज़रायल के चैनल 12 की रिपोर्ट में विपक्षी गठबंधन के भीतर एक नई राजनीतिक कठिनाई सामने आई है। समाचार चैनल के अनुसार अविगडोर लिबरमैन ने अपने विपक्षी सहयोगियों के साथ सीधा संवाद काफी हद तक सीमित कर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि वे आइज़नकोट और बेनेट के फोन कॉल का जवाब नहीं दे रहे हैं, हालाँकि विभिन्न दलों के चुनाव अभियान से जुड़े कर्मचारियों के बीच कुछ संपर्क बने हुए हैं। यह जानकारी चैनल की रिपोर्ट पर आधारित है; लिबरमैन की ओर से इसे किसी नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

चैनल 12 के अनुसार लिबरमैन दो पुराने राजनीतिक रुखों पर कायम हैं। पहला, वे नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं होना चाहते। दूसरा, वे ऐसी अल्पमत सरकार को भी समर्थन नहीं देना चाहते जिसका अस्तित्व अरब राजनीतिक दलों के समर्थन पर निर्भर हो। इन दोनों शर्तों के कारण उनके लिए उपलब्ध राजनीतिक विकल्प सीमित हैं। इसी रिपोर्ट में कहा गया कि लिबरमैन चाहते हैं कि आइज़नकोट राष्ट्रीय एकता सरकार के विकल्प पर विचार करें। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा गठबंधन किस नेता के नेतृत्व में बनेगा और लिबरमैन उसमें स्वयं किस भूमिका में होंगे।

लिबरमैन की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके सात सांसदों के बिना आइज़नकोट के घोषित गठबंधन की संख्या 48 से घटकर 41 रह जाएगी। यदि विपक्षी दल अरब पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने पर बातचीत करते हैं तो लिबरमैन की असहमति उस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार लिबरमैन का सरकार में शामिल न होने का निर्णय नेतन्याहू के लिए भी एक राजनीतिक बाधा है। इस तरह सात सीटों वाली उनकी पार्टी सरकार गठन की बातचीत में महत्व रखती है, लेकिन अभी किसी नए राजनीतिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।

अरब दलों ने खोले समर्थन के रास्ते, जॉइंट लिस्ट के नेताओं ने दिए महत्वपूर्ण बयान

इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना अरब पार्टियों की सीटों में वृद्धि है। जॉइंट लिस्ट और रा'अम को मिलाकर 19 सीटों का अनुमान है। जॉइंट लिस्ट को 12 और रा'अम को सात सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं। दोनों पार्टियाँ अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक कार्यशैली और प्राथमिकताएँ पूरी तरह समान नहीं हैं। जॉइंट लिस्ट व्यापक अरब राजनीतिक एकजुटता तथा नागरिक अधिकारों की बात करती है, जबकि मंसूर अब्बास की रा'अम ने पहले भी इज़रायल की गठबंधन सरकार में भागीदारी का रास्ता अपनाया है।

जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबारीन ने कहा है कि उनकी पार्टी नेतन्याहू की सरकार को सत्ता से बाहर करने का रास्ता बनाने के लिए विपक्ष के साथ सहयोग करने को तैयार है। पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद तिबी ने भी आइज़नकोट के प्रयास में मदद करने की इच्छा जताई है। हालाँकि जॉइंट लिस्ट ने संकेत दिया है कि वह किसी वैकल्पिक सरकार को बाहर से समर्थन दे सकती है, लेकिन स्वयं मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगी। यह अंतर महत्वपूर्ण है। बाहर से समर्थन देने का अर्थ है कि पार्टी सरकार गठन या विशेष संसदीय प्रस्तावों में सहयोग कर सकती है, जबकि मंत्री पदों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग रहेगी।

यदि आइज़नकोट के 48 सांसद और अरब दलों के 19 सांसद किसी साझा संसदीय व्यवस्था पर सहमत हो जाएँ, तो कुल 67 सांसदों का समर्थन उपलब्ध हो सकता है। लेकिन यह अभी केवल गणितीय संभावना है, वास्तविक गठबंधन नहीं। इसके लिए आइज़नकोट, बेनेट, लापिद, गोलान और लिबरमैन सहित सभी संबंधित नेताओं को अपनी राजनीतिक शर्तों पर सहमति बनानी होगी। विशेष रूप से बेनेट और लिबरमैन के पूर्व घोषित रुख के कारण इस प्रश्न पर मतभेद हैं। इसलिए अरब दलों के प्रस्ताव को तत्काल सरकार गठन की सहमति मानना सही नहीं होगा।

राष्ट्रीय एकता सरकार की चर्चा : नेतन्याहू और आइज़नकोट एक साथ आएँ तो क्या होगा?

इज़रायली तथा अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों में राष्ट्रीय एकता सरकार के विकल्प की भी चर्चा हो रही है। रॉयटर्स ने अपने राजनीतिक विश्लेषण में नेतन्याहू के पूर्व सलाहकार अवीव बुशिंस्की और पूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी डैनी सिट्रिनोविच के विचार प्रकाशित किए हैं। दोनों ने इस बात पर चर्चा की कि नेतन्याहू अपने परंपरागत सहयोगियों से बाहर निकलकर किसी बड़े विपक्षी दल को सरकार में शामिल करने का प्रयास कर सकते हैं। इस संदर्भ में आइज़नकोट और बेनेट जैसे नेताओं के नाम सामने आए हैं। लेकिन यह विश्लेषकों द्वारा व्यक्त संभावना है, न कि इन नेताओं के बीच किसी समझौते की आधिकारिक पुष्टि।

राष्ट्रीय एकता सरकार का एक स्वरूप ऐसा हो सकता है जिसमें लिकुड और विपक्ष की कोई बड़ी पार्टी साझा कार्यक्रम पर सहमत हो। यदि लिकुड और यशार जैसी पार्टियाँ साथ आती हैं, तो उनका संयुक्त संसदीय आधार सरकार गठन की बातचीत का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री पद, मंत्रालयों का बँटवारा, सेना में धार्मिक समुदायों की भर्ती, न्यायिक व्यवस्था और सात अक्टूबर की जाँच जैसे प्रश्नों पर स्पष्ट सहमति आवश्यक होगी। नेतन्याहू ने अपने पुराने सहयोगियों को साथ रखने की बात कही है और आइज़नकोट ने चुनाव प्रचार में राजनीतिक बदलाव का समर्थन किया था। ये दोनों राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ राष्ट्रीय एकता सरकार की बातचीत में सामने आएँगी।

इज़रायल में इस तरह की सरकार पहले भी बन चुकी है। वर्ष 2020 में नेतन्याहू और बेनी गांत्ज़ ने साझा सरकार बनाने का समझौता किया था। उसमें प्रधानमंत्री पद का क्रमिक हस्तांतरण होना था, लेकिन गठबंधन टूट जाने के कारण यह व्यवस्था पूरी नहीं हो सकी। इस ऐतिहासिक उदाहरण का उल्लेख रॉयटर्स और विदेशी समाचार माध्यमों ने भी किया है। इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रीय एकता सरकार संवैधानिक रूप से असामान्य नहीं है, लेकिन ऐसी सरकार की स्थिरता उसके सहयोगियों के बीच समझौते पर निर्भर करती है।

लिकुड ने अरब दलों पर चुनाव चोरी का आरोप लगाया, चुनाव आयोग ने कहा—सभी शिकायतों की जाँच होगी

सरकार गठन की बातचीत के बीच चुनाव प्रक्रिया को लेकर एक नया विवाद भी शुरू हो गया है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने अरब राजनीतिक दलों पर चुनाव में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। पार्टी ने दावा किया है कि कुछ अरब बहुल मतदान केंद्रों पर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए रिश्वत, धमकियों, हिंसा, जाली मतदान और अवैध तकनीकी साधनों का इस्तेमाल किया गया। लिकुड ने पुलिस, आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट और केंद्रीय चुनाव आयोग से इसकी जाँच करने की माँग की है। पार्टी ने कहा है कि उसके पास शिकायतों और कथित अनियमितताओं से जुड़ी अनेक जानकारियाँ हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन आरोपों की अभी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इज़रायल के केंद्रीय चुनाव आयोग ने कहा है कि वह चुनाव में अनियमितताओं से संबंधित सभी दलों की शिकायतों की जाँच अपनी नियमित प्रक्रिया के अनुसार करेगा। आयोग के एक अधिकारी ने पहले भी व्यापक चुनावी धोखाधड़ी के दावों पर सवाल उठाए थे। इसलिए लिकुड के राजनीतिक आरोपों और चुनाव अधिकारियों द्वारा सिद्ध की गई किसी गड़बड़ी के बीच अंतर करना आवश्यक है। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर अरब पार्टियों की बढ़ी हुई सीटों को चुनावी धांधली का परिणाम नहीं कहा जा सकता।

अरब पार्टियों ने लिकुड के आरोपों का विरोध किया है। जॉइंट लिस्ट का कहना है कि बड़ी संख्या में अरब नागरिकों ने मतदान करके राजनीतिक बदलाव तथा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए समर्थन दिया है। पार्टी ने संकेत दिया है कि वह इस जनादेश के आधार पर नेतन्याहू की सरकार के विकल्प का समर्थन करने के लिए तैयार है। इस विवाद ने चुनाव बाद की राजनीति में एक और संवेदनशील प्रश्न खड़ा कर दिया है—अरब नागरिकों के मतों और उनके चुने हुए प्रतिनिधियों को सरकार गठन की प्रक्रिया में क्या स्थान मिलेगा?

राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने कहा—फिर चुनाव से बचने के लिए खुले मन से बातचीत करें

इज़रायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने चुनाव के बाद प्रमुख राजनीतिक दलों से आग्रह किया है कि वे सरकार गठन की बातचीत खुले मन से करें और देश को फिर से आम चुनाव की ओर ले जाने से बचाने का प्रयास करें। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय हितों और संसदीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए समझौते की संभावनाएँ तलाशनी चाहिए। उनका यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी घोषित गठबंधन को 61 सीटें नहीं मिली हैं। अंतिम परिणाम आने के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श करेंगे और उसके आधार पर किसी सांसद को सरकार बनाने का दायित्व सौंपेंगे।

राष्ट्रपति के सामने फिलहाल दो प्रमुख राजनीतिक दावेदार हैं। पहला दावा नेतन्याहू का है, जिनकी लिकुड सबसे बड़ी पार्टी है और जिनके सहयोगी दलों का संयुक्त आधार 53 सीटों का दिखाई देता है। दूसरा दावा आइज़नकोट का है, जिनके साथ चार प्रमुख विपक्षी दल हैं और जो अन्य सांसदों के समर्थन से वैकल्पिक सरकार बनाना चाहते हैं। राष्ट्रपति की जिम्मेदारी केवल सबसे बड़े दल के नेता को बुलाना नहीं है। उन्हें यह देखना होगा कि किस व्यक्ति के पास संसद का समर्थन जुटाने की वास्तविक क्षमता है। इसलिए राजनीतिक दलों की लिखित सिफारिशें और परस्पर सहमति इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होंगी।

सरकार गठन की प्रक्रिया कितनी लंबी हो सकती है?

इज़रायल के मूल कानून के अनुसार चुनाव परिणाम मिलने के बाद राष्ट्रपति दलों से परामर्श करके सरकार बनाने का दायित्व किसी सांसद को सौंपते हैं। पहले उम्मीदवार को 28 दिन मिलते हैं। राष्ट्रपति आवश्यकता होने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। यदि वह सफल नहीं होता, तो दूसरे सांसद को 28 दिन का अवसर मिल सकता है। उसके भी असफल होने या राष्ट्रपति द्वारा सरकार बनने की संभावना न देखने की स्थिति में संसद के कम से कम 61 सदस्य निर्धारित 21 दिन के भीतर किसी सांसद को नामित करने की माँग कर सकते हैं। उस उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए 14 दिन मिलते हैं। यदि सभी संवैधानिक प्रयास विफल हो जाएँ, तो फिर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

नई सरकार बनने तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। इसका अर्थ यह है कि त्रिशंकु संसद की स्थिति अपने आप प्रधानमंत्री को पद से नहीं हटाती। नई सरकार को संसदीय विश्वास प्राप्त करना होगा। सरकार गठन में कई सप्ताह लग सकते हैं। आधिकारिक चुनाव परिणाम चार नवंबर तक प्रकाशित होने की अपेक्षा है और उसके बाद राष्ट्रपति की औपचारिक परामर्श प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस प्रकार अभी जो बातचीत चल रही है, वह मुख्यतः चुनाव के बाद की प्रारंभिक राजनीतिक पहल है।

इज़रायली और विदेशी अख़बार क्या लिख रहे हैं? चुनाव परिणामों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण

इज़रायल के प्रमुख समाचार पत्र 'द टाइम्स ऑफ इज़रायल' ने चुनाव के बाद की स्थिति को राजनीतिक गतिरोध और गठबंधन गठन की जटिलता के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। अख़बार के अनुसार नेतन्याहू और आइज़नकोट दोनों सरकार बनाने के दावे कर रहे हैं, लेकिन दोनों के सामने अलग-अलग बाधाएँ हैं। नेतन्याहू के लिए आठ और सांसद जुटाने का प्रश्न है। आइज़नकोट को अरब दलों के समर्थन और अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों की आपत्तियों के बीच रास्ता निकालना है। अख़बार ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया है कि चुनाव के बाद सत्ता बदलने के लिए केवल नेतन्याहू-विरोधी दलों की सीटों को जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।

इज़रायल के दूसरे प्रमुख अंग्रेजी अख़बार 'द जेरूसलम पोस्ट' ने 28 अक्टूबर की रात और 29 अक्टूबर की शुरुआती रिपोर्टों में तीन घटनाओं को प्रमुखता दी। पहली, करीब 90 प्रतिशत मतगणना पूरी होने के बावजूद दोनों मुख्य खेमे बहुमत से पीछे थे। दूसरी, जॉइंट लिस्ट के वरिष्ठ नेता अहमद तिबी ने विपक्ष को सहयोग देने का संकेत दिया। तीसरी, डेमोक्रेट्स नेता याइर गोलान ने अरब दलों की भागीदारी के साथ वैकल्पिक सरकार बनाने की पहल तेज करने का प्रस्ताव रखा। अख़बार ने विशेष मतपत्रों की गणना शुरू होने की भी सूचना दी।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट ने नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उसकी रिपोर्ट में पूर्व सलाहकार अवीव बुशिंस्की के हवाले से यह बात सामने आई कि स्पष्ट बहुमत न मिलने पर भी नेतन्याहू सबसे बड़े दल और गठबंधन के नेता बने हुए हैं। पूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी डैनी सिट्रिनोविच ने भी इस तथ्य पर जोर दिया कि नेतन्याहू के विरोधियों के सामने एक व्यावहारिक गठबंधन बनाने की कठिनाई है। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय एकता सरकार के विकल्प को लेकर चर्चा है, लेकिन इसे किसी औपचारिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता।

ब्रिटेन के अख़बार 'द गार्जियन' ने अरब नागरिकों की बढ़ी हुई चुनावी भागीदारी और संसद में उनके प्रतिनिधित्व को महत्वपूर्ण विषय बनाया है। अख़बार के अनुसार विपक्ष के सामने मूल प्रश्न यह है कि क्या उसके प्रमुख नेता अरब राजनीतिक दलों के साथ सरकार बनाने की पुरानी असहमतियों में बदलाव करेंगे। वहीं एसोसिएटेड प्रेस ने इज़रायल की सामाजिक और राजनीतिक विभाजन रेखाओं पर ध्यान दिया है। उसकी रिपोर्ट में धार्मिक सैन्य छूट, लोकतांत्रिक संस्थाओं, फ़िलिस्तीनी प्रश्न और नागरिक अधिकारों से जुड़े मतभेदों को गठबंधन गठन की प्रमुख चुनौतियों में गिना गया है।

अमेरिकी समाचार माध्यमों और ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक प्रसारक एबीसी ने भी अल्पमत सरकार, राष्ट्रीय एकता सरकार, विपक्ष तथा अरब दलों के सहयोग और दोबारा चुनाव जैसे संवैधानिक विकल्पों की चर्चा की है। इन रिपोर्टों का साझा तथ्य यह है कि चुनाव परिणामों से किसी एक नेता की सरकार का गठन सुनिश्चित नहीं हुआ है। हालाँकि गठबंधन की संभावनाओं के बारे में विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों के मत अलग-अलग हैं।

ट्रंप का नेतन्याहू को समर्थन, ईरान की नीति भी सरकार गठन की बहस में

इज़रायल के चुनाव में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी चर्चा में रही है। ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू का समर्थन किया था। मतदान के बाद उन्होंने कहा कि नेतन्याहू ने अच्छा प्रदर्शन किया है और अपने समर्थन के राजनीतिक प्रभाव का भी उल्लेख किया। रॉयटर्स ने अपने विश्लेषण में यह प्रश्न उठाया है कि अमेरिका की क्षेत्रीय प्राथमिकताएँ और ईरान के प्रति नीति इज़रायल की नई सरकार के स्वरूप को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं।

नेतन्याहू ईरान के विरुद्ध कठोर सुरक्षा नीति को अपने नेतृत्व का प्रमुख आधार बना रहे हैं। दूसरी ओर आइज़नकोट और बेनेट भी राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में कठोर दृष्टिकोण रखते हैं। इसलिए नई सरकार के गठन से इज़रायल की सुरक्षा नीति में तत्काल बुनियादी परिवर्तन हो जाएगा, ऐसा मान लेना उचित नहीं है। दलों के बीच मतभेद युद्ध संचालन, निर्णय प्रक्रिया, सरकारी जवाबदेही और कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं। रॉयटर्स के टिप्पणी लेख ने भी इस बात पर ध्यान दिया है कि लंबे राजनीतिक गतिरोध के कारण क्षेत्रीय नीति से जुड़े निर्णयों पर अनिश्चितता बनी रह सकती है।

अब आगे किन घटनाओं पर नजर रहेगी?

चुनाव के बाद की प्रक्रिया में सबसे पहले अंतिम मतगणना और आधिकारिक सीटों का निर्धारण महत्वपूर्ण है। इसके साथ यह देखना होगा कि विपक्षी नेता अरब पार्टियों के समर्थन पर किस प्रकार की सहमति बनाते हैं, लिबरमैन अपने राजनीतिक रुख में कोई परिवर्तन करते हैं या नहीं, और नेतन्याहू अपने मौजूदा सहयोगियों के अतिरिक्त दूसरे दलों से बातचीत शुरू करते हैं या नहीं। राष्ट्रपति हर्ज़ोग के समक्ष दलों की सिफारिशें आने के बाद सरकार गठन की संभावनाओं की अधिक स्पष्ट तस्वीर बनेगी।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न संसद के नए अध्यक्ष का होगा। इज़रायली मीडिया में ऐसी चर्चा हुई है कि नेतन्याहू-विरोधी दल अरब पार्टियों के समर्थन से वर्तमान नेसेट अध्यक्ष अमीर ओहाना को बदलने की पहल कर सकते हैं। यदि नए संसदीय बहुमत के आधार पर ऐसा कदम उठाया जाता है, तो वह सरकार गठन से अलग एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम होगा। लेकिन अभी इसे केवल रिपोर्ट की गई राजनीतिक संभावना माना जाना चाहिए, कोई पूरा हो चुका फैसला नहीं।

मतदाताओं ने संसद की तस्वीर बदल दी, सरकार का स्वरूप अभी तय नहीं

इज़रायल के चुनाव में एक साथ तीन राजनीतिक घटनाएँ सामने आई हैं। पहली, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है, लेकिन उसका परंपरागत गठबंधन बहुमत से पीछे है। दूसरी, आइज़नकोट के नेतृत्व में विपक्ष के पास महत्वपूर्ण संख्या में सांसद हैं, किंतु उसके सहयोगियों में अरब दलों को लेकर मतभेद हैं। तीसरी, अरब राजनीतिक दलों की संसदीय ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और उनके प्रतिनिधि अब सरकार गठन की बातचीत में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इस स्थिति में चुनाव परिणामों को किसी एक व्यक्ति की स्पष्ट राजनीतिक विजय या पराजय के रूप में प्रस्तुत करना अंतिम मतगणना से पहले उचित नहीं होगा। नेतन्याहू ने सबसे बड़े दल और गठबंधन का नेतृत्व बनाए रखा है, लेकिन उनके पास आवश्यक संसदीय बहुमत नहीं है। आइज़नकोट के पास वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों का समर्थन है, लेकिन उन्हें नए समझौते करने होंगे। अरब दलों ने सहयोग की इच्छा व्यक्त की है, लेकिन उनका समर्थन किन शर्तों पर स्वीकार किया जाएगा, यह अभी अनिश्चित है।

इज़रायल के सामने अब केवल सरकार बनाने का प्रश्न नहीं है। नई सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, ईरान, गाजा, सैन्य भर्ती, न्यायपालिका, धार्मिक समुदायों और नागरिक अधिकारों से जुड़े विवादों पर भी अपने सहयोगियों के बीच सहमति बनानी होगी। इसी वजह से सरकार का स्वरूप जितना महत्वपूर्ण होगा, उतना ही महत्वपूर्ण उसका साझा कार्यक्रम भी होगा।

29 अक्टूबर की सुबह तक की वास्तविक स्थिति यह है कि लगभग 98 प्रतिशत मतगणना पूरी हो चुकी है, नेतन्याहू गठबंधन 53, विपक्ष 48 और अरब पार्टियाँ 19 सीटों पर हैं। अभी कोई नई सरकार नहीं बनी है, न किसी नए गठबंधन के गठन की औपचारिक घोषणा हुई है। राजनीतिक बातचीत और प्रस्तावों का दौर शुरू हो चुका है।

Neel Mani Lal
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