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Nepal News: नेपाल का जलविद्युत विस्तार, बिजली की प्रचुरता के बीच हिमालयी सुरक्षा का बड़ा सवाल
Nepal Hydropower Projects Effect: नेपाल तेजी से जलविद्युत क्षमता बढ़ा रहा है, लेकिन 2026 की भोटेकोशी त्रासदी ने हिमालयी परियोजनाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जानिए नेपाल की बिजली क्षमता, प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं, भारत-चीन निवेश और भूकंप, भूस्खलन व हिमनदीय आपदाओं के बढ़ते जोखिम की पूरी कहानी।
Nepal Hydropower Projects Effect Himalayan Explained in Hindi
Nepal Hydropower Projects Effect: नेपाल आज दक्षिण एशिया में सबसे तेजी से जलविद्युत क्षमता बढ़ाने वाले देशों में शामिल है। विशाल हिमालयी नदियां, ऊंचाई में तीव्र अंतर और प्रचुर जलप्रवाह उसे स्वाभाविक रूप से जलविद्युत उत्पादन के लिए अनुकूल बनाते हैं। लेकिन अगस्त 2026 की भोटेकोशी, ल्हेन्दे और त्रिशूली घाटी की विनाशकारी घटना ने नेपाल की पूरी जलविद्युत रणनीति के सामने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि नेपाल अपनी नदियों से कितनी बिजली बना सकता है, सवाल यह भी है कि जिन हिमालयी घाटियों में सैकड़ों अरब रुपये की परियोजनाएं खड़ी की जा रही हैं, वे भूकंप, भूस्खलन, चट्टानों के टूटने, हिमनदों के धंसने, हिमझीलों के फटने, प्राकृतिक रूप से नदी के अवरुद्ध होने और अचानक आने वाले मलबा-प्रवाह के सामने कितनी सुरक्षित हैं। 2015 के गोरखा भूकंप ने नेपाल को एक तरह की चेतावनी दी थी, अगस्त 2026 की त्रासदी ने उस चेतावनी का दायरा और बड़ा कर दिया है।
इस समय नेपाल के पास कितनी बिजली है
नेपाल विद्युत प्राधिकरण की 2025–26 की वार्षिक रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष के अंत में देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग 4,120 मेगावाट दर्ज की गई थी। जुलाई और अगस्त 2026 में नई परियोजनाओं के जुड़ने के बाद नवीनतम परिचालन आंकड़े इसे लगभग 4,300 मेगावाट के आसपास रखते हैं। दोनों संख्याओं में अंतर विरोधाभास नहीं है। वार्षिक रिपोर्ट एक निश्चित तारीख पर बंद होती है, जबकि बाद की संख्या उसके बाद चालू हुई इकाइयों को भी शामिल करती है।
नेपाल के बिजली क्षेत्र में पिछले डेढ़ दशक में सबसे बड़ा परिवर्तन निजी क्षेत्र के प्रवेश से हुआ है। उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार निजी क्षेत्र की 227 चालू परियोजनाओं की संयुक्त क्षमता लगभग 3,459 मेगावाट हो चुकी है। अकेले वित्तीय वर्ष 2025–26 में निजी क्षेत्र की 23 नई परियोजनाएं चालू हुईं और लगभग 529 मेगावाट नई क्षमता राष्ट्रीय व्यवस्था में जुड़ी। इससे स्पष्ट है कि नेपाल का जलविद्युत क्षेत्र अब केवल नेपाल विद्युत प्राधिकरण द्वारा संचालित सरकारी संयंत्रों पर निर्भर नहीं है। निजी कंपनियां इसका सबसे बड़ा उत्पादन आधार बन चुकी हैं।
लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण संख्या निर्माणाधीन परियोजनाओं की है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण से उपलब्ध अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार 213 जलविद्युत परियोजनाएं वित्तीय व्यवस्था पूरी करके निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं, इनकी संयुक्त प्रस्तावित क्षमता लगभग 6,472 मेगावाट है। यानी जितनी जलविद्युत क्षमता नेपाल ने अब तक कई दशकों में खड़ी की है, उससे कहीं अधिक क्षमता की परियोजनाएं इस समय निर्माणाधीन हैं।
इसके अतिरिक्त 105 परियोजनाएं, जिनकी क्षमता 2,200 मेगावाट से अधिक है, विकास के विभिन्न चरणों में हैं। लगभग 281 दूसरी प्रस्तावित परियोजनाएं करीब 16,425 मेगावाट क्षमता के लिए बिजली खरीद समझौते की प्रतीक्षा में बताई गई हैं। इसलिए नेपाल को केवल वर्तमान 4,300 मेगावाट वाले देश के रूप में देखना अधूरा होगा। वह अगले दशक में दस हजार मेगावाट से बहुत आगे जाने की तैयारी कर रहा है और उसकी दीर्घकालिक योजना 28,500 से 30,000 मेगावाट तक पहुंचने की है।
नेपाल को स्वयं कितनी बिजली चाहिए
यहीं नेपाल की जलविद्युत कहानी का सबसे दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। अगस्त 2026 में देश की अधिकतम घरेलू बिजली मांग मोटे तौर पर 2,450 से 2,550 मेगावाट के बीच रही। एक हालिया दिन में राष्ट्रीय अधिकतम मांग 2,547 मेगावाट दर्ज की गई, जबकि निर्यात को जोड़ने के बाद पूरी विद्युत व्यवस्था का अधिकतम भार 3,338 मेगावाट तक पहुंचा।
इसका सीधा अर्थ है कि वर्षा ऋतु में नेपाल के पास अपनी घरेलू आवश्यकता से कहीं अधिक बिजली बनाने की क्षमता है। जुलाई 2026 में स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि नेपाल विद्युत प्राधिकरण को कुछ जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पादन घटाने के लिए कहना पड़ा। लगभग 4,300 मेगावाट स्थापित क्षमता के मुकाबले उस समय घरेलू अधिकतम मांग करीब 2,200 मेगावाट थी। भारत और बांग्लादेश को बिजली निर्यात करने के बावजूद कई सौ मेगावाट बिजली के उपयोग अथवा निर्यात की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।
लेकिन सर्दियों में कहानी उलट जाती है। नेपाल की अधिकांश परियोजनाएं नदी के तत्काल प्रवाह पर आधारित हैं। वर्षा ऋतु में नदियों में बहुत पानी होता है और वे भरपूर बिजली बनाती हैं। लेकिन सर्दियों में नदी का प्रवाह घटने पर उन्हीं संयंत्रों का उत्पादन तेजी से गिर जाता है। कई बार नेपाल को भारत से बिजली आयात करनी पड़ती है। इसलिए नेपाल की असली समस्या केवल ‘कितनी बिजली उत्पादन क्षमता है’ नहीं है। उसकी बड़ी समस्या यह है कि वर्षा ऋतु में बिजली आवश्यकता से अधिक और शुष्क मौसम में आवश्यकता से कम होती है।
इसी कारण जलाशय आधारित परियोजनाएं नेपाल के लिए विशेष महत्व रखती हैं। वे वर्षा ऋतु का पानी रोककर शुष्क मौसम और शाम के अधिक मांग वाले घंटों में बिजली बना सकती हैं।
नेपाल की पुरानी और प्रमुख चालू परियोजनाएं
नेपाल विद्युत प्राधिकरण स्वयं लगभग बीस जलविद्युत संयंत्र संचालित करता है, जिनकी संयुक्त क्षमता करीब 627 मेगावाट है। इसके अतिरिक्त उसकी सहायक कंपनियों और निजी क्षेत्र के संयंत्रों से हजारों मेगावाट बिजली आती है।
देश की सबसे बड़ी चालू परियोजनाओं में अपर तामाकोशी, 456 मेगावाट, तामाकोशी नदी पर है। कालीगंडकी ए, 144 मेगावाट, कालीगंडकी नदी पर है। मध्य मर्स्यांगदी, 70 मेगावाट और मर्स्यांगदी, 69 मेगावाट, दोनों मर्स्यांगदी नदी पर हैं। कुलेखानी प्रथम, 60 मेगावाट और कुलेखानी द्वितीय, 32 मेगावाट, कुलेखानी नदी व्यवस्था से जुड़े हैं। त्रिशूली, 24 मेगावाट और देवीघाट, 15 मेगावाट, त्रिशूली नदी पर हैं। गंडक, 15 मेगावाट, नारायणी नदी व्यवस्था पर है। मोदी खोला, लगभग 14.8 मेगावाट, मोदी नदी पर, पुवाखोला, लगभग 6.2 मेगावाट, पुवा नदी पर, पनौती, 2.4 मेगावाट, रोशी नदी पर और सेती, लगभग 1.5 मेगावाट, सेती नदी पर स्थित है।
इन पुरानी परियोजनाओं की ऐतिहासिक निर्माण लागत एक समान सरकारी सूची में उपलब्ध नहीं है। कई परियोजनाएं दशकों पहले विदेशी सहायता से बनी थीं, कुछ का विस्तार बाद में हुआ और अलग-अलग समय की मुद्राओं तथा लागतों को आज के मूल्य में सीधे तुलना करना भ्रामक हो सकता है।
रसुवागढ़ी, जिस परियोजना को 2026 की आपदा ने नए सवालों के बीच ला खड़ा किया
रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना की क्षमता 111 मेगावाट है। यह उस ऊपरी भोटेकोशी नदी पर स्थित है जो केरुंग और ल्हेन्दे नदियों के मिलने से बनती है। परियोजना का जलग्रहण स्थल इस संगम से लगभग 400 मीटर नीचे है। इसका विद्युतगृह भूमिगत बनाया गया है। परियोजना ने 31 दिसंबर 2024 से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया था और इसकी अनुमानित वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 614 गीगावाट-घंटा है।
इस परियोजना का मुख्य ऋण नेपाल के कर्मचारी भविष्य निधि कोष ने दिया। पूंजी में चिलिमे जलविद्युत कंपनी, नेपाल विद्युत प्राधिकरण, स्थानीय निकाय, स्थानीय नागरिक और आम निवेशक शामिल हैं। इसके निर्माण कार्य में चीनी कंपनी China International Water and Electric Corporation शामिल थी, जबकि विद्युत और यांत्रिक उपकरणों का काम भारत की Voith Hydro ने किया।
यह अंतर समझना बहुत जरूरी है। किसी परियोजना का निर्माण ठेका चीनी कंपनी के पास होने का अर्थ यह नहीं है कि परियोजना चीन के पैसे से बनी है। रसुवागढ़ी मूलतः नेपाली वित्तीय संसाधनों पर आधारित परियोजना है।
लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से यही परियोजना आज सबसे गंभीर पुनर्विचार मांगती है। 2015 के गोरखा भूकंप के समय निर्माण स्थल भूस्खलन और चट्टान गिरने से प्रभावित हुआ था। अगस्त 2026 में इसी नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में विशाल हिमनदीय और चट्टानी धंसाव से पैदा हुई बाढ़ ने दिखा दिया कि यहां खतरा केवल भूकंप नहीं है।
इस परियोजना के लिए अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि हजारों मीटर ऊपर कोई हिमनद टूटता है, विशाल मलबा नदी में आता है, नदी अस्थायी रूप से अवरुद्ध होती है और फिर प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है तो परियोजना उस संयुक्त आपदा को कितना सह सकती है। इसलिए रसुवागढ़ी को वर्तमान परिस्थितियों में उच्च प्राकृतिक जोखिम वाली परियोजनाओं में रखना उचित होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी इंजीनियरिंग खराब है। बल्कि यह कि जिस भूभाग में वह स्थित है उसका प्राकृतिक जोखिम पहले के आकलन से अधिक गंभीर सिद्ध हुआ है।
अपर तामाकोशी, नेपाल की अपनी पूंजी से बनी सबसे बड़ी परियोजना
456 मेगावाट की अपर तामाकोशी परियोजना नेपाल के लिए केवल एक बिजलीघर नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी रही है। यह दोलखा जिले में तामाकोशी नदी पर बनी है और इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे बड़े विदेशी सरकारी ऋण के बजाय मुख्य रूप से नेपाल के अपने वित्तीय संसाधनों से बनाया गया।
नेपाल विद्युत प्राधिकरण, नेपाल टेलीकॉम, कर्मचारी भविष्य निधि कोष, नागरिक निवेश कोष और राष्ट्रीय बीमा संस्थान इसके प्रमुख वित्तीय भागीदार रहे। स्थानीय नागरिकों और आम नेपाली निवेशकों को भी इसमें हिस्सेदारी दी गई।
लेकिन यही परियोजना 2015 के गोरखा भूकंप के दौरान हिमालयी जलविद्युत परियोजनाओं की कमजोरी का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी। भूकंप के बाद परियोजना के जलग्रहण क्षेत्र में लगभग 17 से 18 सेंटीमीटर तक भू-धंसाव दर्ज किया गया। पहुंच सड़कें भूस्खलन से बंद हो गईं और आसपास चट्टान गिरने की घटनाएं हुईं।
अंतरराष्ट्रीय भू-तकनीकी विशेषज्ञों ने बाद में यहां विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने बांध से अधिक चिंता आसपास की अत्यंत खड़ी पहाड़ी ढालों, चट्टान गिरने और दीर्घकालिक भूस्खलन को लेकर व्यक्त की। विशेषज्ञ समिति ने बांध, नींव और ढाल की सुरक्षा का पुनर्मूल्यांकन किया।
इसलिए अपर तामाकोशी को असुरक्षित कहना उचित नहीं होगा। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि यह मजबूत इंजीनियरिंग वाली लेकिन उच्च प्राकृतिक जोखिम क्षेत्र में स्थित परियोजना है।
अपर त्रिशूली-1, अत्यधिक जोखिम वाले भूगोल में कठोर सुरक्षा मानक
216 मेगावाट की अपर त्रिशूली-1 परियोजना इस पूरी चर्चा की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में है, क्योंकि यह उसी त्रिशूली–भोटेकोशी नदी व्यवस्था में स्थित है जिसने अगस्त 2026 की विनाशकारी आपदा देखी।
परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 73.16 अरब नेपाली रुपये रही है। इसमें दक्षिण कोरिया की Korea South-East Power Company की 50 प्रतिशत, Daelim की 15 प्रतिशत, Kyeryong की 10 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम के नेतृत्व में नौ वित्तीय संस्थाओं ने करीब 453 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण उपलब्ध कराया। एशियाई विकास बैंक और कनाडा के जलवायु कोष ने भी इसमें वित्त दिया।
लेकिन इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी सुरक्षा समीक्षा है। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम की स्वतंत्र समीक्षा ने परियोजना क्षेत्र को पहले ही भूकंपीय रूप से सक्रिय, सूक्ष्म भूकंपों वाला, अत्यंत खड़ी पहाड़ियों और भूस्खलन के खतरे वाला क्षेत्र माना था। 2015 के भूकंप के बाद इसके मूल निर्माण प्रारूप में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।
परियोजना को अत्यंत शक्तिशाली संभावित भूकंप सहने के हिसाब से तैयार किया गया। इसके लिए अधिकतम संभावित भू-कंपन का स्तर 0.83 g माना गया। बांध को अत्यंत दुर्लभ और बड़ी बाढ़ की स्थिति के अनुरूप मजबूत किया गया। विद्युतगृह और कुछ दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं को भूमिगत अथवा अधिक सुरक्षित स्थानों पर रखा गया और बांध टूटने की स्थिति का अलग अध्ययन कराया गया।
पुराने अध्ययन में हिमझील फटने का तत्काल जोखिम अपेक्षाकृत कम माना गया था। लेकिन यह चेतावनी भी दी गई थी कि बढ़ता तापमान भविष्य में इस खतरे को बढ़ा सकता है। अगस्त 2026 की वास्तविक घटना के बाद उस पुराने निष्कर्ष की पुनः जांच आवश्यक हो गई है, क्योंकि इस बार आपदा सीधे हिमझील फटने से नहीं बल्कि हिमनद और चट्टानी ढाल के विशाल धंसाव से पैदा हुई।
अपर त्रिशूली-1 इसलिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, इसका प्राकृतिक जोखिम बहुत अधिक है। लेकिन इसकी इंजीनियरिंग और स्वतंत्र सुरक्षा समीक्षा भी नेपाल की अधिकांश परियोजनाओं की तुलना में कहीं अधिक कठोर रही है।
अरुण तृतीय, नेपाल में भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में एक
अरुण तृतीय की क्षमता 900 मेगावाट है। यह पूर्वी नेपाल में अरुण नदी पर बन रही है। परियोजना भारत सरकार और हिमाचल प्रदेश सरकार के संयुक्त सार्वजनिक उपक्रम SJVN की नेपाली सहायक कंपनी द्वारा विकसित की जा रही है।
भारत सरकार ने उत्पादन भाग के लिए शुरुआती स्वीकृत लागत करीब 5,724 करोड़ भारतीय रुपये रखी थी। बाद में Investment Board Nepal के आंकड़ों में कुल स्वीकृत निवेश लगभग 144.76 अरब नेपाली रुपये दर्ज किया गया। लागत समय और निर्माण की प्रगति के साथ बदल सकती है, इसलिए दोनों संख्याएं अलग चरणों की हैं।
परियोजना में करीब 80 मीटर ऊंचा ठोस गुरुत्व बांध, लगभग 11.8 किलोमीटर लंबी जल सुरंग और भूमिगत विद्युतगृह बनाया जा रहा है। इसकी अनुमानित वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता करीब 4,019 गीगावाट-घंटा है।
अरुण तृतीय के पुराने भूकंपीय अध्ययन ने क्षेत्र को व्यापक रूप से भूकंप-सक्रिय माना, हालांकि परियोजना स्थल को हिमालय की कुछ दूसरी केंद्रीय घाटियों की तुलना में अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष भूकंपीय जोखिम वाला बताया गया था। लेकिन पुराने अध्ययनों की सीमा यह है कि उनमें आज की तरह हिमनद, भूस्खलन, प्राकृतिक नदी-अवरोध और मलबा-बाढ़ को एक संयुक्त जोखिम के रूप में उतना महत्व नहीं दिया जाता था।
इसलिए अरुण तृतीय को कम जोखिम वाली परियोजना कहना उचित नहीं होगा। लेकिन त्रिशूली–भोटेकोशी के अत्यधिक संवेदनशील हिमनदीय क्षेत्र की परियोजनाओं से इसका जोखिम अलग प्रकृति का है।
लोअर अरुण, भारतीय निवेश की अगली बड़ी परियोजना
लोअर अरुण की प्रस्तावित क्षमता 669 मेगावाट है। यह अरुण तृतीय के नीचे अरुण नदी पर विकसित की जा रही है और भारत की SJVN को इसका विकास अधिकार मिला है। इसकी अनुमानित वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता करीब 2,901 मिलियन यूनिट है।
नेपाल निवेश बोर्ड के अनुसार इसका स्वीकृत निवेश करीब 92.68 अरब नेपाली रुपये है। यह परियोजना अभी अरुण तृतीय जैसी पूर्ण निर्माण गति तक नहीं पहुंची है और वित्तीय तथा पूर्व-निर्माण प्रक्रियाओं के विभिन्न चरणों में रही है।
अरुण नदी पर अरुण तृतीय और लोअर अरुण का एक साथ विकास नेपाल और भारत के ऊर्जा संबंधों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भविष्य में इसी नदी व्यवस्था की ऊपरी और निचली परियोजनाओं के संयुक्त जल और आपदा प्रबंधन की आवश्यकता भी होगी।
अपर कर्णाली, 900 मेगावाट की बड़ी लेकिन विलंबित परियोजना
अपर कर्णाली की क्षमता 900 मेगावाट प्रस्तावित है। यह कर्णाली नदी पर भारतीय GMR समूह के नेतृत्व में विकसित की जाने वाली परियोजना है। इसकी वित्तीय व्यवस्था लंबे समय से सबसे बड़ी बाधाओं में रही है, इसलिए इसे अरुण तृतीय की तरह पूर्ण गति से निर्माणाधीन परियोजना मानना उचित नहीं होगा।
नेपाल निवेश बोर्ड ने इसका अनुमानित निवेश करीब 162.49 अरब नेपाली रुपये दर्ज किया है। दूसरे आकलनों में परियोजना पूरी होने तक लागत लगभग 9,145 करोड़ भारतीय रुपये तक पहुंचने का अनुमान दिया गया है।कर्णाली का विशाल जलग्रहण क्षेत्र इसे ऊर्जा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है, लेकिन किसी बड़ी हिमालयी परियोजना की तरह यहां भी भूकंप, भूस्खलन, तलछट और नदी घाटी की स्थिरता को दीर्घकालिक सुरक्षा में शामिल करना आवश्यक है।
तनहूं, केवल 140 मेगावाट लेकिन नेपाल के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण
तनहूं जलाशय आधारित परियोजना की क्षमता 140 मेगावाट है और यह सेती नदी पर बन रही है। क्षमता के लिहाज से यह अरुण तृतीय या अपर तामाकोशी से बहुत छोटी है, लेकिन नेपाल की बिजली व्यवस्था के लिए इसका महत्व अनुपात से कहीं अधिक है। इसका कारण यह है कि यह पानी को जलाशय में रोककर जरूरत के समय बिजली बना सकती है। नेपाल की अधिकांश परियोजनाएं वर्षा ऋतु में खूब बिजली और सर्दियों में कम बिजली देती हैं। तनहूं जैसी परियोजना इस मौसमी असंतुलन को कम कर सकती है।


