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Nepal Bans Indian Mangoes 2026: जापान के बाद नेपाल ने भी भारतीय आमों पर लगाया प्रतिबंध, जानिए कीटनाशकों का सच
Nepal Bans Indian Mangoes 2026: जापान के बाद नेपाल ने भी भारतीय आमों के आयात पर रोक लगाई। जानिए कीटनाशक विवाद, निर्यात पर असर और विशेषज्ञ क्या कहते हैं।
Nepal Bans Indian Mangoes 2026
Nepal Bans Indian Mangoes 2026: अपनी लुभावनी मीठी खुशबू और जुबान पर जाकर घुल जाने वाले अनोखे स्वाद के चलते फलों के राजा कहे जाने वाले भारतीय आमों ने पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना दिया है। यही वजह है कि गर्मी का मौसम शुरू होते ही विदेशों में भारतीय आमों की डिमांड हाई हो जाती है। आम उत्पादन के मामले में भारत की पहचान सबसे बड़े उत्पादक देश के रूप में होती है। अल्फोंसो, दशहरी, चौसा, केसर और लंगड़ा जैसे भारतीय आमों की मांग कई देशों में सबसे ज्यादा रहती है। लेकिन हाल के दिनों में भारतीय आमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बढ़ी है। इस वर्ष पहले जापान और अब नेपाल ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी है। नेपाल ने इसके पीछे आमों में कथित तौर पर अधिक मात्रा में कीटनाशकों की मौजूदगी और सीमावर्ती क्षेत्रों में जांच सुविधाओं की कमी को कारण बताया है। आखिर भारतीय आमों को लेकर विवाद क्यों बढ़ रहा है और इसका किसानों तथा व्यापारियों पर क्या असर पड़ सकता है, आइए इस बारे में जानते हैं विस्तार से -
नेपाल ने भारतीय आमों के आयात पर क्यों लगाई रोक?
नेपाल सरकार के अनुसार भारतीय आमों की कुछ खेपों में निर्धारित सीमा से अधिक कीटनाशक अवशेष पाए गए हैं। इसके अलावा मधेस प्रांत समेत कई सीमावर्ती इलाकों में क्वारेंटाइन और गुणवत्ता जांच की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की बात भी कही गई है। नेपाली कृषि और पशुधन मंत्रालय ने कथित तौर पर अप्रैल-मई से यह प्रतिबंध लागू कर रखा है। सरकार का कहना है कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।
स्थानीय किसानों को फायदा पहुंचाने की भी कोशिश
नेपाल में आम की खेती होती है, लेकिन स्थानीय उत्पादन पूरे देश की मांग को पूरा नहीं कर पाता। इसके बावजूद नेपाली अधिकारियों का मानना है कि भारतीय आमों पर रोक से घरेलू किसानों को बेहतर बाजार मिलेगा। मधेस प्रांत के कृषि अधिकारियों का कहना है कि इससे स्थानीय स्तर पर उगाए गए फलों की बिक्री बढ़ेगी और किसानों को अधिक अवसर मिलेंगे। हालांकि व्यापारियों का कहना है कि इससे बाजार में आम की कमी भी पैदा हो सकती है।
प्रतिबंध के बाद नेपाल में बढ़ने लगी आम की कीमतें
भारतीय आमों पर रोक लगने के बाद नेपाल के कई शहरों में आम की उपलब्धता प्रभावित हुई है। राजधानी काठमांडू में आम की कीमतें 100 से 150 नेपाली रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। फल व्यापारियों का कहना है कि नेपाल में आम का सीजन बहुत सीमित अवधि के लिए रहता है, इसलिए भारतीय आमों की आपूर्ति रुकने से बाजार में कमी महसूस होने लगी है।
जापान ने भी हाल ही में भारतीय आमों पर लगाई थी रोक
नेपाल से पहले जापान ने भी भारतीय आमों के आयात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था। मार्च 2026 में जापानी अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश में स्थित एक निर्यात केंद्र का निरीक्षण किया था। जांच के दौरान उपचार और कीटाणुशोधन प्रक्रियाओं में कुछ कमियां सामने आई थीं। इसके बाद जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगाने का फैसला किया। करीब दो दशक में यह पहला मौका था जब जापान ने भारतीय आमों को लेकर इतनी सख्ती दिखाई है।
पहले भी कई देशों में भारतीय आमों पर लग चुके हैं प्रतिबंध
यह पहली बार नहीं है जब भारतीय आमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठे हों। वर्ष 2014 में यूरोपीय संघ ने फल मक्खी और अन्य कीटों की मौजूदगी के कारण भारतीय आमों के आयात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था। बाद में भारत द्वारा गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था मजबूत करने के बाद यह प्रतिबंध हटा लिया गया। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य विकसित देशों में भी भारतीय फलों के लिए कड़े फाइटोसैनिटरी नियम लागू हैं।
भारत के आम निर्यात पर कितना पड़ेगा असर?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और यहां हर साल भारी मात्रा में आम की पैदावार होती है। जबकि सच्चाई ये है कि कुल उत्पादन का केवल एक छोटा हिस्सा ही विदेशों में निर्यात किया जाता है। नेपाल भारतीय आमों का सबसे बड़ा बाजार नहीं है, लेकिन भौगोलिक निकटता के कारण यह महत्वपूर्ण बाजार माना जाता है। इस प्रतिबंध का असर अल्फोंसो, दशहरी, चौसा, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी लोकप्रिय किस्मों के निर्यात पर पड़ सकता है। छोटे व्यापारियों और निर्यातकों के लिए यह चिंता का विषय बन सकता है।
आम की खेती में किन कीटनाशकों का होता है इस्तेमाल?
आम की फसल को फल मक्खी, कीटों और विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए कई तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इमिडाक्लोप्रिड, थायामेथोक्साम, साइपरमेथ्रिन, मैलाथियॉन और क्लोरपायरीफॉस जैसे रसायन आम की खेती में उपयोग किए जाते हैं। इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक सलाह और निर्धारित मात्रा में किया जाए तो फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब इनका उपयोग तय सीमा से अधिक किया जाता है।
क्या भारतीय आमों में वास्तव में अधिक कीटनाशक पाए जाते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे भारतीय आम उद्योग को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। भारत में लाखों किसान आम की खेती करते हैं और अधिकांश किसान कृषि विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और अधिक उत्पादन की चाह में कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अलग-अलग देशों के खाद्य सुरक्षा मानक भी अलग होते हैं। कई बार जो मात्रा भारत में स्वीकार्य मानी जाती है, वह दूसरे देशों के मानकों के अनुसार अधिक हो सकती है।
कीटनाशकों के इस्तेमाल पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि कीटनाशक अपने आप में समस्या नहीं हैं, बल्कि उनका गलत और अत्यधिक उपयोग चिंता का विषय बनता है। विशेषज्ञों के अनुसार आम की फसल को फल मक्खी, मिलीबग और अन्य कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल जरूरी होता है, लेकिन किसानों को निर्धारित मात्रा और 'वेटिंग पीरियड' का पालन करना चाहिए।
ICAR-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी भी कीटनाशक के छिड़काव और फल की तुड़ाई के बीच एक निश्चित अंतराल रखा जाता है। यदि किसान इस अवधि का पालन नहीं करते हैं तो फलों में कीटनाशक अवशेष (Residues) निर्धारित सीमा से अधिक रह सकते हैं, जिससे निर्यात के दौरान खेप अस्वीकृत होने का खतरा बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय पादप संरक्षण संगठन (NPPO) और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निर्यात होने वाले फलों की नियमित जांच की जाती है। अधिकांश भारतीय आम अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरते हैं, लेकिन कुछ मामलों में गुणवत्ता नियंत्रण में कमी या किसानों द्वारा अनुशंसित मात्रा से अधिक रसायनों के उपयोग के कारण समस्याएं सामने आ सकती हैं। इन विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि उपभोक्ताओं को घबराने की जरूरत नहीं है। बाजार से खरीदे गए आमों को बहते पानी से अच्छी तरह धोने और कुछ समय के लिए साफ पानी में रखने से सतह पर मौजूद कई प्रकार के रासायनिक अवशेष कम किए जा सकते हैं।
आम को जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड भी रहा है विवाद का कारण
भारत में वर्षों से आम को जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल को लेकर विवाद होता रहा है। यह रसायन फल को तेजी से पकाता है, लेकिन इससे निकलने वाले तत्व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं। इसी वजह से भारत में इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। सरकार और खाद्य सुरक्षा एजेंसियां किसानों और व्यापारियों को सुरक्षित विकल्प अपनाने की सलाह देती हैं।
ज्यादा कीटनाशक वाले फल खाने से सेहत पर क्या असर पड़ सकता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि फलों में कीटनाशक अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक हों और लंबे समय तक ऐसे फलों का सेवन किया जाए, तो इसका असर शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ सकता है। इससे पाचन संबंधी समस्याएं, सिरदर्द, चक्कर आना, त्वचा में एलर्जी, हार्मोनल असंतुलन और कुछ मामलों में लीवर तथा किडनी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को ऐसे रसायनों के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) समय-समय पर यह सलाह देते रहे हैं कि फलों और सब्जियों में कीटनाशक अवशेषों को निर्धारित सुरक्षित सीमा के भीतर रखा जाना चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक अत्यधिक संपर्क स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकता है।
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के सामुदायिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. संजय राय का कहना है कि कीटनाशकों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितनी मात्रा और कितने लंबे समय तक इनके संपर्क में रहता है। सामान्य परिस्थितियों में बाजार में उपलब्ध फल खाने से तत्काल गंभीर खतरा नहीं होता, लेकिन लगातार अधिक अवशेष वाले खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि आम सहित सभी फलों को खाने से पहले बहते पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। इससे सतह पर मौजूद धूल, गंदगी और कुछ रासायनिक अवशेषों को कम करने में मदद मिल सकती है। यह भी जरूरी है कि किसान और निर्यातक कीटनाशकों के उपयोग से जुड़े वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करें ताकि उपभोक्ताओं तक सुरक्षित खाद्य पदार्थ पहुंच सकें।
भारत के सामने अब गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती
भारतीय आमों की वैश्विक पहचान स्वाद और गुणवत्ता के लिए है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में बने रहने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण को और मजबूत करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग की बेहतर ट्रेनिंग, निर्यात से पहले सख्त जांच व्यवस्था और आधुनिक क्वारेंटाइन सुविधाओं की जरूरत है। इससे भारतीय आमों को लेकर विदेशी बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और भविष्य में ऐसे प्रतिबंधों की संभावना कम होगी।
विदेशों में हर साल कितना आम निर्यात करता है भारत?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है, लेकिन उत्पादन के मुकाबले निर्यात का हिस्सा काफी कम है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 29,938 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात किया, जिसकी कुल कीमत करीब 56.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर रही। भारत से सबसे अधिक आम संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अमेरिका, ब्रिटेन, कुवैत और कतर जैसे देशों में भेजे जाते हैं। APEDA के आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया में आम उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद अपने कुल उत्पादन का बहुत छोटा हिस्सा ही विदेशों में निर्यात कर पाता है।
निर्यात कम होने की क्या वजह है?
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में आम की घरेलू मांग बेहद अधिक है। इसके अलावा कोल्ड चेन, लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता मानकों, फाइटोसैनिटरी नियमों और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन जैसी चुनौतियां भी निर्यात बढ़ाने में बाधा बनती हैं। यही कारण है कि दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद भारत अपने कुल आम उत्पादन का लगभग 1 प्रतिशत या उससे भी कम हिस्सा ही निर्यात कर पाता है।
ज्योत्सना सिंह
11.06.2026
शब्द 1705


