Japan Mars Mission: जापान का अंतरिक्ष मिशन 2031 में क्या लेकर लौटेगा? 10 ग्राम नमूने क्यों हैं खास

Japan Mars Mission: जापान का MMX मिशन मंगल के चंद्रमा फोबोस से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी लाकर उसकी उत्पत्ति और सौरमंडल के इतिहास के रहस्य समझने की कोशिश करेगा।

Yogesh Mishra
Published on: 23 Oct 2026 7:41 PM IST
Japan Mars Mission Explained in Hindi News | Newstrack Hindi News
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Japan Mars Mission Explained in Hindi News | Newstrack Hindi News 

Japan Mars Mission: मंगल ग्रह पर जीवन के संकेत खोजने और उसके पुराने इतिहास को समझने के लिए दुनिया के कई देश काम कर रहे हैं। लेकिन जापान ने इस दिशा में एक अलग रास्ता चुना है। वह मंगल की सतह से नहीं, बल्कि उसके एक चंद्रमा फोबोस से मिट्टी और चट्टानों के नमूने पृथ्वी पर लाना चाहता है।

इस अभियान का नाम है मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन यानी एमएमएक्स (MMX)। इसका मकसद फोबोस की सतह पर उतरना, वहाँ से नमूने इकट्ठा करना और उन्हें वैज्ञानिक अध्ययन के लिए पृथ्वी तक पहुँचाना है।

सवाल है कि जब वैज्ञानिक सीधे मंगल का अध्ययन कर सकते हैं, तो उसके छोटे-से चंद्रमा से मिट्टी लाने की इतनी बड़ी तैयारी क्यों की जा रही है?

इसका जवाब मंगल के दो चंद्रमाओं ,फोबोस और डाइमोस की उत्पत्ति के रहस्य में छिपा है। वैज्ञानिक अब तक निश्चित रूप से नहीं जान पाए हैं कि ये दोनों चंद्रमा कैसे बने। क्या वे कभी अंतरिक्ष में घूमने वाले क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल ने अपने गुरुत्वाकर्षण से पकड़ लिया? या फिर अरबों साल पहले मंगल से किसी बड़े पिंड की टक्कर हुई थी और उससे निकले मलबे से ये चंद्रमा बने?

फोबोस की मिट्टी में मंगल की प्राचीन सतह से उछलकर पहुँचे कण भी हो सकते हैं। अगर वैज्ञानिक ऐसे कणों की पहचान कर पाए, तो उन्हें मंगल के पुराने इतिहास को समझने का एक नया रास्ता मिल सकता है।

जापान ने कब लॉन्च किया एमएमएक्स मिशन?

जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी यानी जाक्सा (JAXA) के अनुसार, एमएमएक्स को 20 अक्टूबर 2026 को स्थानीय समयानुसार सुबह 4 बजकर 41 मिनट पर तानेगाशिमा अंतरिक्ष केंद्र से एच-3 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया। भारत में उस समय 20 अक्टूबर की रात लगभग 1 बजकर 11 मिनट थे।

मिशन की योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान अगस्त 2027 में मंगल के आसपास पहुँचेगा। इसके बाद वह फोबोस का अध्ययन करेगा, उतरने के लिए सही जगह चुनेगा और वहाँ से कम से कम 10 ग्राम पदार्थ इकट्ठा करेगा। नमूने लेने की प्रक्रिया दिसंबर 2028 से पहले शुरू होने की उम्मीद नहीं है। योजना के मुताबिक, नमूनों को लेकर कैप्सूल वर्ष 2031 में पृथ्वी पर पहुँचेगा। यह कई वर्षों तक चलने वाला मिशन है, लेकिन इसकी अहमियत केवल मिट्टी के नमूने लाने तक सीमित नहीं है।

मंगल के दोनों चंद्रमा कैसे बने?

मंगल के दो प्राकृतिक चंद्रमा हैं - फोबोस और डाइमोस। अमेरिकी खगोलशास्त्री आसफ हॉल ने 1877 में इनकी खोज की थी। दोनों पृथ्वी के चंद्रमा से बहुत छोटे हैं और इनकी आकृति भी गोल होने के बजाय अनियमित है।

फोबोस का औसत व्यास करीब 22 किलोमीटर है, जबकि डाइमोस का लगभग 12 किलोमीटर। फोबोस मंगल की सतह से करीब 6,000 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करता है और लगभग 7 घंटे 39 मिनट में एक चक्कर पूरा कर लेता है। डाइमोस मंगल से अधिक दूर है और उसकी एक परिक्रमा में लगभग 30 घंटे लगते हैं।

फोबोस की सतह पर धूल, चट्टानें, टक्कर से बने गड्ढे और लंबी खाँचेनुमा संरचनाएँ मौजूद हैं। उसका सबसे प्रसिद्ध गड्ढा स्टिकनी है, जो चंद्रमा के आकार की तुलना में काफी बड़ा है। इनकी आकृति और सतह के कुछ गुण क्षुद्रग्रहों से मिलते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिकों के सामने इनकी उत्पत्ति को लेकर दो प्रमुख सिद्धांत हैं।

पहला सिद्धांत: क्या मंगल ने क्षुद्रग्रहों को पकड़ लिया था?

इस विचार को कैप्चर हाइपोथेसिस कहा जाता है। इसके अनुसार, फोबोस और डाइमोस कभी स्वतंत्र क्षुद्रग्रह रहे होंगे। वे सौरमंडल के किसी दूसरे हिस्से में बने और बाद में मंगल के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर उसके चंद्रमा बन गए। इस संभावना के पक्ष में एक संकेत यह है कि दोनों चंद्रमाओं की सतह के कुछ वर्णक्रमीय गुण कार्बन-समृद्ध क्षुद्रग्रहों से मिलते हैं।

लेकिन इस सिद्धांत में एक मुश्किल भी है। किसी क्षुद्रग्रह को ग्रह के आसपास स्थायी कक्षा में पकड़ना आसान नहीं होता। इसके लिए उसकी गति और ऊर्जा में बदलाव होना जरूरी है। फोबोस और डाइमोस की कक्षाएँ अपेक्षाकृत गोलाकार हैं और मंगल की भूमध्यरेखीय सतह के करीब हैं। केवल सामान्य गुरुत्वाकर्षणीय पकड़ से इनकी कक्षाओं को समझाना कठिन है। कुछ वैज्ञानिक मॉडल बताते हैं कि शुरुआती मंगल के आसपास मौजूद गैस, दूसरे पिंडों या जटिल गुरुत्वाकर्षणीय प्रक्रियाओं ने इसमें भूमिका निभाई होगी। लेकिन अभी इस बारे में सर्वसम्मति नहीं है। यदि फोबोस के नमूनों में ऐसे खनिज और समस्थानिक अनुपात मिलते हैं जो कुछ क्षुद्रग्रहों से मेल खाते हों, तो इस सिद्धांत को समर्थन मिल सकता है।

दूसरा सिद्धांत: क्या किसी विशाल टक्कर से बने मंगल के चंद्रमा?

दूसरे प्रमुख विचार को जायंट इम्पैक्ट हाइपोथेसिस कहा जाता है। इसके अनुसार, सौरमंडल के शुरुआती दौर में कोई बड़ा खगोलीय पिंड मंगल से टकराया होगा। इस टक्कर से मंगल और दूसरे पिंड का पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर गया होगा। उसका कुछ हिस्सा मंगल के चारों ओर मलबे की एक पट्टी में जमा हुआ और समय के साथ उससे चंद्रमा बने। यह विचार पृथ्वी के चंद्रमा की उत्पत्ति से जुड़े विशाल टक्कर वाले सिद्धांत से कुछ हद तक मिलता है। हालाँकि, मंगल के मामले में परिस्थितियाँ और परिणाम अलग रहे होंगे।

यदि फोबोस मंगल से निकले पदार्थ और टक्कर में शामिल दूसरे पिंड के मलबे से बना है, तो उसकी चट्टानों में मंगल से जुड़े रासायनिक संकेत मिल सकते हैं।

यहाँ समस्थानिक अनुपात (आइसोटोपिक रेशियो) अहम होंगे। किसी तत्व के अलग-अलग समस्थानिकों का अनुपात वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर सकता है कि पदार्थ कहाँ से आया और किन परिस्थितियों में बना।

हालाँकि, नमूनों का विश्लेषण आसान नहीं होगा। फोबोस की सतह पर लंबे समय से उल्कापिंडों और अंतरिक्षीय धूल का पदार्थ जमा होता रहा है। इसलिए नमूनों में कई स्रोतों की सामग्री मिली-जुली हो सकती है। वैज्ञानिकों को यह पहचानना होगा कि कौन-से कण फोबोस के मूल पदार्थ से आए हैं और कौन-से बाद में वहाँ पहुँचे।

दोनों प्रमुख सिद्धांतों के बीच अंतर समझना एमएमएक्स मिशन का मुख्य वैज्ञानिक उद्देश्य है।

क्या फोबोस की मिट्टी में मंगल का प्राचीन इतिहास छिपा है?

इस मिशन की एक और दिलचस्प संभावना है कि फोबोस की सतह पर मंगल से आए पुराने कण मिल सकते हैं। अरबों वर्षों से उल्कापिंड मंगल की सतह से टकराते रहे हैं। किसी बड़े पिंड की टक्कर से पैदा हुई ऊर्जा चट्टानों और धूल को इतनी तेजी से उछाल सकती है कि कुछ पदार्थ मंगल के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में पहुँच जाएँ।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इनमें से कुछ कण फोबोस की सतह पर जमा हुए हो सकते हैं। इसका मतलब है कि फोबोस की मिट्टी में केवल उसके अपने इतिहास के संकेत ही नहीं, बल्कि मंगल की सतह से आए पुराने पदार्थ भी मौजूद हो सकते हैं। यदि वैज्ञानिक ऐसे कणों की पहचान कर लेते हैं, तो वे मंगल की प्राचीन चट्टानों, रासायनिक संरचना और पर्यावरण में आए बदलावों के बारे में अधिक जानकारी जुटा सकेंगे।

मंगल पर कभी तरल पानी मौजूद था, इसके मजबूत भूवैज्ञानिक प्रमाण मिल चुके हैं। लेकिन पानी कितने समय तक रहा, ग्रह का वायुमंडल कैसे बदला और वहाँ जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ कितने समय तक बनी रहीं, इन सवालों के जवाब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

फोबोस से मिले मंगल-मूल के कण इन सवालों के कुछ पहलुओं को समझने में मदद कर सकते हैं। हालाँकि, ऐसे कण नमूनों में मिलेंगे ही, इसकी गारंटी नहीं है। अगर वे मिलते हैं, तो उनकी उम्र और मूल स्थान का पता लगाना भी चुनौतीपूर्ण होगा।

क्या जापान मंगल पर जीवन के प्रमाण खोज रहा है?

एमएमएक्स का प्राथमिक उद्देश्य मंगल पर जीवन खोजना नहीं है। यह मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति और मंगल प्रणाली के विकास का अध्ययन करने वाला मिशन है। फिर भी, इसके नतीजे जीवन से जुड़े कुछ व्यापक सवालों को समझने में मदद कर सकते हैं।

वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि सौरमंडल के शुरुआती दौर में पानी और कार्बनिक पदार्थ अलग-अलग क्षेत्रों में कैसे फैले। यदि फोबोस किसी क्षुद्रग्रह से बना है, तो उसके नमूने शुरुआती सौरमंडल में मौजूद पदार्थों और उनके एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने के बारे में जानकारी दे सकते हैं। दूसरी ओर, यदि फोबोस किसी विशाल टक्कर से बना था, तो उसके नमूनों से मंगल की शुरुआती संरचना और टक्कर के बाद हुए बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है। नमूनों में कार्बनिक अणु मिलना भी वैज्ञानिक रूप से दिलचस्प होगा। लेकिन कार्बनिक पदार्थ मिलने का मतलब यह नहीं कि वहाँ कभी जीवन मौजूद था। ऐसे पदार्थ निर्जीव रासायनिक प्रक्रियाओं से भी बन सकते हैं। जीवन का दावा करने के लिए बहुत मजबूत और कई तरह के प्रमाण जरूरी होंगे।

केवल 10 ग्राम मिट्टी लाने में इतनी मेहनत क्यों?

दस ग्राम पदार्थ बहुत कम लगता है, लगभग दो छोटी चम्मच चीनी के वजन के बराबर। फिर भी, किसी दूसरे खगोलीय पिंड से लाया गया इतना छोटा नमूना भी वैज्ञानिकों के लिए बेहद मूल्यवान हो सकता है।

पृथ्वी पर मौजूद प्रयोगशालाओं में नमूनों की जाँच के लिए अत्याधुनिक उपकरण इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनमें मास स्पेक्ट्रोमेट्री, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, खनिजों का सूक्ष्म विश्लेषण और समस्थानिकों की जाँच जैसी तकनीकें शामिल हैं। अंतरिक्ष यान पर मौजूद उपकरणों के आकार, वजन, ऊर्जा और काम करने की क्षमता की सीमाएँ होती हैं। पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक एक ही नमूने की अलग-अलग तरीकों से जाँच कर सकते हैं। नमूने का कुछ हिस्सा भविष्य के अध्ययन के लिए सुरक्षित भी रखा जा सकता है, ताकि नई तकनीक विकसित होने पर उसकी दोबारा जाँच हो सके।

जापान को ऐसे मिशनों का पहले से अनुभव है। उसके हायाबुसा और हायाबुसा-2 अभियानों ने क्षुद्रग्रहों से नमूने पृथ्वी तक पहुँचाए थे। हायाबुसा-2 ने रयुगु क्षुद्रग्रह से लगभग 5.4 ग्राम सामग्री लाई थी। इन नमूनों के अध्ययन से कार्बन-समृद्ध क्षुद्रग्रहों में पानी से जुड़े खनिजों और कार्बनिक पदार्थों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।एमएमएक्स इसी अनुभव का इस्तेमाल मंगल के चंद्रमा से नमूने लाने के लिए करेगा।

फोबोस पर उतरना इतना चुनौतीपूर्ण क्यों है?

फोबोस का गुरुत्वाकर्षण मंगल की तुलना में बहुत कमजोर है। इससे वहाँ से दोबारा उड़ान भरने के लिए मंगल की सतह से उड़ान भरने की तुलना में कम ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन कमजोर गुरुत्वाकर्षण अपनी अलग मुश्किलें भी पैदा करता है।

यदि अंतरिक्ष यान बहुत तेजी से सतह से टकराता है, तो वह उछल सकता है या अस्थिर हो सकता है। वैज्ञानिकों को यह भी पूरी तरह नहीं पता कि फोबोस की सतह कितनी मजबूत है, धूल कितनी गहरी है और पत्थर किस तरह फैले हुए हैं। नमूने इकट्ठा करते समय भी सावधानी जरूरी है। पृथ्वी पर मिट्टी खोदते समय जमीन और गुरुत्वाकर्षण उपकरण को स्थिर रखते हैं। फोबोस पर ऐसा नहीं होगा। वहाँ उपकरण के दबाव से अंतरिक्ष यान की स्थिति प्रभावित हो सकती है। जाक्सा की योजना फोबोस पर दो नियंत्रित लैंडिंग करने की है। इन अभियानों के दौरान यान को उतरना होगा, नमूने लेने होंगे और फिर सुरक्षित तरीके से सतह से उठना होगा।

इसके लिए एमएमएक्स में नमूने इकट्ठा करने की अलग-अलग तकनीकें शामिल की गई हैं। नासा के सहयोग से विकसित एक न्यूमैटिक सैंपलर गैस के नियंत्रित इस्तेमाल से सतह के कणों को संग्रह प्रणाली तक पहुँचाने में मदद करेगा। इसके अलावा, सतह के नीचे से सामग्री लेने के लिए एक दूसरी प्रणाली भी बनाई गई है।

इतनी दूर से अंतरिक्ष यान को नियंत्रित कैसे करेंगे?

पृथ्वी और मंगल के बीच की दूरी लगातार बदलती रहती है। इस वजह से रेडियो संकेतों को एक दिशा में पहुँचने में कई मिनट लग सकते हैं। जाक्सा के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में आने-जाने वाले संकेतों का कुल विलंब लगभग 44 मिनट तक हो सकता है।

इसका मतलब है कि पृथ्वी से भेजे गए किसी निर्देश का परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देगा। इसलिए फोबोस पर उतरने जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को केवल पृथ्वी से तत्काल निर्देश देकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता।अंतरिक्ष यान को कई काम खुद करने होंगे। उसे अपनी स्थिति का अनुमान लगाना होगा, सतह से दूरी मापनी होगी और उतरने की गति को नियंत्रित करना होगा। इस तरह एमएमएक्स नमूने लाने के साथ-साथ दूर अंतरिक्ष में स्वचालित संचालन की तकनीक को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।

डाइमोस पर क्यों नहीं उतरेगा जापानी यान?

डाइमोस भी वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन एमएमएक्स का मुख्य लक्ष्य फोबोस से नमूने इकट्ठा करना है। फोबोस मंगल के अधिक पास है और मिशन की योजना उसी के विस्तृत अध्ययन और नमूना-संग्रह के लिए तैयार की गई है। डाइमोस का अध्ययन दूर से किया जाएगा। दोनों चंद्रमाओं की सतह, संरचना और कक्षाओं की तुलना करके वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या वे एक ही घटना से बने थे या उनका इतिहास अलग-अलग रहा है। यदि दोनों की संरचना और गुणों में महत्वपूर्ण अंतर मिलता है, तो इससे उनकी उत्पत्ति के सिद्धांतों को परखने में मदद मिल सकती है।

मिशन में अमेरिका और यूरोप की क्या भूमिका है?

एमएमएक्स जापान के नेतृत्व वाला मिशन है, लेकिन इसमें दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियाँ भी सहयोग कर रही हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने वैज्ञानिक उपकरणों और नमूना-संग्रह तकनीक में योगदान दिया है। इनमें MEGANE नाम का उपकरण शामिल है, जो फोबोस की सतह पर मौजूद तत्वों की संरचना का अध्ययन करेगा। जर्मनी और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसियों ने भी मिशन में सहयोग दिया है। योजना के तहत एक छोटा रोवर फोबोस की सतह पर भेजा जाएगा, जो वहाँ की भौतिक परिस्थितियों और सतह पर चलने की चुनौतियों का अध्ययन करेगा। फोबोस पर चलना पृथ्वी या मंगल पर चलने जैसा नहीं होगा। वहाँ गुरुत्वाकर्षण बहुत कमजोर है, इसलिए रोवर के पहियों, गति और संतुलन को लेकर अलग तरह की चुनौतियाँ होंगी।

क्या यह जापान की मानवयुक्त मंगल यात्रा की तैयारी है?

एमएमएक्स को जापान का मानवयुक्त मंगल मिशन नहीं कहा जा सकता। इस अभियान के जरिए जापान ने मंगल पर इंसान उतारने की कोई निश्चित योजना घोषित नहीं की है। हालाँकि, इससे विकसित होने वाली तकनीक भविष्य के रोबोटिक और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए उपयोगी हो सकती है। मंगल के आसपास पहुँचना, वहाँ लंबे समय तक काम करना, छोटे खगोलीय पिंड पर उतरना, नमूने इकट्ठा करना और उन्हें पृथ्वी तक वापस लाना, ये सभी गहरे अंतरिक्ष में काम करने की महत्वपूर्ण क्षमताएँ हैं।

भविष्य में मंगल के चंद्रमाओं को वैज्ञानिक केंद्रों या मानवयुक्त अभियानों के संभावित पड़ाव के रूप में इस्तेमाल करने के विचार भी सामने आए हैं। लेकिन अभी इन्हें प्रस्ताव और अध्ययन के स्तर पर ही समझना चाहिए, न कि तय हो चुकी परियोजनाओं के रूप में।

2031 में नमूने पृथ्वी पर कैसे लौटेंगे?

मिशन की योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान लगभग 2030 में मंगल के आसपास का क्षेत्र छोड़ेगा और पृथ्वी की ओर वापसी यात्रा शुरू करेगा। वर्ष 2031 में नमूनों से भरा एक विशेष कैप्सूल अंतरिक्ष यान से अलग होकर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा। उसे अत्यधिक ताप और दबाव सहन करते हुए सुरक्षित रूप से उतरना होगा।

जाक्सा की योजना के मुताबिक, कैप्सूल को ऑस्ट्रेलिया में प्राप्त किया जाएगा। इसके बाद नमूनों को नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में वैज्ञानिक अध्ययन के लिए तैयार किया जाएगा। इनकी जाँच में कई साल लग सकते हैं। कुछ नतीजे जल्दी सामने आ सकते हैं, लेकिन जटिल भूवैज्ञानिक और समस्थानिक अध्ययनों में अधिक समय लग सकता है। इसलिए मिशन की वैज्ञानिक कहानी 2031 में नमूने पृथ्वी पर पहुँचने के साथ खत्म नहीं होगी। असल में, उसके बाद ही नमूनों से मिलने वाली जानकारी को समझने का बड़ा काम शुरू होगा।

फोबोस की मिट्टी में छिपे हैं सौरमंडल के अतीत के सुराग

पहली नजर में मंगल के एक छोटे चंद्रमा से 10 ग्राम मिट्टी लाना बहुत छोटी उपलब्धि लग सकती है। लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान में किसी नमूने की अहमियत उसके वजन से नहीं, बल्कि उसमें सुरक्षित जानकारी से तय होती है।

जापान जानना चाहता है कि फोबोस और डाइमोस की उत्पत्ति कैसे हुई। क्या वे दूर कहीं बने क्षुद्रग्रह हैं, जिन्हें मंगल ने अपने गुरुत्वाकर्षण से पकड़ लिया? या किसी प्राचीन विशाल टक्कर से निकले पदार्थों ने इन चंद्रमाओं को जन्म दिया?

वैज्ञानिक यह भी पता लगाना चाहते हैं कि क्या फोबोस की मिट्टी में मंगल की प्राचीन सतह के कण मौजूद हैं और क्या उनसे ग्रह पर पानी, कार्बनिक पदार्थों तथा पर्यावरण में हुए बदलावों के बारे में नई जानकारी मिल सकती है।

इन सवालों के जवाब केवल मंगल के दो छोटे चंद्रमाओं का इतिहास नहीं बताएँगे। वे यह समझने में भी मदद कर सकते हैं कि ग्रह कैसे बने, सौरमंडल में पदार्थ एक जगह से दूसरी जगह कैसे पहुँचे और जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ किन प्रक्रियाओं से विकसित हुईं।

जापान का असली लक्ष्य सिर्फ 10 ग्राम मिट्टी लाना नहीं, बल्कि उसमें छिपे अरबों साल पुराने इतिहास को समझना है। हो सकता है कि फोबोस से आए कुछ छोटे-से कण सौरमंडल की उत्पत्ति और ग्रहों के विकास के बारे में हमारी मौजूदा समझ को और बेहतर बना दें।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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