PAK नहीं... भारत के कारगिल में क्यों गूंजा ‘खामेनेई ज़िंदाबाद’? US-Israel के खिलाफ लगे नारे, मिडिल ईस्ट से खतरनाक कनेक्शन!

Kargil Iran rally 2026: 14 जनवरी को रैली में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के समर्थन में नारे लगाए गए, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन किया गया।

Priya Singh Bisen
Published on: 16 Jan 2026 1:12 PM IST (Updated on: 16 Jan 2026 1:12 PM IST)
Kargil Iran rally 2026
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Kargil Iran rally 2026 (photo: social media)

Kargil Iran rally 2026: मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ रहे तनाव के बीच भारत के लद्दाख क्षेत्र के कारगिल शहर से सामने आई तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। 14 जनवरी को कारगिल में शिया समुदाय के सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे और ईरान के समर्थन में एक विशाल रैली निकाली। इस रैली में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के समर्थन में नारे लगाए गए, उनके पोस्टर और बैनर लहराए गए, साथ ही अमेरिका और इजराइल के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन किया गया। लेकिन... इन अब के बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में भारत और ईरान, दोनों देशों के झंडे एक साथ नज़र आये।

आपको जानकर हैरानी होगी कि यह रैली न तो ईरान में हुई और न ही किसी मिडिल ईस्ट देश में, बल्कि भारत के एक संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके 'कारगिल' में हुई। अब सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिर कारगिल के लोग ईरान और उसके सुप्रीम लीडर के समर्थन में सड़कों पर आखिर क्यों उतरे?

कारगिल का धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना

कारगिल, लद्दाख का एक शिया बहुल इलाका है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, कारगिल जिले में लगभग 76.87% आबादी मुस्लिम है, जिनमें से करीब 90% शिया समुदाय से आते हैं। बौद्ध आबादी लगभग 14.29% और हिंदू आबादी लगभग 7.34% है। यही शिया पहचान कारगिल और ईरान के संबंधों की सबसे बड़ी कड़ी मानी जाती है।

आपको बता दे, ईरान विश्व का सबसे बड़ा 'शिया बहुल' देश है और अयातुल्लाह अली खामेनेई को वैश्विक स्तर पर शिया मुसलमानों का 'सबसे प्रभावशाली' धार्मिक नेता माना जाता है। कारगिल के कई शिया मुसलमान ईरान को केवल एक देश नहीं, बल्कि पूरे विश्वभर में शिया नेतृत्व का केंद्र मानते हैं।

सदियों पुराने ऐतिहासिक रिश्ता

कारगिल और ईरान के संबंध कोई नए नहीं हैं। इतिहासकारों के अनुसार, 15वीं सदी में ईरान से शिया धर्मगुरु लद्दाख क्षेत्र में आए थे, जिनके माध्यम से यहां शिया इस्लाम का प्रभाव बढ़ा। साल 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति के बाद ये रिश्ते और भी गहरे हो गए। इसी दौर में कारगिल के स्थानीय शिया नेताओं ने ईरान के धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों को अपनाया और उनसे जुड़ाव को मजबूत किया।

कारगिल में ईरान के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नाम पर एक चौक मौजूद है। साल 1989 में स्थापित इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट लंबे वक़्त से इस क्षेत्र में ईरान के धार्मिक विचारों का प्रचार करता आ रहा है। हालिया रैली का आयोजन भी इसी ट्रस्ट की तरफ से किया गया।

मिडिल ईस्ट तनाव और विरोध करने के पीछे का कारण

रैली में शामिल प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका समर्थन ईरान के साथ धार्मिक और ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित है। उनका आरोप है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजराइल का दखल और हमले ईरान की संप्रभुता के सख्त खिलाफ हैं। इसी कारण से उन्होंने खामेनेई को 'रहबर' यानी कि मार्गदर्शक और रक्षक बताते हुए उनके समर्थन में जमकर नारे लगाए।

ईरान: विरोधाभासों से भरा देश

ईरान को लेकर विश्वभर में राय बंटी हुई है। एक ओर ईरान में सख्त इस्लामिक कानून लागू हैं, जहां महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य है और छोटे अपराधों पर भी कठोर सजाएं दी जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ, ईरान शिक्षा, शहरीकरण और साक्षरता के मामले में मिडिल ईस्ट के अग्रणी देशों में गिना जाता है। यहां युवाओं और महिलाओं की साक्षरता दर बेहद ऊंची है और उच्च शिक्षा में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों से अधिक है।

ईरान की आबादी तकरीबन 9 करोड़ से अधिक है और यह विश्व के सबसे 'युवा' देशों में से एक है। तेल और गैस के विशाल भंडार होने के बावजूद आर्थिक प्रतिबंधों और शासन व्यवस्था की वजह से वहां के युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है।

भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा

कारगिल में ईरान के समर्थन में हुई यह रैली भारत की आंतरिक विविधता और वैश्विक घटनाओं के स्थानीय प्रभाव को दिखाती है। हालांकि, यह समर्थन धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, लेकिन सुरक्षा और कूटनीतिक दृष्टि से यह मामला संवेदनशील माना जा रहा है। भारत एक ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रखता है, तो वहीं दूसरी ओर अमेरिका और इजराइल के साथ भी उसके मजबूत रिश्ते हैं।

बता दे, कारगिल की यह रैली संकेत दे रही है कि वैश्विक राजनीति की गूंज भारत के दूरदराज इलाकों तक किस प्रकार पहुंचती है और स्थानीय पहचानें किस तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ जाती हैं।

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Priya Singh Bisen is a journalist with over five years of experience in the news and digital media industry. She covers a wide range of topics, including weather, lifestyle, health, politics, and international affairs. In addition to news writing, Priya has experience in news script writing, voice-overs, anchoring, field reporting, and social media management. She holds a Bachelor's degree in Mass Communication and a Master's degree in Advertising and Public Relations. Priya also enjoys writing, traveling, and playing sports, pursuits that reflect her curiosity and passion for exploring new perspectives.

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