Israel Election 2026 Update: नेतन्याहू की सत्ता दाँव पर, गादी आइज़नकोट बने सबसे बड़ी चुनौती

Israel Election 2026 Update: इज़रायल चुनाव 2026 में बेंजामिन नेतन्याहू और गादी आइज़नकोट के बीच कड़ा मुकाबला है। जानिए चुनावी सर्वे, प्रमुख मुद्दे, गठबंधन और सरकार बनाने का पूरा गणित।

Yogesh Mishra
Published on: 27 Oct 2026 6:14 PM IST
Israel Election 2026 Result Live Update in Hindi | Benjamin Netanyahu vs Gadi Eisenkot | Newstrack
X

Israel Election 2026 Result Live Update in Hindi | Benjamin Netanyahu vs Gadi Eisenkot | Newstrack 

Israel Election 2026 Update: इज़रायल के संसदीय चुनाव में आज मतदान हो रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का लगभग दो दशकों में फैला राजनीतिक नेतृत्व इस चुनाव के केंद्र में है। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले, उसके बाद गाजा में लंबे युद्ध, ईरान के साथ सैन्य संघर्ष और इज़रायल की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को लेकर उठे सवालों ने इस चुनाव को विशेष महत्व दे दिया है। देश के 70 लाख से अधिक मतदाता यह तय कर रहे हैं कि वे नेतन्याहू के नेतृत्व वाले राजनीतिक गठबंधन को फिर सत्ता सौंपना चाहते हैं या किसी नए नेतृत्व को अवसर देना चाहते हैं। मतदान के दिन समाचार एजेंसी रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सरकार की जवाबदेही, सेना में अनिवार्य भर्ती, न्यायिक सुधार और धार्मिक समुदायों को मिलने वाली विशेष छूट भी प्रमुख मुद्दे हैं। 

इस चुनाव में दिलचस्प बात यह है कि नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी परंपरागत वामपंथी नेता नहीं, बल्कि इज़रायली सेना के पूर्व प्रमुख गादी आइज़नकोट हैं। उनके अतिरिक्त पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट, पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिद और पूर्व रक्षा मंत्री अविगडोर लिबरमैन भी नेतन्याहू-विरोधी राजनीतिक खेमे के प्रमुख चेहरे हैं। इसका अर्थ है कि नेतन्याहू के विरोध में एकत्रित राजनीतिक शक्तियाँ वैचारिक रूप से एक जैसी नहीं हैं। इनमें दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और उदारवादी दल शामिल हैं। सितंबर में इन दलों के नेताओं ने परस्पर राजनीतिक हमलों को सीमित करने और चुनाव के बाद वैकल्पिक सरकार बनाने के उद्देश्य से सहयोग की घोषणा की थी। हालाँकि चुनाव के बाद इनके बीच वास्तविक सत्ता-साझेदारी कैसी होगी, यह अभी तय नहीं है। 

कौन-कौन चुनाव लड़ रहा है और किसकी क्या राजनीतिक हैसियत है?

इज़रायल की 120 सदस्यीय संसद को 'नेसेट' कहा जाता है। इसमें सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। चुनाव में पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और राजनीतिक दलों को प्राप्त वोटों के आधार पर अनुपातिक प्रणाली से सीटें मिलती हैं। किसी दल को संसद में प्रवेश के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वैध वोट प्राप्त करने होते हैं। इस बार 38 उम्मीदवार सूचियाँ स्वीकृत हुई थीं, लेकिन पूर्व रक्षा मंत्री बेनी गांत्ज़ की 'ब्लू एंड व्हाइट' ने अंतिम समय में चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया। इस तरह सक्रिय रूप से मुकाबले में 37 सूचियाँ रह गईं। सभी दलों के संसद तक पहुँचने की संभावना नहीं है। 

बेंजामिन नेतन्याहू : लिकुड पार्टी के नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी इज़रायल के दक्षिणपंथी राजनीतिक आंदोलन की प्रमुख प्रतिनिधि है। उनका राजनीतिक आधार राष्ट्रीय सुरक्षा, यहूदी राष्ट्रीय पहचान, ईरान के प्रति कठोर नीति और फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना के विरोध पर आधारित है। नेतन्याहू समर्थक उन्हें एक अनुभवी नेता मानते हैं जिन्होंने इज़रायल को अनेक युद्धों और सुरक्षा संकटों में नेतृत्व दिया। दूसरी ओर उनके आलोचक सात अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलता, विवादास्पद न्यायिक बदलावों और गाजा युद्ध के राजनीतिक प्रबंधन को लेकर उनकी जवाबदेही की माँग करते हैं। नेतन्याहू अपने चुनाव अभियान में सैन्य उपलब्धियों, ईरान के विरुद्ध कार्रवाई और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंधों को प्रमुखता दे रहे हैं। 

लिकुड के लिए इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू उसके सहयोगी दलों की संख्या और उनकी सीटें हैं। नेतन्याहू का राजनीतिक आधार अकेली लिकुड तक सीमित नहीं है। उनके साथ धार्मिक यहूदी दलों और कट्टर राष्ट्रवादी दलों का गठबंधन जुड़ा हुआ है। इज़रायल की गठबंधन राजनीति में कई बार अपेक्षाकृत छोटे दल सरकार की आर्थिक, धार्मिक और सुरक्षा नीतियों पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। इसलिए लिकुड की सीटों की संख्या जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण शासक गठबंधन का कुल संसदीय समर्थन भी है।

गादी आइज़नकोट : सेना के पूर्व प्रमुख, यशार पार्टी के नेता

गादी आइज़नकोट इस चुनाव के सबसे चर्चित नेताओं में हैं। वह 2015 से 2019 तक इज़रायली सेना के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ रहे। बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। उनकी नई पार्टी 'यशार' या 'यशार!' ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ संस्थागत सुधार, सार्वजनिक जवाबदेही, सेना में समान भर्ती और सात अक्टूबर की घटनाओं की स्वतंत्र जाँच को प्रमुख मुद्दा बनाया है। उनकी राजनीतिक पहचान केवल नेतन्याहू-विरोध पर आधारित नहीं है। वे सुरक्षा संबंधी मामलों में कठोर दृष्टिकोण रखते हैं और फ़िलिस्तीनी राज्य के गठन का भी विरोध करते हैं। यही वजह है कि इज़रायल का वर्तमान चुनाव केवल दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं है। 

आइज़नकोट ने उम्मीदवारों की सूची बनाते समय सुरक्षा और प्रशासनिक अनुभव को महत्व दिया है। उनकी पार्टी में पूर्व शिन बेट प्रमुख योराम कोहेन दूसरे स्थान पर हैं। शिन बेट इज़रायल की आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी खुफिया एजेंसी है। इसके अलावा पूर्व मंत्री ओरित फार्काश-हाकोहेन, सामाजिक कार्यकर्ता आदि आल्टशुलर और पूर्व मंत्री मातान कहाना जैसे नाम भी सूची में शामिल हैं। इस संयोजन के माध्यम से आइज़नकोट ने सुरक्षा, प्रशासन और नागरिक समाज के प्रतिनिधित्व को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाया है। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह के कई चुनावी सर्वेक्षणों में उनकी पार्टी को लिकुड से अधिक सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। लेकिन पार्टी का सबसे बड़ी बनना और सरकार बना पाना दो अलग-अलग बातें हैं। 

नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद : दो पूर्व प्रधानमंत्रियों का संयुक्त मोर्चा

पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिद इस बार 'बेयाखाद' अर्थात 'टुगेदर' नाम के संयुक्त चुनावी गठबंधन में हैं। इस सूची का नेतृत्व बेनेट कर रहे हैं और लापिद दूसरे स्थान पर हैं। बेनेट स्वयं दक्षिणपंथी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जबकि लापिद की 'येश अतिद' पार्टी मध्यमार्गी राजनीति से जुड़ी रही है। दोनों ने पहले भी नेतन्याहू के बाद गठबंधन सरकार चलाने में भूमिका निभाई थी। बेनेट जून 2021 से जून 2022 तक प्रधानमंत्री रहे और उनके बाद लापिद ने प्रधानमंत्री पद संभाला। संयुक्त चुनावी सूची बनाना दोनों नेताओं का राजनीतिक सहयोग है, हालाँकि उनकी विचारधाराएँ पूरी तरह समान नहीं हैं। 

बेयाखाद ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ प्रभावी शासन, सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता और सेना में सेवा के दायित्व को चुनावी मुद्दा बनाया है। इस गठबंधन की उम्मीदवार सूची में पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह केरेन टर्नर और पूर्व सैन्य अधिकारी नोआम टिबोन भी शामिल हैं। बेनेट ने अरब राजनीतिक दल रा'अम के साथ 2021 जैसे गठबंधन को दोहराने से इनकार किया है। यह चुनाव के बाद सरकार बनाने की संभावनाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता है, क्योंकि विभिन्न सर्वेक्षणों में अरब दलों की सीटें सत्ता के समीकरण को प्रभावित करती दिखाई दे रही हैं। 

इतामार बेन-गवीर : यहूदी पावर पार्टी और कट्टर राष्ट्रवादी राजनीति

इतामार बेन-गवीर की 'ओत्ज़मा येहुदित' अर्थात 'यहूदी पावर' पार्टी नेतन्याहू के सहयोगी दक्षिणपंथी खेमे का हिस्सा है। उसका राजनीतिक आधार यहूदी राष्ट्रवाद, फ़िलिस्तीनियों के संबंध में कठोर सुरक्षा नीति और पश्चिमी तट पर इज़रायली नियंत्रण का विस्तार करने की माँग से जुड़ा है। पार्टी के विचार मुख्यधारा के मध्यमार्गी दलों से कई मामलों में अलग हैं। इसका महत्व इसलिए है कि चुनाव के बाद नेतन्याहू को बहुमत जुटाने में ऐसी पार्टियों की आवश्यकता पड़ सकती है। इनके समर्थन की शर्तें संभावित सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं। 

बेज़लेल स्मोट्रिच : धार्मिक ज़ायनिज़्म और ज़ेहुत का गठबंधन

बेज़लेल स्मोट्रिच धार्मिक राष्ट्रवादी राजनीति के प्रमुख नेता हैं। इस चुनाव में उनकी 'रिलीजियस ज़ायनिज़्म' पार्टी ने मोशे फेग्लिन के 'ज़ेहुत' समूह के साथ संयुक्त सूची बनाई है। स्मोट्रिच सूची में पहले और फेग्लिन दूसरे स्थान पर हैं। उनकी राजनीतिक धारा इज़रायल के धार्मिक-राष्ट्रीय चरित्र तथा पश्चिमी तट से संबंधित नीतियों पर विशेष जोर देती है। धार्मिक राष्ट्रवादी दलों की चुनावी ताकत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इनका प्रभाव केवल सांसदों की संख्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सुरक्षा और क्षेत्रीय नीतियों को लेकर गठबंधन सरकार के भीतर उनकी भूमिका भी होती है। 

आर्येह डेरी की शास और यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म

नेतन्याहू के सहयोगी खेमे में दो अति-रूढ़िवादी यहूदी राजनीतिक दल विशेष महत्व रखते हैं। पहला 'शास' है, जिसके नेता आर्येह डेरी हैं। दूसरा 'यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म' है, जिसकी उम्मीदवार सूची में याकोव आशेर पहले और यित्ज़ाक गोल्डक्नोप्फ दूसरे स्थान पर हैं। इन दलों का सामाजिक आधार धार्मिक यहूदी समुदायों, विशेषकर 'हरेदी' समूहों से जुड़ा है। इनके लिए धार्मिक शिक्षा संस्थानों का संरक्षण, धार्मिक जीवन में सरकारी हस्तक्षेप की सीमाएँ, सामाजिक सहायता और सैन्य भर्ती के नियम महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय हैं। 

इज़रायल में अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा की व्यवस्था है, जबकि कई अति-रूढ़िवादी धार्मिक विद्यार्थियों को लंबे समय तक छूट मिलती रही है। इस व्यवस्था के कारण धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक समाज के बीच राजनीतिक विवाद बढ़ा है। लंबे युद्धों में सेना पर दबाव के बाद यह प्रश्न और प्रमुख हो गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का बोझ समाज के सभी वर्गों पर किस सीमा तक समान रूप से पड़ना चाहिए। धार्मिक दलों का दृष्टिकोण धार्मिक अध्ययन और सामुदायिक जीवन की स्वायत्तता के संरक्षण से जुड़ा है, जबकि उनके विरोधी अधिक व्यापक भर्ती के पक्ष में हैं। यही विवाद गठबंधन वार्ताओं में भी महत्वपूर्ण हो सकता है। 

अविगडोर लिबरमैन : धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ की आवाज

अविगडोर लिबरमैन की पार्टी 'यिस्राएल बेतेनू' इज़रायल के धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथी मतदाताओं, विशेषकर रूसी भाषी आप्रवासी समुदायों में आधार रखती है। लिबरमैन पहले रक्षा मंत्री भी रहे हैं। वे ईरान, हमास और हिज़्बुल्लाह के विरुद्ध कठोर सुरक्षा नीतियों का समर्थन करते हैं, लेकिन सेना में धार्मिक छूट तथा धार्मिक संस्थाओं के प्रभाव के प्रश्न पर नेतन्याहू के अति-रूढ़िवादी सहयोगियों से उनका मतभेद है। वे नागरिक विवाह तथा सैन्य सेवा में व्यापक भागीदारी के पक्षधर हैं। उन्होंने नेतन्याहू और अति-रूढ़िवादी दलों के साथ सरकार न बनाने का रुख व्यक्त किया है। उनकी पार्टी कई सर्वेक्षणों में लगभग छह से नौ सीटों के आसपास दिखाई देती है। 

याइर गोलान : डेमोक्रेट्स पार्टी का नेतृत्व

याइर गोलान की 'द डेमोक्रेट्स' पार्टी इज़रायल के उदारवादी और वाम-मध्यमार्गी राजनीतिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करती है। इसका गठन लेबर और मेरेत्ज़ की राजनीतिक धाराओं के एकीकरण से हुआ। पार्टी न्यायपालिका की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा, नागरिक समानता और धर्मनिरपेक्ष सुधारों पर जोर देती है। पश्चिमी तट के विलय का विरोध और भविष्य में इज़रायल-फ़िलिस्तीन राजनीतिक अलगाव की संभावना बनाए रखना भी उसकी नीति का हिस्सा है। गोलान स्वयं सैन्य पृष्ठभूमि से आते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इज़रायल में सुरक्षा प्रतिष्ठान के पूर्व अधिकारी केवल दक्षिणपंथी दलों में ही नहीं, बल्कि उदारवादी राजनीति में भी सक्रिय हैं। 

मंसूर अब्बास और अरब राजनीतिक दल : सत्ता समीकरण का अलग पक्ष

अरब मतदाताओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली 'रा'अम' पार्टी अरब समाज की नागरिक आवश्यकताओं, अपराध नियंत्रण, विकास और सरकारी निवेश को प्रमुखता देती है। यह पार्टी 2021 में बेनेट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई थी। इसके अतिरिक्त 'जॉइंट लिस्ट' में हदाश, ता'अल और बलाद जैसी राजनीतिक धाराएँ सम्मिलित हैं। इस सूची का नेतृत्व यूसुफ जबारीन कर रहे हैं और अहमद तिबी भी प्रमुख नेताओं में हैं। यह गठबंधन अरब नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों, समानता और फ़िलिस्तीनी प्रश्न पर अपना अलग दृष्टिकोण रखता है। 

एक उल्लेखनीय घटना यह भी रही कि केंद्रीय चुनाव समिति ने सितंबर में रा'अम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव लड़ने से रोकने का निर्णय लिया था। बाद में दो अक्टूबर को इज़रायल के सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को पलट दिया। इस प्रकार दोनों सूचियाँ चुनाव में भाग ले रही हैं। इज़रायल की गठबंधन राजनीति में अरब दलों के प्रति अन्य प्रमुख दलों का रुख संवेदनशील मुद्दा है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में दोनों अरब सूचियों को मिलाकर लगभग 14 से 16 सीटें मिलने के अनुमान सामने आए हैं, लेकिन उन सीटों का किसी संभावित सरकार को प्रत्यक्ष या बाहर से समर्थन मिलेगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। 

इज़रायली अख़बारों के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण क्या कह रहे हैं?

चुनाव से ठीक पहले 22 और 23 अक्टूबर को प्रकाशित सर्वेक्षणों में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है। अनेक सर्वेक्षणों में गादी आइज़नकोट की यशार पार्टी, नेतन्याहू की लिकुड से अधिक सीटें प्राप्त करती दिखाई गई है। हालाँकि सर्वेक्षण एजेंसियों के अनुमान एक जैसे नहीं हैं। कुछ में आइज़नकोट की पार्टी अधिक सीटें प्राप्त करती दिखाई देती है, जबकि दूसरे सर्वेक्षणों में लिकुड को बढ़त मिलती है। इसी तरह नेतन्याहू समर्थक गठबंधन की कुल सीटों को लेकर भी उल्लेखनीय अंतर है। इसलिए किसी एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण को पूरे इज़रायल के मतदाताओं की अंतिम राय नहीं माना जा सकता। 

मारिव का सर्वेक्षण : आइज़नकोट की पार्टी को 21 और लिकुड को 19 सीटें

इज़रायल के प्रमुख समाचार पत्र 'मारिव' के लिए लाज़र रिसर्च द्वारा किए गए 23 अक्टूबर के सर्वेक्षण में यशार पार्टी को 21 और लिकुड को 19 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। बेनेट और लापिद की संयुक्त बेयाखाद पार्टी को 15 सीटें, याइर गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी को 10 और लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनू को आठ सीटें दी गईं। अरब दलों में जॉइंट लिस्ट को नौ और रा'अम को पाँच सीटें मिलने का अनुमान था। नेतन्याहू के सहयोगियों में शास को आठ, ओत्ज़मा येहुदित को सात, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को सात और धार्मिक ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत को सात सीटें मिलने का अनुमान सामने आया। छोटे दलों में योआज़ हेंडेल और यारोन ज़ेलेखा की संयुक्त सूची को चार सीटों तक पहुँचते दिखाया गया। 

इस सर्वेक्षण में गठबंधन संबंधी सार्वजनिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर आइज़नकोट के पक्ष में 54 सीटें और नेतन्याहू के खेमे के लिए 41 सीटें दिखाई गईं। शेष में अरब पार्टियों की 14 सीटें तथा ऐसे दलों की सीटें शामिल थीं जिन्होंने स्पष्ट रूप से किसी प्रमुख गठबंधन के साथ रहने का एलान नहीं किया था। यह अंतर समझना जरूरी है। किसी एक राजनीतिक विचारधारा के दलों की सीटों को जोड़ना और उन दलों को जोड़ना जिन्होंने औपचारिक रूप से साथ सरकार बनाने की घोषणा की है, दोनों अलग गणनाएँ हैं। 

चैनल 12 का सर्वेक्षण : यशार को 23 और लिकुड को 21 सीटें

इज़रायल के चर्चित समाचार चैनल 'चैनल 12' के लिए मिडगाम द्वारा किए गए 23 अक्टूबर के सर्वेक्षण में आइज़नकोट की यशार पार्टी को 23 सीटें और नेतन्याहू की लिकुड को 21 सीटें मिलने का अनुमान था। बेयाखाद को 15, डेमोक्रेट्स को 10, जॉइंट लिस्ट को नौ, ओत्ज़मा येहुदित को आठ, शास को आठ, यिस्राएल बेतेनू को आठ, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को सात, धार्मिक ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत को छह और रा'अम को पाँच सीटों का अनुमान दिया गया। इस सर्वेक्षण में 1,018 उत्तरदाताओं का उल्लेख है। 

चैनल 12 के सर्वेक्षण में घोषित राजनीतिक समर्थन के आधार पर आइज़नकोट से संबद्ध खेमे को 56 और नेतन्याहू से संबद्ध खेमे को 43 सीटें दिखाई गईं। अरब पार्टियों को 14 तथा अन्य सात सीटों को अलग रखा गया। दूसरे शब्दों में, इस सर्वेक्षण में भी किसी स्पष्ट गठबंधन को अपने बल पर सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटें नहीं मिली थीं। 

सार्वजनिक प्रसारक कान-11 का सर्वेक्षण : लिकुड को 20, यशार को 22 सीटें

इज़रायल के सरकारी सार्वजनिक प्रसारक 'कान-11' के लिए कांतार द्वारा किए गए 23 अक्टूबर के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में लिकुड को 20 और यशार को 22 सीटों का अनुमान दिया गया। बेयाखाद को 14, डेमोक्रेट्स को आठ, जॉइंट लिस्ट को नौ, ओत्ज़मा येहुदित को आठ, शास को सात, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को आठ, यिस्राएल बेतेनू को आठ, धार्मिक ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत को सात और रा'अम को पाँच सीटें मिलने का अनुमान था। हेंडेल-ज़ेलेखा की सूची को भी चार सीटों तक पहुँचते दिखाया गया। इस सर्वेक्षण के अनुसार सार्वजनिक रूप से घोषित गठबंधन खेमों की सीटें आइज़नकोट पक्ष के लिए 52 और नेतन्याहू पक्ष के लिए 42 थीं। 

चैनल 13 : आइज़नकोट की पार्टी को 22 सीटों का अनुमान

23 अक्टूबर को चैनल 13 के लिए प्रकाशित 'हमदाद' सर्वेक्षण में यशार को 22 और लिकुड को 19 सीटों का अनुमान था। बेयाखाद को 14, डेमोक्रेट्स को 10, जॉइंट लिस्ट को नौ, ओत्ज़मा येहुदित को आठ, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को आठ, धार्मिक ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत को आठ, यिस्राएल बेतेनू को आठ, शास को सात और रा'अम को सात सीटें दी गईं। यह सर्वेक्षण अरब दलों को अपेक्षाकृत अधिक सीटें देने वाले अनुमानों में शामिल था। 

आई-24 न्यूज़ का सर्वेक्षण : लिकुड को 26 सीटें

दूसरे प्रमुख सर्वेक्षणों से कुछ अलग तस्वीर आई-24 न्यूज़ के लिए डायरेक्ट पोल्स द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सामने आई। 23 अक्टूबर को प्रकाशित इस सर्वेक्षण में लिकुड को 26 सीटें और यशार को 21 सीटें मिलने का अनुमान था। बेयाखाद को 12, डेमोक्रेट्स को आठ, जॉइंट लिस्ट को नौ, शास को आठ, ओत्ज़मा येहुदित को आठ, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को सात, यिस्राएल बेतेनू को छह, धार्मिक ज़ायनिज़्म को छह और रा'अम को पाँच सीटें मिलने का अनुमान था। छोटे दल 'अमखा यिस्राएल' को चार सीटें मिलती दिखाई गईं। 

इस सर्वेक्षण के अनुसार नेतन्याहू के मौजूदा राजनीतिक गठबंधन से जुड़े दलों को, अमखा यिस्राएल सहित व्यापक खेमे की गणना में, 59 सीटें दिखाई गई थीं। विरोधी खेमे को 47 तथा अरब पार्टियों को 14 सीटें मिली थीं। सर्वेक्षण संस्था के अनुसार 22 अक्टूबर को डिजिटल प्रणाली और पैनल के माध्यम से 5,124 वयस्कों का सर्वेक्षण किया गया था तथा सांख्यिकीय त्रुटि सीमा लगभग 1.4 प्रतिशत अंक बताई गई थी। यह ध्यान देने योग्य है कि अधिक उत्तरदाताओं वाला सर्वेक्षण भी संभावित गठबंधन, मतदान में वास्तविक भागीदारी या चुनाव के अंतिम क्षणों में बदलने वाले मतदाता व्यवहार का निश्चित परिणाम नहीं बता सकता। 

चैनल 14 का सर्वेक्षण : नेतन्याहू गठबंधन को 62 सीटें

चैनल 14 के लिए 22 अक्टूबर को प्रकाशित एक सर्वेक्षण में लिकुड को 30 और यशार को 20 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया। बेयाखाद को 10, डेमोक्रेट्स को आठ तथा नेतन्याहू के निवर्तमान सहयोगी दलों को मिलाकर कुल 62 सीटें दिखाई गईं। यह उन सर्वेक्षणों से उल्लेखनीय रूप से अलग था जिनमें आइज़नकोट की पार्टी सबसे बड़ी दिखाई गई थी। इस माप के साथ अन्य प्रमुख सर्वेक्षणों जैसी तुलनीय नमूना पद्धति की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसलिए इसे भी एक प्रकाशित चुनाव पूर्व अनुमान के रूप में पढ़ना चाहिए, न कि चुनाव के संभावित नतीजे के निर्णायक प्रमाण के रूप में। 

इन सर्वेक्षणों की तुलना से एक महत्वपूर्ण तथ्य निकलता है। लगभग एक ही अवधि में अलग-अलग एजेंसियों ने मतदाताओं से जानकारी लेकर काफी भिन्न सीट अनुमान दिए। इसका एक कारण प्रत्येक सर्वेक्षण का नमूना, उसकी पद्धति और उत्तरदाताओं की संरचना हो सकती है। दूसरा कारण इज़रायल की चुनावी प्रणाली है। किसी छोटे दल का मत प्रतिशत 3.25 प्रतिशत की न्यूनतम सीमा से थोड़ा भी नीचे रह जाए तो उसे एक भी सीट नहीं मिलती। इसी मत प्रतिशत के थोड़ा ऊपर पहुँचने पर उसे लगभग चार सीटें प्राप्त हो सकती हैं। इसीलिए बहुत कम मतों का अंतर गठबंधन की कुल सीटों में बड़ा बदलाव पैदा कर सकता है।

चुनावी मुद्दे : जनता किन सवालों का जवाब चाहती है?

सात अक्टूबर की सुरक्षा विफलता और जवाबदेही

सात अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले ने इज़रायल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। इज़रायल की सीमा सुरक्षा, खुफिया जानकारी, सैन्य तैयारी और तत्काल सरकारी प्रतिक्रिया की समीक्षा की माँग इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। विपक्ष के नेता इस घटना की स्वतंत्र सरकारी जाँच कराने पर जोर दे रहे हैं। नेतन्याहू की सरकार द्वारा अपेक्षित जाँच आयोग स्थापित न किए जाने की आलोचना भी चुनाव अभियान में उठी है। समर्थक और विरोधी इस प्रश्न को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। नेतन्याहू समर्थक सुरक्षा संकट के दौरान उनके निर्णयों और युद्धकालीन नेतृत्व को रेखांकित करते हैं, जबकि आलोचक यह जानना चाहते हैं कि हमले से पहले सुरक्षा व्यवस्था में हुई विफलताओं के लिए राजनीतिक जिम्मेदारी किसकी थी। 

गाजा युद्ध, ईरान और इज़रायल की अंतरराष्ट्रीय स्थिति

इस चुनाव की एक विशिष्ट बात यह है कि नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी नेता सैन्य नीति में उनसे मौलिक रूप से अलग नहीं हैं। आइज़नकोट, बेनेट और लिबरमैन स्वयं कठोर सुरक्षा नीति के समर्थक हैं। ईरान को लेकर खतरे का आकलन, हमास के भविष्य, लेबनान में हिज़्बुल्लाह की भूमिका और फ़िलिस्तीनी राज्य के प्रश्न पर इज़रायल के भीतर विभिन्न राजनीतिक धारणाएँ हैं, लेकिन प्रमुख यहूदी राजनीतिक दलों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा पर व्यापक सहमति के क्षेत्र भी मौजूद हैं। अंतर इस बात पर अधिक है कि युद्धों का संचालन कैसे किया गया, उनकी राजनीतिक और कूटनीतिक लागत क्या रही तथा भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्णय किस संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाने चाहिए। 

गाजा में इज़रायल की सैन्य कार्रवाई के कारण बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत हुए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े गंभीर प्रश्न उठे। इज़रायल की नीतियों को लेकर विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में आलोचना बढ़ी है। नेतन्याहू और उनके समर्थक सैन्य अभियानों को इज़रायल की सुरक्षा आवश्यकताओं के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं। उनके विरोधी नेतृत्व की जवाबदेही, कूटनीतिक संबंधों और युद्धोत्तर प्रबंधन पर प्रश्न उठाते हैं। इस तरह युद्ध का मुद्दा केवल युद्ध जारी रखने या बंद करने की सरल राजनीतिक विभाजन रेखा नहीं है। 

धार्मिक विद्यार्थियों की सेना में भर्ती : समाज के भीतर बढ़ता मतभेद

इज़रायल में सेना में भर्ती का प्रश्न भारतीय पाठकों को विशेष रूप से ध्यान देने योग्य लगेगा। इज़रायल में सैन्य सेवा राष्ट्रीय जीवन की प्रमुख संस्थाओं में से एक है। लेकिन अति-रूढ़िवादी हरेदी समुदाय के अनेक धार्मिक विद्यार्थियों को लंबे समय से सेना में भर्ती से छूट मिलती रही है। लगातार सैन्य अभियानों के कारण नियमित और रिज़र्व सैनिकों पर बढ़े दबाव ने इस छूट को नए विवाद का विषय बना दिया है। विरोधी दल अधिक समान सैन्य दायित्व की माँग कर रहे हैं, जबकि धार्मिक राजनीतिक दल अपने समुदाय की धार्मिक शिक्षा और जीवन पद्धति की रक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं। 

यह मुद्दा चुनाव के बाद गठबंधन गठन में भी प्रभाव डाल सकता है। कोई दल राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेतन्याहू के साथ सहमत हो सकता है, लेकिन धार्मिक भर्ती छूट पर उनके सहयोगियों से असहमत हो सकता है। लिबरमैन जैसे धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथी नेताओं के राजनीतिक दृष्टिकोण में यह अंतर स्पष्ट है। इसी कारण इज़रायल की राजनीति को केवल वामपंथ और दक्षिणपंथ में विभाजित करके समझना अधूरा होगा।

न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं का भविष्य

इज़रायल में न्यायपालिका की शक्तियों और निर्वाचित सरकार के अधिकारों को लेकर पिछले वर्षों में तीखी बहस हुई है। नेतन्याहू के नेतृत्व में प्रस्तावित न्यायिक बदलावों का समर्थक पक्ष यह मानता रहा है कि न्यायपालिका पर पर्याप्त लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए और निर्वाचित प्रतिनिधियों को अधिक निर्णयकारी अधिकार प्राप्त होने चाहिए। विरोधी पक्ष की चिंता है कि ऐसे बदलाव न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सरकार की शक्तियों पर संवैधानिक नियंत्रण को कमजोर कर सकते हैं। इस विवाद से संबंधित विशाल विरोध प्रदर्शनों ने भी इज़रायल की घरेलू राजनीति को प्रभावित किया था। इस चुनाव में डेमोक्रेट्स तथा अन्य विपक्षी दल संस्थागत संतुलन, न्यायिक स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही को प्रमुखता दे रहे हैं। 

अरब मतदाता, नागरिक अधिकार और अपराध नियंत्रण

इज़रायल के अरब नागरिकों के लिए यह चुनाव एक अलग सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ रखता है। उनके बीच स्थानीय स्तर पर अपराध, हिंसा, नागरिक सेवाओं, संसाधनों के वितरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। अरब राजनीतिक दल इन विषयों को अपने चुनाव अभियान में उठा रहे हैं। मंसूर अब्बास की रा'अम स्थानीय विकास और प्रशासनिक भागीदारी पर विशेष जोर देती है, जबकि जॉइंट लिस्ट व्यापक राजनीतिक अधिकारों और फ़िलिस्तीनी प्रश्न को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाती है। मतदान के दिन की प्रारंभिक समाचार रिपोर्टों में अरब समुदायों में उल्लेखनीय मतदान भागीदारी का भी उल्लेख किया गया है। 

सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली : कौन बनाएगा सरकार?

इज़रायल की राजनीति में सबसे अधिक सीटें प्राप्त करने वाली पार्टी का नेता स्वतः प्रधानमंत्री नहीं बनता। चुनाव परिणाम आने के बाद राष्ट्रपति इस बात का आकलन करते हैं कि किस नेता के पास संसदीय बहुमत जुटाने की अधिक संभावना है। राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग राजनीतिक दलों के साथ परामर्श करके किसी नेता को सरकार बनाने का अवसर देंगे। सरकार गठन के लिए समय-सीमा निर्धारित है और जरूरत पड़ने पर इसका विस्तार भी किया जा सकता है। यदि कोई नेता आवश्यक समर्थन नहीं जुटा पाता, तो दूसरे राजनीतिक विकल्पों की तलाश होती है। गतिरोध बने रहने पर पुनः चुनाव की नौबत भी आ सकती है। नवंबर 2022 का चुनाव इज़रायल में साढ़े तीन वर्षों के भीतर पाँचवाँ आम चुनाव था। इससे वहाँ की गठबंधन राजनीति की अस्थिरता का ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। 

इस चुनाव में गठबंधन बनाने की जटिलता का एक कारण नेतन्याहू-विरोधी दलों के बीच मौजूद राजनीतिक मतभेद हैं। आइज़नकोट, बेनेट, लापिद, गोलान और लिबरमैन ने राजनीतिक सहयोग की इच्छा व्यक्त की है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, धर्म और राज्य के संबंध, आर्थिक नीति तथा फ़िलिस्तीनी प्रश्न पर इनके दृष्टिकोण एक जैसे नहीं हैं। दूसरी ओर नेतन्याहू के सहयोगी खेमे में भी धार्मिक दलों और राष्ट्रवादी दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएँ हैं। इसीलिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में किसी एक दल को अधिक सीटें मिलने का अनुमान सरकार गठन की पूरी कहानी नहीं बताता।

अरब दलों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। वर्तमान सर्वेक्षणों में अरब पार्टियों को मिलने वाली सीटें कई संभावित गठबंधन समीकरणों को प्रभावित करती हैं। हालाँकि दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के नेताओं ने अरब पार्टियों को औपचारिक गठबंधन में शामिल करने को लेकर सीमाएँ व्यक्त की हैं। इज़रायल के इतिहास में बाहर से संसदीय समर्थन और औपचारिक रूप से सरकार में शामिल होना अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएँ रही हैं। इसलिए अंतिम स्थिति चुनाव परिणाम और उसके बाद होने वाली वार्ताओं से ही स्पष्ट होगी।

मतदान के दिन की स्थिति : भागीदारी उल्लेखनीय, अंतिम नतीजे अभी बाकी

27 अक्टूबर को दोपहर तक सामने आए चुनावी आँकड़ों में 31 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज होने की खबर है। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार उस समय तक यह 1977 के बाद का सबसे अधिक दोपहरकालीन मतदान प्रतिशत था। अरब बहुल क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय मतदाता भागीदारी की सूचनाएँ मिली हैं। चुनाव अधिकारियों के अनुसार कुछ मतदान केंद्रों पर अनियमितताओं की शिकायतें आईं, लेकिन व्यवस्थित चुनावी गड़बड़ी का कोई प्रमाण नहीं मिला था। यह मतदान के दौरान की स्थिति है, अंतिम मतदान प्रतिशत या चुनाव परिणाम नहीं। 

इज़रायल में मतदान केंद्र स्थानीय समयानुसार रात दस बजे बंद होने के बाद एग्ज़िट पोल आने हैं। इसके बाद आधिकारिक मतगणना के परिणाम उपलब्ध होंगे। एग्ज़िट पोल और वास्तविक परिणाम में अंतर संभव है। विशेष रूप से छोटे दलों को न्यूनतम मत प्रतिशत प्राप्त होने या उससे पीछे रह जाने का प्रश्न अंतिम संसदीय गणित को प्रभावित कर सकता है। इसलिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की तुलना में आधिकारिक मतगणना और उसके बाद गठबंधन सहयोगियों का समर्थन अधिक निर्णायक होगा। 

भारत और पश्चिम एशिया के लिए यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के लिए इज़रायल का चुनाव महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों देशों के संबंध केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं हैं। रक्षा सहयोग, कृषि प्रौद्योगिकी, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, व्यापार तथा उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के साझा हित हैं। इज़रायल में बनने वाली नई सरकार की प्राथमिकताएँ इन संबंधों को संचालित करने वाली नीतियों और निर्णयों पर प्रभाव डाल सकती हैं। हालाँकि भारत और इज़रायल के द्विपक्षीय संबंध किसी एक राजनीतिक नेता या दल तक सीमित नहीं हैं।

पश्चिम एशिया के लिए चुनाव का महत्व व्यापक है। ईरान के साथ इज़रायल के संबंध, गाजा का भविष्य, लेबनान की सुरक्षा स्थिति, अरब देशों के साथ संबंधों का विस्तार और अमेरिका की क्षेत्रीय भूमिका ऐसे प्रश्न हैं जिन पर इज़रायल के राजनीतिक निर्णयों का असर पड़ता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू का समर्थन किया है। लेकिन इज़रायल के भीतर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल अमेरिका से संबंधों का सवाल नहीं है। देश की सुरक्षा व्यवस्था, सामाजिक विभाजन और सरकारी संस्थाओं में भरोसे जैसे आंतरिक मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 

चुनाव का व्यापक संदेश : सुरक्षा के साथ सत्ता की जवाबदेही का प्रश्न

इज़रायल का यह चुनाव उस राजनीतिक परिस्थिति में हो रहा है जिसमें युद्धकालीन नेतृत्व का मूल्यांकन और लोकतांत्रिक जवाबदेही एक साथ सामने आए हैं। नेतन्याहू अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और सुरक्षा संबंधी निर्णयों के आधार पर जनता के सामने हैं। आइज़नकोट सुरक्षा प्रतिष्ठान के अनुभव के साथ संस्थागत बदलाव और राजनीतिक पुनर्निर्माण का एजेंडा प्रस्तुत कर रहे हैं। बेनेट और लापिद प्रशासनिक अनुभव तथा मध्यमार्गी सहयोग को महत्व दे रहे हैं। वहीं धार्मिक और राष्ट्रवादी दल अपनी वैचारिक तथा सामुदायिक प्राथमिकताओं के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। अरब राजनीतिक दल नागरिक अधिकारों और अपनी विशिष्ट सामाजिक चिंताओं को चुनावी विमर्श में स्थान देने का प्रयास कर रहे हैं।

इन परिस्थितियों में यह चुनाव केवल व्यक्तियों के बीच मुकाबला नहीं रह जाता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा, सत्ता की जवाबदेही, धार्मिक और नागरिक अधिकारों के संतुलन तथा राज्य की संस्थाओं के भविष्य से भी जुड़ा है। पिछले तीन वर्षों की घटनाओं ने इज़रायली समाज पर जो प्रभाव डाला है, उसके राजनीतिक परिणाम संसद की नई संरचना और सरकार गठन की प्रक्रिया में सामने आएँगे। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों ने विभिन्न राजनीतिक संभावनाओं को सामने रखा है, लेकिन वास्तविक परिणाम मतदाताओं के फैसले और उसके बाद दलों के बीच होने वाली संसदीय वार्ताओं से निर्धारित होगा।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story