टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाएगा पाकिस्तान! मुनीर की नई चाल से टेंशन में आवाम, क्या है फील्ड मार्शल का पूरा प्लान?

योजना के तहत पाकिस्तान में 12 से 15 प्रांत बनाने या 160 तक छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने के विकल्पों की चर्चा है।

Sachin Singh
Published on: 9 Oct 2026 12:37 PM IST (Updated on: 9 Oct 2026 7:09 PM IST)
टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाएगा पाकिस्तान! मुनीर की नई चाल से टेंशन में आवाम, क्या है फील्ड मार्शल का पूरा प्लान?
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Pakistan: पाकिस्तान में आने वाले समय में देश का नक्शा बदलने की चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर देश के चार बड़े प्रांतों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो पाकिस्तान में मौजूदा चार प्रांतों की जगह 12 से 15 नए प्रांत बनाए जा सकते हैं। एक दूसरे विकल्प के तहत देश को 160 तक छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटने की बात भी सामने आई है। यानी कि पाकिस्तान टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाएगा।

यह जानकारी ब्रिटिश पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट से सामने आई है। हालांकि, इसे पाकिस्तान के बंटने या देश के अलग-अलग देशों में टूटने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल चर्चा पाकिस्तान की मौजूदा सीमाओं के भीतर उसके प्रांतों और प्रशासनिक इकाइयों को नए तरीके से व्यवस्थित करने की है। लेकिन इस प्रस्ताव ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या छोटे प्रांत बनने से आम लोगों को सरकारी सुविधाएं आसानी से मिलेंगी, या इससे पाकिस्तान की सेना का राजनीतिक प्रभाव और बढ़ सकता है?

पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान होंगे छोटे हिस्सों में?

पाकिस्तान में अभी चार प्रमुख प्रांत हैं—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान। प्रस्ताव के मुताबिक, इन बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने पर विचार किया जा रहा है। इसके पीछे एक तर्क यह दिया जा रहा है कि इतने बड़े इलाकों को एक ही प्रशासनिक व्यवस्था के तहत चलाना मुश्किल होता है। आबादी और क्षेत्रफल के मामले में भी इन प्रांतों के बीच काफी अंतर है। ऐसे में छोटे प्रांत बनने से सरकार को स्थानीय स्तर पर काम करने और लोगों तक सुविधाएं पहुंचाने में आसानी हो सकती है। हालांकि, इस बदलाव का असर केवल सरकारी दफ्तरों या प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा। पाकिस्तान में प्रांतों की अपनी राजनीतिक ताकत है। इसलिए सीमाओं में बदलाव होने पर सत्ता का संतुलन भी बदल सकता है।

पंजाब की आबादी बहुत बड़ी, बलूचिस्तान क्षेत्रफल में सबसे बड़ा

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में करीब 12.8 करोड़ लोग रहते हैं। यह देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रांत है और पाकिस्तान की कुल आबादी के आधे से भी अधिक लोगों का घर है। दूसरी ओर, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन वहां की आबादी करीब डेढ़ करोड़ बताई गई है।

इन दोनों प्रांतों की स्थिति से साफ होता है कि पाकिस्तान के सभी प्रांतों की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। पंजाब जैसे घनी आबादी वाले इलाके में सरकारी सेवाओं की मांग बहुत ज्यादा है, जबकि बलूचिस्तान जैसे बड़े क्षेत्र में दूर-दराज के इलाकों तक सुविधाएं पहुंचाना बड़ी चुनौती हो सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब के ग्रामीण इलाकों में कुछ लोगों को सरकारी सुविधाओं तक पहुंचने के लिए घंटों सफर करना पड़ता है। यहां एक और गंभीर समस्या साफ पीने के पानी की उपलब्धता से जुड़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रांत के एक चौथाई से भी कम लोगों के घरों में साफ पेयजल की भरोसेमंद सुविधा है।

इन्हीं समस्याओं को आधार बनाकर छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों की जरूरत बताई जा रही है। हालांकि, पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियों की वजह केवल बड़े प्रांत नहीं हैं। देश धीमी आर्थिक वृद्धि, महंगाई और कर्ज चुकाने के भारी खर्च जैसी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।

असीम मुनीर की ताकत बढ़ने की चर्चा क्यों?

इस प्रस्ताव का सबसे अहम पहलू पाकिस्तान की सेना की भूमिका है। पाकिस्तान के इतिहास में सेना लंबे समय तक सीधे सत्ता संभालती रही है। कई बार चुनी हुई सरकारों के कामकाज पर भी सेना का प्रभाव रहने की बात सामने आती रही है।

'द इकोनॉमिस्ट' की रिपोर्ट में इस बात पर सवाल उठाया गया है कि जिन समस्याओं को छोटे प्रांत बनाकर दूर करने की बात कही जा रही है, उनमें सेना की भूमिका पर भी चर्चा होनी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, सेना के पास कीमती जमीन और कारोबार से जुड़ी ताकत है और सरकारी संसाधनों में भी उसकी अहम हिस्सेदारी रही है।

यहीं से इस योजना को लेकर विवाद की गुंजाइश पैदा होती है। एक तरफ छोटे प्रांतों से प्रशासन लोगों के करीब आ सकता है, लेकिन दूसरी तरफ अगर ये प्रांत आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और केंद्र सरकार पर ज्यादा निर्भर रहते हैं, तो सेना और केंद्र का प्रभाव बढ़ सकता है।

इसलिए सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पाकिस्तान में कितने प्रांत बनाए जाएंगे। बड़ा सवाल यह भी है कि इस बदलाव से फायदा किसे होगा और सत्ता का संतुलन किसके पक्ष में जाएगा।

पंजाब और सिंध की राजनीतिक ताकत पर पड़ सकता है असर

पाकिस्तान में पंजाब और सिंध केवल प्रशासनिक क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि दोनों की राजनीति में भी बड़ी भूमिका है। पंजाब में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज यानी PML-N का पारंपरिक प्रभाव रहा है, जबकि सिंध को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी PPP का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है।

इन प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत ने इन्हें पाकिस्तान की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। यही ताकत कई मौकों पर केंद्र सरकार और सेना के प्रभाव के सामने एक संतुलन का काम भी कर सकती है।

अगर पंजाब और सिंध को छोटे-छोटे प्रांतों में बांटा जाता है, तो इनकी मौजूदा राजनीतिक ताकत अलग-अलग हिस्सों में बंट सकती है। इससे क्षेत्रीय नेताओं और राजनीतिक दलों का प्रभाव बदलने की संभावना है।

हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नए प्रांतों की सीमाएं कैसे तय होती हैं, उन्हें कितने अधिकार मिलते हैं और उनके पास आर्थिक संसाधनों का कितना हिस्सा रहता है।

खैबर पख्तूनख्वा में तनाव ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें

खैबर पख्तूनख्वा में भी राजनीतिक तनाव पाकिस्तान की केंद्र सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, इमरान खान की पार्टी के हजारों समर्थकों ने इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया। यह मार्च PTI और सरकार के बीच बातचीत विफल होने के बाद शुरू हुआ।

खैबर पख्तूनख्वा में PTI की सरकार है। प्रदर्शनकारियों को राजधानी में प्रवेश करने से रोकने के लिए पाकिस्तानी सरकार ने इस्लामाबाद के आसपास भारी सुरक्षा व्यवस्था की और मार्च रोकने का संकल्प जताया।

इस घटनाक्रम से केंद्र सरकार और प्रांतीय प्रशासन के बीच तनाव और बढ़ सकता है। इसके साथ ही खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवादी हिंसा की समस्या भी बनी हुई है, जिससे वहां शासन चलाने की चुनौतियां और गंभीर हो जाती हैं।

ऐसे हालात में प्रांतों के अधिकारों और सीमाओं में बदलाव का सवाल और संवेदनशील हो जाता है। छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने की योजना पर आगे बढ़ने के लिए सरकार को स्थानीय राजनीति और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है।

बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की चुनौतियां

पाकिस्तान के सामने बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में भी कई तरह की समस्याएं हैं। बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा होती रही है। इसके पीछे आजादी की मांग, प्राकृतिक संसाधनों को लेकर विवाद और इस्लामाबाद की भूमिका का विरोध जैसे मुद्दे बताए जाते हैं।

अगर बलूचिस्तान को छोटे हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो वहां की सीमाओं, संसाधनों के बंटवारे और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं।

दूसरी तरफ, PoK में भी शासन व्यवस्था, महंगाई, टैक्स और आर्थिक हालात को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नाराजगी और प्रशासन से जुड़ी समस्याएं पहले से मौजूद हैं।

ऐसे में प्रांतों का पुनर्गठन करना आसान काम नहीं होगा। सरकार को यह तय करना पड़ेगा कि नए क्षेत्रों की सीमाएं कहां होंगी, उन्हें कितना अधिकार मिलेगा और प्राकृतिक व आर्थिक संसाधनों का बंटवारा किस तरह किया जाएगा।

क्या छोटे प्रांतों से आम जनता को फायदा होगा?

छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि इससे प्रशासन लोगों के करीब पहुंच सकता है। सरकारी दफ्तरों, स्वास्थ्य सेवाओं, पानी और दूसरी सुविधाओं तक पहुंच आसान हो सकती है। बड़े और दूर-दराज के इलाकों में स्थानीय प्रशासन को लोगों की समस्याएं समझने और उनका समाधान करने का बेहतर मौका मिल सकता है।

लेकिन केवल प्रांतों की संख्या बढ़ाने से सभी समस्याएं अपने आप खत्म नहीं होंगी। इसके लिए पर्याप्त बजट, जवाबदेह प्रशासन, स्थानीय प्रतिनिधियों को अधिकार और संसाधनों का सही बंटवारा भी जरूरी होगा।

अगर नए प्रांतों के पास अपने फैसले लेने की पर्याप्त ताकत नहीं होगी और उन्हें हर बड़े मामले में केंद्र पर निर्भर रहना पड़ेगा, तो छोटे प्रांत बनाने का फायदा सीमित रह सकता है। इसके उलट, अगर इस प्रक्रिया से केंद्र और सेना का नियंत्रण बढ़ता है, तो राजनीतिक संतुलन बदलने की आशंका भी बनी रहेगी।

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Sachin Singh is a media professional with 4 years of experience in the field of journalism and digital media. After completing his education at Jamia Millia Islamia Central University, he has worked with reputed media organizations such as Editor ji, ABP News and Doordarshan. Currently, Sachin Singh is working as a Content Writer with News Track, where he contributes to fast-paced digital news coverage and content creation. His areas of interest include politics, national and international affairs, and food. With experience across different formats of journalism, he focuses on producing informative, accurate, and engaging content for digital audiences.

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