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नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग ने पकड़ी रफ्तार, तराई में बढ़ते तनाव के बीच रुपईडीहा सीमा पर कड़ी निगरानी
Nepal: नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग और तराई क्षेत्र में बढ़ती राजनीतिक-सामाजिक हलचल के बीच भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई गई है। रुपईडीहा-नेपालगंज बॉर्डर पर निगरानी और जांच तेज है।
India Nepal Border
Nepal: नेपाल में देश को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को लेकर सक्रिय संगठनों की गतिविधियां अब काठमांडू और बड़े राजनीतिक केंद्रों से आगे बढ़कर तराई और भारत से सटे सीमावर्ती जिलों तक दिखाई देने लगी हैं। दूसरी ओर, सुनसरी और आसपास के इलाकों में हाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने भी नेपाल के मैदानी क्षेत्र में तनाव बढ़ाया है। इन दोनों घटनाक्रमों को देखते हुए उत्तर प्रदेश से लगी भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं। बहराइच के रुपईडीहा-नेपालगंज सीमा मार्ग पर आने-जाने वाले लोगों और वाहनों की जांच बढ़ा दी गई है।
नेपाल के बांके, बर्दिया, कपिलवस्तु, रुपनदेही और नवलपरासी जैसे सीमावर्ती जिलों में हिंदू राष्ट्र की मांग से जुड़े विभिन्न संगठनों की बैठकों, ज्ञापनों और लामबंदी की सूचनाओं पर भारतीय सुरक्षा एजेंसियां नजर रख रही हैं। खुली भारत-नेपाल सीमा और दोनों देशों के बीच रोजाना होने वाली बड़ी आवाजाही के कारण नेपाल में किसी भी राजनीतिक या सामाजिक तनाव का असर सीमावर्ती भारतीय जिलों तक पहुंचने की आशंका बनी रहती है।
एसएसबी, पुलिस और नेपाली एपीएफ के बीच बढ़ा समन्वय
रुपईडीहा भारत और नेपाल के बीच प्रमुख व्यापारिक एवं यात्री मार्गों में शामिल है। यहां सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 42वीं वाहिनी नेपाल की आर्म्ड पुलिस फोर्स (APF) और स्थानीय पुलिस के साथ पहले से समन्वय में काम करती रही है। हाल के महीनों में दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों की बैठक में सीमा प्रबंधन, संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और आपसी सूचनाओं के आदान-प्रदान को और प्रभावी बनाने पर सहमति भी बनी थी।
सुरक्षा एजेंसियां सीमा से गुजरने वाले संदिग्ध व्यक्तियों, वाहनों और असामान्य गतिविधियों पर विशेष नजर रख रही हैं। रुपईडीहा चेकपोस्ट पर पहले से आधुनिक निगरानी तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत फेस रिकग्निशन और वाहन नंबर प्लेट पहचान जैसी प्रणालियां भी लगाई जा चुकी हैं। 
सुनसरी की हिंसा ने बढ़ाई चिंता
नेपाल के तराई क्षेत्र में सुरक्षा चिंता केवल हिंदू राष्ट्र की मांग से जुड़े आंदोलन के कारण नहीं बढ़ी है। जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारत की सीमा से लगे सुनसरी जिले के दिवानगंज इलाके में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच धार्मिक आयोजन में संगीत और झंडों को लेकर विवाद हिंसक हो गया था। इसमें कई लोग घायल हुए और बाद की घटनाओं को मिलाकर कम से कम तीन लोगों की मौत हुई। तनाव फैलने के बाद कई क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। )
नेपाल सरकार ने घटनाओं की जांच के लिए समिति गठित की और सामाजिक व धार्मिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों, नागरिक समाज और मीडिया से संयम बरतने को कहा।
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भी सार्वजनिक रूप से शांति और एकता की अपील करते हुए निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया। नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुङ ने मृतकों के परिवारों से मुलाकात की और आर्थिक सहायता की घोषणा की। 
हिंदू राष्ट्र की मांग नेपाल की राजनीति में फिर बनी मुद्दा
नेपाल वर्ष 2008 में राजशाही समाप्त होने के बाद संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना और 2015 के संविधान ने उसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इसके बावजूद नेपाल की राजनीति में समय-समय पर राजशाही की पुनर्स्थापना और हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग उठती रही है।
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) इस मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक मांग के रूप में उठाती रही है। इसके अलावा अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक संगठन भी नेपाल की पुरानी हिंदू राष्ट्र की पहचान बहाल करने की मांग करते रहे हैं। हाल के तनावपूर्ण माहौल में विभिन्न हिंदू संगठनों के साझा मंच और मांगपत्रों की चर्चा ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।
तराई क्यों है सबसे संवेदनशील?
भारत से सटा नेपाल का तराई क्षेत्र राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा—तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ इसकी सैकड़ों किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों ओर लोगों के बीच पारिवारिक, धार्मिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध इतने गहरे हैं कि सामान्य दिनों में भी रोजाना बड़ी संख्या में लोग बिना वीजा आवाजाही करते हैं।
यही खुलापन दोनों देशों के संबंधों की विशेषता है, लेकिन किसी तनावपूर्ण स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती भी बन जाता है। भारत के गृह मंत्रालय से जुड़े सुरक्षा दस्तावेज भी नेपाल सीमा को खुली और अत्यधिक गतिशील सीमा बताते हैं, जहां वैध आवाजाही के साथ तस्करी और अन्य सीमा-पार अपराधों को रोकना लगातार चुनौती है।
इसी कारण नेपालगंज, बांके, बर्दिया, कपिलवस्तु, रुपनदेही और नवलपरासी में होने वाली राजनीतिक या सांप्रदायिक गतिविधियों पर उत्तर प्रदेश के बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज जैसे जिलों की सुरक्षा एजेंसियों की नजर बनी रहती है।
आंदोलनकारी संगठन शांतिपूर्ण संवैधानिक रास्ते का कर रहे दावा
नेपाल के हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठनों का कहना है कि उनकी मांग देश की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ी है और इसे लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से उठाया जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद नेपाल से जुड़े पदाधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण तरीके से जनमत तैयार करना है।
हालांकि हालिया सांप्रदायिक तनाव के बाद नेपाल सरकार के सामने चुनौती यह है कि राजनीतिक और धार्मिक मांगों को हिंसक या सांप्रदायिक रूप लेने से कैसे रोका जाए। सरकार ने सभी पक्षों से संयम, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक एकता बनाए रखने की अपील की है।
भारत के लिए मामला केवल नेपाल की घरेलू राजनीति नहीं
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहस मूलतः उसका आंतरिक राजनीतिक विषय है, लेकिन भारत के लिए इसकी सुरक्षा और सामाजिक संवेदनशीलता अलग है। खुली सीमा के कारण बड़े आंदोलन, सांप्रदायिक तनाव या राजनीतिक अस्थिरता का सीधा प्रभाव सीमावर्ती व्यापार, यातायात और स्थानीय कानून-व्यवस्था पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि रुपईडीहा सहित प्रमुख सीमा चौकियों पर फिलहाल रणनीति सीमा बंद करने की नहीं, बल्कि आवाजाही जारी रखते हुए निगरानी बढ़ाने की है। दोनों देशों के सुरक्षा बल सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं और हालात पर नजर रखे हुए हैं।
फिलहाल रुपईडीहा और आसपास भारतीय सीमा क्षेत्र में स्थिति सामान्य है, लेकिन नेपाल के तराई जिलों में हिंदू राष्ट्र की मांग, हालिया सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक लामबंदी ने सीमा सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट संदेश दे दिया है—नेपाल की हर बड़ी हलचल अब सीमा के उस पार तक सीमित मानकर नहीं चला जा सकता।


