Pakistan News: पाकिस्तान में इस बार अजूबा तख़्ता पलट!

Pakistan News: पाकिस्तान में असीम मुनीर की ताकत कैसे बढ़ी? 27वें संविधान संशोधन, Chief of Defence Forces पद, फील्ड मार्शल का दर्जा और नागरिक-सैन्य रिश्तों से समझिए क्या यह ‘संवैधानिक तख्तापलट’ है।

Yogesh Mishra
Published on: 26 Aug 2026 11:06 PM IST
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Pakistan News (Image Credit-Social Media)

Pakistan News: पाकिस्तान के इतिहास में सेना का ताकतवर होना कोई नई घटना नहीं है। इस देश ने जनरल अयूब ख़ान के मार्शल लॉ से लेकर याह्या ख़ान की त्रासदी, ज़िया-उल-हक़ की लंबी तानाशाही और परवेज़ मुशर्रफ़ के सैनिक शासन तक बहुत कुछ देखा है। पाकिस्तान में निर्वाचित प्रधानमंत्री जेल गए हैं, फाँसी पर चढ़े हैं और निर्वासित हुए हैं। सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी कई बार इस्लामाबाद की संसद से अधिक शक्तिशाली साबित हुआ है।

लेकिन फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर का मामला पुराने सैनिक शासकों से कुछ अलग है। उन्होंने अभी तक संविधान निलंबित नहीं किया। संसद भंग नहीं की। प्रधानमंत्री को गिरफ्तार करके राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा नहीं किया। सड़कों पर टैंक उतारकर मार्शल लॉ की घोषणा भी नहीं की।

इसके बावजूद अगस्त 2026 में पाकिस्तान की वास्तविक सत्ता-संरचना को देखें तो एक असाधारण तस्वीर दिखाई देती है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ हैं। राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी हैं। संसद काम कर रही है। न्यायपालिका मौजूद है। लेकिन मुनीर सेना प्रमुख होने के साथ पाकिस्तान के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेन्स फ़ोर्सेज़ हैं। पाँच सितारा फ़ील्ड मार्शल हैं। उनका सैन्य कार्यकाल नए ढाँचे में पाँच वर्ष के लिए पुनर्निर्धारित हुआ है। उनका फ़ील्ड मार्शल का दर्जा जीवन भर रहेगा। उन्हें राष्ट्रपति जैसी व्यापक कानूनी प्रतिरक्षा दी गई है और पाकिस्तान की तीनों सेनाओं तथा रणनीतिक सैन्य ढाँचे पर उनका ऐसा संस्थागत प्रभाव बन चुका है जो पाकिस्तान के किसी सामान्य सेना प्रमुख को पहले उपलब्ध नहीं था।

इसीलिए सवाल अब केवल यह नहीं है कि पाकिस्तान में फिर कभी सैनिक तख़्ता पलट होगा या नहीं। अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब किसी सेना प्रमुख को संविधान बदलकर इतनी शक्ति दे दी जाए कि उसे सत्ता हासिल करने के लिए तख़्ता पलट करने की आवश्यकता ही न रहे, तब उस व्यवस्था को लोकतंत्र कहा जाए, मिश्रित शासन कहा जाए या बिना टैंक वाला संवैधानिक तख़्ता पलट?

पाकिस्तान के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की हाल की रिपोर्टें इसी परिवर्तन की अलग-अलग परतों की ओर संकेत करती हैं।

आसिम मुनीर की कहानी कहाँ से शुरू होती है?

आसिम मुनीर पाकिस्तान सेना के उन विरले अधिकारियों में हैं जिन्होंने मिलिट्री इंटेलिजेंस और इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस, दोनों का नेतृत्व किया। अक्टूबर 2018 में वे आईएसआई के महानिदेशक बने। लेकिन केवल आठ महीने बाद उन्हें हटा दिया गया।

उनके कार्यकाल को आईएसआई प्रमुख के रूप में सबसे छोटी अवधियों में गिना जाता है। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के आग्रह पर बदला गया था। उनके हटने के कारणों को लेकर पाकिस्तान में अनेक कथाएँ प्रचलित हुईं, जिनमें इमरान परिवार से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की जानकारी देने का दावा भी शामिल था। लेकिन ऐसे दावों का निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

तथ्य इतना है कि इमरान और मुनीर के बीच उस समय से सहज संबंध नहीं रहे। बाद में मुनीर गुजरांवाला कोर के कमांडर और फिर सेना मुख्यालय में क्वार्टरमास्टर जनरल बने।

नवंबर 2022 में जब जनरल क़मर जावेद बाजवा का छह वर्ष लंबा कार्यकाल समाप्त हुआ तो शहबाज़ शरीफ़ सरकार ने तमाम राजनीतिक तनावों के बीच मुनीर को सेना प्रमुख चुना। उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति बहुत निकट थी, इसलिए नियुक्ति के समय तकनीकी अड़चन भी थी। लेकिन उन्हें चार सितारा जनरल बनाकर सेवा में बनाए रखा गया और 29 नवंबर 2022 को उन्होंने पाकिस्तान सेना की कमान संभाल ली।

उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि तीन वर्ष के भीतर यही अधिकारी पाकिस्तान का दूसरा फ़ील्ड मार्शल और फिर देश की पूरी सैन्य संरचना का सर्वोच्च संवैधानिक अधिकारी बन जाएगा।

इमरान ख़ान से टकराव ने बदला पाकिस्तान का सत्ता संतुलन



मुनीर की सत्ता बढ़ने का पहला निर्णायक चरण इमरान ख़ान और सेना के खुले संघर्ष से पैदा हुआ। अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से इमरान सत्ता से बाहर हुए। इमरान ने सेना के तत्कालीन नेतृत्व पर परोक्ष और बाद में प्रत्यक्ष आरोप लगाए और सेना तथा पीटीआई के बीच वह पुराना समीकरण समाप्त हो गया जिसने 2018 में इमरान की सत्ता तक पहुँचने में कथित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मुनीर के सेना प्रमुख बनने के कुछ महीने बाद 9 मई 2023 को इमरान ख़ान की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान में अभूतपूर्व हिंसक प्रदर्शन हुए। लाहौर में कोर कमांडर के आवास सहित कई सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले हुए। पाकिस्तान सेना ने इसे अपनी संस्था पर सीधा हमला माना।

इसके बाद जो कार्रवाई हुई उसने पाकिस्तान के राजनीतिक संतुलन को बदल दिया। पीटीआई के हजारों कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। नेताओं पर मुकदमे चले। अनेक प्रमुख नेता पार्टी छोड़ गए। कुछ मामलों को सैन्य अदालतों तक ले जाया गया। इमरान के विरुद्ध मुकदमों का सिलसिला चलता रहा।

इमरान अगस्त 2023 से जेल में हैं। उन पर कई कानूनी मामले चले हैं, हालांकि कुछ सजाएँ अपील में निलंबित या समाप्त भी हुईं।

महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत यह है कि अगस्त 2026 में इमरान के करीबी सहयोगी ज़ुल्फ़िकार बुख़ारी ने कहा कि यदि इमरान बाहर आते हैं तो वे मुनीर से टकराव नहीं चाहेंगे। जिस नेता ने सेना के सामने खुली राजनीतिक चुनौती खड़ी की थी, उसके खेमे से समझौते की भाषा निकलना बताता है कि शक्ति-संतुलन कितना बदल चुका है।

2024 का चुनाव: इमरान हारे नहीं, लेकिन सत्ता उनके हाथ नहीं आई

फरवरी 2024 के आम चुनाव इस संघर्ष का दूसरा बड़ा पड़ाव थे। पीटीआई का चुनाव-चिह्न छिन चुका था। उसके उम्मीदवार बड़ी संख्या में निर्दलीय लड़े। इमरान जेल में थे।

इसके बावजूद उनके समर्थित उम्मीदवारों ने बहुत मजबूत प्रदर्शन किया। परिणामों ने साबित किया कि सेना से टकराव के बाद भी इमरान का जनाधार समाप्त नहीं हुआ था।

लेकिन सत्ता अंततः पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के गठबंधन के हाथ आई। शहबाज़ शरीफ़ फिर प्रधानमंत्री बने।

यहीं से पाकिस्तान का नागरिक-सैन्य समीकरण मुनीर के अनुकूल हो गया। एक कमजोर और गठबंधन-आधारित नागरिक सरकार, एक लोकप्रिय किंतु जेल में पड़ा विपक्षी नेता और उसके सामने एक संगठित सेना—यह वह वातावरण था जिसमें सेना प्रमुख के लिए राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना आसान था।

मुनीर के दौर को ऐसे ‘मिश्रित शासन’ के रूप में देखा गया जिसमें नागरिक संस्थाएँ औपचारिक रूप से बनी रहती हैं, लेकिन सेना राष्ट्रीय नीति के बड़े हिस्से पर प्रभाव रखती है।

मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष ने मुनीर को फ़ील्ड मार्शल बना दिया

मुनीर को पाकिस्तान के पिछले ताकतवर सेना प्रमुखों से अलग करने वाली निर्णायक घटना मई 2025 में हुई।

भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन का गंभीर सैन्य टकराव हुआ। संघर्ष समाप्त होने के कुछ ही दिनों बाद शहबाज़ शरीफ़ की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने आसिम मुनीर को फ़ील्ड मार्शल के पाँच सितारा दर्जे पर पदोन्नत करने का फैसला किया।

पाकिस्तान सरकार ने इसे सैन्य संघर्ष के दौरान उनकी रणनीतिक नेतृत्व क्षमता की मान्यता बताया।

पाकिस्तान के इतिहास में इससे पहले केवल अयूब ख़ान फ़ील्ड मार्शल बने थे। अयूब ने 1958 में सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद स्वयं को यह दर्जा दिया था, जबकि मुनीर को एक निर्वाचित सरकार ने यह पद दिया।

लगभग छह दशक बाद पाकिस्तान में किसी सैन्य अधिकारी को पाँच सितारा दर्जा मिला था।

शुरुआत में यह पद केवल सम्मानात्मक दिखाई दे सकता था। लेकिन कुछ महीनों के भीतर इसे ऐसी संवैधानिक शक्ति और सुरक्षा से जोड़ दिया गया जिसने इसकी प्रकृति बदल दी।

27वाँ संविधान संशोधन: असली शक्ति यहीं से आई

नवंबर 2025 का 27वाँ संविधान संशोधन मुनीर की शक्ति की वास्तविक आधारशिला है।

पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 243 में व्यापक परिवर्तन किए गए। लंबे समय से मौजूद चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी का पद समाप्त कर दिया गया। सेना प्रमुख को ही नए बनाए गए चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेन्स फ़ोर्सेज़ का पद देने की व्यवस्था की गई।

इसका सीधा अर्थ था कि पाकिस्तान आर्मी के प्रमुख को सेना, नौसेना और वायुसेना—तीनों के ऊपर सर्वोच्च संयुक्त सैन्य नेतृत्व की संवैधानिक स्थिति मिल गई।

दिसंबर 2025 में मुनीर को पाकिस्तान का पहला सीडीएफ अधिसूचित किया गया। रक्षा मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार वे एक साथ चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ और चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेन्स फ़ोर्सेज़ बने और यह नियुक्ति पाँच वर्ष के लिए की गई।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि मुनीर सामान्य परिस्थितियों में 2030 तक पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के शीर्ष पर बने रह सकते हैं।

यह दशकों में पाकिस्तान की सैन्य कमान का सबसे व्यापक पुनर्गठन था और सैन्य केंद्रीकरण की बड़ी छलांग भी।

जीवन भर का फ़ील्ड मार्शल पद और कानूनी प्रतिरक्षा

इस संशोधन का दूसरा हिस्सा और अधिक असाधारण है। पाँच सितारा सैन्य अधिकारियों—फ़ील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ़ द एयर फ़ोर्स और एडमिरल ऑफ़ द फ़्लीट—को जीवन भर अपना पद, वर्दी और विशेषाधिकार बनाए रखने का संवैधानिक अधिकार दिया गया।

ऐसे अधिकारी को साधारण प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता। बल्कि राष्ट्रपति के विरुद्ध इस्तेमाल होने वाली अनुच्छेद 47 जैसी विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता होगी।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पाँच सितारा सैन्य अधिकारी को अनुच्छेद 248 के अनुरूप व्यापक कानूनी प्रतिरक्षा प्रदान की गई।

यानी फ़ील्ड मार्शल के रूप में अधिकारी जीवन भर रैंक, विशेषाधिकार और वर्दी रख सकता है। सैन्य कमान का कार्यकाल पूरा होने के बाद संघीय सरकार ‘राज्यहित’ में उसकी जिम्मेदारियाँ निर्धारित कर सकती है।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि आजीवन प्रतिरक्षा कुछ व्यक्तियों के हाथ में जवाबदेही से मुक्त असाधारण शक्ति केंद्रित करती है।

यही वह बिंदु है जहाँ मुनीर केवल शक्तिशाली सेना प्रमुख नहीं रहते। उनके व्यक्तित्व और पद के लिए संविधान में स्थायी सुरक्षा-दायरा तैयार हो जाता है।

परमाणु कमान में भी सेना की भूमिका बढ़ी



तीसरा बड़ा परिवर्तन पाकिस्तान की रणनीतिक और परमाणु कमान से जुड़ा है। 27वें संशोधन ने कमांडर नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड का नया पद बनाया। इस पद पर नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे। लेकिन नाम की सिफारिश सेना प्रमुख यानी सीडीएफ करेगा और कमांडर पाकिस्तान आर्मी से होगा।

यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान का ‘परमाणु बटन’ अकेले मुनीर के हाथ में आ गया है। औपचारिक रूप से नेशनल कमांड अथॉरिटी और प्रधानमंत्री की भूमिका बनी हुई है।

लेकिन पाकिस्तान के परमाणु और रणनीतिक संसाधनों की सैन्य कमान-श्रृंखला में सेना प्रमुख की स्थिति पहले से कहीं अधिक संस्थागत और निर्णायक हो गई है।

यानी मुनीर के पास केवल थलसेना की कमान नहीं है। बल्कि पाकिस्तान की संयुक्त सैन्य योजना तथा रणनीतिक प्रणाली में भी उनका सर्वोच्च प्रभाव है।

विदेश नीति में भी रावलपिंडी की भूमिका बढ़ी

मुनीर की शक्ति का चौथा और शायद सबसे दिखाई देने वाला आयाम विदेश नीति है।

जून 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में मुनीर के साथ अभूतपूर्व निजी मुलाकात की। बाद के महीनों में अमेरिका, सऊदी अरब, ईरान और दूसरे देशों के साथ पाकिस्तान की कूटनीति में मुनीर की व्यक्तिगत भूमिका लगातार बढ़ी।

2026 में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में उभरा। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आईं कि महत्वपूर्ण बातचीत का समन्वय इस्लामाबाद की नागरिक सत्ता के बजाय रावलपिंडी यानी सैन्य मुख्यालय से होता दिखाई दिया।

24 अगस्त 2026 की रिपोर्टों में भी मुनीर की ईरान से जुड़ी कूटनीतिक भूमिका सामने आई। किसी संसदीय लोकतंत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति का किसी क्षेत्रीय संकट पर सीधे सेना प्रमुख को इस तरह मुख्य राजनीतिक-सामरिक संवादकर्ता मानना अपने आप में बताता है कि दुनिया पाकिस्तान के वास्तविक शक्ति केंद्र को कहाँ देखती है।

क्या मुनीर पाकिस्तान के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन चुके हैं?

यही सवाल पाकिस्तान की मौजूदा राजनीति को समझने की कुंजी है।

राष्ट्रपति के पास संवैधानिक शक्तियाँ हैं। प्रधानमंत्री के पास सरकार चलाने की शक्ति है। संसद कानून बनाती है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, परमाणु रणनीति और अब तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान एक ही सैन्य अधिकारी के हाथ में केंद्रित हो गई है।

यही कारण है कि विदेशी मीडिया और रणनीतिक संस्थानों के विश्लेषण में मुनीर को पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली सैन्य नेताओं में गिना जा रहा है।

इसे समझने के लिए पाकिस्तान के पुराने सैन्य शासकों से तुलना करना जरूरी है।

अयूब ख़ान: टैंक के सहारे सत्ता

अयूब ख़ान ने 1958 में मार्शल लॉ के माध्यम से सत्ता हासिल की। पहले राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा ने संविधान समाप्त करके अयूब को चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बनाया। लेकिन कुछ ही सप्ताह में अयूब ने स्वयं मिर्ज़ा को बाहर कर दिया।

वे लगभग ग्यारह वर्ष सत्ता में रहे। उन्होंने नियंत्रित लोकतंत्र की व्यवस्था बनाई, स्वयं को फ़ील्ड मार्शल बनाया और नागरिक शासन को सैन्य-नौकरशाही ढाँचे के अधीन कर दिया।

लेकिन 1965 के भारत-पाक युद्ध, आर्थिक असमानता, विपक्षी असंतोष और 1968-69 के व्यापक जन आंदोलन ने उन्हें कमजोर कर दिया। अंततः मार्च 1969 में सत्ता एक और जनरल, याह्या ख़ान को सौंपकर हटना पड़ा।

याह्या ख़ान: सेना की ताकत भी देश को टूटने से नहीं बचा सकी

याह्या ख़ान ने संविधान निलंबित किया और मार्शल लॉ लगाया। उन्होंने 1970 के आम चुनाव कराए।

पूर्वी पाकिस्तान में शेख़ मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग को स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन सत्ता हस्तांतरण नहीं हुआ।

इसके बाद सैन्य कार्रवाई, गृहयुद्ध, भारत-पाक युद्ध और दिसंबर 1971 में पाकिस्तान का विभाजन हुआ तथा बांग्लादेश अस्तित्व में आया।

पाकिस्तान की सैन्य पराजय के बाद याह्या का शासन एक झटके में समाप्त हो गया।

यह पाकिस्तान के लिए पहला बड़ा सबक था कि सेना की अधिकतम शक्ति भी गलत राजनीतिक निर्णयों से देश को टूटने से नहीं बचा सकती।

ज़िया-उल-हक़: सबसे लंबा सैनिक शासन

जनरल ज़िया-उल-हक़ ने 1977 में प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्ता पलटा। उन्होंने चुनाव जल्दी कराने का वादा किया, लेकिन करीब ग्यारह साल सत्ता में रहे।

भुट्टो को विवादास्पद न्यायिक प्रक्रिया के बाद फाँसी दी गई। ज़िया ने पाकिस्तान का व्यापक इस्लामीकरण किया। अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के बाद अमेरिका और सऊदी अरब के साथ साझेदारी बढ़ाई और आईएसआई तथा सेना को राज्य के भीतर अत्यंत शक्तिशाली बनाया।

वे शायद पाकिस्तान के सबसे पूर्ण सैनिक शासक थे—राष्ट्रपति भी और सेना प्रमुख भी।

लेकिन 17 अगस्त 1988 को बहावलपुर के निकट उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और उनकी मृत्यु हो गई।

मुशर्रफ़: औपचारिक तख़्ता पलट का आखिरी बड़ा उदाहरण

परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान के अंतिम औपचारिक सैनिक तख़्ता पलट के नायक थे।

अक्टूबर 1999 में उन्होंने नवाज़ शरीफ़ की सरकार हटाई। बाद में राष्ट्रपति बने। संविधान को निलंबित किया और 9/11 के बाद अमेरिका के महत्वपूर्ण सहयोगियों में गिने गए।

लेकिन 2007 में मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी को हटाने और आपातकाल लगाने के बाद वकील आंदोलन, नागरिक समाज और राजनीतिक दल उनके विरुद्ध खड़े हुए।

2008 में महाभियोग के दबाव के बीच उन्हें राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा। बाद में वे निर्वासन में गए। पाकिस्तान लौटे तो मुकदमों का सामना करना पड़ा और अंततः दुबई में उनका निधन हुआ।

सत्ता के शिखर पर बैठे उस जनरल का राजनीतिक अंत अपने देश से बाहर हुआ।

मुनीर से पहले आया था ‘हाइब्रिड शासन’

इसके बाद अशफ़ाक़ परवेज़ कयानी और क़मर जावेद बाजवा जैसे सेना प्रमुखों ने बिना औपचारिक तख़्ता पलट के शक्ति का नया मॉडल विकसित किया।

कयानी ने परदे के पीछे से सुरक्षा और विदेश नीति पर सेना का प्रभाव बनाए रखा। बाजवा का छह वर्षीय दौर और भी महत्वपूर्ण था।

इमरान ख़ान की सरकार के शुरुआती वर्षों में नागरिक और सैन्य नेतृत्व के ‘एक पन्ने पर’ होने की बात कही जाती रही। लेकिन बाद में वही संबंध टूट गया।

बाजवा के दौर को पाकिस्तान में ‘हाइब्रिड शासन’ की अवधारणा से जोड़ा गया—निर्वाचित सरकार सामने, सेना पीछे निर्णायक शक्ति के रूप में।

मुनीर के तहत पर्दे के पीछे की सैन्य शक्ति का बड़ा भाग अब पर्दे के सामने संवैधानिक रूप से स्थापित हो गया है।

क्या मुनीर अब नया तख़्ता पलट करने वाले हैं?

इस प्रश्न का उत्तर सनसनी से नहीं, प्रमाण से देना होगा।

24 अगस्त 2026 तक उपलब्ध विश्वसनीय पाकिस्तानी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग में ऐसा कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है कि सेना ने शहबाज़ शरीफ़ सरकार को हटाने, संसद भंग करने, संविधान निलंबित करने और मुनीर को राष्ट्रपति या चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बनाने की कोई तत्काल योजना तैयार कर ली है।

सैन्य तख़्ता पलट की अफ़वाहें पाकिस्तान की राजनीति का स्थायी हिस्सा हैं। इसलिए महज राजनीतिक अस्थिरता या सेना प्रमुख की शक्ति को किसी आसन्न तख़्ता पलट का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

उलटे वर्तमान सत्ता-समीकरण को देखें तो औपचारिक तख़्ता पलट मुनीर के लिए लाभ से अधिक जोखिम पैदा कर सकता है।

शहबाज़ सरकार उनसे टकराव की स्थिति में नहीं है। संसद ने उनकी शक्ति बढ़ाने वाले संशोधन पारित किए हैं। सबसे लोकप्रिय विपक्षी नेता जेल में है। सैन्य कमान उनके नीचे केंद्रीकृत है और अमेरिका तथा मध्य-पूर्व की बड़ी शक्तियाँ उन्हें सीधे संवादकर्ता के रूप में स्वीकार कर रही हैं।

जब इतना कुछ संविधान के भीतर मिल चुका हो तो टैंक भेजकर संविधान तोड़ने की आवश्यकता क्यों होगी?

क्या यह ‘संवैधानिक तख़्ता पलट’ है?

यहीं ‘संवैधानिक तख़्ता पलट’ की अवधारणा सामने आती है।

27वें संशोधन के आलोचकों ने इसे लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बताया है। संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि संशोधन ने सेना प्रमुख की सत्ता को अभूतपूर्व संवैधानिक संरक्षण दिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी कमजोर हुई।

सरकार का तर्क अलग है। उसका कहना है कि आधुनिक युद्ध, संयुक्त सैन्य संचालन और नई सुरक्षा चुनौतियों के कारण एकीकृत सैन्य कमान आवश्यक थी तथा संवैधानिक संशोधन केवल उसी संरचना को स्पष्ट करता है।

लेकिन समस्या यह है कि सुधार केवल सैन्य कमान का पुनर्गठन नहीं करता। उसी समय फ़ील्ड मार्शल को जीवन भर वर्दी, पद-सम्मान और प्रतिरक्षा भी देता है।

इसलिए संस्थागत सुधार और व्यक्ति-विशेष को असाधारण सुरक्षा देने की रेखा धुंधली हो जाती है।

मुनीर की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होती है

मुनीर के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जितनी शक्ति उनके हाथ में केंद्रित होती जाएगी, पाकिस्तान की विफलताओं की राजनीतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही उनके दरवाजे तक पहुँचेगी।

पाकिस्तान आतंकवाद की नई लहर, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की गतिविधियों, बलूचिस्तान में विद्रोह, अफ़ग़ानिस्तान के साथ तनाव, कमजोर आर्थिक आधार, विदेशी ऋण, आईएमएफ पर निर्भरता और युवा आबादी में राजनीतिक असंतोष से जूझ रहा है।

बाहर से पाकिस्तान की प्रतिष्ठा बढ़ाना और भीतर से देश चलाना दो अलग-अलग परीक्षाएँ हैं।

इमरान ख़ान अभी भी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती

दूसरा बड़ा खतरा इमरान ख़ान हैं।

राजनीतिक रूप से उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन उनके मतदाताओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। 2024 के चुनाव ने दिखाया कि गिरफ्तारी और चुनावी बाधाओं के बावजूद पीटीआई समर्थक समाज का बहुत बड़ा हिस्सा हैं।

अगस्त 2026 में इमरान की सेहत को लेकर भी गंभीर राजनीतिक हलचल हुई। उनके सार्वजनिक जीवन में लौटने की कोई भी संभावना पाकिस्तान के राजनीतिक समीकरण को फिर बदल सकती है।

फिलहाल उनके सहयोगियों से समझौते के संकेत आ रहे हैं। लेकिन स्वयं इमरान क्या रुख अपनाएँगे, यह स्पष्ट नहीं है।

यदि सेना और इमरान के बीच किसी प्रकार की सहमति बनती है तो मुनीर की व्यवस्था और मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि संघर्ष फिर खुला तो पाकिस्तान दोबारा गंभीर राजनीतिक संकट में प्रवेश कर सकता है।

सेना के भीतर उत्तराधिकार भी एक बड़ा सवाल

तीसरा और सबसे कम दिखाई देने वाला खतरा सेना के भीतर से आता है।

पाकिस्तान सेना एक अत्यंत अनुशासित संस्था है, लेकिन उसका नेतृत्व भी पदोन्नति, वरिष्ठता, कोर कमांडरों और उत्तराधिकार के जटिल संतुलन पर चलता है।

जब एक व्यक्ति का कार्यकाल असाधारण रूप से लंबा हो जाए, उसके पास सेना प्रमुख और संयुक्त सैन्य प्रमुख दोनों पद हों तथा उसके बाद के भविष्य को भी संविधान सुरक्षा प्रदान करे, तब अगली पीढ़ी के वरिष्ठ जनरलों की पदोन्नति और अवसर प्रभावित होते हैं।

अभी मुनीर के विरुद्ध किसी सैन्य विद्रोह या आंतरिक तख़्ता पलट का विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। इसलिए ऐसी कल्पना को तथ्य बनाना गलत होगा।

लेकिन पाकिस्तान के इतिहास में सेना के भीतर शक्ति-संतुलन हमेशा निर्णायक रहा है।

पाकिस्तान में अब टैंक की जरूरत क्यों नहीं?

यही मुनीर की शक्ति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

वे संभवतः पाकिस्तान के इतिहास के पहले ऐसे सैन्य नेता हैं जिन्हें वह सब पाने के लिए औपचारिक मार्शल लॉ लगाने की जरूरत नहीं पड़ी, जिसे उनके पूर्ववर्तियों ने संविधान तोड़कर हासिल किया था।

अयूब को संसद और संविधान के ऊपर जाने के लिए सैनिक शासन चाहिए था। ज़िया को प्रधानमंत्री हटाना पड़ा। मुशर्रफ़ को सत्ता पर कब्ज़ा करना पड़ा।

मुनीर के लिए संसद ने ही संविधान में परिवर्तन किया।

यह इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सत्ता का सैन्यीकरण अस्थायी आदेश नहीं रहता, बल्कि कानूनी संस्था में बदल जाता है।

प्रतिरोध करने वाला यह नहीं कह सकता कि संविधान निलंबित है। संविधान मौजूद है, लेकिन उसका रूप बदल चुका है।

तो क्या पाकिस्तान फिर सैन्य शासन की ओर बढ़ रहा है?

2026 के पाकिस्तान को समझने के लिए ‘क्या मुनीर तख़्ता पलट करेंगे?’ शायद गलत प्रश्न है।

सही प्रश्न है—क्या तख़्ता पलट पहले ही एक नए रूप में हो चुका है?

इसका उत्तर पूरी तरह हाँ या पूरी तरह नहीं में नहीं दिया जा सकता।

पाकिस्तान में अभी भी नागरिक सरकार है। संसद कानून बनाती है। राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं और अदालतें कभी-कभी सरकार के विरुद्ध निर्णय भी देती हैं। इसलिए इसे अयूब, ज़िया या मुशर्रफ़ के प्रत्यक्ष सैनिक शासन के बराबर रखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

लेकिन दूसरी ओर सेना प्रमुख के हाथ तीनों सेनाओं की सर्वोच्च कमान, पाँच वर्ष का नया कार्यकाल, जीवन भर फ़ील्ड मार्शल का पद और वर्दी, व्यापक कानूनी प्रतिरक्षा, रणनीतिक कमान पर निर्णायक प्रभाव, विदेश नीति में केंद्रीय भूमिका और कमजोर नागरिक विपक्ष के कारण जो शक्ति संकेंद्रित हुई है, वह सामान्य संसदीय लोकतंत्र से बहुत दूर है।

इसे शायद ‘संवैधानिक रूप से संस्थागत सैन्य प्रधानता’ कहना सबसे सटीक होगा।

इतिहास मुनीर को भी एक चेतावनी देता है

पाकिस्तान के जनरलों का इतिहास मुनीर के लिए भी चेतावनी है।

अयूब लगभग अजेय लगते थे, जन आंदोलन ने उन्हें हटा दिया। याह्या के पास पूरा सैन्य राज्य था, 1971 ने उनकी सत्ता समाप्त कर दी। ज़िया ने लगभग ग्यारह वर्ष शासन किया, एक विमान दुर्घटना में सब कुछ अचानक खत्म हो गया। मुशर्रफ़ ने संविधान, सेना और राष्ट्रपति पद तीनों अपने नियंत्रण में रखे, फिर भी न्यायपालिका और नागरिक प्रतिरोध के सामने उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी।

बाजवा पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली सेना प्रमुखों में गिने गए। लेकिन उनके विदाई तक उनका नाम देश के गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण से जुड़ गया।

मुनीर ने इन सबकी तुलना में अपने लिए अधिक व्यवस्थित संवैधानिक सुरक्षा बनाई है। लेकिन संविधान किसी शासक को लोकप्रियता नहीं दे सकता और कानूनी प्रतिरक्षा आर्थिक संकट, राजनीतिक असंतोष या सुरक्षा विफलता से नहीं बचाती।

अंततः आसिम मुनीर की कहानी किसी एक महत्वाकांक्षी जनरल की कहानी भर नहीं है। यह पाकिस्तान की उस दीर्घकालिक बीमारी की नई अवस्था है जिसमें नागरिक राजनीति अपनी कमजोरी और आपसी संघर्ष के कारण बार-बार सेना के लिए जगह बनाती है और फिर उसी सेना की बढ़ती शक्ति से भयभीत होती है।

शहबाज़ शरीफ़ और उनके सहयोगियों ने मुनीर को जिन अधिकारों के लिए संवैधानिक रास्ता दिया है, वही अधिकार भविष्य में किसी दूसरे सेना प्रमुख के हाथ भी जा सकते हैं।

इसलिए सवाल मुनीर से बड़ा है। यह पाकिस्तान के राज्य-चरित्र का सवाल है।

यदि एक निर्वाचित संसद स्वयं ऐसी व्यवस्था बना देती है जिसमें सेना प्रमुख नागरिक नेतृत्व से अधिक दीर्घकालिक, अधिक सुरक्षित और कई क्षेत्रों में अधिक प्रभावशाली हो जाए, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा बचा रहने के बावजूद उसकी आत्मा कमजोर हो सकती है।

और शायद पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति का सबसे सटीक वाक्य यही है—

पहले पाकिस्तान में जनरल सत्ता पाने के लिए संविधान तोड़ते थे। अब संविधान को इस तरह बदला जा रहा है कि जनरल को संविधान तोड़ने की जरूरत न पड़े।

इसीलिए आज पाकिस्तान में टैंकों की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है। संसद भंग नहीं हुई है। मार्शल लॉ घोषित नहीं हुआ है। फिर भी रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय पहले से कहीं अधिक ताकतवर है।

आसिम मुनीर ने अभी तख़्ता नहीं पलटा है। लेकिन उन्होंने उस राजनीतिक व्यवस्था को जरूर बदल दिया है जिसमें सिद्धांततः सेना नागरिक सरकार के अधीन होनी चाहिए। अब उनका अगला अध्याय इस बात से तय नहीं होगा कि वे और कितनी शक्ति हासिल करते हैं। बल्कि इससे होगा कि इतनी शक्ति के बावजूद वे पाकिस्तान को आर्थिक स्थिरता, राजनीतिक वैधता और आंतरिक शांति दे पाते हैं या नहीं।

पाकिस्तान के इतिहास का कठोर निष्कर्ष यही है कि वहाँ जनरल अक्सर सत्ता जीत लेते हैं, लेकिन इतिहास बहुत कम जनरलों को विजेता की तरह विदा करता है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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